लेख शीर्षक: “न्यायपालिका की गरिमा और समानता का संदेश: Sakhawat and Another Vs State of Uttar Pradesh में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक अवलोकन”
भूमिका:
भारतीय संविधान की मूल भावना न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा पर आधारित है। इस भावना को सुदृढ़ करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने Sakhawat and Another Vs State of Uttar Pradesh (2024) के एक हालिया निर्णय में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की पीठ ने यह स्पष्ट रूप से कहा कि ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड को “Lower Court Record” कहना संविधान की आत्मा के प्रतिकूल है।
मामले की पृष्ठभूमि:
इस आपराधिक अपील में याचिकाकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश राज्य के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की थी। बहस के दौरान, दस्तावेजों का उल्लेख करते हुए ट्रायल कोर्ट की फाइल को “Lower Court Record” कहा गया, जिस पर न्यायालय ने आपत्ति प्रकट की।
सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण अवलोकन:
न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा:
“The record of the Trial Court should not be referred to as ‘Lower Court Record’. Describing any Court as a ‘Lower Court’ is against the ethos of our Constitution.”
यह टिप्पणी भारतीय न्याय प्रणाली में हर स्तर की अदालतों की गरिमा और समानता के सिद्धांत को रेखांकित करती है। सुप्रीम कोर्ट का यह कहना था कि किसी भी न्यायालय को “निचली अदालत” कहना केवल पदानुक्रम को दिखाने का साधन नहीं है, बल्कि यह एक अपमानजनक शब्दावली भी बन सकती है जो उस न्यायिक संस्था की गरिमा को ठेस पहुंचाती है।
संवैधानिक महत्व:
भारत का संविधान स्पष्ट रूप से न्यायपालिका को स्वतंत्र और समान दर्जा प्रदान करता है। अनुच्छेद 50 में न्यायपालिका की कार्यपालिका से पृथकता का सिद्धांत निहित है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि हर न्यायालय — चाहे वह सर्वोच्च न्यायालय हो या न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत — संविधान के न्यायिक ढांचे में समान महत्व रखता है।
भविष्य के लिए दिशानिर्देश:
इस निर्णय से निम्नलिखित दिशा-निर्देश स्थापित हुए:
- भाषा की संवेदनशीलता: न्यायिक आदेशों और सरकारी पत्राचार में ट्रायल कोर्ट को “Lower Court” कहने से बचना चाहिए।
- “Trial Court” या “Subordinate Court” जैसे शब्द अधिक उपयुक्त और संवैधानिक दृष्टिकोण से उचित हैं।
- न्यायिक गरिमा का सम्मान: सभी स्तर की अदालतें संविधान के न्यायिक ढांचे का हिस्सा हैं और उनके प्रति सम्मान अनिवार्य है।
निष्कर्ष:
Sakhawat and Another Vs State of Uttar Pradesh का निर्णय केवल एक आपराधिक अपील नहीं था, बल्कि यह न्यायपालिका के भीतर की भाषा और सम्मान के संबंध में एक आदर्श दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी हमें यह याद दिलाती है कि न्याय केवल निर्णयों में नहीं बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा में भी निहित होता है।
यह निर्णय भारतीय न्याय व्यवस्था में सम्मानजनक संवाद और संवैधानिक चेतना को मजबूत करने की दिशा में एक मील का पत्थर है।