शीर्षक:
“जब कानून का दुरुपयोग होता है, वह ढाल नहीं बल्कि तलवार बन जाता है: कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत झूठे मामलों को रद्द करने का मार्ग प्रशस्त”
भूमिका:
कानून का उद्देश्य न्याय प्रदान करना होता है — न कि किसी व्यक्ति द्वारा प्रतिशोध, उत्पीड़न या दुर्भावना के उपकरण के रूप में उसका प्रयोग करना। विशेष रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 [SC/ST (Prevention of Atrocities) Act] जैसे विशेष कानूनों का उद्देश्य वंचित समुदायों की रक्षा करना है। किंतु जब इन विशेषाधिकारों का दुरुपयोग केवल व्यक्तिगत या वित्तीय विवादों में दबाव बनाने के लिए किया जाता है, तो यह कानून की आत्मा के विपरीत होता है।
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि यदि SC/ST एक्ट के अंतर्गत दायर आपराधिक मामला केवल पूर्व-प्रचलित दीवानी या वित्तीय विवाद का परिणाम हो, और उसमें वास्तव में कोई अत्याचार या जातीय दुर्भावना का तत्व न हो, तो ऐसी आपराधिक कार्यवाही को रद्द किया जा सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि:
इस मामले में वादी पक्ष ने आरोपी के खिलाफ SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज करवाया था। शिकायत के अनुसार आरोपी ने जातिसूचक शब्दों का प्रयोग कर अपमान किया। लेकिन गहन जांच से यह सामने आया कि दोनों पक्षों के बीच पहले से ही वित्तीय और संपत्ति संबंधी विवाद चल रहा था, जो न्यायालय में लंबित भी था।
आरोपी ने उच्च न्यायालय में आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करने के लिए याचिका दायर की और कहा कि यह प्राथमिकी केवल दबाव बनाने के उद्देश्य से दायर की गई है।
कर्नाटक उच्च न्यायालय का निर्णय:
न्यायालय ने इस मामले में SC/ST अधिनियम की वास्तविक भावना, विधिक सिद्धांतों और पिछले निर्णयों को ध्यान में रखते हुए स्पष्ट कहा:
1. कानून की भावना का दुरुपयोग अस्वीकार्य:
न्यायालय ने टिप्पणी की कि, “The law when misused ceases to be a shield and becomes a sword.” यानी जब कानून को रक्षक की बजाय प्रतिशोध के हथियार के रूप में प्रयोग किया जाए, तो वह न्याय नहीं, अन्याय को जन्म देता है।
2. पूर्ववर्ती विवाद की पृष्ठभूमि में दर्ज एफआईआर संदिग्ध:
यदि यह प्रमाणित हो जाए कि पीड़ित और आरोपी के बीच पहले से ही दीवानी, लेन-देन, संपत्ति या अन्य निजी विवाद चल रहा था, और शिकायत उसी पृष्ठभूमि में की गई है — तो यह बदनीयती (mala fide) और दुरुपयोग का संकेत है।
3. जातीय अपमान का साक्ष्य आवश्यक:
SC/ST अधिनियम की धाराओं के अंतर्गत अपराध तभी सिद्ध हो सकता है जब जातीय पहचान के कारण जानबूझकर अपमान या उत्पीड़न किया गया हो। मात्र विवाद की स्थिति में जातिसूचक शब्दों का आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं है।
4. धारा 482 CrPC के तहत कार्यवाही रद्द करना न्यायोचित:
यदि प्रथम दृष्टया शिकायत में जातीय उत्पीड़न का कोई substance नहीं है, और यह निजी विवाद के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ है, तो उच्च न्यायालय अपने अंतर्निहित अधिकारों (inherent powers) के अंतर्गत कार्यवाही को रद्द कर सकता है।
महत्वपूर्ण उद्धरण:
न्यायालय ने कहा:
“Special statutes like SC/ST (POA) Act are meant for protecting the oppressed, not for settling personal scores. When it is evident that the allegation stems from a civil or monetary conflict, allowing criminal prosecution to continue would be an abuse of the process of law.”
निष्कर्ष:
कर्नाटक उच्च न्यायालय का यह निर्णय न केवल SC/ST अधिनियम की गरिमा की रक्षा करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि इस अधिनियम का उपयोग केवल सचमुच पीड़ितों के संरक्षण के लिए हो, न कि निजी विवादों में दबाव बनाने के औजार के रूप में।
यह फैसला उन मामलों के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करता है जहां अपराध का आरोप विधिक अधिकारों की आड़ में दुर्भावनापूर्ण इरादे से लगाया गया हो। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि न्यायपालिका का कार्य न केवल दंड देना है, बल्कि निर्दोष को अनावश्यक मुकदमेबाज़ी से बचाना भी है।
इस निर्णय से न्यायिक विवेक, कानून का नैतिक अनुप्रयोग और विधिक संरक्षण की सीमाओं का सशक्त उदाहरण सामने आता है।