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सुप्रीम कोर्ट के दो बड़े फैसले: OBC क्रीमी लेयर में माता-पिता की सैलरी अकेला आधार नहीं, नेशनल बुक ट्रस्ट भी अनुच्छेद 12 के तहत राज्य

सुप्रीम कोर्ट के दो बड़े फैसले: OBC क्रीमी लेयर में माता-पिता की सैलरी अकेला आधार नहीं, नेशनल बुक ट्रस्ट भी अनुच्छेद 12 के तहत राज्य; जानिए आरक्षण और मौलिक अधिकारों पर क्या पड़ेगा असर

         सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण और मौलिक अधिकारों से जुड़े दो महत्वपूर्ण मामलों में अहम फैसले सुनाए हैं। एक फैसले में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) या निजी क्षेत्र में काम करने वाले माता-पिता का वेतन मात्र OBC अभ्यर्थियों को क्रीमी लेयर में रखने और आरक्षण से बाहर करने का निर्णायक आधार नहीं हो सकता। इसके लिए माता-पिता के पद, उसकी श्रेणी और निर्धारित सामाजिक-आर्थिक मानदंडों को भी ध्यान में रखना होगा।

दूसरे महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT) को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ की परिभाषा में शामिल माना है। अदालत ने कहा कि नेशनल बुक ट्रस्ट पर केंद्र सरकार का नियंत्रण गहरा और व्यापक है। इसलिए इसे केवल एक स्वतंत्र संस्था या सोसायटी बताकर संवैधानिक जवाबदेही से अलग नहीं किया जा सकता।

OBC क्रीमी लेयर मामले में न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार की उस मांग को खारिज कर दिया, जिसमें 11 मार्च 2026 के फैसले को केवल भविष्य की तारीख से लागू करने का अनुरोध किया गया था। हालांकि, सरकार को फैसले के अनुपालन के लिए दो महीने का अतिरिक्त समय दिया गया।

वहीं, नेशनल बुक ट्रस्ट मामले में न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए संस्था को अनुच्छेद 12 के तहत राज्य का अंग माना।

दोनों फैसले भारतीय संविधान में समानता, आरक्षण, प्रशासनिक जवाबदेही और मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।

पहला फैसला: OBC क्रीमी लेयर में माता-पिता की सैलरी अकेला आधार नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि OBC वर्ग के अभ्यर्थियों को क्रीमी लेयर में शामिल करने के लिए उनके माता-पिता की केवल सैलरी को आधार नहीं बनाया जा सकता।

विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निजी कंपनियों में कार्यरत माता-पिता के बच्चों के मामले में उनके पद की स्थिति और सरकारी सेवाओं में उसके समकक्ष पद का निर्धारण महत्वपूर्ण होगा।

अदालत ने अपने 11 मार्च 2026 के फैसले को बरकरार रखते हुए केंद्र सरकार की पुनर्विचार संबंधी मांगों को स्वीकार नहीं किया।

इस मामले में सरकार का तर्क था कि फैसले को तत्काल लागू करने से पहले पूरी हो चुकी भर्ती प्रक्रियाओं और नियुक्तियों पर असर पड़ सकता है। इससे प्रशासनिक अव्यवस्था पैदा होने की आशंका है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फैसले को लागू करने में देरी करने का कोई ठोस और उचित आधार सामने नहीं आया है।

केंद्र सरकार ने क्यों मांगा था फैसले को भविष्य से लागू करने का आदेश?

11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार बनाम रोहित नाथन मामले में महत्वपूर्ण निर्णय दिया था।

इसके बाद केंद्र सरकार ने अदालत में आवेदन दाखिल कर अनुरोध किया कि इस फैसले को केवल भविष्य में लागू किया जाए। सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 142 का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पास पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक आदेश जारी करने की शक्ति है।

केंद्र सरकार का कहना था कि यदि फैसले को पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू किया गया तो ऐसे कर्मचारियों और अभ्यर्थियों को परेशानी हो सकती है, जो इस मुकदमे में पक्षकार नहीं थे।

सरकार के अनुसार, कई भर्ती प्रक्रियाएं पहले ही पूरी हो चुकी थीं। ऐसे में पुराने चयन और नियुक्तियों पर प्रभाव पड़ने से प्रशासनिक कठिनाइयां पैदा हो सकती थीं।

सरकार चाहती थी कि अदालत फैसले को केवल भविष्य की तारीख से लागू करने का निर्देश दे, ताकि पहले से पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं को दोबारा न खोलना पड़े।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की मांग क्यों खारिज की?

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि 11 मार्च का फैसला अदालत के समक्ष उपस्थित पक्षकारों के अधिकारों को निर्धारित करता है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि संबंधित अभ्यर्थी OBC की गैर-क्रीमी लेयर श्रेणी में आते हैं और उन चयन प्रक्रियाओं में आरक्षण का लाभ, पद आवंटन तथा नियुक्ति पाने के अधिकारी हैं, जिनमें उन्होंने भाग लिया था।

पीठ ने यह भी कहा कि इन अभ्यर्थियों को उनका अधिकार देने से अपने आप किसी अन्य व्यक्ति की वरिष्ठता प्रभावित नहीं होगी।

इसके अलावा, पहले ही पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं या नियुक्तियों को दोबारा खोलने की आवश्यकता भी नहीं है।

अदालत ने इस संबंध में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के 20 दिसंबर 2016 के पत्र का उल्लेख किया। इसमें स्पष्ट किया गया था कि सिविल सेवा परीक्षा 2016 के तहत चयन का निर्धारण सुप्रीम कोर्ट में लंबित अपीलों के परिणाम के आधार पर किया जाएगा।

इससे यह स्पष्ट होता है कि संबंधित भर्ती प्रक्रिया में न्यायिक निर्णय के प्रभाव को लेकर प्रशासन पहले से अवगत था।

पहले से हुई नियुक्तियों और वरिष्ठता पर क्या होगा असर?

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया है।

अदालत ने कहा कि 11 मार्च 2026 का फैसला अपने आप किसी दूसरे व्यक्ति की पहले से निर्धारित वरिष्ठता को प्रभावित नहीं करेगा।

इसी प्रकार, पहले से पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं और नियुक्तियों को केवल इस फैसले के आधार पर दोबारा नहीं खोला जाएगा।

इसका अर्थ है कि अदालत ने एक तरफ प्रभावित अभ्यर्थियों के अधिकारों को सुरक्षित रखा है, वहीं दूसरी तरफ पहले से स्थापित प्रशासनिक व्यवस्थाओं और नियुक्तियों में अनावश्यक हस्तक्षेप से भी बचने का प्रयास किया है।

हालांकि, जो अभ्यर्थी अपने मामले को इसी तरह की परिस्थितियों वाला बताते हैं और जिनके दावे किसी न्यायालय, न्यायाधिकरण या सक्षम प्राधिकरण के सामने पहले से लंबित हैं, उनके मामलों पर संबंधित संस्था कानून के अनुसार विचार कर सकती है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे दावों का निर्णय संबंधित तथ्यों और उनके गुण-दोष के आधार पर किया जाएगा।

1993 के ऑफिस मेमोरेंडम और 2004 के पत्र का विवाद क्या है?

OBC क्रीमी लेयर से जुड़ा यह विवाद मुख्य रूप से केंद्र सरकार के 8 सितंबर 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम और 14 अक्टूबर 2004 के स्पष्टीकरण पत्र की व्याख्या से जुड़ा है।

1993 के ऑफिस मेमोरेंडम में OBC वर्ग के सामाजिक और आर्थिक रूप से उन्नत व्यक्तियों को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने के लिए मानदंड निर्धारित किए गए थे।

इस व्यवस्था में केवल आय ही नहीं, बल्कि माता-पिता के पद और सामाजिक स्थिति को भी महत्वपूर्ण माना गया।

विवाद तब पैदा हुआ जब PSU और निजी क्षेत्र में कार्यरत माता-पिता की सैलरी को क्रीमी लेयर निर्धारित करने के लिए किस प्रकार शामिल किया जाए, इस पर अलग-अलग व्याख्याएं सामने आईं।

सरकारी कर्मचारियों के बच्चों और PSU या निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए जाने पर भेदभाव का सवाल भी उठा।

सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 के फैसले में स्पष्ट किया कि सरकारी कर्मचारियों और PSU तथा निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के साथ बिना उचित आधार के अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता।

माता-पिता के पद की सरकारी सेवाओं में समकक्षता स्थापित करना महत्वपूर्ण है। इसके आधार पर सामाजिक स्थिति का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

क्या अब सरकार क्रीमी लेयर के लिए नए नियम बना सकती है?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार संविधान और अदालत द्वारा निर्धारित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप आरक्षण तथा क्रीमी लेयर से संबंधित अपनी नीति बनाने के लिए स्वतंत्र है।

अदालत ने यह भी कहा कि सरकारी पदों और PSU के पदों के बीच समकक्षता निर्धारित करने या संबंधित पक्षों से परामर्श करने के लिए न्यायालय अपनी ओर से कोई समय-सीमा तय नहीं करना चाहता।

यह विषय कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।

अर्थात सरकार को नीति बनाने का अधिकार है, लेकिन यह नीति संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में निहित समानता के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को फैसले के अनुपालन के लिए केंद्र सरकार को छह महीने का समय दिया था। 6 नवंबर 2026 को सुनाए गए आदेश में इस अवधि को दो महीने और बढ़ा दिया गया।

इस प्रकार सरकार को फैसले को लागू करने के लिए अतिरिक्त समय तो मिला, लेकिन उसे फैसले को केवल भविष्य से लागू करने की अनुमति नहीं मिली।

सिविल सेवा परीक्षा 2025 के अभ्यर्थियों को भी मिलेगा लाभ

इस फैसले का एक महत्वपूर्ण प्रभाव सिविल सेवा परीक्षा 2025 के OBC अभ्यर्थियों पर भी पड़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने ध्यान दिया कि परीक्षा का परिणाम 6 मार्च 2026 को घोषित हो चुका था, लेकिन चयनित अभ्यर्थियों को सेवाओं का आवंटन अभी अंतिम रूप से पूरा नहीं हुआ था।

ऐसी स्थिति में अदालत ने कहा कि 11 मार्च के फैसले में निर्धारित क्रीमी लेयर के सिद्धांत सिविल सेवा परीक्षा 2025 के माध्यम से चयनित OBC अभ्यर्थियों के सेवा आवंटन पर भी लागू होंगे।

इससे संबंधित पात्र अभ्यर्थियों को गैर-क्रीमी लेयर की स्थिति के अनुसार आरक्षण का लाभ मिलने का रास्ता स्पष्ट हुआ है।

दूसरा फैसला: नेशनल बुक ट्रस्ट संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’

सुप्रीम कोर्ट ने 6 नवंबर 2026 को एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT) को संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत राज्य की परिभाषा में शामिल माना।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष और एक अन्य व्यक्ति की अपील खारिज कर दी।

इस अपील में दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के 1 जून 2012 के फैसले को चुनौती दी गई थी।

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में नेशनल बुक ट्रस्ट को संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत राज्य का अंग माना था।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निष्कर्ष को सही ठहराते हुए कहा कि सरकार का ट्रस्ट पर नियंत्रण केवल सामान्य नियामक निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका नियंत्रण वित्तीय, प्रशासनिक और कार्यात्मक स्तर पर व्यापक है।

संविधान का अनुच्छेद 12 क्या कहता है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 12 मौलिक अधिकारों के संदर्भ में ‘राज्य’ शब्द की परिभाषा निर्धारित करता है।

इसमें केंद्र सरकार, संसद, राज्य सरकारों, राज्य विधानमंडलों और भारत के क्षेत्र में आने वाले स्थानीय तथा अन्य प्राधिकरणों को शामिल किया गया है।

इस प्रावधान का महत्व इसलिए है क्योंकि संविधान के भाग-3 में दिए गए मौलिक अधिकारों का संरक्षण मुख्य रूप से राज्य की कार्रवाई के विरुद्ध किया गया है।

यदि कोई सरकारी संस्था या प्राधिकरण अनुच्छेद 12 के अंतर्गत राज्य की श्रेणी में आता है और वह किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो प्रभावित व्यक्ति उचित परिस्थितियों में हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि कोई संस्था मनमाने तरीके से किसी व्यक्ति के साथ भेदभाव करती है, तो अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का प्रश्न उठ सकता है।

इसी प्रकार सरकारी नियंत्रण वाली संस्थाओं की मनमानी कार्रवाई को भी संवैधानिक कसौटी पर परखा जा सकता है।

नेशनल बुक ट्रस्ट पर सरकार का नियंत्रण क्यों महत्वपूर्ण माना गया?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी संस्था को अनुच्छेद 12 के तहत राज्य घोषित करने के लिए केवल उसके नाम, पंजीकरण या कार्यों को देखना पर्याप्त नहीं है।

यह देखना आवश्यक है कि सरकार का उस संस्था पर वास्तविक नियंत्रण कितना है।

अदालत ने नेशनल बुक ट्रस्ट की स्थापना, उसकी संचालन व्यवस्था, प्रशासनिक ढांचे, वित्तीय प्रबंधन और प्रमुख पदाधिकारियों की नियुक्ति जैसे पहलुओं पर विचार किया।

पीठ ने पाया कि सरकार की भूमिका ट्रस्ट की स्थापना से ही शुरू होती है और उसके संचालन के विभिन्न स्तरों तक बनी रहती है।

ट्रस्ट के प्रमुख पदाधिकारी की नियुक्ति, प्रशासनिक व्यवस्था, वित्तीय नियंत्रण, ऑडिट, रिपोर्टिंग और शासन से संबंधित महत्वपूर्ण मामलों में सरकारी भूमिका व्यापक है।

अदालत ने कहा कि इन सभी तथ्यों को एक साथ देखने पर यह स्पष्ट होता है कि नेशनल बुक ट्रस्ट पर सरकार का गहरा और व्यापक नियंत्रण है।

इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट का उसे अनुच्छेद 12 के तहत राज्य मानने का निर्णय सही था।

क्या केवल सार्वजनिक कार्य करने से कोई संस्था राज्य बन जाती है?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण भी दिया।

अदालत ने कहा कि केवल सार्वजनिक महत्व का कार्य करने से कोई संस्था अपने आप संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत राज्य नहीं बन जाती।

उदाहरण के लिए, कोई संस्था शिक्षा, साहित्य, सामाजिक कल्याण या अन्य सार्वजनिक उपयोगिता से जुड़ा कार्य कर सकती है। लेकिन केवल इस आधार पर उसे सरकारी संस्था नहीं माना जा सकता।

इसके लिए यह देखना होगा कि सरकार का उस संस्था के वित्तीय, प्रशासनिक और कार्यात्मक ढांचे पर कितना नियंत्रण है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी संस्था पर सामान्य नियामक नियंत्रण और गहरा तथा व्यापक सरकारी नियंत्रण दोनों अलग-अलग परिस्थितियां हैं।

यदि सरकार केवल सामान्य नियमों के माध्यम से किसी संस्था को नियंत्रित करती है, तो यह अपने आप उसे अनुच्छेद 12 के तहत राज्य बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है।

लेकिन जब सरकार किसी संस्था की स्थापना, प्रबंधन, नियुक्तियों और वित्तीय प्रशासन पर व्यापक नियंत्रण रखती है, तब उसकी संवैधानिक स्थिति अलग हो सकती है।

क्या नेशनल बुक ट्रस्ट के कर्मचारी सरकारी कर्मचारी बन जाएंगे?

सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में भी महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया।

अदालत ने कहा कि नेशनल बुक ट्रस्ट को अनुच्छेद 12 के तहत राज्य मानने का यह अर्थ नहीं है कि वह केंद्र सरकार का विभाग बन जाएगा।

इसका अर्थ यह भी नहीं है कि ट्रस्ट के सभी कर्मचारी स्वतः सरकारी कर्मचारी बन जाएंगे या उन्हें सरकारी सेवकों को मिलने वाले सभी संवैधानिक संरक्षण प्राप्त हो जाएंगे।

विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 309, 310 और 311 के अंतर्गत सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाले सेवा संबंधी संरक्षण केवल इस फैसले के आधार पर ट्रस्ट के कर्मचारियों को स्वतः प्राप्त नहीं होंगे।

अनुच्छेद 12 के अंतर्गत राज्य घोषित किए जाने का मुख्य उद्देश्य मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए संस्था को संवैधानिक जवाबदेही के दायरे में लाना है।

इसलिए दोनों विषयों को अलग-अलग समझना आवश्यक है।

इस फैसले का आम नागरिकों के लिए क्या महत्व है?

नेशनल बुक ट्रस्ट को अनुच्छेद 12 के तहत राज्य मानने का फैसला उन नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनका किसी सरकारी नियंत्रण वाली संस्था के साथ विवाद हो सकता है।

अब ट्रस्ट की कार्रवाई को मौलिक अधिकारों और संवैधानिक सिद्धांतों की कसौटी पर परखा जा सकता है।

यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि संस्था ने उसके साथ मनमाना व्यवहार किया है या उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया है, तो वह परिस्थितियों के अनुसार संवैधानिक उपचार की मांग कर सकता है।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि ट्रस्ट का प्रत्येक प्रशासनिक निर्णय स्वतः अवैध हो जाएगा या प्रत्येक विवाद में सीधे अनुच्छेद 12 के आधार पर राहत मिल जाएगी।

न्यायालय प्रत्येक मामले में संबंधित तथ्यों, लागू नियमों और अधिकारों का परीक्षण करेगा।

निष्कर्ष: समानता और संवैधानिक जवाबदेही पर सुप्रीम कोर्ट का जोर

सुप्रीम कोर्ट के दोनों फैसले भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को मजबूत करते हैं।

OBC क्रीमी लेयर के मामले में अदालत ने स्पष्ट किया कि माता-पिता की सैलरी को अकेले आधार बनाकर किसी अभ्यर्थी को आरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता। उसके पद, सामाजिक स्थिति और निर्धारित कानूनी मानदंडों को भी ध्यान में रखना होगा।

साथ ही अदालत ने पहले से पूरी हो चुकी नियुक्तियों और वरिष्ठता को अनावश्यक रूप से प्रभावित होने से बचाने का भी प्रयास किया है।

दूसरी ओर, नेशनल बुक ट्रस्ट के मामले में अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई संस्था केवल सोसायटी या ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत होने के कारण संवैधानिक जवाबदेही से बाहर नहीं हो सकती। यदि उस पर सरकार का वास्तविक और व्यापक नियंत्रण है, तो उसे अनुच्छेद 12 के तहत राज्य माना जा सकता है।

इन फैसलों का व्यापक संदेश यह है कि आरक्षण की व्यवस्था में समानता और उचित मानदंडों का पालन जरूरी है, वहीं सरकारी नियंत्रण वाली संस्थाओं को भी संविधान के मौलिक अधिकारों से जुड़े दायित्वों का पालन करना होगा।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।