SIR में पहले से पंजीकृत मतदाताओं को फॉर्म-6 भरने के लिए मजबूर नहीं कर सकता चुनाव आयोग, बॉम्बे हाईकोर्ट ने छह मतदाताओं के नाम बहाल करने का दिया आदेश
बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि पहले से मतदाता सूची में पंजीकृत किसी व्यक्ति को केवल आवास बदलने के कारण नया मतदाता मानकर फॉर्म-6 या पहले से भरा हुआ एन्यूमरेशन फॉर्म (Enumeration Form) जमा करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति पहले से मतदाता है और वह अपना निवास स्थान बदलकर उसी विधानसभा क्षेत्र में किसी दूसरे स्थान पर रहने लगता है, तो उसके मामले में लागू कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। उसे ऐसी घोषणा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जो वास्तविक तथ्यों के विपरीत हो।
अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि गलत घोषणा करना संबंधित मतदाता के लिए कानूनी परेशानी पैदा कर सकता है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत मतदाता सूची की तैयारी, पुनरीक्षण या सुधार से संबंधित गलत बयान अथवा घोषणा करना दंडनीय अपराध हो सकता है। इसलिए किसी नागरिक को ऐसी प्रक्रिया अपनाने के लिए बाध्य करना उचित नहीं है, जिसमें उससे गलत जानकारी देने की स्थिति पैदा हो।
यह फैसला सालगांवकर परिवार के छह सदस्यों की याचिका पर आया। इन छह लोगों के नाम गोवा के संताक्रूज विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। परिवार के सदस्यों ने उसी विधानसभा क्षेत्र में अपना आवास एक स्थान से दूसरे स्थान पर बदला था। इसके बावजूद उनके नाम मतदाता सूची से काट दिए गए। मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को सभी छह सदस्यों के नाम तत्काल अंतिम मतदाता सूची में बहाल करने का निर्देश दिया।
इस फैसले को मतदाता अधिकारों, चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और SIR के दौरान अपनाई जाने वाली प्रशासनिक प्रक्रिया के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला गोवा के संताक्रूज विधानसभा क्षेत्र से संबंधित है। सालगांवकर परिवार के छह सदस्य पहले से ही मतदाता सूची में पंजीकृत थे। परिवार के सदस्यों ने अपना निवास स्थान बदला, लेकिन वे उसी विधानसभा क्षेत्र में रहते रहे।
सामान्य परिस्थितियों में जब कोई मतदाता अपना आवास बदलता है, तो मतदाता सूची में उसके पते को अपडेट करने की आवश्यकता होती है। इसके लिए निर्वाचन आयोग ने निर्धारित प्रक्रिया और फॉर्म उपलब्ध कराए हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता का नाम सही पते पर दर्ज रहे और उसे मतदान करने में किसी प्रकार की परेशानी न हो।
हालांकि, SIR की प्रक्रिया के दौरान सालगांवकर परिवार के छह सदस्यों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। परिवार ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ का दरवाजा खटखटाया।
याचिका में मूल रूप से यह सवाल उठाया गया कि जब संबंधित व्यक्ति पहले से मतदाता के रूप में पंजीकृत हैं और उन्होंने केवल उसी विधानसभा क्षेत्र में अपना निवास स्थान बदला है, तो उन्हें नए मतदाता की तरह फॉर्म-6 भरने अथवा पहले से भरा हुआ एन्यूमरेशन फॉर्म जमा करने के लिए क्यों कहा जा रहा है?
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि आवास बदलने और पहली बार मतदाता बनने की स्थिति में कानूनी अंतर है। केवल पता बदलने के कारण किसी मौजूदा मतदाता की पहचान और उसके पंजीकरण को समाप्त नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने मामले पर विचार करते हुए मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया और नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने क्या कहा?
बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने स्पष्ट किया कि पहले से पंजीकृत मतदाता को केवल आवास बदलने के कारण फॉर्म-6 या पहले से भरा हुआ एन्यूमरेशन फॉर्म जमा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
अदालत के सामने महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि क्या किसी मौजूदा मतदाता को ऐसी घोषणा करने के लिए कहा जा सकता है, जो उसकी वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाती?
यदि कोई व्यक्ति पहले से मतदाता सूची में दर्ज है, तो उसे पहली बार मतदाता बनने वाले व्यक्ति की श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा। दोनों परिस्थितियों के लिए अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं निर्धारित हैं।
अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि गलत घोषणा करना केवल एक सामान्य प्रशासनिक गलती नहीं है। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर गलत बयान देता है या ऐसी घोषणा करता है जिसे वह स्वयं गलत जानता है, तो उसके खिलाफ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत कार्रवाई हो सकती है।
इसलिए चुनावी अधिकारियों को ऐसी प्रक्रिया अपनानी चाहिए, जिससे नागरिक को अपनी वास्तविक स्थिति के विपरीत घोषणा करने की आवश्यकता न पड़े।
हाईकोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग को सालगांवकर परिवार के सभी छह सदस्यों के नाम तत्काल अंतिम मतदाता सूची में बहाल करने का आदेश दिया।
क्या है SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण?
SIR का पूरा नाम Special Intensive Revision है, जिसे हिंदी में विशेष गहन पुनरीक्षण कहा जाता है।
यह मतदाता सूची को व्यापक स्तर पर जांचने और अपडेट करने की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची में मौजूद गलतियों को दूर करना, अपात्र प्रविष्टियों की पहचान करना, पात्र मतदाताओं के नाम सुनिश्चित करना तथा निर्वाचन संबंधी रिकॉर्ड को अधिक सटीक बनाना है।
सामान्य पुनरीक्षण और विशेष गहन पुनरीक्षण में प्रक्रिया तथा जांच के स्तर का अंतर हो सकता है। विशेष गहन पुनरीक्षण में निर्वाचन अधिकारियों द्वारा मतदाताओं की जानकारी का व्यापक सत्यापन किया जाता है।
इस प्रक्रिया के अंतर्गत मतदाताओं से निर्धारित जानकारी मांगी जा सकती है। जरूरत पड़ने पर संबंधित दस्तावेजों के माध्यम से पहचान, निवास और अन्य पात्रता संबंधी तथ्यों का सत्यापन भी किया जा सकता है।
हालांकि, SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध बनाना है, न कि पात्र नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित करना।
इसलिए पुनरीक्षण के दौरान प्रत्येक कार्रवाई कानून के अनुरूप होनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति का नाम हटाया जाता है, तो उसके पीछे उचित आधार और निर्धारित प्रक्रिया होनी चाहिए।
बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला इसी महत्वपूर्ण सिद्धांत की ओर ध्यान आकर्षित करता है कि चुनावी प्रक्रिया में प्रशासनिक सुविधा के नाम पर नागरिकों को गलत घोषणा करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
फॉर्म-6 और फॉर्म-8 में क्या अंतर है?
इस मामले को समझने के लिए निर्वाचन आयोग के अलग-अलग फॉर्म की भूमिका समझना जरूरी है। मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने, पता बदलने और अन्य संशोधनों के लिए अलग-अलग फॉर्म निर्धारित किए गए हैं।
1. फॉर्म-6 (Form-6):
फॉर्म-6 का उपयोग मुख्य रूप से मतदाता सूची में नया नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है। सामान्य रूप से 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले पात्र नागरिक अथवा ऐसे व्यक्ति जिनका नाम अभी मतदाता सूची में दर्ज नहीं है, इस फॉर्म के माध्यम से पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकते हैं।
इसका उद्देश्य किसी नए पात्र मतदाता का नाम मतदाता सूची में शामिल करना है।
2. फॉर्म-8 (Form-8):
फॉर्म-8 का उपयोग पहले से पंजीकृत मतदाता द्वारा मतदाता सूची में आवश्यक संशोधन कराने के लिए किया जाता है। इसमें निवास स्थान बदलने, पते में सुधार, मतदाता पहचान पत्र में सुधार और अन्य निर्धारित संशोधनों से संबंधित आवेदन शामिल हो सकते हैं।
यदि कोई व्यक्ति पहले से मतदाता है और वह अपना निवास स्थान बदलता है, तो उसके मामले में फॉर्म-8 के माध्यम से पते के स्थानांतरण की प्रक्रिया प्रासंगिक हो सकती है।
3. एन्यूमरेशन फॉर्म (Enumeration Form):
विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान एन्यूमरेशन फॉर्म का उपयोग मतदाताओं से संबंधित जानकारी एकत्र करने और उसका सत्यापन करने के लिए किया जाता है।
इसका उद्देश्य मतदाता सूची में दर्ज जानकारी की पुष्टि करना और पुनरीक्षण प्रक्रिया को पूरा करना है।
इन तीनों प्रक्रियाओं का उद्देश्य अलग-अलग है। इसलिए किसी मौजूदा मतदाता को बिना उसकी वास्तविक स्थिति समझे नए मतदाता की तरह आवेदन करने के लिए बाध्य करना विवाद का कारण बन सकता है।
सालगांवकर परिवार का मामला इसी कानूनी अंतर को समझने का अवसर प्रदान करता है।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 क्या कहती है?
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (Representation of the People Act, 1950) की धारा 31 है।
यह धारा मतदाता सूची की तैयारी, पुनरीक्षण और सुधार से संबंधित गलत बयानों या घोषणाओं को दंडनीय बनाती है।
धारा 31 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति मतदाता सूची की तैयारी, पुनरीक्षण या सुधार के संबंध में ऐसा बयान या घोषणा करता है, जो गलत है और वह जानता है या विश्वास करता है कि यह गलत है, अथवा उसे सही नहीं मानता, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
इस अपराध के लिए एक वर्ष तक के कारावास, जुर्माने या दोनों का प्रावधान है।
इस प्रावधान का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया में सही जानकारी सुनिश्चित करना है। मतदाता सूची लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि इसमें जानबूझकर गलत जानकारी दी जाती है, तो इससे चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, धारा 31 का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक छोटी गलती या अनजाने में हुई त्रुटि पर स्वतः आपराधिक कार्रवाई होगी। इसके लिए कानून में निर्धारित आवश्यक तत्वों का होना जरूरी है।
यही कारण है कि निर्वाचन अधिकारियों को भी फॉर्म भरवाते समय सावधानी बरतनी चाहिए। किसी नागरिक से ऐसी जानकारी मांगना या ऐसी घोषणा करवाना उचित नहीं होगा, जो उसकी वास्तविक स्थिति के विपरीत हो।
हाईकोर्ट की टिप्पणी इसी कानूनी जोखिम को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
क्या आवास बदलने से मतदान का अधिकार समाप्त हो जाता है?
भारत में मतदान का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि मतदान का अधिकार निर्वाचन कानूनों के तहत निर्धारित पात्रता और पंजीकरण की शर्तों के अधीन है।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए आवश्यक शर्तें निर्धारित की गई हैं।
इस अधिनियम की धारा 19 के अनुसार, कोई व्यक्ति संबंधित निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए पात्र हो सकता है, यदि वह निर्धारित आयु पूरी करता है और उस निर्वाचन क्षेत्र में सामान्य रूप से निवास करता है।
धारा 20 में सामान्य निवास (Ordinarily Resident) से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं।
इसका अर्थ यह है कि मतदाता के पंजीकरण में उसके वास्तविक निवास का महत्वपूर्ण स्थान है। लेकिन केवल घर का पता बदल जाना अपने आप में किसी व्यक्ति को मतदाता सूची से बाहर करने का पर्याप्त आधार नहीं बन जाता।
उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति गोवा के संताक्रूज विधानसभा क्षेत्र के एक मोहल्ले में रहता था और बाद में उसी विधानसभा क्षेत्र के दूसरे मोहल्ले में रहने लगा, तो उसका मामला नए मतदाता के पंजीकरण से अलग होगा।
ऐसी स्थिति में मतदाता सूची में उसके पते को सही करने और आवश्यक स्थानांतरण की प्रक्रिया अपनाने की जरूरत होती है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता का नाम सही स्थान पर दर्ज रहे और वह अपने पात्र निर्वाचन क्षेत्र में मतदान कर सके।
मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए भी निर्धारित प्रक्रिया जरूरी
मतदाता सूची में नाम जोड़ना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण किसी व्यक्ति का नाम हटाने की प्रक्रिया भी है।
निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाने का अधिकार प्राप्त है। लेकिन इस अधिकार का उपयोग कानून के अनुसार किया जाना चाहिए।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 22 में मतदाता सूची में प्रविष्टियों के सुधार, नाम और पते में परिवर्तन तथा कुछ परिस्थितियों में नाम हटाने से संबंधित प्रावधान हैं।
इसी प्रकार धारा 23 में मतदाता सूची में नाम शामिल करने से संबंधित व्यवस्था दी गई है।
धारा 24 के अंतर्गत मतदाता सूची से जुड़े कुछ आदेशों के विरुद्ध अपील की व्यवस्था भी मौजूद है।
इन प्रावधानों से स्पष्ट है कि मतदाता सूची में किसी प्रकार का परिवर्तन मनमाने तरीके से नहीं किया जा सकता।
यदि किसी व्यक्ति का नाम हटाने का प्रस्ताव है, तो संबंधित कानूनी आधार और निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। विशेष रूप से जहां किसी नागरिक के मतदान के अधिकार पर प्रभाव पड़ रहा हो, वहां प्रशासनिक अधिकारियों को अधिक सावधानी बरतनी चाहिए।
सालगांवकर परिवार के मामले में भी यही प्रश्न महत्वपूर्ण था कि जब छह व्यक्ति पहले से पंजीकृत मतदाता थे और उनका मामला केवल आवास परिवर्तन से जुड़ा था, तो उनके नाम मतदाता सूची से हटाने का क्या औचित्य था?
हाईकोर्ट का आदेश इस बात को रेखांकित करता है कि पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं के वास्तविक तथ्यों और उनकी कानूनी स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
चुनाव आयोग के लिए क्या है इस फैसले का संदेश?
बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला निर्वाचन अधिकारियों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश देता है।
चुनाव आयोग का दायित्व केवल मतदाता सूची तैयार करना या उसका पुनरीक्षण करना नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और कानून के अनुरूप हो।
SIR जैसी व्यापक प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाताओं का सत्यापन किया जाता है। ऐसे में कई बार निवास स्थान बदलने, दस्तावेजों में अंतर, नाम की वर्तनी में गलती या पुराने रिकॉर्ड में त्रुटि जैसी परिस्थितियां सामने आ सकती हैं।
इन परिस्थितियों में प्रत्येक मतदाता के मामले का वास्तविक तथ्यों के आधार पर परीक्षण किया जाना चाहिए।
यदि कोई मतदाता पहले से पंजीकृत है, तो उसे नए मतदाता की तरह मानने से पहले उसके पुराने पंजीकरण और वर्तमान स्थिति की जांच जरूरी है।
इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति ने उसी विधानसभा क्षेत्र में अपना पता बदला है, तो उसके आवेदन को उसी के अनुरूप देखा जाना चाहिए।
निर्वाचन अधिकारियों को यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी नागरिक से गलत घोषणा करवाने की स्थिति पैदा न हो।
लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है, जब मतदाता और निर्वाचन प्रशासन दोनों कानून का पालन करें।
आम मतदाताओं के लिए इस फैसले का क्या महत्व है?
इस फैसले का महत्व केवल गोवा के छह मतदाताओं तक सीमित नहीं है। यह उन सभी नागरिकों के लिए प्रासंगिक है, जो पहले से मतदाता सूची में पंजीकृत हैं और समय-समय पर अपना निवास स्थान बदलते रहते हैं।
नौकरी, व्यवसाय, शिक्षा, परिवार या अन्य कारणों से लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं। कई बार वे एक ही विधानसभा क्षेत्र में अपना घर बदलते हैं, जबकि कुछ मामलों में दूसरे विधानसभा क्षेत्र में चले जाते हैं।
ऐसी स्थिति में मतदाता को यह समझना जरूरी है कि नया पंजीकरण और पुराने पंजीकरण में संशोधन दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
यदि उसका नाम पहले से मतदाता सूची में है, तो उसे अपनी वास्तविक स्थिति के अनुसार आवेदन करना चाहिए।
किसी भी फॉर्म में गलत जानकारी नहीं देनी चाहिए। यदि निर्वाचन अधिकारी किसी ऐसी घोषणा के लिए कहता है, जो तथ्यों के अनुरूप नहीं है, तो संबंधित व्यक्ति को स्पष्टीकरण मांगना चाहिए और अपनी आपत्ति उचित माध्यम से दर्ज करानी चाहिए।
इसके अतिरिक्त मतदाताओं को समय-समय पर अपना नाम और पता मतदाता सूची में जांचते रहना चाहिए। यदि नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो निर्धारित प्रक्रिया के तहत आपत्ति या अपील का सहारा लिया जा सकता है।
निष्कर्ष: मतदाता सूची का शुद्धिकरण जरूरी, लेकिन नागरिकों के अधिकारों की कीमत पर नहीं
बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ का यह फैसला चुनावी प्रक्रिया में कानून के पालन और नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन की आवश्यकता को सामने लाता है।
मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसके माध्यम से फर्जी, दोहरी और गलत प्रविष्टियों को हटाने तथा पात्र मतदाताओं का सही रिकॉर्ड तैयार करने में मदद मिलती है।
लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान पहले से पंजीकृत मतदाताओं की स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सालगांवकर परिवार के छह सदस्यों का मामला बताता है कि केवल निवास स्थान बदलने के कारण किसी मौजूदा मतदाता को नए मतदाता की श्रेणी में रखना और उसके नाम को सूची से हटा देना कानूनी सवाल खड़े कर सकता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि नागरिक को ऐसी घोषणा करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, जो उसकी वास्तविक स्थिति के अनुरूप न हो और जिसके कारण उसे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत अभियोजन का सामना करना पड़ सकता है।
चुनाव आयोग और निर्वाचन अधिकारियों के लिए यह आवश्यक है कि वे प्रत्येक मतदाता की स्थिति का सही परीक्षण करें और उसी के अनुसार निर्धारित फॉर्म तथा प्रक्रिया का उपयोग करें।
लोकतंत्र में मतदाता सूची केवल सरकारी रिकॉर्ड नहीं, बल्कि नागरिक की चुनावी भागीदारी का आधार है। इसलिए इसका शुद्धिकरण आवश्यक है, लेकिन यह काम कानून, पारदर्शिता और नागरिकों के अधिकारों का सम्मान करते हुए ही किया जाना चाहिए।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।