अनुकंपा नियुक्ति में चपरासी की नौकरी स्वीकार करने के बाद नहीं मांग सकते उच्च पद, हाईकोर्ट ने सहायक ग्रेड-3 की मांग ठुकराई
बिलासपुर। सरकारी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु हो जाने पर उसके परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक संकट से निपटने की होती है। परिवार का कमाने वाला सदस्य अचानक दुनिया छोड़ देता है तो उसके आश्रितों के सामने घर चलाने, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा के खर्चों की जिम्मेदारी आ जाती है। ऐसी परिस्थितियों में सरकार की अनुकंपा नियुक्ति योजना (Compassionate Appointment Scheme) प्रभावित परिवार को आर्थिक सहारा देने के उद्देश्य से बनाई गई है। हालांकि, अनुकंपा नियुक्ति को लेकर कई बार ऐसे विवाद सामने आते हैं, जिनमें आवेदक अपनी शैक्षणिक योग्यता या उपलब्ध पदों के आधार पर उच्च पद पर नियुक्ति की मांग करता है।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े ऐसे ही एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति को अनुकंपा के आधार पर किसी पद पर नियुक्ति मिल जाती है और वह उस पद पर कार्यभार भी ग्रहण कर लेता है, तो बाद में केवल अधिक शैक्षणिक योग्यता के आधार पर दूसरे या उच्च पद पर नियुक्ति का दावा नहीं किया जा सकता।
मामले में याचिकाकर्ता महेंद्र आदिल को उसके पिता की मृत्यु के बाद नगर निगम बीरगांव में चपरासी के पद पर अनुकंपा नियुक्ति दी गई थी। उसने इस नियुक्ति को स्वीकार कर नौकरी भी शुरू कर दी थी। बाद में उसने सहायक ग्रेड-3 (Assistant Grade-3) के पद पर नियुक्ति देने की मांग की। उसका तर्क था कि उसकी शैक्षणिक योग्यता अधिक है और नगर निगम में इस पद के लिए अनुकंपा नियुक्ति का अवसर भी उपलब्ध है।
लेकिन हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अनुकंपा नियुक्ति नीति के खंड 20(1) का हवाला देते हुए उसकी मांग स्वीकार करने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने प्रारंभिक सुनवाई के दौरान याचिका खारिज कर दी।
अदालत ने अपने निर्णय में यह महत्वपूर्ण बात दोहराई कि अनुकंपा नियुक्ति किसी कर्मचारी के परिवार को तत्काल आर्थिक संकट से राहत देने के लिए दी जाती है। यह सामान्य भर्ती प्रक्रिया का विकल्प नहीं है और न ही इसके आधार पर आवेदक को अपनी पसंद का पद प्राप्त करने का अधिकार मिल जाता है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला रायपुर जिले के हिरानगर, अछोली-उरला निवासी महेंद्र आदिल से संबंधित है। महेंद्र के पिता राजेंद्र आदिल नगर निगम बीरगांव में राजस्व निरीक्षक (Revenue Inspector) के पद पर कार्यरत थे। सरकारी सेवा के दौरान 24 जुलाई 2025 को उनका निधन हो गया।
पिता की मृत्यु के बाद परिवार के सामने आर्थिक कठिनाइयां उत्पन्न हो गईं। इसके बाद महेंद्र ने परिवार को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से अनुकंपा नियुक्ति के लिए नगर निगम में आवेदन प्रस्तुत किया।
नगर निगम ने उसके आवेदन पर विचार करते हुए 5 मई 2026 को उसे चपरासी के पद पर नियुक्ति दे दी। महेंद्र ने इस नियुक्ति को स्वीकार कर लिया और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अपने पद पर कार्यभार भी ग्रहण कर लिया।
हालांकि, महेंद्र की इच्छा चपरासी के पद पर नौकरी करने की नहीं थी। उसका कहना था कि उसकी शैक्षणिक योग्यता इस पद से अधिक है और उसे नगर निगम में सहायक ग्रेड-3 के पद पर नियुक्त किया जाना चाहिए था।
इसी आधार पर उसने चपरासी के पद के स्थान पर सहायक ग्रेड-3 का पद दिए जाने की मांग की। जब उसे अपेक्षित राहत नहीं मिली तो उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता ने सहायक ग्रेड-3 पद पर नियुक्ति की मांग क्यों की?
महेंद्र आदिल की ओर से हाईकोर्ट में अधिवक्ता ने दलील दी कि याचिकाकर्ता की शैक्षणिक योग्यता सहायक ग्रेड-3 के पद के लिए उपयुक्त है। इसलिए उसे चपरासी के पद पर नियुक्त करने के बजाय उसकी योग्यता के अनुरूप उच्च पद पर नियुक्त किया जाना चाहिए था।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी बताया गया कि नगर निगम बीरगांव में सहायक ग्रेड-3 के कुल आठ स्वीकृत पद हैं। राज्य सरकार की अनुकंपा नियुक्ति नीति के अनुसार इस पद पर कुल स्वीकृत पदों की संख्या के 10 प्रतिशत तक अनुकंपा नियुक्ति दी जा सकती है।
इस गणना के आधार पर याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने अपना पक्ष रखा।
उसका कहना था कि यदि सहायक ग्रेड-3 के आठ स्वीकृत पद हैं, तो उनका 10 प्रतिशत 0.8 होता है। ऐसे में उसकी नियुक्ति के आवेदन पर इस पद के लिए विचार किया जाना चाहिए था।
याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि नगर निगम आयुक्त ने सहायक ग्रेड-3 के पद की उपलब्धता और नियुक्ति के संबंध में संयुक्त संचालक से मार्गदर्शन मांगा था। इससे यह स्पष्ट होता है कि संबंधित पद पर नियुक्ति की संभावना को लेकर प्रशासनिक स्तर पर विचार किया गया था।
याचिकाकर्ता की मुख्य दलील यह थी कि जब उसकी योग्यता अधिक है और संबंधित पद पर नियुक्ति की नीति में गुंजाइश भी मौजूद है, तो उसे केवल चपरासी के पद तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
राज्य सरकार ने खंड 20(1) का दिया हवाला
राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध करते हुए अनुकंपा नियुक्ति नीति के खंड 20(1) का हवाला दिया गया।
सरकार की दलील थी कि अनुकंपा नियुक्ति नीति में स्पष्ट प्रावधान है कि एक बार किसी आवेदक को अनुकंपा नियुक्ति मिल जाने के बाद वह दूसरे पद पर नियुक्ति या पहले से दिए गए पद में बदलाव की मांग नहीं कर सकता।
सरकार के अनुसार, महेंद्र आदिल को चपरासी के पद पर नियुक्ति दी जा चुकी थी। उसने इस नियुक्ति को स्वीकार भी कर लिया और कार्यभार ग्रहण कर लिया। ऐसे में अब वह उसी अनुकंपा नियुक्ति के आधार पर सहायक ग्रेड-3 का पद मांगने का अधिकार नहीं रखता।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृत सरकारी कर्मचारी के परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है। इस योजना के अंतर्गत नियुक्ति देते समय उपलब्ध पद, पात्रता और लागू सरकारी नीति को ध्यान में रखा जाता है।
एक बार नियुक्ति स्वीकार कर लेने के बाद पद बदलने की मांग करना नीति के प्रावधानों के विपरीत होगा।
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों और संबंधित सरकारी नीति पर विचार किया। अदालत के सामने सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि महेंद्र आदिल को चपरासी के पद पर नियुक्ति मिल चुकी थी और उसने उस पद पर कार्यभार भी ग्रहण कर लिया था।
अदालत ने पाया कि राज्य सरकार की अनुकंपा नियुक्ति नीति के खंड 20(1) में एक बार नियुक्ति मिलने के बाद पद परिवर्तन की मांग स्वीकार नहीं करने का प्रावधान है।
ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता को बाद में सहायक ग्रेड-3 के पद पर नियुक्ति देने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।
अदालत ने यह भी माना कि अनुकंपा नियुक्ति में आवेदक को अपनी पसंद का पद चुनने का अधिकार नहीं होता। नियुक्ति देने वाला सक्षम प्राधिकारी संबंधित नीति, उपलब्ध रिक्तियों, पात्रता और अन्य आवश्यक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेता है।
केवल इस आधार पर कि किसी आवेदक की शैक्षणिक योग्यता अधिक है, उसे अनिवार्य रूप से उच्च पद पर नियुक्त करने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
इन्हीं आधारों पर न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने महेंद्र आदिल की याचिका खारिज कर दी।
अनुकंपा नियुक्ति क्या होती है?
अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) एक विशेष प्रकार की सरकारी नियुक्ति है, जिसका उद्देश्य सरकारी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु होने पर उसके परिवार को आर्थिक संकट से बचाना है।
सामान्य सरकारी भर्ती में पदों को विज्ञापित किया जाता है। उम्मीदवार आवेदन करते हैं और निर्धारित चयन प्रक्रिया के माध्यम से योग्य अभ्यर्थियों की नियुक्ति होती है।
इसके विपरीत अनुकंपा नियुक्ति में मृत सरकारी कर्मचारी के पात्र आश्रित को निर्धारित सरकारी नीति के अंतर्गत नियुक्ति देने पर विचार किया जाता है।
इसका मुख्य उद्देश्य परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता देना है, ताकि कमाने वाले सदस्य की मृत्यु के बाद परिवार पूरी तरह आर्थिक संकट में न फंस जाए।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि मृत कर्मचारी के परिवार के किसी सदस्य को सरकारी नौकरी मिलना उसका पूर्ण और स्वतः प्राप्त अधिकार है।
अनुकंपा नियुक्ति सरकारी नीति के अंतर्गत मिलने वाली विशेष राहत है। इसके लिए निर्धारित पात्रता, शर्तों और उपलब्ध पदों का पालन करना आवश्यक होता है।
क्या अधिक शैक्षणिक योग्यता होने पर उच्च पद मांगने का अधिकार है?
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न यही था कि क्या अनुकंपा नियुक्ति पाने वाला व्यक्ति अपनी अधिक शैक्षणिक योग्यता के आधार पर उच्च पद की मांग कर सकता है?
इसका सामान्य कानूनी उत्तर यह है कि केवल अधिक शैक्षणिक योग्यता होने से उच्च पद पर नियुक्ति का अधिकार पैदा नहीं हो जाता।
उदाहरण के लिए, यदि किसी मृत सरकारी कर्मचारी के आश्रित ने स्नातक की पढ़ाई पूरी कर रखी है और उसे अनुकंपा नियुक्ति के अंतर्गत चपरासी का पद दिया जाता है, तो वह केवल स्नातक होने के आधार पर सहायक या लिपिक पद पर नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता।
हालांकि, यदि संबंधित सरकारी नीति में उच्च पद पर नियुक्ति की अनुमति है और आवेदक उस पद की सभी आवश्यक शर्तें पूरी करता है, तो नियुक्ति प्राधिकारी उसके आवेदन पर विचार कर सकता है।
लेकिन विचार किए जाने और नियुक्ति पाने के अधिकार में अंतर है।
किसी पद के लिए पात्र होना अपने आप में उस पद पर नियुक्ति की गारंटी नहीं देता। नियुक्ति के लिए सरकारी नीति, उपलब्ध रिक्तियां और सक्षम प्राधिकारी का निर्णय महत्वपूर्ण होते हैं।
महेंद्र आदिल के मामले में हाईकोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दिया कि वह पहले ही चपरासी के पद पर नियुक्ति स्वीकार कर चुका था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी किया गया उल्लेख
इस मामले में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण निर्णय का हवाला दिया।
यह निर्णय आईजी (कार्मिक) विरुद्ध प्रह्लाद मणि त्रिपाठी (IG Personnel v. Prahlad Mani Tripathi) के नाम से संबंधित है।
सुप्रीम कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के संबंध में समय-समय पर यह सिद्धांत स्पष्ट किया है कि ऐसी नियुक्ति को सामान्य सरकारी भर्ती की तरह नहीं देखा जा सकता।
अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को आर्थिक संकट से तत्काल राहत देना है। इसका उद्देश्य परिवार के किसी सदस्य को उसकी इच्छा के अनुसार सरकारी पद उपलब्ध कराना या सामान्य भर्ती प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा से छूट देकर मनचाही नौकरी देना नहीं है।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न निर्णयों में यह भी स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार सरकारी नीति और निर्धारित शर्तों के अधीन होता है।
इस प्रकार, अनुकंपा नियुक्ति में पद का निर्धारण केवल उम्मीदवार की व्यक्तिगत पसंद से नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने भी इसी कानूनी दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता की मांग स्वीकार नहीं की।
अनुकंपा नियुक्ति और संविधान का अनुच्छेद 14 तथा 16
अनुकंपा नियुक्ति को समझने के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लेख करना भी आवश्यक है।
अनुच्छेद 14 सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण का अधिकार देता है।
वहीं, अनुच्छेद 16 सरकारी सेवाओं में अवसर की समानता से संबंधित है।
सामान्य रूप से सरकारी पदों पर नियुक्ति खुली और निष्पक्ष चयन प्रक्रिया के माध्यम से की जाती है। इसका उद्देश्य सभी पात्र उम्मीदवारों को समान अवसर देना है।
अनुकंपा नियुक्ति सामान्य भर्ती प्रक्रिया का एक सीमित अपवाद है। इसे इसलिए स्वीकार किया गया है ताकि सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के कारण उसका परिवार अचानक गंभीर आर्थिक संकट में न आ जाए।
इसलिए न्यायालयों ने बार-बार कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति का लाभ केवल निर्धारित नीति के अंतर्गत ही दिया जा सकता है। इसे सामान्य भर्ती का वैकल्पिक रास्ता नहीं बनाया जा सकता।
यही कारण है कि अनुकंपा नियुक्ति पाने वाले व्यक्ति को अपनी पसंद के पद पर नियुक्ति का असीमित अधिकार प्राप्त नहीं होता।
क्या नियुक्ति स्वीकार करने के बाद पद बदलवाया जा सकता है?
इस फैसले से एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत सामने आता है कि अनुकंपा नियुक्ति स्वीकार करने और कार्यभार ग्रहण करने के बाद पद परिवर्तन की मांग करना आसान नहीं होता।
यदि संबंधित सरकारी नीति में स्पष्ट रूप से पद परिवर्तन पर रोक लगाई गई है, तो नियुक्ति प्राप्त कर चुके कर्मचारी के लिए बाद में उच्च पद की मांग करना कठिन हो सकता है।
हालांकि, प्रत्येक मामले में संबंधित राज्य की नीति, नियुक्ति आदेश की शर्तें और परिस्थितियां अलग हो सकती हैं।
यदि नियुक्ति आदेश में कोई त्रुटि हो, नियुक्ति नीति का उल्लंघन हुआ हो या किसी पात्र व्यक्ति के साथ नियमों के विपरीत व्यवहार किया गया हो, तो संबंधित व्यक्ति को कानून के अनुसार उचित मंच पर चुनौती देने का अधिकार हो सकता है।
लेकिन केवल यह कहना कि मेरी शैक्षणिक योग्यता अधिक है और मुझे ऊंचा पद मिलना चाहिए था, अपने आप में पर्याप्त कानूनी आधार नहीं माना जा सकता।
महेंद्र आदिल के मामले में भी अदालत ने इसी अंतर को ध्यान में रखा।
भविष्य के लिए क्या है इस फैसले का महत्व?
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है, जो सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन करते हैं।
अक्सर आवेदक अपनी शैक्षणिक योग्यता और अनुभव के आधार पर किसी विशेष पद की अपेक्षा रखते हैं। लेकिन नियुक्ति प्राधिकारी कई बार उपलब्ध रिक्तियों और सरकारी नीति के अनुसार अलग पद पर नियुक्ति देता है।
ऐसी स्थिति में नियुक्ति स्वीकार करने से पहले आदेश और उसकी शर्तों को समझना आवश्यक है।
यदि कोई व्यक्ति नियुक्ति स्वीकार कर कार्यभार ग्रहण कर लेता है, तो बाद में पद परिवर्तन की मांग पर सरकारी नीति की शर्तें लागू होंगी।
इसलिए आवेदकों को नियुक्ति से पहले यह देखना चाहिए कि उन्हें किस पद पर नियुक्त किया जा रहा है, उस पद की सेवा शर्तें क्या हैं और क्या नीति में बाद में पद बदलने का कोई प्रावधान मौजूद है।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का महेंद्र आदिल बनाम राज्य से संबंधित यह फैसला अनुकंपा नियुक्ति की सीमाओं को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृत सरकारी कर्मचारी के परिवार को आर्थिक संकट से राहत देना है, न कि आवेदक को उसकी पसंद का पद उपलब्ध कराना।
महेंद्र आदिल को नगर निगम बीरगांव में चपरासी के पद पर नियुक्ति मिली थी। उसने नियुक्ति स्वीकार कर कार्यभार ग्रहण कर लिया था। ऐसे में राज्य सरकार की नीति के खंड 20(1) के तहत बाद में सहायक ग्रेड-3 का पद मांगने की उसकी याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती थी।
इस फैसले से यह संदेश मिलता है कि अनुकंपा नियुक्ति में सरकारी नीति और नियुक्ति आदेश की शर्तें सर्वोपरि हैं। अधिक शैक्षणिक योग्यता होने मात्र से उच्च पद पर नियुक्ति का अधिकार नहीं मिलता। आवेदक को नियुक्ति स्वीकार करने से पहले उसके परिणामों और कानूनी शर्तों को अच्छी तरह समझना चाहिए।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।