ट्रेन में रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक ही सो सकेंगे यात्री! मद्रास हाईकोर्ट ने रेलवे के नियम को ठहराया सही, बीमार और गर्भवती महिलाओं को मिलेगी विशेष छूट
भारतीय रेलवे से सफर करने वाले करोड़ों यात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण खबर है। अगर आप ट्रेन के स्लीपर या एसी कोच में यात्रा करते हैं और दिनभर अपनी बर्थ पर लेटकर आराम करना पसंद करते हैं, तो आपको रेलवे के एक नियम का पालन करना होगा। रेलवे के नियमों के मुताबिक आरक्षित कोचों में सोने का निर्धारित समय रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक है। सुबह 6 बजे के बाद यात्रियों को अपनी बर्थ का इस्तेमाल बैठने के लिए करना होता है, ताकि मिडिल और अपर बर्थ वाले यात्रियों को भी बैठने की सुविधा मिल सके।
इस नियम को चुनौती देते हुए मद्रास हाईकोर्ट में मामला पहुंचा था। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि रेलवे का यह नियम कई बार बीमार और विशेष परिस्थितियों वाले यात्रियों के लिए परेशानी पैदा करता है। उन्होंने अपनी बीमार पत्नी के साथ ट्रेन में यात्रा के दौरान हुई परेशानी का उदाहरण देते हुए नियम को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की थी।
मामले की सुनवाई करते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने रेलवे के इस नियम को सही ठहराया है। अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था किसी एक यात्री की सुविधा को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि आरक्षित कोच में यात्रा करने वाले सभी यात्रियों की सुविधा और अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के लिए बनाई गई है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि दिन के समय मिडिल और अपर बर्थ वाले यात्रियों को भी बैठने की जगह मिलनी चाहिए। हालांकि, बीमार व्यक्तियों, दिव्यांगों और गर्भवती महिलाओं के लिए रेलवे के नियमों में विशेष व्यवस्था मौजूद है। ऐसे यात्रियों को निर्धारित समय के बाद भी सोने की आवश्यकता होने पर अन्य यात्रियों से सहयोग करने की अपेक्षा की जाती है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी यात्री को इस संबंध में परेशानी होती है, तो वह रेलवे अधिकारियों या रेलवे सुरक्षा बल (RPF) की सहायता ले सकता है। रेलवे अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे नियमों में दिए गए सुरक्षा उपायों का पालन सुनिश्चित कराएं।
क्या है पूरा मामला, हाईकोर्ट तक क्यों पहुंची बात?
यह मामला चेन्नई निवासी बी. बालासुब्रमण्यन से जुड़ा है। वह अक्सर ट्रेन से यात्रा करते हैं। एक बार वह अपनी बीमार पत्नी के साथ ट्रेन में सफर कर रहे थे। यात्रा के दौरान उनकी पत्नी की तबीयत ठीक नहीं थी और उन्हें निर्धारित समय के बाद भी सोने के लिए बर्थ की आवश्यकता थी।
लेकिन ट्रेन के अन्य यात्रियों ने रेलवे के निर्धारित समय का हवाला देते हुए उनकी पत्नी को बर्थ पर सोने की अनुमति नहीं दी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि रेलवे के नियमों में बीमार व्यक्तियों, दिव्यांगों और गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। इसके बावजूद जब उन्होंने सहयात्रियों से सहयोग मांगा, तो उन्हें अपेक्षित सहायता नहीं मिली।
उनका तर्क था कि यदि किसी बीमार यात्री को वास्तव में आराम की जरूरत है और रेलवे के नियम भी ऐसे यात्रियों के प्रति सहयोग की बात करते हैं, तो केवल निर्धारित समय का हवाला देकर उसे बर्थ इस्तेमाल करने से नहीं रोका जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि नियमों में विशेष परिस्थितियों के लिए जो छूट दी गई है, उसका कोई वास्तविक लाभ नहीं मिल रहा है, क्योंकि अन्य यात्री सहयोग करने से इनकार कर सकते हैं।
इसी आधार पर उन्होंने रेलवे के इंडियन रेलवे कमर्शियल मैनुअल के पैरा 652(a) और 652(d) को चुनौती दी थी।
उन्होंने अदालत से मांग की थी कि 17 अगस्त 2017 के कमर्शियल सर्कुलर के माध्यम से लागू किए गए इन प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित किया जाए।
रेलवे के किस नियम को दी गई थी चुनौती?
इस मामले में इंडियन रेलवे कमर्शियल मैनुअल, वॉल्यूम-1 के पैरा 652(a) और 652(d) को चुनौती दी गई थी।
रेलवे ने 17 अगस्त 2017 के कमर्शियल सर्कुलर के माध्यम से आरक्षित कोचों में सोने और बैठने के समय को लेकर व्यवस्था लागू की थी।
पैरा 652(a) के तहत सोने का समय
इस प्रावधान के अनुसार आरक्षित स्लीपिंग बर्थ वाले कोचों में यात्रियों को रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक सोने की सुविधा दी जाती है।
इसके बाद शेष समय यानी सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक बर्थ का इस्तेमाल बैठने के लिए किया जाना चाहिए।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि दिन के समय सभी यात्रियों को बैठने की पर्याप्त जगह मिल सके।
पैरा 652(d) के तहत विशेष परिस्थितियों में सहयोग
रेलवे के नियम में बीमार व्यक्तियों, दिव्यांगों और गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष व्यवस्था का भी उल्लेख है।
इसके तहत अन्य यात्रियों से अपेक्षा की जाती है कि यदि किसी बीमार व्यक्ति, दिव्यांग या गर्भवती महिला को निर्धारित समय के बाद भी सोने की जरूरत है, तो वे उसके साथ सहयोग करें।
यानी रेलवे का नियम सभी यात्रियों पर एक समान सुविधा व्यवस्था लागू करने के साथ-साथ विशेष परिस्थितियों वाले यात्रियों की जरूरतों को भी ध्यान में रखता है।
हाईकोर्ट ने इन्हीं दोनों प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए रेलवे की व्यवस्था को उचित माना।
हाईकोर्ट ने रेलवे के नियम को क्यों ठहराया सही?
मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता की दलीलों से सहमति नहीं जताई।
अदालत ने कहा कि रेलवे ने आरक्षित थ्री-टियर कोचों में यात्रा करने वाले सभी यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए सोने का समय निर्धारित किया है।
अगर किसी यात्री को पूरी यात्रा के दौरान दिन में भी अपनी बर्थ पर सोने की अनुमति दे दी जाए, तो मिडिल और अपर बर्थ वाले यात्रियों को बैठने में परेशानी हो सकती है।
विशेषकर थ्री-टियर कोच में मिडिल बर्थ वाले यात्रियों के लिए यह समस्या अधिक गंभीर हो जाती है।
इस तरह के कोचों में एक ही स्थान पर तीन स्तरों पर बर्थ बनाई जाती हैं। लोअर बर्थ पर बैठने वाले यात्रियों को दिन में बैठने की सुविधा मिलती है, लेकिन मिडिल और अपर बर्थ वाले यात्रियों को भी बैठने के लिए लोअर बर्थ के आसपास की जगह का इस्तेमाल करना पड़ता है।
यदि लोअर बर्थ पर बैठा यात्री दिनभर सोता रहता है और बर्थ को बैठने के लिए उपलब्ध नहीं कराता, तो दूसरे यात्रियों को असुविधा हो सकती है।
इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए रेलवे ने सोने के लिए निश्चित समय तय किया है।
अदालत ने माना कि यह प्रतिबंध सभी वैध टिकट धारकों को बिना अनावश्यक परेशानी के यात्रा करने की सुविधा देने के उद्देश्य से बनाया गया है।
पीठ के अनुसार, पैरा 652 के तहत निर्धारित समय का यात्रियों की सामूहिक सुविधा से उचित संबंध है। इसलिए केवल एक व्यक्तिगत घटना के आधार पर पूरे नियम को असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता।
बीमार, दिव्यांग और गर्भवती महिलाओं को मिलेगी विशेष सुविधा
इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने विशेष परिस्थितियों वाले यात्रियों की जरूरतों को भी स्वीकार किया है।
अदालत ने कहा कि रेलवे के नियम में बीमार व्यक्तियों, दिव्यांगों और गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष व्यवस्था मौजूद है।
ऐसे यात्रियों को यदि स्वास्थ्य संबंधी कारणों से निर्धारित समय के बाद भी सोने की जरूरत पड़ती है, तो अन्य यात्रियों से सहयोग करने की अपेक्षा की जाती है।
इसका मतलब यह है कि रेलवे का नियम केवल समय निर्धारित करने तक सीमित नहीं है। इसमें उन यात्रियों की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा गया है, जिन्हें सामान्य यात्रियों की तुलना में अधिक आराम की आवश्यकता हो सकती है।
उदाहरण के तौर पर किसी यात्री की तबीयत अचानक खराब हो जाए, कोई महिला गर्भवती हो या किसी दिव्यांग व्यक्ति को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो, तो ऐसी स्थिति में सहयात्रियों को मानवीय आधार पर सहयोग करना चाहिए।
अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि नियम में दी गई विशेष सुविधा को केवल कागजों तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
यदि कोई यात्री सहयोग नहीं कर रहा है, तो प्रभावित व्यक्ति रेलवे कर्मचारियों या रेलवे सुरक्षा बल की सहायता ले सकता है।
सहयात्री सहयोग न करें तो क्या करें?
इस मामले में हाईकोर्ट ने यात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट की है।
यदि किसी बीमार व्यक्ति, दिव्यांग या गर्भवती महिला को निर्धारित समय के बाद भी सोने की आवश्यकता है और सहयात्री सहयोग करने से इनकार कर रहे हैं, तो ऐसी स्थिति में सीधे विवाद करने के बजाय रेलवे अधिकारियों से सहायता मांगी जा सकती है।
अदालत ने कहा कि यात्री अपनी परेशानी रेलवे कर्मचारियों या रेलवे सुरक्षा बल के सामने रख सकते हैं।
रेलवे अधिकारियों की जिम्मेदारी होगी कि वे इंडियन रेलवे कमर्शियल मैनुअल के पैरा 652(d) में दिए गए सुरक्षा उपायों का सही तरीके से पालन सुनिश्चित कराएं।
इस मामले में अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता अपनी पत्नी की परेशानी के समय रेलवे सुरक्षा बल या अन्य संबंधित अधिकारियों की मदद ले सकते थे।
लेकिन उन्होंने इस विकल्प का इस्तेमाल करने के बजाय सीधे नियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने का रास्ता चुना।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यात्रियों की वास्तविक परेशानियों का समाधान रेलवे प्रशासन के हस्तक्षेप से किया जा सकता है।
यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अब यात्रियों को यह समझना चाहिए कि रेलवे के नियमों में विशेष परिस्थितियों के लिए सहयोग की व्यवस्था है और जरूरत पड़ने पर संबंधित अधिकारियों से सहायता प्राप्त की जा सकती है।
क्या सुबह 6 बजे के बाद लोअर बर्थ पर बैठना जरूरी है?
इस फैसले के बाद ट्रेन यात्रियों के मन में यह सवाल भी उठ सकता है कि सुबह 6 बजे के बाद लोअर बर्थ पर बैठने का अधिकार किसे होगा?
दरअसल, रेलवे की निर्धारित व्यवस्था के अनुसार सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक का समय बैठने के लिए निर्धारित है।
इस दौरान लोअर बर्थ का उपयोग बैठने की जगह के रूप में किया जाता है। मिडिल और अपर बर्थ वाले यात्री भी नीचे बैठने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।
रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक सोने का समय होता है। इस दौरान मिडिल और अपर बर्थ को खोलकर इस्तेमाल किया जा सकता है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एक ही कोच में यात्रा कर रहे सभी यात्रियों को उनकी टिकट के अनुसार उचित सुविधा मिल सके।
हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि किसी यात्री की स्वास्थ्य संबंधी वास्तविक परेशानी को नजरअंदाज कर दिया जाए। ऐसे मामलों में रेलवे के विशेष प्रावधान लागू होंगे।
क्या यह नियम केवल स्लीपर कोच के लिए है?
रेलवे के कमर्शियल मैनुअल में यह व्यवस्था आरक्षित स्लीपिंग बर्थ वाले कोचों के लिए है। इसका उद्देश्य उन कोचों में सोने और बैठने की सुविधा के बीच संतुलन बनाए रखना है, जहां यात्रियों को स्लीपिंग बर्थ आवंटित की जाती हैं।
इसलिए यात्रियों को यह समझना चाहिए कि आरक्षित स्लीपिंग बर्थ का टिकट खरीदने का मतलब यह नहीं है कि वे दिन के सभी घंटों में बर्थ पर लेटे रह सकते हैं।
दिन के समय बर्थ का इस्तेमाल बैठने की सुविधा के लिए भी किया जाता है।
इस व्यवस्था से लोअर, मिडिल और अपर बर्थ पर यात्रा करने वाले यात्रियों के बीच सुविधा का संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की अपील का किया निपटारा
इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यह भी है कि याचिकाकर्ता पहले एकल न्यायाधीश के समक्ष भी इस नियम को चुनौती दे चुके थे।
एकल पीठ ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद बी. बालासुब्रमण्यन ने खंडपीठ के समक्ष अपील दाखिल की।
खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए रेलवे के नियमों, विशेष परिस्थितियों में दी गई छूट और यात्रियों की सामूहिक सुविधा पर विचार किया।
अदालत ने कहा कि एक बीमार महिला को निर्धारित समय से अधिक सोने की अनुमति नहीं दिए जाने की एक घटना के आधार पर ऐसे नियम को रद्द नहीं किया जा सकता, जिसका उद्देश्य लाखों यात्रियों की सुविधा सुनिश्चित करना है।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी यात्री को नियम के तहत मिलने वाली विशेष सुविधा का लाभ नहीं मिल रहा है, तो वह रेलवे प्रशासन से शिकायत कर सकता है।
इस प्रकार हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की अपील में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए मामले का निपटारा कर दिया।
यात्रियों के लिए इस फैसले का क्या है महत्व?
मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला रेलवे से नियमित यात्रा करने वाले लोगों के लिए काफी महत्वपूर्ण है।
अक्सर ट्रेन में बर्थ को लेकर यात्रियों के बीच विवाद देखने को मिलते हैं। कोई यात्री दिनभर सोना चाहता है, तो दूसरा यात्री बैठने के लिए जगह मांगता है।
खासकर थ्री-टियर कोच में इस तरह की समस्याएं अधिक देखने को मिलती हैं।
रेलवे का निर्धारित समय इसी विवाद को कम करने के लिए बनाया गया है। इससे सभी यात्रियों को अपनी यात्रा के दौरान बैठने और सोने की सुविधा मिलती है।
इस फैसले से यह भी स्पष्ट हुआ है कि नियमों का पालन करते समय मानवीय परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
यदि कोई यात्री बीमार है या किसी विशेष स्वास्थ्य समस्या से गुजर रहा है, तो दूसरे यात्रियों को उसके प्रति सहयोगात्मक रवैया अपनाना चाहिए।
वहीं, यदि सहयोग नहीं मिलता है, तो रेलवे कर्मचारियों और RPF की सहायता ली जा सकती है।
निष्कर्ष: रेलवे में सभी यात्रियों की सुविधा जरूरी, नियम के साथ मानवीय व्यवहार भी जरूरी
मद्रास हाईकोर्ट के इस फैसले ने रेलवे के एक महत्वपूर्ण नियम को न्यायिक मान्यता दी है। अदालत ने साफ कर दिया है कि आरक्षित कोचों में रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक सोने और बाकी समय बैठने की व्यवस्था का उद्देश्य सभी यात्रियों के अधिकारों और सुविधाओं के बीच संतुलन बनाना है।
रेलवे में यात्रा करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना होगा कि आरक्षित बर्थ का उपयोग केवल व्यक्तिगत सुविधा के लिए नहीं, बल्कि एक साझा व्यवस्था के तहत किया जाता है।
हालांकि, नियमों का पालन कराना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है बीमार, दिव्यांग और गर्भवती यात्रियों की जरूरतों का सम्मान करना।
किसी व्यक्ति की बीमारी या स्वास्थ्य संबंधी परेशानी को केवल समय का हवाला देकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में रेलवे के विशेष प्रावधानों के अनुसार सहयोग मिलना चाहिए।
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि ट्रेन में यात्रा करते समय अपने अधिकारों के साथ दूसरे यात्रियों की सुविधाओं का भी ध्यान रखना जरूरी है। रेलवे का नियम सभी के लिए है और विशेष परिस्थितियों में मानवीय सहयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
मामले से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| न्यायालय | मद्रास हाईकोर्ट |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी एवं न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन |
| याचिकाकर्ता | बी. बालासुब्रमण्यन |
| चुनौती | इंडियन रेलवे कमर्शियल मैनुअल के पैरा 652(a) और 652(d) |
| संबंधित सर्कुलर | 17 अगस्त 2017 |
| सोने का समय | रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक |
| बैठने का समय | सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक |
| विशेष सुविधा | बीमार, दिव्यांग और गर्भवती यात्रियों के लिए सहयोग |
| फैसला | रेलवे के नियम को चुनौती देने वाली अपील खारिज/निस्तारित |
कानूनी जानकारी के लिए:
रेलवे का आधिकारिक कमर्शियल मैनुअल:
IndianLawNotes.com
लेखक: Adv. Prem Kumar Nigam
यह लेख कानूनी एवं सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।