बाल श्रम पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: केंद्र सरकार को विशेष सेल बनाने का निर्देश, राज्यों के मुख्य सचिवों के जरिए होगी कानून के पालन की निगरानी
बच्चों का बचपन किताबों, खेलकूद और शिक्षा के लिए होता है, न कि कारखानों, दुकानों, होटलों और मजदूरी के काम में खप जाने के लिए। इसके बावजूद देश के अलग-अलग हिस्सों में आज भी बड़ी संख्या में बच्चे बाल श्रम करने को मजबूर हैं। कहीं आर्थिक तंगी के कारण बच्चों से काम कराया जाता है, तो कहीं उन्हें कम उम्र में ही परिवार की जिम्मेदारी उठाने के लिए मजदूरी में लगा दिया जाता है। बाल श्रम पर रोक लगाने के लिए देश में कानून मौजूद है, लेकिन असली चुनौती इन कानूनों को जमीन पर लागू कराने की है।
इसी गंभीर मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। अदालत ने केंद्र सरकार को बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 के प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन की निगरानी के लिए एक विशेष सेल गठित करने का निर्देश दिया है। यह सेल कानून के पालन पर लगातार नजर रखेगा और यह सुनिश्चित करने की दिशा में काम करेगा कि बच्चों तथा किशोरों से संबंधित कानूनी सुरक्षा केवल कागजों तक सीमित न रहे।
सुप्रीम कोर्ट ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के सचिव को विशेष सेल गठित करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही केंद्र सरकार से कहा है कि वह राज्यों के मुख्य सचिवों के माध्यम से संबंधित प्रवर्तन एजेंसियों को आवश्यक निर्देश जारी करे, ताकि बाल श्रम के खिलाफ बनाए गए कानून का देशभर में सख्ती से पालन कराया जा सके।
यह आदेश न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने एक पुरानी रिट याचिका का निपटारा करते हुए दिया। इस मामले में अदालत ने वर्ष 2016 में कानून में किए गए महत्वपूर्ण संशोधनों पर विचार किया और कहा कि अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी संशोधित कानून को पूरी तरह लागू कराने की है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दिया विशेष सेल बनाने का निर्देश?
सुप्रीम कोर्ट के सामने बाल श्रम से जुड़े कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका विचाराधीन थी। यह याचिका वर्ष 2009 में सामाजिक संगठन ‘हेल्थ फॉर मिलियंस’ (Health For Millions) की ओर से दाखिल की गई थी।
याचिकाकर्ता ने बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी थी। विशेष रूप से धारा 3 के परंतुक (Proviso) पर सवाल उठाए गए थे। याचिका में उन कानूनी अपवादों को लेकर आपत्ति जताई गई थी, जिनके तहत कुछ परिस्थितियों में बच्चों से काम कराने की अनुमति मिल सकती थी।
मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि वर्ष 2016 में कानून में व्यापक संशोधन किए जा चुके हैं। इन संशोधनों के बाद बच्चों को काम पर लगाने से संबंधित कानूनी व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव आया है और याचिका में उठाई गई कई आपत्तियों का समाधान हो चुका है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि कानून में हुए संशोधनों को देखते हुए याचिका में मांगी गई मूल राहतों पर अब अलग से विचार करने की आवश्यकता नहीं रह गई है।
हालांकि, अदालत ने मामले को केवल याचिका के निपटारे तक सीमित नहीं रखा। पीठ ने स्पष्ट किया कि कानून में संशोधन कर देना पर्याप्त नहीं है। उसका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब संबंधित सरकारी विभाग और प्रवर्तन एजेंसियां उसका पूरी गंभीरता से पालन कराएंगी।
इसी उद्देश्य से अदालत ने विशेष सेल गठित करने और राज्यों के स्तर पर कानून के क्रियान्वयन की निगरानी के निर्देश दिए।
किस धारा को दी गई थी चुनौती?
इस मामले में बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 की धारा 3 के परंतुक को चुनौती दी गई थी।
मूल कानून में बच्चों को कुछ निर्धारित खतरनाक व्यवसायों और प्रक्रियाओं में काम पर लगाने पर प्रतिबंध लगाया गया था। लेकिन इसमें कुछ अपवाद भी मौजूद थे, जिनके कारण विशेष परिस्थितियों में बच्चों के काम करने की गुंजाइश बनी रहती थी।
याचिकाकर्ता ने इसी व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा था कि बच्चों को खतरनाक परिस्थितियों में काम करने की अनुमति देने वाले प्रावधान उनके मौलिक अधिकारों और सुरक्षा के उद्देश्य के अनुरूप नहीं हैं।
याचिका में केंद्र सरकार को यह निर्देश देने की मांग भी की गई थी कि ऐसे बच्चों को शिक्षा की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं और उन्हें दोपहर का भोजन यानी मिड-डे मील भी दिया जाए।
यह मामला केवल किसी एक उद्योग या रोजगार तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका संबंध उन बच्चों के अधिकारों से था, जिनका बचपन मजदूरी और कामकाज में गुजर जाता है।
वर्ष 2009 में दाखिल हुई इस याचिका पर लंबे समय तक न्यायिक कार्यवाही चली। इसी दौरान संसद ने बाल श्रम कानून में वर्ष 2016 में महत्वपूर्ण संशोधन कर दिया। इसके बाद बच्चों को रोजगार में लगाने से संबंधित कानूनी व्यवस्था पहले की तुलना में काफी बदल गई।
वर्ष 2016 का संशोधन: 14 साल से कम उम्र के बच्चों के काम करने पर व्यापक प्रतिबंध
बाल श्रम से संबंधित कानून में वर्ष 2016 का संशोधन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
संसद ने बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 पारित किया। इसके माध्यम से पुराने कानून में व्यापक बदलाव किए गए और कानून का नाम बदलकर बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 कर दिया गया।
यह संशोधन 1 सितंबर 2016 से प्रभावी हुआ।
इस संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को किसी भी व्यवसाय या प्रक्रिया में काम पर लगाने पर व्यापक प्रतिबंध लगा दिया गया।
पहले बच्चों के रोजगार पर रोक मुख्य रूप से निर्धारित खतरनाक व्यवसायों और प्रक्रियाओं तक सीमित थी। लेकिन संशोधन के बाद सामान्य व्यवसायों में भी बच्चों को काम पर लगाने की अनुमति समाप्त कर दी गई, हालांकि कानून में कुछ सीमित अपवाद रखे गए हैं।
इस बदलाव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि बच्चों का समय मजदूरी में खर्च होने के बजाय शिक्षा, स्वास्थ्य और उनके सर्वांगीण विकास में लगे।
कानून का यह संशोधित स्वरूप बच्चों को आर्थिक शोषण से बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था।
क्या परिवार के व्यवसाय में बच्चे मदद कर सकते हैं?
वर्ष 2016 के संशोधन के बाद भी कानून में एक सीमित अपवाद रखा गया है, जिसको लेकर अक्सर लोगों के मन में सवाल रहता है।
कानून के अनुसार, कुछ निर्धारित शर्तों के अधीन 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे अपने परिवार या पारिवारिक उद्यम में स्कूल के समय के बाद अथवा छुट्टियों के दौरान सहायता कर सकते हैं।
लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि माता-पिता अपने बच्चों को नियमित रूप से दुकान, कारखाने, होटल या किसी अन्य व्यवसाय में काम करने के लिए लगा सकते हैं।
इस अपवाद के तहत कुछ महत्वपूर्ण शर्तों का पालन करना आवश्यक है।
पहली शर्त: बच्चे की सहायता ऐसी होनी चाहिए, जिससे उसकी शिक्षा प्रभावित न हो।
दूसरी शर्त: बच्चे से स्कूल के समय में काम नहीं कराया जा सकता।
तीसरी शर्त: यह सहायता स्कूल के बाद या छुट्टियों के दौरान ही निर्धारित कानूनी शर्तों के अधीन हो सकती है।
चौथी शर्त: बच्चे को किसी खतरनाक व्यवसाय या प्रक्रिया में नहीं लगाया जा सकता।
इस प्रावधान का उद्देश्य पारिवारिक जीवन और पारंपरिक कौशल से बच्चों के सीमित परिचय को अनुमति देना है, न कि बाल श्रम को बढ़ावा देना।
इसलिए परिवार के व्यवसाय में सहायता करने के अपवाद को नियमित मजदूरी या बच्चों के आर्थिक शोषण का आधार नहीं बनाया जा सकता।
14 से 18 वर्ष के किशोरों के लिए क्या है कानून?
बाल श्रम कानून केवल 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों तक सीमित नहीं है। इसमें किशोरों के रोजगार को लेकर भी विशेष प्रावधान किए गए हैं।
कानून के अनुसार, 14 से 18 वर्ष की आयु के व्यक्तियों को किशोर की श्रेणी में रखा गया है।
इन किशोरों को सभी प्रकार के कामों से प्रतिबंधित नहीं किया गया है, लेकिन उन्हें निर्धारित खतरनाक व्यवसायों और प्रक्रियाओं में काम पर लगाने पर रोक है।
इसका अर्थ है कि 14 से 18 वर्ष की आयु के किशोर गैर-खतरनाक कार्यों में कानून की शर्तों के अधीन काम कर सकते हैं, लेकिन उन्हें खतरनाक उद्योगों और प्रक्रियाओं में रोजगार नहीं दिया जा सकता।
यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि किशोरों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और विकास को नुकसान पहुंचाने वाले कार्यों से उन्हें बचाया जा सके।
कानून का उद्देश्य बच्चों और किशोरों के बीच उम्र तथा जोखिम के आधार पर अंतर करते हुए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
विशेष सेल की जिम्मेदारी क्या होगी?
सुप्रीम कोर्ट ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के सचिव को विशेष सेल गठित करने का निर्देश दिया है। इस निर्देश का मुख्य उद्देश्य बाल एवं किशोर श्रम कानून के प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन की निगरानी करना है।
इस विशेष सेल के माध्यम से कानून के पालन पर लगातार नजर रखी जानी है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के आदेश में विशेष सेल के कर्मचारियों की संख्या, उसकी विस्तृत प्रशासनिक संरचना या अलग-अलग राज्यों में उसके कार्यालयों की व्यवस्था का विवरण नहीं दिया गया है।
फिर भी अदालत के निर्देश से इसकी प्रमुख जिम्मेदारी स्पष्ट होती है कि बाल श्रम से संबंधित संशोधित कानून का पूरा और सख्त पालन सुनिश्चित किया जाए।
इसमें कुछ महत्वपूर्ण पहलू शामिल हैं:
1. कानून के क्रियान्वयन की निगरानी
विशेष सेल यह देखेगा कि बाल एवं किशोर श्रम अधिनियम के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा रहा है या नहीं।
2. राज्यों के साथ समन्वय
केंद्र सरकार राज्यों के मुख्य सचिवों के माध्यम से संबंधित प्रवर्तन एजेंसियों को आवश्यक निर्देश जारी करेगी।
3. कानून का सख्त पालन
बाल श्रम पर रोक लगाने वाले प्रावधानों का केवल कागजी पालन न हो, बल्कि संबंधित विभाग वास्तविक कार्रवाई भी करें।
4. बच्चों और किशोरों के अधिकारों की सुरक्षा
कानून का अंतिम उद्देश्य बच्चों को शोषण से बचाना और उन्हें शिक्षा तथा सुरक्षित बचपन का अवसर उपलब्ध कराना है।
इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों की जिम्मेदारी को फिर से रेखांकित किया है।
राज्यों के मुख्य सचिवों की भूमिका भी होगी महत्वपूर्ण
बाल श्रम जैसी सामाजिक समस्या से निपटने के लिए केवल केंद्र सरकार के निर्देश पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए राज्य सरकारों और जिला स्तर पर काम करने वाली प्रवर्तन एजेंसियों की सक्रिय भूमिका भी आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह राज्यों के मुख्य सचिवों के माध्यम से संबंधित एजेंसियों को आवश्यक निर्देश जारी करे।
मुख्य सचिव राज्य प्रशासन के सर्वोच्च अधिकारियों में शामिल होते हैं। उनके माध्यम से विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित करना और सरकारी निर्देशों को लागू कराना अपेक्षाकृत प्रभावी हो सकता है।
बाल श्रम रोकने के लिए श्रम विभाग, पुलिस, जिला प्रशासन, बाल संरक्षण इकाइयों और अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।
उदाहरण के तौर पर यदि किसी होटल, ढाबे, दुकान, कारखाने या अन्य प्रतिष्ठान में बच्चों से गैरकानूनी तरीके से काम कराया जा रहा है, तो संबंधित अधिकारियों को शिकायत मिलने पर नियमानुसार जांच और कार्रवाई करनी चाहिए।
केवल बच्चों को काम से मुक्त करा देना पर्याप्त नहीं है। उनके पुनर्वास, शिक्षा और सुरक्षित भविष्य की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
अदालत के निर्देशों का व्यापक उद्देश्य इसी प्रशासनिक जिम्मेदारी को प्रभावी बनाना है।
बाल श्रम पर रोक के बावजूद क्यों बनी हुई है समस्या?
भारत में बाल श्रम रोकने के लिए कानून मौजूद हैं, लेकिन सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के कारण यह समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई है।
गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और परिवारों की आर्थिक मजबूरी इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
कई परिवारों की आय इतनी कम होती है कि बच्चों को भी काम पर भेजना उनकी मजबूरी बन जाती है। कुछ मामलों में बच्चों को काम के बदले मामूली पैसे दिए जाते हैं, जबकि कई जगह उनसे बिना उचित पारिश्रमिक के काम कराया जाता है।
होटलों, ढाबों, चाय की दुकानों, छोटे कारखानों, घरेलू कामकाज और निर्माण स्थलों पर बाल श्रम की शिकायतें सामने आती रहती हैं।
कई बार बच्चों को ऐसे कामों में लगा दिया जाता है, जहां उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य दोनों खतरे में पड़ जाते हैं।
लंबे समय तक काम करना, खतरनाक मशीनों के संपर्क में रहना, रासायनिक पदार्थों के बीच काम करना और शिक्षा से दूर हो जाना उनके भविष्य पर गंभीर असर डाल सकता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि बाल श्रम के कारण बच्चे शिक्षा के उस अधिकार से वंचित हो जाते हैं, जो उनके बेहतर भविष्य की नींव है।
ऐसे में कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ-साथ गरीब परिवारों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति सुधारना भी जरूरी है।
शिक्षा का अधिकार और बाल श्रम कानून का आपस में क्या संबंध है?
बाल श्रम को रोकने का उद्देश्य केवल बच्चों को काम से दूर रखना नहीं है। इसका एक बड़ा उद्देश्य उन्हें शिक्षा प्राप्त करने का अवसर देना भी है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21A छह से चौदह वर्ष की आयु के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार प्रदान करता है।
वहीं संविधान का अनुच्छेद 24 चौदह वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों, खानों और अन्य खतरनाक रोजगारों में नियोजित करने पर प्रतिबंध लगाता है।
इसके अतिरिक्त संविधान के अनुच्छेद 39(e) और 39(f) में बच्चों के स्वास्थ्य, शक्ति और विकास की सुरक्षा से संबंधित राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत दिए गए हैं।
इन संवैधानिक प्रावधानों का व्यापक उद्देश्य बच्चों को शोषण से बचाना और उन्हें सम्मानजनक जीवन के लिए आवश्यक अवसर उपलब्ध कराना है।
बाल एवं किशोर श्रम अधिनियम भी इसी संवैधानिक सोच को आगे बढ़ाता है।
यदि कोई बच्चा स्कूल जाने की उम्र में मजदूरी करने के लिए मजबूर है, तो यह केवल श्रम कानून का मामला नहीं है, बल्कि उसके शिक्षा और विकास से जुड़े अधिकारों का भी प्रश्न है।
इसलिए बाल श्रम के खिलाफ कार्रवाई करते समय शिक्षा और पुनर्वास को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए क्या कहा?
न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने 29 अक्टूबर 2026 को Health For Millions बनाम Union of India मामले में आदेश पारित किया।
अदालत ने वर्ष 2016 के संशोधन को ध्यान में रखते हुए कहा कि याचिका में उठाई गई मूल मांगें अब आगे विचार किए जाने योग्य नहीं रह गई हैं।
हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि संशोधित कानून का पूर्ण और सख्त पालन सुनिश्चित करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है।
अदालत ने बच्चों और किशोरों के अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के सचिव को विशेष सेल गठित करने और कानून के क्रियान्वयन की निगरानी जारी रखने का निर्देश दिया।
साथ ही केंद्र को राज्यों के मुख्य सचिवों के माध्यम से प्रवर्तन एजेंसियों को निर्देश जारी करने के लिए कहा गया।
इस प्रकार अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर विशेष जोर दिया।
निष्कर्ष: कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं, उसका पालन कराना भी जरूरी
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश बाल श्रम की समस्या से निपटने के लिए महत्वपूर्ण है। देश में बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई कानूनी और संवैधानिक व्यवस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन इनका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब प्रशासनिक स्तर पर उनका ईमानदारी से पालन कराया जाएगा।
बाल श्रम के कारण किसी बच्चे का बचपन, शिक्षा और भविष्य बर्बाद नहीं होना चाहिए। गरीबी या पारिवारिक मजबूरी के नाम पर बच्चों से मजदूरी कराना स्वीकार नहीं किया जा सकता।
विशेष सेल के गठन और राज्यों के मुख्य सचिवों के माध्यम से निगरानी की व्यवस्था से कानून के क्रियान्वयन को अधिक प्रभावी बनाने की उम्मीद है।
हालांकि, इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकारी अधिकारी कितनी गंभीरता से कार्रवाई करते हैं, शिकायतों पर कितना शीघ्र संज्ञान लिया जाता है और बाल श्रम से मुक्त कराए गए बच्चों के पुनर्वास की कितनी अच्छी व्यवस्था की जाती है।
बच्चों को मजदूरी नहीं, शिक्षा मिलनी चाहिए। उनका स्थान कारखानों और दुकानों में नहीं, बल्कि स्कूलों में होना चाहिए। यही बाल श्रम कानून की मूल भावना है और सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश का सबसे महत्वपूर्ण संदेश भी।
महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान
- संविधान का अनुच्छेद 21A – शिक्षा का मौलिक अधिकार।
- संविधान का अनुच्छेद 24 – बच्चों को कारखानों और खतरनाक रोजगारों में लगाने पर प्रतिबंध।
- संविधान का अनुच्छेद 39(e) – श्रमिकों और बच्चों के स्वास्थ्य एवं शक्ति की सुरक्षा।
- संविधान का अनुच्छेद 39(f) – बच्चों के स्वस्थ विकास और शोषण से सुरक्षा का सिद्धांत।
- बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986।
- बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016।
- धारा 3 – बच्चों के नियोजन पर प्रतिबंध और संबंधित सीमित अपवाद।
- धारा 3A – किशोरों के खतरनाक व्यवसायों और प्रक्रियाओं में नियोजन पर प्रतिबंध।
मामले का विवरण:
- केस: Health For Millions बनाम Union of India
- याचिका संख्या: W.P. (C) No. 501/2009
- न्यायालय: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया
- पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी एवं जस्टिस एन.वी. अंजारिया
- आदेश की तारीख: 29 अक्टूबर 2026
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।