विरोध-प्रदर्शन के नाम पर जंतर-मंतर और रामलीला मैदान पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट, व्यापारियों की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस
Supreme Court on Protest at Jantar Mantar and Ramlila Maidan: लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन करना नागरिकों का महत्वपूर्ण अधिकार है। सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाना, अपनी मांगों को लेकर धरना देना और शांतिपूर्ण तरीके से असहमति जताना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। लेकिन सवाल तब खड़ा होता है, जब किसी सार्वजनिक स्थान पर लंबे समय तक धरना-प्रदर्शन जारी रहने से आसपास रहने वाले लोगों, व्यापारियों और आम नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगती है। क्या विरोध-प्रदर्शन के अधिकार के नाम पर किसी सार्वजनिक स्थान पर अनिश्चितकाल तक कब्जा किया जा सकता है? क्या कुछ संगठनों को लंबे समय तक एक ही स्थान पर प्रदर्शन करने की अनुमति दी जा सकती है, जबकि दूसरे नागरिकों को उससे परेशानी हो रही हो?
इन्हीं महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर सुप्रीम कोर्ट ने 2 नवंबर 2026 को सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की। मामला दिल्ली के रामलीला मैदान और जंतर-मंतर पर लंबे समय तक चलने वाले धरना-प्रदर्शनों से संबंधित है। दिल्ली के व्यापारिक संगठनों ने याचिका दाखिल कर आरोप लगाया है कि इन स्थानों पर अनिश्चितकालीन विरोध-प्रदर्शनों के कारण आसपास के व्यापारिक क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार के नाम पर किसी स्थान पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं किया जा सकता।
अदालत ने विरोध-प्रदर्शन के मौलिक अधिकार और आम नागरिकों के आजीविका अर्जित करने के अधिकार के बीच संवैधानिक संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए मामले में जवाब मांगा है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला दिल्ली के दो प्रमुख विरोध-प्रदर्शन स्थलों रामलीला मैदान और जंतर-मंतर से जुड़ा हुआ है।
दिल्ली में राजनीतिक दलों, किसान संगठनों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न जनसमूहों द्वारा अपनी मांगों को लेकर समय-समय पर इन स्थानों पर धरना-प्रदर्शन किया जाता है।
इन दोनों स्थानों का राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में लंबे समय से महत्वपूर्ण स्थान रहा है। सरकार के खिलाफ प्रदर्शन, विभिन्न कानूनों का विरोध और सामाजिक मुद्दों को लेकर आंदोलन करने वाले संगठन अक्सर यहां एकत्र होते हैं।
हालांकि, दिल्ली के कुछ व्यापारिक संगठनों का कहना है कि इन स्थानों पर लंबे समय तक चलने वाले प्रदर्शनों के कारण आसपास के व्यावसायिक क्षेत्रों में कारोबार प्रभावित होता है।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, धरना-प्रदर्शन के दौरान यातायात व्यवस्था, बाजारों तक पहुंच, ग्राहकों की आवाजाही और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों पर असर पड़ता है।
इससे केवल बड़े व्यापारियों को ही नहीं, बल्कि दुकानों में काम करने वाले कर्मचारियों, छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों, परिवहन से जुड़े लोगों और दिहाड़ी मजदूरों को भी परेशानी होती है।
इसी समस्या को लेकर दिल्ली के व्यापारिक संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
किन व्यापारिक संगठनों ने दाखिल की याचिका?
यह याचिका किराना कमेटी, दिल्ली आयरन एंड हार्डवेयर मर्चेंट्स एसोसिएशन और दिल्ली के अन्य व्यापारिक एवं व्यावसायिक संगठनों की ओर से दाखिल की गई है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के अधिकार के खिलाफ नहीं हैं। उनका उद्देश्य किसी भी राजनीतिक दल, किसान संगठन या सामाजिक संगठन को अपनी बात रखने से रोकना भी नहीं है।
उनकी मुख्य आपत्ति यह है कि सार्वजनिक स्थानों पर विरोध-प्रदर्शन की अनुमति इस तरह नहीं दी जानी चाहिए, जिससे आसपास के व्यापारिक क्षेत्रों की सामान्य गतिविधियां लंबे समय तक बाधित रहें।
व्यापारिक संगठनों का तर्क है कि लोकतंत्र में एक नागरिक को अपनी मांग रखने का अधिकार है, लेकिन दूसरे नागरिक को भी अपना कारोबार करने और परिवार का भरण-पोषण करने का अधिकार प्राप्त है।
यदि किसी एक समूह को सार्वजनिक स्थान पर लंबे समय तक प्रदर्शन करने की अनुमति मिल जाती है, तो इससे दूसरे लोगों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी, एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड जय अनंत देहाद्राई और अन्य अधिवक्ताओं ने अदालत में पक्ष रखा।
CJI सूर्यकांत ने क्या महत्वपूर्ण टिप्पणी की?
मामले की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने विरोध-प्रदर्शन के अधिकार की सीमाओं पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
पीठ ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का अधिकार है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि किसी सार्वजनिक स्थान पर अनिश्चितकाल तक कब्जा करके रखा जाए।
अदालत के अनुसार, निर्धारित विरोध-प्रदर्शन स्थलों पर भी कोई संगठन या समूह अनिश्चितकाल तक अपना एकाधिकार नहीं जमा सकता।
विरोध-प्रदर्शन लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इसका इस्तेमाल इस प्रकार नहीं किया जा सकता कि दूसरे नागरिकों के मौलिक अधिकारों का व्यापक रूप से हनन होने लगे।
अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि सार्वजनिक स्थानों का उपयोग सभी नागरिकों के लिए निष्पक्ष और समान तरीके से उपलब्ध होना चाहिए।
यदि किसी संगठन को अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करने का अवसर मिलता है, तो दूसरे संगठनों को भी उचित अवसर मिलना चाहिए।
इस प्रकार अदालत ने विरोध-प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित किया।
विरोध-प्रदर्शन के लिए बनाए गए स्थान पर भी अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि जंतर-मंतर और रामलीला मैदान जैसे निर्धारित प्रदर्शन स्थलों पर भी किसी संगठन को स्थायी अधिकार नहीं मिल सकता।
मान लीजिए कि किसी संगठन को अपनी मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की अनुमति मिलती है। यदि वह संगठन लंबे समय तक उसी स्थान पर बैठा रहता है और दूसरे संगठनों को वहां प्रदर्शन करने का अवसर नहीं मिलता, तो सार्वजनिक स्थान के समान उपयोग का प्रश्न उठ सकता है।
अदालत ने संकेत दिया कि किसी एक समूह को सार्वजनिक स्थान पर एकाधिकार नहीं दिया जा सकता।
विरोध-प्रदर्शन के लिए स्थान, समय और अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं इस प्रकार होनी चाहिए कि अलग-अलग संगठनों को अपनी बात रखने का अवसर मिल सके।
इसका उद्देश्य लोकतांत्रिक अधिकारों को समाप्त करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि एक व्यक्ति या संगठन के अधिकार के कारण दूसरे नागरिकों के अधिकार प्रभावित न हों।
सुप्रीम कोर्ट ने किन छह बिंदुओं पर जोर दिया?
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने विरोध-प्रदर्शन स्थलों के इस्तेमाल और विभिन्न नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़े छह महत्वपूर्ण पहलुओं पर जोर दिया।
इनका सार इस प्रकार समझा जा सकता है:
1. विरोध-प्रदर्शन का अधिकार सुरक्षित रहे: प्रत्येक नागरिक और संगठन को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने तथा सरकार के खिलाफ विरोध जताने का अधिकार है।
2. अनिश्चितकालीन कब्जे की अनुमति नहीं: किसी सार्वजनिक स्थान या निर्धारित प्रदर्शन स्थल पर कोई संगठन अनिश्चितकाल तक कब्जा करके नहीं बैठ सकता।
3. आजीविका का अधिकार भी महत्वपूर्ण: विरोध-प्रदर्शन के कारण आसपास के व्यापारियों, कर्मचारियों और आम नागरिकों की आर्थिक गतिविधियां लगातार बाधित नहीं होनी चाहिए।
4. सभी संगठनों को समान अवसर मिले: किसी एक राजनीतिक दल या संगठन को सार्वजनिक प्रदर्शन स्थल पर एकाधिकार नहीं मिलना चाहिए। दूसरे संगठनों को भी उचित अवसर उपलब्ध होना चाहिए।
5. निर्धारित स्थान और समय का पालन हो: विरोध-प्रदर्शन ऐसी व्यवस्था के तहत होने चाहिए, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था और आम नागरिकों की सुविधाएं प्रभावित न हों।
6. संवैधानिक अधिकारों में संतुलन जरूरी: विरोध-प्रदर्शन के अधिकार और अन्य नागरिकों के जीवन, स्वतंत्रता तथा आजीविका के अधिकारों के बीच उचित संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
इन बिंदुओं का उद्देश्य विरोध-प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्थानों के उचित और समान उपयोग की व्यवस्था सुनिश्चित करना है।
जंतर-मंतर पर हिंसा और शिकायतों की जांच के लिए हाई पावर्ड कमेटी
इस मामले में एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू जंतर-मंतर पर हुए विरोध-प्रदर्शनों से जुड़ी हिंसा और विभिन्न शिकायतों का भी है।
सुप्रीम कोर्ट ने इन शिकायतों की सुनवाई और जांच के लिए एक हाई पावर्ड इंक्वायरी कमेटी के गठन का भी उल्लेख किया है।
ऐसी समिति का उद्देश्य प्रदर्शन स्थलों से जुड़े विवादों, हिंसा की शिकायतों और अन्य संबंधित पहलुओं की जांच करना है।
इससे यह भी स्पष्ट होता है कि अदालत केवल विरोध-प्रदर्शन के अधिकार पर विचार नहीं कर रही, बल्कि यह भी देखना चाहती है कि सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शन किस प्रकार आयोजित किए जाएं, जिससे कानून-व्यवस्था और आम लोगों के अधिकार सुरक्षित रहें।
हालांकि, समिति के गठन से जुड़े आदेश और उसके कार्यक्षेत्र का अंतिम विवरण न्यायालय के आधिकारिक आदेश से ही स्पष्ट होगा।
याचिका में CJP, राहुल गांधी और INDIA गठबंधन को पक्षकार बनाने का निर्देश
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित प्रदर्शनकारी संगठनों और राजनीतिक पक्षकारों को भी मामले में उचित पक्षकार के रूप में शामिल करने का निर्देश दिया।
इनमें सीजेपी, राहुल गांधी और INDIA गठबंधन के प्रतिनिधियों का उल्लेख किया गया।
इसका उद्देश्य यह है कि जिन संगठनों और राजनीतिक पक्षों से संबंधित विरोध-प्रदर्शन का मुद्दा उठाया गया है, उन्हें भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिले।
न्यायिक प्रक्रिया में यह महत्वपूर्ण है कि किसी पक्ष के अधिकारों को प्रभावित करने वाला निर्णय लेने से पहले संबंधित पक्षों को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाए।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने मामले में आवश्यक पक्षकारों को शामिल करने पर जोर दिया।
संविधान का अनुच्छेद 19 देता है विरोध-प्रदर्शन का अधिकार
भारत में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन का अधिकार मुख्य रूप से संविधान के अनुच्छेद 19 में दिए गए मौलिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है।
अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
इसके माध्यम से प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने, सरकार की नीतियों की आलोचना करने और असहमति व्यक्त करने का अधिकार मिलता है।
वहीं अनुच्छेद 19(1)(b) सभी नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है।
इस अधिकार के अंतर्गत नागरिक शांतिपूर्ण सभाएं आयोजित कर सकते हैं और अपनी मांगों को लेकर विरोध-प्रदर्शन कर सकते हैं।
लेकिन ये अधिकार पूर्ण या असीमित नहीं हैं।
संविधान के अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था, राज्य की सुरक्षा और अन्य संवैधानिक आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
इसका अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति या संगठन अपने विरोध-प्रदर्शन के अधिकार का इस्तेमाल इस तरह नहीं कर सकता, जिससे कानून-व्यवस्था बिगड़े या दूसरे नागरिकों के अधिकार प्रभावित हों।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने भी यही संवैधानिक प्रश्न महत्वपूर्ण है कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन और दूसरे नागरिकों की आजीविका के अधिकार के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले भी समझना जरूरी
विरोध-प्रदर्शन और सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले भी महत्वपूर्ण फैसले दे चुका है।
1. अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त, 2020
शाहीन बाग प्रदर्शन से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सार्वजनिक रास्तों और सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं किया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया था कि विरोध-प्रदर्शन का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन सार्वजनिक स्थानों पर अन्य लोगों के आने-जाने के अधिकार को भी ध्यान में रखना होगा।
यह फैसला विरोध-प्रदर्शन और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
2. हिम्मत लाल के. शाह बनाम पुलिस आयुक्त, अहमदाबाद (1973)
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों पर सभा और प्रदर्शन के अधिकार से जुड़े महत्वपूर्ण सिद्धांत निर्धारित किए थे।
अदालत ने माना कि राज्य सार्वजनिक सभाओं को विनियमित कर सकता है, लेकिन ऐसी शक्ति का इस्तेमाल नागरिकों के शांतिपूर्ण सभा करने के अधिकार को मनमाने ढंग से समाप्त करने के लिए नहीं किया जा सकता।
इन दोनों फैसलों से स्पष्ट होता है कि भारतीय न्यायपालिका विरोध-प्रदर्शन को लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती है, लेकिन इसके साथ सार्वजनिक व्यवस्था और दूसरे नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा को भी आवश्यक समझती है।
व्यापारियों की आजीविका का अधिकार भी है महत्वपूर्ण
इस मामले में व्यापारिक संगठनों की सबसे बड़ी चिंता आजीविका को लेकर है।
दिल्ली जैसे महानगर में बाजारों और व्यावसायिक क्षेत्रों में लाखों लोग अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं।
एक छोटी-सी दुकान से लेकर बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों तक कई लोगों का रोजगार जुड़ा होता है।
किसी बाजार में ग्राहकों की आवाजाही कम होने से केवल दुकानदार का कारोबार प्रभावित नहीं होता, बल्कि उसके यहां काम करने वाले कर्मचारियों, सामान पहुंचाने वाले वाहन चालकों, छोटे आपूर्तिकर्ताओं और अन्य लोगों की आय पर भी असर पड़ सकता है।
रेहड़ी-पटरी लगाने वाले और दिहाड़ी मजदूर भी ऐसी आर्थिक गतिविधियों पर निर्भर रहते हैं।
यदि किसी स्थान पर लंबे समय तक प्रदर्शन होने के कारण यातायात और बाजार तक पहुंच प्रभावित होती है, तो उसका असर व्यापक हो सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(g) नागरिकों को कोई भी व्यवसाय, व्यापार या पेशा अपनाने का अधिकार देता है।
इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमापूर्ण जीवन और आजीविका से जुड़े पहलुओं को भी न्यायिक संरक्षण प्राप्त है।
इसलिए व्यापारिक संगठनों का तर्क है कि विरोध-प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा करते समय उन लोगों के हितों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए, जिनकी रोजी-रोटी संबंधित क्षेत्रों के कारोबार पर निर्भर है।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने धरना-प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया है?
इस मामले को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल देशभर में धरना-प्रदर्शनों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है।
अदालत ने शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार को स्वीकार किया है।
उसकी चिंता सार्वजनिक स्थानों के अनिश्चितकालीन इस्तेमाल और उससे दूसरे नागरिकों को होने वाली परेशानी को लेकर है।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि अब जंतर-मंतर या रामलीला मैदान में प्रदर्शन नहीं किए जा सकेंगे।
मामले में अभी केंद्र सरकार से जवाब मांगा गया है और आगे न्यायिक सुनवाई होनी है।
अंतिम व्यवस्था अदालत द्वारा संबंधित पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध तथ्यों पर विचार करने के बाद तय की जाएगी।
अगली सुनवाई कब होगी?
सुप्रीम कोर्ट ने व्यापारिक संगठनों की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है।
अदालत ने संबंधित प्रदर्शनकारी संगठनों और राजनीतिक पक्षकारों को भी उचित रूप से कार्यवाही में शामिल करने का निर्देश दिया है।
मामले की अगली सुनवाई नवंबर 2026 के अंतिम सप्ताह में होने की बात कही गई है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार इस मामले में क्या जवाब दाखिल करती है और विरोध-प्रदर्शन स्थलों के इस्तेमाल को लेकर किस प्रकार की व्यवस्था का सुझाव देती है।
निष्कर्ष
रामलीला मैदान और जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शनों से जुड़ा यह मामला भारतीय लोकतंत्र में नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
एक तरफ नागरिकों को सरकार के खिलाफ आवाज उठाने और अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। दूसरी तरफ व्यापारियों, कर्मचारियों और आम नागरिकों को भी अपना व्यवसाय करने, रोजगार प्राप्त करने और सामान्य जीवन जीने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का मुख्य संदेश यही है कि किसी एक व्यक्ति या संगठन का अधिकार दूसरे नागरिकों के अधिकारों को अनिश्चितकाल तक प्रभावित करने का आधार नहीं बन सकता।
लोकतंत्र में विरोध की आवाज दबाई नहीं जानी चाहिए, लेकिन विरोध के नाम पर सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्चितकालीन कब्जा भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और न्यायपालिका की जिम्मेदारी है कि इन अधिकारों के बीच उचित संतुलन बनाए रखा जाए।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।