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NHAI का फर्जी डिप्टी जनरल मैनेजर बनकर 7.29 करोड़ रुपये की ठगी का आरोप, बठिंडा कोर्ट ने आरोपी की दोनों जमानत याचिकाएं की खारिज

NHAI का फर्जी डिप्टी जनरल मैनेजर बनकर 7.29 करोड़ रुपये की ठगी का आरोप, बठिंडा कोर्ट ने आरोपी की दोनों जमानत याचिकाएं की खारिज

NHAI Fake Officer Fraud Case: सरकारी विभागों में बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों के नाम और पद का इस्तेमाल करके लोगों को ठगने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। खासकर सरकारी ठेकों, टोल प्लाजा के लाइसेंस और अन्य व्यावसायिक अवसरों का लालच देकर लोगों से करोड़ों रुपये ऐंठने वाले गिरोह सक्रिय हैं। ऐसे मामलों में ठग पहले खुद को किसी बड़े सरकारी अधिकारी के रूप में पेश करते हैं, फिर फर्जी पहचान पत्र, सरकारी लेटरहेड और दूसरे दस्तावेज दिखाकर लोगों का विश्वास जीतते हैं। जब तक पीड़ित को वास्तविकता का पता चलता है, तब तक उसकी बड़ी रकम आरोपियों के खातों में पहुंच चुकी होती है।

ऐसा ही एक गंभीर मामला पंजाब के बठिंडा से सामने आया है। यहां भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) का फर्जी डिप्टी जनरल मैनेजर बनकर टोल प्लाजा का ठेका दिलाने के नाम पर करोड़ों रुपये की कथित धोखाधड़ी करने के आरोपी राकेश गोयल को अदालत से बड़ा झटका लगा है।

बठिंडा की अदालत ने आरोपी की दोनों जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं। आरोपी के खिलाफ दो अलग-अलग मामले दर्ज हैं, जिनमें कुल 7.29 करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी करने के आरोप लगाए गए हैं। दोनों मामले थाना थर्मल में दर्ज किए गए हैं।

दूसरे मामले में सत्र न्यायाधीश गगनदीप सिंह गर्ग की अदालत ने सुनवाई के बाद आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने धोखाधड़ी की बड़ी रकम, आरोपों की गंभीरता और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका जैसे पहलुओं पर विचार किया।

फिलहाल आरोपी न्यायिक हिरासत में है। हालांकि, अदालत द्वारा जमानत खारिज किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि आरोपी पर लगे आरोप सिद्ध हो गए हैं। मामले में दोष या निर्दोष होने का अंतिम फैसला मुकदमे की सुनवाई और साक्ष्यों के आधार पर होगा।

क्या है पूरा मामला?

मामला पंजाब के बठिंडा जिले का है, जहां राकेश गोयल पर खुद को नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) का वरिष्ठ अधिकारी बताकर लोगों को ठगने का आरोप है।

पुलिस के अनुसार, आरोपी ने कथित तौर पर अपना परिचय एनएचएआई के लेखा विभाग में तैनात डिप्टी जनरल मैनेजर के रूप में दिया था।

उसने लोगों को विश्वास दिलाया कि उसकी सरकारी विभाग में अच्छी पहुंच है और वह उन्हें टोल प्लाजा का ठेका दिलवा सकता है। इसके अलावा वाहनों पर बिना रिचार्ज फास्टैग लगवाने जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने का भी भरोसा दिया गया।

आरोप है कि लोगों का विश्वास जीतने के लिए आरोपी ने कथित तौर पर फर्जी पहचान पत्र, सरकारी लेटरहेड और अन्य दस्तावेजों का इस्तेमाल किया।

सरकारी विभाग के बड़े अधिकारी का नाम सुनकर शिकायतकर्ताओं ने उसकी बातों पर भरोसा किया और अलग-अलग समय पर बड़ी रकम उसके बैंक खातों में जमा करवा दी।

लेकिन बाद में जब वादा पूरा नहीं हुआ और ठेके से संबंधित कोई वास्तविक प्रक्रिया सामने नहीं आई, तब शिकायतकर्ताओं को धोखाधड़ी का संदेह हुआ। इसके बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई।

इस मामले में पुलिस ने अलग-अलग शिकायतों के आधार पर दो FIR दर्ज की हैं।

पहला मामला: टोल प्लाजा का ठेका दिलाने के नाम पर 2.40 करोड़ रुपये लेने का आरोप

आरोपी राकेश गोयल के खिलाफ पहला मामला शिकायतकर्ता राम स्वरूप सिंगला की शिकायत पर दर्ज किया गया था।

शिकायत के अनुसार, आरोपी ने खुद को एनएचएआई का अधिकारी बताया और शिकायतकर्ता को टोल प्लाजा का लाइसेंस तथा ठेका दिलाने का भरोसा दिया।

बताया गया कि आरोपी ने अपनी सरकारी पहचान और विभाग में प्रभाव का हवाला देकर शिकायतकर्ता को विश्वास में लिया।

शिकायतकर्ता को लगा कि आरोपी वास्तव में एनएचएआई में किसी महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत है और उसके माध्यम से टोल प्लाजा का ठेका प्राप्त किया जा सकता है।

इसी भरोसे के आधार पर आरोपी को करीब 2.40 करोड़ रुपये दिए जाने का आरोप है।

बाद में जब ठेका दिलाने के संबंध में कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया, तो शिकायतकर्ता को अपने साथ धोखाधड़ी होने का एहसास हुआ।

इसके बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई और मामले की जांच शुरू हुई।

इस मामले में आरोपी ने जमानत के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन उसकी जमानत याचिका तीन दिन पहले ही खारिज हो चुकी थी।

दूसरा मामला: 7.29 करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी का आरोप

राकेश गोयल के खिलाफ दूसरा मामला भी थाना थर्मल में दर्ज है। यह मामला एफआईआर नंबर 96 से संबंधित है।

इसमें वीडियोग्राफर मनीष गुप्ता ने शिकायत दर्ज कराई थी।

शिकायतकर्ता के अनुसार, आरोपी ने खुद को भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के लेखा विभाग का डिप्टी जनरल मैनेजर बताया था।

आरोप है कि उसने अपनी पहचान साबित करने और शिकायतकर्ता का विश्वास जीतने के लिए कथित रूप से फर्जी सरकारी पहचान पत्र, लेटरहेड और अन्य दस्तावेज दिखाए।

इसके बाद उसने टोल प्लाजा का ठेका दिलाने का भरोसा दिया। साथ ही वाहनों पर बिना रिचार्ज फास्टैग लगवाने की सुविधा उपलब्ध कराने का भी दावा किया।

आरोपी ने कथित तौर पर यह विश्वास दिलाया कि उसके पास एनएचएआई में पद और संपर्क होने के कारण वह यह काम आसानी से करवा सकता है।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसी भरोसे में आकर उसने अलग-अलग किस्तों में आरोपी के बैंक खातों में बड़ी रकम जमा कराई।

किश्तों में जमा कराए गए 7 करोड़ 4 लाख 21 हजार 962 रुपये

दूसरे मामले में शिकायतकर्ता मनीष गुप्ता ने आरोप लगाया कि आरोपी को अलग-अलग किश्तों में कुल 7 करोड़ 4 लाख 21 हजार 962 रुपये दिए गए।

इसके अतिरिक्त आरोपी के एक रिश्तेदार के बैंक खाते में भी 25 लाख रुपये जमा कराए गए।

इस प्रकार शिकायत में कुल 7 करोड़ 29 लाख 21 हजार 962 रुपये की कथित धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया है।

यह रकम एक बार में नहीं, बल्कि अलग-अलग समय पर बैंक खातों के माध्यम से जमा कराई गई थी।

शिकायतकर्ता के अनुसार, आरोपी ने सरकारी अधिकारी होने का भरोसा दिलाकर टोल प्लाजा के ठेके और फास्टैग से जुड़ी सुविधाओं का लालच दिया था।

जब कथित तौर पर वादे के अनुसार काम नहीं हुआ, तब शिकायतकर्ता ने पुलिस से संपर्क किया।

पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर जांच शुरू की।

यहां यह महत्वपूर्ण है कि बैंक खातों में जमा हुई रकम और उससे संबंधित लेनदेन की जांच के जरिए पुलिस को धोखाधड़ी के आरोपों से जुड़े साक्ष्य जुटाने होते हैं। केवल शिकायत में बताई गई रकम को अंतिम रूप से साबित हुई ठगी नहीं माना जा सकता।

आरोपी ने अदालत में जमानत के लिए क्या दलील दी?

दोनों मामलों में आरोपी राकेश गोयल ने अदालत से जमानत देने की मांग की थी।

बचाव पक्ष की ओर से अदालत में दलील दी गई कि आरोपी को झूठे मामलों में फंसाया गया है और उसके खिलाफ लगाए गए आरोप सही नहीं हैं।

आरोपी पक्ष ने यह भी बताया कि वह 25 जुलाई से न्यायिक हिरासत में है।

बचाव पक्ष का कहना था कि पुलिस अपनी जांच पूरी कर चुकी है और चालान यानी आरोपपत्र भी अदालत में पेश किया जा चुका है।

ऐसी स्थिति में आरोपी को आगे हिरासत में रखने की आवश्यकता नहीं है। उसे जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए, ताकि वह मुकदमे की सुनवाई में शामिल हो सके।

बचाव पक्ष ने अदालत के सामने यह तर्क भी रखा कि जब जांच पूरी हो चुकी है और पुलिस द्वारा आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है, तो आरोपी को अनिश्चित समय तक जेल में रखना उचित नहीं होगा।

हालांकि, अदालत ने बचाव पक्ष की दलीलों को स्वीकार नहीं किया।

सरकारी पक्ष ने जमानत का क्यों किया विरोध?

सरकारी पक्ष ने आरोपी की जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया।

अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि आरोपी के खिलाफ धोखाधड़ी की रकम बहुत बड़ी है और मामले में गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

सरकारी पक्ष ने यह भी ध्यान दिलाया कि आरोपी के खिलाफ इसी प्रकार की धोखाधड़ी से संबंधित दूसरा मामला भी दर्ज है।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी पर सरकारी अधिकारी बनकर लोगों को विश्वास में लेने और टोल प्लाजा का ठेका दिलाने के नाम पर करोड़ों रुपये लेने का आरोप है।

इस तरह के मामलों में केवल रकम का लेनदेन ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि यह भी जांचना आवश्यक होता है कि आरोपी ने कथित रूप से किन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया, लोगों को किस प्रकार विश्वास में लिया और रकम किन बैंक खातों में पहुंची।

सरकारी पक्ष ने आशंका जताई कि यदि आरोपी को जमानत पर रिहा किया जाता है, तो वह गवाहों को प्रभावित कर सकता है या उन्हें डराने-धमकाने का प्रयास कर सकता है।

इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अभियोजन पक्ष ने अदालत से जमानत याचिका खारिज करने की मांग की।

बठिंडा कोर्ट ने क्यों खारिज की दोनों जमानत याचिकाएं?

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने बचाव पक्ष और सरकारी पक्ष की दलीलों पर विचार किया।

दूसरे मामले में सत्र न्यायाधीश गगनदीप सिंह गर्ग की अदालत ने आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया।

अदालत ने मामले की गंभीरता, कथित धोखाधड़ी की बड़ी रकम और आरोपी के खिलाफ दर्ज दूसरे समान मामले को महत्वपूर्ण माना।

इसके अलावा गवाहों को प्रभावित करने और उन्हें डराने-धमकाने की आशंका पर भी विचार किया गया।

अदालत के सामने यह तथ्य भी था कि आरोपी के खिलाफ दो अलग-अलग मामलों में गंभीर आर्थिक धोखाधड़ी के आरोप लगाए गए हैं।

ऐसी परिस्थितियों में अदालत ने आरोपी को जमानत पर रिहा करना उचित नहीं समझा।

इससे पहले करीब 2.40 करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी से जुड़े पहले मामले में भी उसकी जमानत याचिका खारिज हो चुकी थी।

इस प्रकार आरोपी को दोनों मामलों में अदालत से राहत नहीं मिली।

फिलहाल वह न्यायिक हिरासत में है।

क्या पुलिस द्वारा चालान पेश करने के बाद जमानत मिलना अधिकार है?

इस मामले में बचाव पक्ष की एक प्रमुख दलील यह थी कि पुलिस चालान पेश कर चुकी है और अब आरोपी को हिरासत में रखने की जरूरत नहीं है।

यहां आपराधिक कानून का एक महत्वपूर्ण पहलू समझना जरूरी है।

पुलिस द्वारा आरोपपत्र दाखिल कर देने के बाद आरोपी को स्वतः जमानत मिलने का अधिकार नहीं मिल जाता।

जमानत पर विचार करते समय अदालत कई पहलुओं को देखती है।

इनमें अपराध की प्रकृति, आरोपों की गंभीरता, उपलब्ध प्रारंभिक साक्ष्य, आरोपी के फरार होने की आशंका, गवाहों को प्रभावित करने की संभावना और जांच या मुकदमे पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव शामिल हैं।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) में जमानत से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं। गैर-जमानती अपराधों में जमानत देना या न देना न्यायालय के विवेक और मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी कई फैसलों में कहा है कि जमानत पर विचार करते समय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निष्पक्ष जांच एवं न्यायिक प्रक्रिया के हितों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

इसलिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि पुलिस ने चालान पेश कर दिया है। अदालत को यह भी देखना होता है कि आरोपी की रिहाई से मुकदमे की प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका तो नहीं है।

NHAI के नाम पर ठगी से लोगों को कैसे बचना चाहिए?

यह मामला आम लोगों के लिए भी एक महत्वपूर्ण चेतावनी है।

सरकारी विभागों में ठेके, लाइसेंस और अन्य व्यावसायिक अवसर प्राप्त करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया होती है। कोई भी व्यक्ति केवल किसी अधिकारी से व्यक्तिगत संपर्क होने का दावा करके सरकारी ठेका दिलाने की गारंटी नहीं दे सकता।

एनएचएआई जैसी सरकारी संस्था के नाम का इस्तेमाल करके यदि कोई व्यक्ति निजी तौर पर लाखों या करोड़ों रुपये मांगता है, तो उसकी पूरी जांच करना जरूरी है।

ऐसे मामलों में कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए।

1. अधिकारी की पहचान सत्यापित करें: कोई व्यक्ति स्वयं को एनएचएआई का अधिकारी बताता है, तो उसका विभागीय पद, पहचान और कार्यस्थल आधिकारिक माध्यम से सत्यापित करें।

2. सरकारी दस्तावेजों की जांच करें: केवल सरकारी लेटरहेड, मुहर या पहचान पत्र देखकर भरोसा न करें। फर्जी दस्तावेज तैयार करना मुश्किल नहीं है।

3. टेंडर प्रक्रिया की जानकारी लें: सरकारी टोल प्लाजा और अन्य परियोजनाओं से संबंधित ठेके निर्धारित निविदा प्रक्रिया के माध्यम से दिए जाते हैं। इसलिए किसी निजी व्यक्ति के माध्यम से ठेका दिलाने के दावे की जांच करें।

4. निजी बैंक खातों में रकम जमा न करें: सरकारी ठेका दिलाने के नाम पर किसी अधिकारी या बिचौलिए के निजी बैंक खाते में बड़ी रकम जमा कराने से बचें।

5. लिखित प्रमाण सुरक्षित रखें: यदि किसी व्यक्ति ने ठेका दिलाने के नाम पर पैसे मांगे हैं, तो उससे संबंधित बैंक ट्रांजैक्शन, बातचीत, ईमेल और अन्य दस्तावेज सुरक्षित रखें।

6. धोखाधड़ी होने पर शिकायत करें: आर्थिक धोखाधड़ी की स्थिति में तत्काल पुलिस और साइबर अपराध से संबंधित सक्षम अधिकारियों को शिकायत दें। बैंक से भी तुरंत संपर्क करें।

किन कानूनी धाराओं में हो सकती है कार्रवाई?

इस प्रकार के मामले में आरोपों और जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के विभिन्न प्रावधान लागू हो सकते हैं।

यदि कोई व्यक्ति धोखाधड़ी करके किसी दूसरे व्यक्ति से धन प्राप्त करता है, तो परिस्थितियों के अनुसार BNS की धारा 318 के तहत कार्रवाई हो सकती है।

यदि धोखाधड़ी करने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए हैं या उनका इस्तेमाल किया गया है, तो जालसाजी और फर्जी दस्तावेजों के उपयोग से संबंधित BNS के प्रावधान भी लागू हो सकते हैं।

इसके अतिरिक्त, यदि जांच में आपराधिक षड्यंत्र या अन्य अपराध सामने आते हैं, तो संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

हालांकि, इस मामले में कौन-कौन सी धाराएं लगाई गई हैं, इसका अंतिम निर्धारण FIR और पुलिस के आरोपपत्र से ही किया जा सकता है। इसलिए केवल आरोपों के आधार पर किसी विशेष धारा को लागू मान लेना उचित नहीं होगा।

निष्कर्ष

बठिंडा का यह मामला सरकारी विभागों के नाम पर होने वाली कथित आर्थिक धोखाधड़ी की गंभीरता को सामने लाता है। आरोप है कि राकेश गोयल ने खुद को एनएचएआई का डिप्टी जनरल मैनेजर बताकर टोल प्लाजा का ठेका दिलाने और फास्टैग से जुड़ी सुविधाएं उपलब्ध कराने का भरोसा दिया तथा इसी बहाने दो अलग-अलग मामलों में 7.29 करोड़ रुपये से अधिक की रकम हासिल की।

बठिंडा की अदालत ने दोनों मामलों में आरोपी की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं। अदालत ने कथित धोखाधड़ी की बड़ी रकम, आरोपों की गंभीरता और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका को महत्वपूर्ण माना है।

फिलहाल आरोपी न्यायिक हिरासत में है और मामले की न्यायिक प्रक्रिया जारी है।

इस मामले से सबसे बड़ी सीख यह है कि सरकारी पद, पहचान पत्र और प्रभावशाली संपर्कों का दावा करने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर आंख बंद करके भरोसा नहीं करना चाहिए। सरकारी ठेका प्राप्त करने के लिए निर्धारित आधिकारिक प्रक्रिया का पालन करना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है। साथ ही, अदालत में आरोप सिद्ध होने से पहले किसी आरोपी को दोषी मानना भी कानून के स्थापित सिद्धांतों के विरुद्ध है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।