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AI से बनाई जा रही अभिनेत्री रूपाली गांगुली की अश्लील तस्वीरें और वीडियो, पर्सनैलिटी राइट्स की सुरक्षा के लिए पहुंचीं बॉम्बे हाईकोर्ट

AI से बनाई जा रही अभिनेत्री रूपाली गांगुली की अश्लील तस्वीरें और वीडियो, पर्सनैलिटी राइट्स की सुरक्षा के लिए पहुंचीं बॉम्बे हाईकोर्ट

       आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने जहां लोगों के लिए नई संभावनाओं के दरवाजे खोले हैं, वहीं इसके दुरुपयोग ने कई गंभीर समस्याएं भी पैदा कर दी हैं। अब किसी व्यक्ति की असली तस्वीर और आवाज का इस्तेमाल करके ऐसी नकली तस्वीरें, वीडियो और ऑडियो तैयार किए जा सकते हैं, जिन्हें पहली नजर में देखकर असली और नकली के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है। खासकर फिल्म और टीवी इंडस्ट्री से जुड़ी अभिनेत्रियां इस समस्या का सामना कर रही हैं। कई बार उनकी तस्वीरों और वीडियो के साथ इस तरह छेड़छाड़ की जाती है कि उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा, निजता और सम्मान प्रभावित होता है।

इसी समस्या को लेकर टीवी की मशहूर अभिनेत्री रूपाली गांगुली ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। अभिनेत्री का आरोप है कि कई ऑनलाइन पोर्टल और वेबसाइट उनकी तस्वीरों, वीडियो और अन्य व्यक्तिगत पहचान से जुड़े कंटेंट का इस्तेमाल बिना अनुमति कर रहे हैं। इतना ही नहीं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक तकनीक की मदद से उनकी नकली तस्वीरें और वीडियो तैयार किए जा रहे हैं। कुछ आपत्तिजनक वेबसाइटों पर उनके चेहरे को दूसरे लोगों के शरीर पर लगाकर अश्लील सामग्री भी प्रसारित की जा रही है।

रूपाली गांगुली ने इसे अपने पर्सनैलिटी राइट्स (Personality Rights), पब्लिसिटी राइट्स (Publicity Rights), निजता और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन बताया है। उन्होंने अदालत से मांग की है कि उनकी पहचान, तस्वीर, आवाज और व्यक्तित्व का इस्तेमाल बिना सहमति करने वाले लोगों और वेबसाइटों के खिलाफ उचित आदेश जारी किए जाएं।

इस मामले की सुनवाई 4 नवंबर 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति माधव जामदार की पीठ के समक्ष निर्धारित है। यह मामला केवल एक अभिनेत्री की निजी शिकायत नहीं है, बल्कि डिजिटल युग में किसी व्यक्ति की पहचान और सम्मान की कानूनी सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।

क्या है पूरा मामला?

रूपाली गांगुली भारतीय टेलीविजन की जानी-मानी अभिनेत्रियों में शामिल हैं। उन्होंने अपने अभिनय करियर में कई लोकप्रिय धारावाहिकों में काम किया है। ‘कहानी घर-घर की’, ‘संजीवनी’, ‘साराभाई वर्सेज साराभाई’ और ‘अनुपमा’ जैसे धारावाहिकों से उन्हें व्यापक पहचान मिली।

अभिनेत्री का कहना है कि लंबे समय से कुछ वेबसाइट और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उनकी लोकप्रियता का फायदा उठाकर उनकी तस्वीरों और वीडियो का इस्तेमाल कर रहे हैं। कई जगह उनकी तस्वीरों का उपयोग ऐसे उत्पादों, सेवाओं और प्रचार सामग्री में किया जा रहा है, जिनसे उनका कोई वास्तविक संबंध नहीं है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि कुछ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उनकी पहचान का इस्तेमाल करके लोगों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि अभिनेत्री किसी विशेष उत्पाद, वेबसाइट, कार्यक्रम या व्यावसायिक गतिविधि से जुड़ी हुई हैं।

सबसे गंभीर आरोप AI से तैयार की गई नकली और अश्लील सामग्री को लेकर है। अभिनेत्री का आरोप है कि कुछ लोग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इमेज एडिटिंग टूल की सहायता से उनका चेहरा दूसरे लोगों के शरीर पर लगाकर अश्लील तस्वीरें और वीडियो तैयार कर रहे हैं।

इसके बाद इस सामग्री को ऐसी वेबसाइटों पर अपलोड किया जा रहा है, जहां से बड़ी संख्या में लोग इसे देख सकते हैं।

रूपाली का कहना है कि इस तरह की गतिविधियां उनकी प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत गरिमा को नुकसान पहुंचाती हैं। किसी व्यक्ति की तस्वीर का इस्तेमाल करके ऐसी सामग्री तैयार करना, जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है, केवल कॉपीराइट का मामला नहीं है, बल्कि उसकी पहचान और निजता से भी जुड़ा हुआ है।

रूपाली गांगुली ने अदालत से क्या मांग की है?

अभिनेत्री की ओर से अधिवक्ता सना रईस खान ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है।

याचिका में रूपाली गांगुली ने अपने नाम, आवाज, तस्वीर, समानता, हस्ताक्षर और व्यक्तित्व से जुड़ी अन्य विशिष्ट पहचान के अनधिकृत इस्तेमाल पर रोक लगाने की मांग की है।

उनकी मांग केवल सामान्य तस्वीरों के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जनरेटिव AI, मशीन लर्निंग, डीपफेक और फेस मॉर्फिंग तकनीक के जरिए तैयार की गई सामग्री को भी शामिल किया गया है।

अभिनेत्री चाहती हैं कि कोई भी व्यक्ति या संस्था उनकी अनुमति के बिना उनकी पहचान का व्यावसायिक या अन्य अनुचित इस्तेमाल न कर सके।

याचिका में ऑनलाइन पोर्टल, सेलिब्रिटी मैनेजमेंट प्लेटफॉर्म, ई-कॉमर्स वेबसाइट और अन्य संबंधित पक्षों को भी प्रतिवादी बनाया गया है। रिपोर्टों के अनुसार, मुकदमे में 18 प्रतिवादी शामिल हैं। इनमें कुछ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, गूगल, रेडिट, AI इमेज जनरेशन प्लेटफॉर्म SeaArt AI और संबंधित सरकारी विभाग भी शामिल हैं।

अभिनेत्री ने अदालत से आपत्तिजनक सामग्री को हटाने, भविष्य में उसके दोबारा इस्तेमाल पर रोक लगाने और उनकी पहचान के अनधिकृत व्यावसायिक इस्तेमाल को प्रतिबंधित करने का अनुरोध किया है।

पर्सनैलिटी राइट्स क्या होते हैं?

इस मामले को समझने के लिए पर्सनैलिटी राइट्स का अर्थ जानना जरूरी है।

पर्सनैलिटी राइट्स का मतलब किसी व्यक्ति को अपनी पहचान और व्यक्तित्व से जुड़ी विशेषताओं पर कानूनी नियंत्रण का अधिकार मिलना है।

किसी व्यक्ति का नाम, चेहरा, आवाज, हस्ताक्षर, बोलने का तरीका, विशेष अंदाज और उसकी पहचान से जुड़ी अन्य विशिष्ट विशेषताएं उसकी व्यक्तिगत पहचान का हिस्सा होती हैं।

उदाहरण के लिए, यदि कोई कंपनी किसी प्रसिद्ध अभिनेत्री की तस्वीर अपने उत्पाद के विज्ञापन में इस तरह इस्तेमाल करती है कि लोगों को लगे कि अभिनेत्री उस उत्पाद का प्रचार कर रही हैं, जबकि उन्होंने इसके लिए कोई अनुमति नहीं दी है, तो यह उनके पब्लिसिटी राइट्स के उल्लंघन का मामला बन सकता है।

इसी तरह यदि कोई व्यक्ति किसी अभिनेता की आवाज की नकल करके AI से नकली ऑडियो तैयार करता है और उसे इस तरह प्रसारित करता है कि लोग उसे असली समझें, तो इससे उस व्यक्ति की पहचान और प्रतिष्ठा प्रभावित हो सकती है।

पर्सनैलिटी राइट्स का संबंध केवल आर्थिक लाभ से नहीं है। इसका एक महत्वपूर्ण पहलू व्यक्ति की गरिमा और निजता की सुरक्षा भी है।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि भारत में पर्सनैलिटी राइट्स के लिए कोई एक अलग और व्यापक कानून नहीं है। इन अधिकारों की सुरक्षा विभिन्न संवैधानिक सिद्धांतों, न्यायिक फैसलों, कॉपीराइट कानून और अन्य लागू कानूनी प्रावधानों के माध्यम से की जाती है।

AI Deepfake क्या है और इससे खतरा क्यों बढ़ रहा है?

डीपफेक (Deepfake) एक ऐसी तकनीक है, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग की मदद से किसी व्यक्ति का चेहरा, आवाज या हाव-भाव किसी दूसरे फोटो, वीडियो या ऑडियो में इस तरह शामिल कर दिया जाता है कि सामग्री वास्तविक दिखाई देने लगती है।

पहले किसी तस्वीर में बदलाव करने के लिए फोटो एडिटिंग का ज्ञान और काफी समय लगता था। लेकिन अब कई AI टूल कुछ ही मिनटों में चेहरे और आवाज की नकल तैयार कर सकते हैं।

इस तकनीक के कुछ सकारात्मक उपयोग भी हैं। फिल्मों में विशेष प्रभाव तैयार करने, शिक्षा, मनोरंजन और रचनात्मक कार्यों में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब किसी व्यक्ति की सहमति के बिना उसकी पहचान का इस्तेमाल करके अश्लील वीडियो, नकली तस्वीरें या भ्रामक सामग्री बनाई जाती है।

ऐसे मामलों में पीड़ित व्यक्ति को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

  • उसकी सामाजिक और व्यावसायिक प्रतिष्ठा प्रभावित हो सकती है।
  • परिवार और परिचितों के सामने गलत छवि बन सकती है।
  • नकली वीडियो के कारण मानसिक और सामाजिक दबाव पैदा हो सकता है।
  • इंटरनेट पर सामग्री तेजी से फैलने के कारण उसे पूरी तरह हटाना मुश्किल हो सकता है।
  • नकली विज्ञापनों के जरिए लोगों को आर्थिक रूप से धोखा दिया जा सकता है।

रूपाली गांगुली की याचिका में भी इसी तरह की चिंताओं को सामने रखा गया है। अभिनेत्री का कहना है कि उनकी पहचान का इस्तेमाल करके तैयार की गई अश्लील सामग्री उनकी गरिमा और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा रही है।

अभिनेत्री सामंथा रुथ प्रभु भी पहुंच चुकी हैं बॉम्बे हाईकोर्ट

रूपाली गांगुली से पहले दक्षिण भारतीय और हिंदी फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री सामंथा रुथ प्रभु भी अपनी पहचान के गलत इस्तेमाल को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंच चुकी हैं।

सामंथा ने अक्टूबर 2026 में अदालत में याचिका दाखिल की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि कई वेबसाइट और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उनकी तस्वीरों, आवाज और पहचान का इस्तेमाल करके AI से नकली वीडियो, मॉर्फ की गई तस्वीरें और अश्लील सामग्री तैयार कर रहे हैं।

उनकी शिकायत में केवल तस्वीरों के दुरुपयोग का मामला नहीं था, बल्कि AI चैटबॉट के माध्यम से उनकी पहचान की नकल करने और उनके नाम से आपत्तिजनक डिजिटल सामग्री तैयार करने का मुद्दा भी उठाया गया था।

सामंथा ने अदालत से मांग की थी कि उनकी पहचान का इस्तेमाल करके बनाई गई आपत्तिजनक सामग्री को हटाया जाए और भविष्य में इस तरह के दुरुपयोग पर रोक लगाई जाए।

उनकी याचिका में गूगल, मेटा और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को भी पक्षकार बनाया गया था।

सामंथा को बॉम्बे हाईकोर्ट से मिली थी अंतरिम राहत

सामंथा रुथ प्रभु की याचिका पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने 1 अक्टूबर 2026 को अंतरिम राहत प्रदान की थी।

अदालत ने उनके व्यक्तित्व से जुड़ी पहचान का अनधिकृत इस्तेमाल रोकने और चिह्नित आपत्तिजनक सामग्री को हटाने के संबंध में अंतरिम निर्देश दिए थे।

इस आदेश में AI से तैयार किए गए डीपफेक वीडियो, मॉर्फ की गई तस्वीरों, अश्लील सामग्री और अभिनेत्री की पहचान का गलत इस्तेमाल करने वाले डिजिटल कंटेंट को भी शामिल किया गया था।

अदालत ने संबंधित ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को उनके द्वारा चिह्नित आपत्तिजनक लिंक और सामग्री के संबंध में कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी था कि अदालत ने इंटरनेट पर उपलब्ध वास्तविक और वैध सामग्री तथा आपत्तिजनक नकली सामग्री के बीच अंतर बनाए रखने की आवश्यकता को ध्यान में रखा।

इसलिए हर उस सामग्री को हटाने का आदेश नहीं माना जा सकता, जिसमें अभिनेत्री की तस्वीर मौजूद हो। कार्रवाई का विषय वह सामग्री है, जो उनकी पहचान का अनधिकृत इस्तेमाल करती है और जिसके संबंध में अदालत ने राहत प्रदान की है।

सामंथा के मामले में मिला अंतरिम संरक्षण अब रूपाली गांगुली की याचिका के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि, दोनों मामलों के अंतिम निर्णय और राहत का दायरा अलग-अलग न्यायिक आदेशों पर निर्भर करेगा।

संविधान का अनुच्छेद 21 भी देता है निजता और गरिमा का संरक्षण

भारत में प्रत्येक व्यक्ति को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है।

सुप्रीम कोर्ट ने के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) के ऐतिहासिक फैसले में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना था।

इस फैसले में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से कहा था कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।

निजता का अधिकार केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं है। इसमें व्यक्ति की पहचान, व्यक्तिगत जानकारी, निजी जीवन और गरिमा से जुड़े पहलू भी शामिल हैं।

यदि किसी व्यक्ति की तस्वीर और आवाज का इस्तेमाल करके उसकी सहमति के बिना अश्लील सामग्री तैयार की जाती है, तो परिस्थितियों के आधार पर यह उसकी निजता और गरिमा के अधिकार को प्रभावित कर सकता है।

रूपाली गांगुली का मामला भी इसी संवैधानिक सिद्धांत से जुड़ा हुआ है।

यहां सवाल केवल इतना नहीं है कि किसी ने अभिनेत्री की तस्वीर इस्तेमाल की है, बल्कि यह भी है कि क्या किसी व्यक्ति को उसकी पहचान और व्यक्तित्व का इस्तेमाल करके ऐसी सामग्री तैयार करने की अनुमति दी जा सकती है, जिससे उसकी प्रतिष्ठा और सम्मान प्रभावित हो।

क्या किसी सेलिब्रिटी की तस्वीर इस्तेमाल करना हमेशा गैरकानूनी है?

इस सवाल का जवाब समझना भी जरूरी है।

किसी सार्वजनिक व्यक्ति या सेलिब्रिटी की प्रत्येक तस्वीर का इस्तेमाल गैरकानूनी नहीं होता। पत्रकारिता, समाचार, समीक्षा, आलोचना, शिक्षा और सार्वजनिक चर्चा के लिए किसी व्यक्ति की तस्वीर का इस्तेमाल कई परिस्थितियों में वैध हो सकता है।

उदाहरण के लिए, किसी समाचार वेबसाइट पर अभिनेत्री के नए धारावाहिक या फिल्म से जुड़ी खबर प्रकाशित करना और उसके साथ उनकी तस्वीर लगाना अपने आप में पर्सनैलिटी राइट्स का उल्लंघन नहीं है।

इसी तरह किसी फिल्म की समीक्षा, सार्वजनिक कार्यक्रम की रिपोर्ट या किसी महत्वपूर्ण घटना से संबंधित समाचार में तस्वीर का इस्तेमाल अलग कानूनी संदर्भ रखता है।

लेकिन यदि कोई व्यक्ति किसी अभिनेत्री की तस्वीर का इस्तेमाल करके नकली विज्ञापन तैयार करता है, अश्लील डीपफेक बनाता है या लोगों को यह विश्वास दिलाता है कि अभिनेत्री किसी उत्पाद या सेवा का समर्थन कर रही हैं, तो मामला अलग हो जाता है।

ऐसी परिस्थितियों में अदालत को यह देखना होता है कि इस्तेमाल का उद्देश्य क्या था, संबंधित व्यक्ति की सहमति थी या नहीं और उससे उसके अधिकारों पर क्या प्रभाव पड़ा।

इसलिए पर्सनैलिटी राइट्स का मतलब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना नहीं है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति की पहचान के अनुचित और अनधिकृत इस्तेमाल से सुरक्षा करना है।

वेबसाइट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की क्या जिम्मेदारी है?

आज इंटरनेट पर कोई भी व्यक्ति कुछ ही मिनटों में फोटो और वीडियो अपलोड कर सकता है। सोशल मीडिया और वेबसाइटों के माध्यम से सामग्री लाखों लोगों तक पहुंच सकती है।

ऐसी स्थिति में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

भारत में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के तहत ऑनलाइन मध्यस्थों के लिए कुछ जिम्मेदारियां निर्धारित की गई हैं।

इन नियमों के अनुसार, संबंधित परिस्थितियों में प्लेटफॉर्म को गैरकानूनी सामग्री के संबंध में शिकायत मिलने पर निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है।

यदि किसी व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल करके अश्लील, नकली या आपत्तिजनक सामग्री प्रसारित की जा रही है, तो पीड़ित व्यक्ति संबंधित प्लेटफॉर्म पर शिकायत कर सकता है और कानूनी उपाय भी अपना सकता है।

हालांकि, किसी भी सामग्री को हटाने की जिम्मेदारी और समय-सीमा मामले की प्रकृति, लागू नियमों तथा सक्षम प्राधिकारी या न्यायालय के आदेश पर निर्भर करती है।

रूपाली गांगुली और सामंथा रुथ प्रभु के मामले यह दिखाते हैं कि अब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पहचान के दुरुपयोग को लेकर अदालतों के सामने नए प्रकार के कानूनी विवाद आ रहे हैं।

इस मामले में आगे क्या होगा?

रूपाली गांगुली की याचिका पर 4 नवंबर 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति माधव जामदार की पीठ के समक्ष सुनवाई निर्धारित की गई है।

सुनवाई के दौरान अदालत अभिनेत्री की मांगों, उपलब्ध साक्ष्यों और संबंधित ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की भूमिका पर विचार कर सकती है।

मुख्य रूप से यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत उनकी पहचान के अनधिकृत इस्तेमाल को रोकने, आपत्तिजनक सामग्री हटाने और भविष्य में AI के जरिए तैयार की जाने वाली नकली सामग्री पर रोक लगाने के लिए क्या अंतरिम निर्देश देती है।

यह भी महत्वपूर्ण होगा कि अदालत वास्तविक समाचार, वैध तस्वीरों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित किए बिना पर्सनैलिटी राइट्स की सुरक्षा के लिए किस प्रकार का संतुलन स्थापित करती है।

फिलहाल सुनवाई से पहले किसी संभावित आदेश को अंतिम न्यायिक निर्णय मानना उचित नहीं होगा।

निष्कर्ष

रूपाली गांगुली का बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचना इस बात का संकेत है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल के साथ व्यक्तिगत पहचान और निजता की सुरक्षा का मुद्दा कितना महत्वपूर्ण हो गया है।

आज किसी व्यक्ति की तस्वीर, आवाज और चेहरे का इस्तेमाल करके ऐसी सामग्री तैयार करना संभव है, जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता। यदि इस तकनीक का इस्तेमाल किसी की प्रतिष्ठा खराब करने, अश्लील सामग्री बनाने या आर्थिक लाभ कमाने के लिए किया जाता है, तो इसके गंभीर कानूनी परिणाम हो सकते हैं।

सामंथा रुथ प्रभु को इसी तरह के मामले में मिली अंतरिम राहत ने भी यह स्पष्ट किया है कि अदालतें AI डीपफेक और पहचान के अनधिकृत इस्तेमाल को गंभीरता से ले रही हैं।

अब रूपाली गांगुली की याचिका पर बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख महत्वपूर्ण होगा। इस मामले का असर केवल फिल्म और टेलीविजन कलाकारों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में आम नागरिकों की डिजिटल पहचान और निजता की सुरक्षा से जुड़े मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण कानूनी दिशा प्रदान कर सकता है।

आखिरकार, तकनीक का विकास किसी व्यक्ति की गरिमा और सम्मान से बड़ा नहीं हो सकता। किसी की तस्वीर इंटरनेट पर उपलब्ध होने का अर्थ यह नहीं है कि कोई भी व्यक्ति उसका मनमाना इस्तेमाल कर सकता है। डिजिटल दुनिया में भी व्यक्ति की पहचान, निजता और सम्मान की सुरक्षा उतनी ही जरूरी है, जितनी वास्तविक जीवन में।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।