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रेप केस का सामना कर रहे जज को POCSO कोर्ट की जिम्मेदारी क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से मांगा जवाब,

रेप केस का सामना कर रहे जज को POCSO कोर्ट की जिम्मेदारी क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से मांगा जवाब, विजिलेंस जांच पर भी उठाए सवाल

Supreme Court on POCSO Judge Ashok Bhartendu Case: न्यायपालिका को लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। आम नागरिक जब अपने अधिकारों के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाता है, तो उसे उम्मीद होती है कि उसे निष्पक्ष न्याय मिलेगा। न्यायपालिका की विश्वसनीयता केवल न्यायिक फैसलों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि न्यायाधीशों के आचरण, उनकी निष्पक्षता और न्यायिक व्यवस्था की जवाबदेही पर भी निर्भर करती है। ऐसे में यदि किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामला लंबित हो और वह स्वयं यौन अपराधों से संबंधित मामलों की सुनवाई कर रहा हो, तो स्वाभाविक रूप से कई सवाल खड़े होते हैं।

इसी संवेदनशील मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने 2 नवंबर 2026 को एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई की। मामला उत्तर प्रदेश के शामली जिले के कैराना में तैनात अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (ADJ) अशोक भरतेंदु से संबंधित है। उनके खिलाफ दिल्ली में वर्ष 2022 में दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज हुआ था। इसके बावजूद वह कैराना में POCSO मामलों की सुनवाई कर रहे हैं।

शिकायतकर्ता महिला ने इस आधार पर मांग की है कि जब न्यायिक अधिकारी स्वयं दुष्कर्म के आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहे हैं, तो उन्हें POCSO जैसी संवेदनशील अदालत की न्यायिक जिम्मेदारी से अलग किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन और संबंधित न्यायिक अधिकारी से जवाब मांगा है। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने विजिलेंस जांच की प्रगति पर भी चिंता जताई और कहा कि इस जांच को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला उत्तर प्रदेश के न्यायिक अधिकारी अशोक भरतेंदु से जुड़ा है, जो वर्तमान में शामली जिले के कैराना में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (POCSO) के पद पर कार्यरत हैं।

उनके खिलाफ दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 थाने में 8 दिसंबर 2022 को एक महिला की शिकायत पर FIR दर्ज की गई थी। इसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत दुष्कर्म का आरोप लगाया गया था।

शिकायतकर्ता महिला का आरोप है कि न्यायिक अधिकारी ने शादी का वादा करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। महिला के अनुसार, शादी का वादा वास्तविक नहीं था और इसी आधार पर उसने उनके खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराई।

मामले में FIR दर्ज होने के बाद न्यायिक अधिकारी ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया और अपने खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की मांग की।

इसके बाद यह मामला केवल आपराधिक मुकदमे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि न्यायिक अधिकारी की संवेदनशील अदालत में नियुक्ति और न्यायपालिका की संस्थागत जवाबदेही से भी जुड़ गया।

महिला का कहना है कि जब संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ दुष्कर्म का आपराधिक मुकदमा लंबित है और अदालत इस मामले में संज्ञान भी ले चुकी है, तो उन्हें POCSO मामलों की सुनवाई की जिम्मेदारी पर बनाए रखना उचित नहीं है।

हालांकि, यह स्पष्ट रहना चाहिए कि किसी व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज होने या अदालत द्वारा संज्ञान लिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि वह अपराध का दोषी सिद्ध हो चुका है।

जज पर कब दर्ज हुई FIR और क्या हैं आरोप?

दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 पुलिस स्टेशन में 8 दिसंबर 2022 को FIR संख्या 661/2022 दर्ज की गई थी।

यह मामला IPC की धारा 376 के अंतर्गत दर्ज हुआ। शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया कि आरोपी न्यायिक अधिकारी ने शादी का झूठा आश्वासन देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।

इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न यह भी है कि शादी का वादा पूरा न होना और शुरुआत से ही शादी का झूठा वादा करके शारीरिक संबंध बनाना, दोनों अलग-अलग परिस्थितियां हैं।

कानून के अनुसार, केवल विवाह का वादा पूरा नहीं होने से प्रत्येक मामले में दुष्कर्म का अपराध स्वतः स्थापित नहीं हो जाता। यह देखना आवश्यक होता है कि क्या शुरुआत से ही शादी करने की मंशा नहीं थी और क्या उसी झूठे आश्वासन के कारण महिला ने सहमति दी थी।

इसलिए इस मामले में आरोपों की वास्तविकता और आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण संबंधित आपराधिक अदालत द्वारा साक्ष्यों के आधार पर किया जाना है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी से दी थी अंतरिम राहत

FIR दर्ज होने के बाद अशोक भरतेंदु ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करके FIR रद्द करने की मांग की थी।

23 मार्च 2023 को दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले की प्रारंभिक सुनवाई के दौरान कुछ तथ्यों पर विचार किया। न्यायमूर्ति जस्मीत सिंह की अदालत ने प्रथम दृष्टया टिप्पणी की कि मामला शादी के वादे के टूटने से संबंधित प्रतीत होता है, न कि शुरुआत से ही झूठा वादा करने का।

अदालत ने संबंधित न्यायिक अधिकारी को गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण प्रदान किया था।

हालांकि, इस आदेश का अर्थ यह नहीं था कि उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला समाप्त हो गया है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने बाद के आदेश में स्पष्ट किया कि आपराधिक कार्यवाही पर कोई रोक नहीं है। चार्जशीट दाखिल होने के बाद संबंधित जिला अदालत को कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया।

इसके बाद दिल्ली की कड़कड़डूमा जिला अदालत में मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ी और आरोपों का संज्ञान लिया गया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल हुई थी क्वो वारंटो याचिका

इस विवाद में शिकायतकर्ता महिला ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया था।

महिला ने रिट याचिका दाखिल करके न्यायिक अधिकारी के POCSO कोर्ट में कार्य करते रहने को चुनौती दी थी। याचिका में क्वो वारंटो (Quo Warranto) रिट जारी करने की मांग की गई थी।

क्वो वारंटो एक संवैधानिक रिट है, जिसके माध्यम से अदालत किसी व्यक्ति से यह पूछ सकती है कि वह किस कानूनी अधिकार के आधार पर किसी सार्वजनिक पद पर बना हुआ है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट को ऐसी रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है।

महिला का तर्क था कि एक ऐसे न्यायिक अधिकारी को POCSO कोर्ट की जिम्मेदारी नहीं दी जानी चाहिए, जिसके खिलाफ स्वयं दुष्कर्म का आपराधिक मुकदमा लंबित है।

याचिकाकर्ता के अनुसार, POCSO अदालतों में बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों से जुड़े अत्यंत संवेदनशील मामलों की सुनवाई होती है। ऐसे में संबंधित अधिकारी की नियुक्ति और न्यायिक जिम्मेदारी पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

हालांकि, 17 अगस्त 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महिला की याचिका खारिज कर दी।

हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति और उन्हें विशेष न्यायिक जिम्मेदारियां सौंपने का निर्णय हाईकोर्ट प्रशासन अपने प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में लेता है।

अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई ठोस आधार रिकॉर्ड पर नहीं रख सकी, जिससे यह साबित हो कि संबंधित न्यायिक अधिकारी अपने न्यायिक कर्तव्यों के निर्वहन में किसी प्रकार की अनुचित गतिविधि कर रहे हैं।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता की आपराधिक शिकायत पर कानून अपना काम करेगा।

सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला, CJI सूर्यकांत की पीठ ने की सुनवाई

इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद शिकायतकर्ता महिला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की।

2 नवंबर 2026 को इस मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की।

महिला की ओर से अधिवक्ता राकेश कुमार सिंह ने पक्ष रखा।

उन्होंने अदालत के सामने मुख्य रूप से यह सवाल उठाया कि जब कोई न्यायिक अधिकारी स्वयं दुष्कर्म के आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहा है, तो उसे POCSO कोर्ट जैसी संवेदनशील न्यायिक जिम्मेदारी पर क्यों बनाए रखा जाना चाहिए?

वकील ने स्पष्ट किया कि उनकी मांग संबंधित अधिकारी को न्यायिक सेवा से बर्खास्त करने या तत्काल निलंबित करने की नहीं है।

उनका कहना था कि कम से कम उन्हें POCSO कोर्ट की जिम्मेदारी से अलग किया जाना चाहिए, क्योंकि इस अदालत में बच्चों के साथ यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई होती है।

इस पर पीठ ने मामले की संवेदनशीलता को स्वीकार किया।

न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि अदालत को शिकायतकर्ता के अधिकारों और आरोपी न्यायिक अधिकारी के कानूनी अधिकारों के बीच संतुलन बनाना होगा।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि बिना उचित सामग्री और संबंधित पक्ष को सुने किसी न्यायिक अधिकारी के अधिकारों को प्रभावित करने वाला आदेश देना उचित नहीं होगा।

इसलिए पीठ ने सीधे न्यायिक अधिकारी को POCSO कोर्ट से हटाने का आदेश देने के बजाय इस विषय पर इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन की भूमिका को महत्वपूर्ण माना।

विजिलेंस जांच पर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों जताई चिंता?

इस सुनवाई का एक महत्वपूर्ण पहलू न्यायिक अधिकारी के खिलाफ चल रही विजिलेंस जांच (Vigilance Inquiry) भी रहा।

शिकायतकर्ता महिला का कहना था कि उन्होंने न्यायिक अधिकारी के खिलाफ शिकायत की थी, लेकिन उन्हें यह स्पष्ट जानकारी नहीं मिल रही है कि विजिलेंस जांच किस स्तर पर पहुंची है और उसमें अब तक क्या कार्रवाई हुई है।

दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट के प्रशासनिक रिकॉर्ड से संबंधित जानकारी के अनुसार, 21 अक्टूबर 2024 को अशोक भरतेंदु को दिल्ली में दर्ज FIR से संबंधित जांच में शामिल होने का निर्देश दिया गया था। जांच अधिकारी को भी जांच की प्रगति के संबंध में हाईकोर्ट को समय-समय पर जानकारी देने के लिए कहा गया था।

महिला ने इस संबंध में सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत जानकारी मांगी थी।

हालांकि, हाईकोर्ट के विजिलेंस ब्यूरो सेल को RTI के दायरे से छूट प्राप्त होने का हवाला देते हुए जांच की विस्तृत स्थिति बताने से इनकार किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट में महिला की ओर से यह मुद्दा उठाया गया कि इतने समय बाद भी विजिलेंस जांच की स्थिति स्पष्ट नहीं है।

इस पर न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि शिकायत पर शुरू हुई जांच को उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए हाईकोर्ट को आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए जा सकते हैं।

पीठ ने संकेत दिया कि वह विजिलेंस जांच की प्रगति पर ध्यान देगी और इस संबंध में हाईकोर्ट से आवश्यक जानकारी मांगी जा सकती है।

यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि न्यायपालिका की आंतरिक जवाबदेही और अनुशासनात्मक व्यवस्था भी न्यायिक संस्थाओं की विश्वसनीयता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया?

सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन और संबंधित न्यायिक अधिकारी से जवाब मांगा।

पीठ ने फिलहाल अशोक भरतेंदु को POCSO कोर्ट की जिम्मेदारी से हटाने या निलंबित करने का कोई सीधा आदेश नहीं दिया।

अदालत ने इस विषय पर प्रशासनिक निर्णय लेने की जिम्मेदारी इलाहाबाद हाईकोर्ट पर छोड़ी।

साथ ही विजिलेंस जांच की प्रगति और शिकायतकर्ता की ओर से उठाए गए सवालों पर भी ध्यान दिया।

मामले को आगे सुनवाई के लिए दिसंबर 2026 में सूचीबद्ध किया गया है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, अगली सुनवाई की तारीख 11 दिसंबर 2026 निर्धारित की गई है।

इसका अर्थ है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी संबंधित न्यायिक अधिकारी को दोषी नहीं माना है और न ही उन्हें पद से हटाने का अंतिम निर्णय दिया है। फिलहाल अदालत ने मामले में जवाब मांगा है और जांच की प्रगति को महत्वपूर्ण माना है।

न्यायपालिका की निष्पक्षता और जवाबदेही का सवाल

इस पूरे मामले का महत्व केवल एक न्यायिक अधिकारी के खिलाफ दर्ज FIR तक सीमित नहीं है। यह न्यायपालिका की संस्थागत निष्पक्षता, प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने लाता है।

पहला सवाल यह है कि क्या किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ गंभीर आपराधिक मुकदमा लंबित होने की स्थिति में उसकी संवेदनशील न्यायिक पद पर नियुक्ति की समीक्षा होनी चाहिए?

दूसरा सवाल यह है कि न्यायपालिका की आंतरिक विजिलेंस व्यवस्था कितनी प्रभावी और समयबद्ध होनी चाहिए?

तीसरा सवाल यह है कि किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ शिकायत करने वाले व्यक्ति को जांच की प्रगति के संबंध में किस सीमा तक जानकारी मिलनी चाहिए?

इन प्रश्नों का उत्तर केवल किसी एक मामले के आधार पर नहीं दिया जा सकता। प्रत्येक मामले के तथ्य, उपलब्ध साक्ष्य और संबंधित अधिकारी के कानूनी अधिकारों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि न्यायिक अधिकारी किसी भी प्रकार की जवाबदेही से मुक्त हैं। इसी तरह जवाबदेही का अर्थ यह भी नहीं है कि केवल आरोप लगने के आधार पर किसी अधिकारी को दोषी मान लिया जाए।

न्यायिक व्यवस्था में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए दोनों सिद्धांतों का संतुलन जरूरी है।

क्या केवल FIR दर्ज होने पर जज को न्यायिक जिम्मेदारी से हटाया जा सकता है?

यह इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है।

सामान्य रूप से किसी व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज होना उसके दोषी होने का प्रमाण नहीं है। आपराधिक न्याय व्यवस्था में प्रत्येक आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक सक्षम अदालत में उसके खिलाफ अपराध सिद्ध न हो जाए।

यही सिद्धांत न्यायिक अधिकारियों पर भी लागू होता है।

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। न्यायिक अधिकारियों को ऐसी जिम्मेदारियां सौंपी जाती हैं, जिनमें निष्पक्षता के साथ-साथ जनता का विश्वास भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

POCSO कोर्ट में बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों की सुनवाई होती है। इन मामलों में पीड़ित बच्चों की सुरक्षा, संवेदनशीलता और न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता विशेष महत्व रखती है।

इसलिए किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामला लंबित होने पर उसकी नियुक्ति की प्रशासनिक समीक्षा का प्रश्न उठ सकता है।

यह समीक्षा अपने आप में दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। इसका उद्देश्य न्यायिक संस्थान की गरिमा, निष्पक्षता और जनता के विश्वास को बनाए रखना हो सकता है।

अंततः यह निर्णय संबंधित हाईकोर्ट प्रशासन को उपलब्ध तथ्यों और लागू सेवा नियमों के आधार पर लेना होगा।

निष्कर्ष

अशोक भरतेंदु से जुड़ा यह मामला भारतीय न्यायपालिका के सामने एक महत्वपूर्ण संस्थागत प्रश्न प्रस्तुत करता है। एक तरफ शिकायतकर्ता महिला न्यायिक अधिकारी को POCSO कोर्ट की जिम्मेदारी से अलग करने की मांग कर रही है, तो दूसरी तरफ संबंधित अधिकारी को भी निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया और निर्दोष माने जाने के संवैधानिक सिद्धांत का संरक्षण प्राप्त है।

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट से जवाब मांगकर और विजिलेंस जांच की स्थिति पर ध्यान देकर मामले को गंभीरता से लिया है।

अब दिसंबर 2026 में होने वाली अगली सुनवाई में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन जांच की प्रगति और न्यायिक अधिकारी की संवेदनशील पद पर नियुक्ति को लेकर क्या जवाब प्रस्तुत करता है।

इस मामले से एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है कि न्यायपालिका की निष्पक्षता केवल अदालतों द्वारा दिए जाने वाले फैसलों में ही नहीं, बल्कि न्यायिक व्यवस्था के भीतर पारदर्शिता, जवाबदेही और उचित प्रशासनिक कार्रवाई में भी दिखाई देनी चाहिए। न्यायाधीशों की स्वतंत्रता का सम्मान जितना जरूरी है, न्यायपालिका की संस्थागत विश्वसनीयता बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।


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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।