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पड़ोसी की निजता में दखल नहीं दे सकता निजी CCTV कैमरा, घर आने-जाने वालों पर नजर रखना निजता के अधिकार का उल्लंघन: इलाहाबाद हाईकोर्ट

पड़ोसी की निजता में दखल नहीं दे सकता निजी CCTV कैमरा, घर आने-जाने वालों पर नजर रखना निजता के अधिकार का उल्लंघन: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Allahabad High Court on CCTV Camera and Right to Privacy: आज के समय में घरों, दुकानों, गलियों और सार्वजनिक स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाना आम बात हो गई है। लोग अपनी सुरक्षा, चोरी रोकने और संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने के लिए अपने घरों के बाहर कैमरे लगवाते हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को अपने घर और संपत्ति की सुरक्षा करने का अधिकार है। लेकिन सुरक्षा के नाम पर किसी दूसरे व्यक्ति की निजी जिंदगी में दखल देने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यदि कोई व्यक्ति अपने घर में सीसीटीवी कैमरा इस तरह लगाता है कि उससे पड़ोसी के घर में आने-जाने वाले लोगों की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके, तो यह उसकी निजता के अधिकार में हस्तक्षेप हो सकता है।

इसी महत्वपूर्ण कानूनी पहलू पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए अहम टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति अपने निजी सीसीटीवी कैमरे को इस तरह स्थापित नहीं कर सकता, जिससे पड़ोसी की निजता प्रभावित हो। विशेष रूप से यदि कैमरे का रुख ऐसा है कि उससे पड़ोसी के घर में आने-जाने वाले लोगों की गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखी जा रही है, तो इसे सामान्य सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा नहीं माना जा सकता।

यह मामला उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले से संबंधित है। मामले में याचिकाकर्ता योगेंद्र मौर्य ने अपने पड़ोसी द्वारा लगाए गए सीसीटीवी कैमरे की दिशा और उससे होने वाली निगरानी को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

क्या है पूरा मामला?

मामले के अनुसार, आजमगढ़ निवासी योगेंद्र मौर्य का आरोप था कि उनके पड़ोसी ने अपने घर पर सीसीटीवी कैमरा इस प्रकार स्थापित किया है कि उसके कैमरे की निगरानी उनके घर में आने-जाने के रास्ते तक पहुंच गई है।

याचिकाकर्ता का कहना था कि पड़ोसी के घर पर लगा कैमरा उनके घर के प्रवेश और निकास मार्ग को लगातार रिकॉर्ड कर रहा है। इस कारण उनके घर कौन आ रहा है, कौन जा रहा है और उनके यहां आने वाले लोगों की गतिविधियां क्या हैं, इन सब पर पड़ोसी की नजर बनी रहती है।

इस तरह की निगरानी से न केवल याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत निजता प्रभावित हो रही थी, बल्कि उनके घर आने वाले रिश्तेदारों, परिचितों और अन्य लोगों की गोपनीयता भी प्रभावित होने की आशंका थी।

याचिकाकर्ता के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को अपने घर में स्वतंत्र और सुरक्षित वातावरण में रहने का अधिकार है। यदि पड़ोसी अपने सीसीटीवी कैमरे के माध्यम से लगातार यह देखता रहे कि दूसरे के घर कौन आ रहा है और कौन जा रहा है, तो इससे व्यक्ति की निजी जिंदगी प्रभावित होती है।

इसी समस्या को लेकर योगेंद्र मौर्य ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा?

इस मामले की सुनवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने की। इसमें न्यायमूर्ति अजित कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद शामिल थे।

खंडपीठ ने मामले के तथ्यों और याचिकाकर्ता की शिकायत पर विचार करते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति अपने निजी सीसीटीवी कैमरे को इस तरह स्थापित नहीं कर सकता, जिससे उसके पड़ोसी की निजता में हस्तक्षेप हो।

अदालत की टिप्पणी का मुख्य आधार यह था कि सीसीटीवी कैमरा लगाने का उद्देश्य अपनी सुरक्षा करना होना चाहिए, न कि पड़ोसी की निजी गतिविधियों पर नजर रखना।

यदि किसी व्यक्ति ने अपने घर की सुरक्षा के लिए कैमरा लगाया है, तो उसे अपने घर, मुख्य द्वार और अपनी संपत्ति के आसपास तक सीमित रखना उचित है। लेकिन कैमरे का कोण इस प्रकार रखना कि उससे पड़ोसी के घर का प्रवेश द्वार या वहां आने-जाने वाले लोगों की गतिविधियां रिकॉर्ड हों, निजता से जुड़ा गंभीर सवाल पैदा करता है।

अदालत ने इस बात को भी महत्वपूर्ण माना कि निजी सुरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल किसी दूसरे व्यक्ति के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करने के लिए नहीं किया जा सकता।

हालांकि, इस मामले में हाईकोर्ट ने सीधे कैमरा हटाने का आदेश देने के बजाय याचिकाकर्ता को प्रशासनिक स्तर पर शिकायत करने का रास्ता दिया।

डीएम को एक महीने के भीतर निर्णय लेने का निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्ता योगेंद्र मौर्य को संबंधित जिलाधिकारी (DM) के समक्ष प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।

अदालत ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता जिलाधिकारी के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करता है, तो जिलाधिकारी उस पर एक महीने के भीतर विचार करके उचित निर्णय लें।

इस प्रकार अदालत ने शिकायत के समाधान के लिए जिला प्रशासन को जिम्मेदारी सौंपी है।

यह निर्देश इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि पड़ोसियों के बीच सीसीटीवी कैमरे की दिशा, उसकी रिकॉर्डिंग और उससे होने वाली निजता के उल्लंघन को लेकर विवाद होने पर संबंधित प्रशासनिक अधिकारी तथ्यों की जांच कर उचित कदम उठा सकते हैं।

हालांकि, हाईकोर्ट के इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक निजी सीसीटीवी कैमरा लगाने के लिए जिलाधिकारी की अनुमति लेना अनिवार्य हो गया है। मामला कैमरे की स्थापना के तरीके और उससे पड़ोसी की निजता प्रभावित होने की शिकायत से संबंधित है।

निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 का हिस्सा

भारत में निजता का अधिकार (Right to Privacy) नागरिकों के महत्वपूर्ण मौलिक अधिकारों में शामिल है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है।

अनुच्छेद 21 के अनुसार, किसी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता।

समय के साथ न्यायपालिका ने अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या करते हुए इसमें सम्मानपूर्वक जीवन जीने, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता जैसे अधिकारों को भी शामिल किया है।

निजता का अर्थ केवल यह नहीं है कि कोई व्यक्ति अपने घर के अंदर क्या कर रहा है, उसे कोई दूसरा व्यक्ति न देखे। इसका संबंध व्यक्ति की निजी जिंदगी, व्यक्तिगत निर्णयों, पारिवारिक मामलों और व्यक्तिगत गतिविधियों से भी है।

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति के घर कौन मिलने आ रहा है, उसके परिवार के सदस्य कब बाहर जाते हैं, कौन-सा रिश्तेदार उससे मिलने आता है या उसके घर में किस प्रकार की गतिविधियां होती हैं, ये सभी बातें उसकी निजी जिंदगी से जुड़ी हो सकती हैं।

यदि कोई पड़ोसी जानबूझकर अपने कैमरे का रुख इस तरह रखता है कि दूसरे व्यक्ति की इन गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखी जा सके, तो यह निजता के अधिकार के उल्लंघन का आधार बन सकता है।

के.एस. पुट्टस्वामी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निजता को मौलिक अधिकार माना

भारत में निजता के अधिकार को लेकर सबसे महत्वपूर्ण फैसला सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 24 अगस्त 2017 को दिया था।

यह फैसला न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (Justice K.S. Puttaswamy v. Union of India) के मामले में आया था।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से माना था कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया था कि निजता संविधान के भाग-3 में दिए गए मौलिक अधिकारों से भी जुड़ी हुई है।

इस फैसले ने भारत में निजता के अधिकार को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करने के संबंध में महत्वपूर्ण आधार तैयार किया।

इसका मतलब यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी निजी जिंदगी को अनावश्यक निगरानी और हस्तक्षेप से बचाने का अधिकार है।

हालांकि, निजता का अधिकार पूर्ण या असीमित अधिकार नहीं है। परिस्थितियों और कानून के अनुसार इस पर उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं। लेकिन किसी व्यक्ति की निजी गतिविधियों पर बिना उचित कारण निगरानी रखना सामान्य व्यवहार नहीं माना जा सकता।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने आया सीसीटीवी विवाद भी इसी व्यापक संवैधानिक सिद्धांत से जुड़ा हुआ है।

क्या घर की सुरक्षा के लिए CCTV लगाना गलत है?

इस फैसले को समझते समय एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए कि अदालत ने घरों में सीसीटीवी कैमरे लगाने पर प्रतिबंध नहीं लगाया है।

प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संपत्ति, परिवार और घर की सुरक्षा करने का अधिकार है। चोरी, डकैती, अनधिकृत प्रवेश और अन्य आपराधिक घटनाओं से बचाव के लिए सीसीटीवी कैमरे उपयोगी साधन हैं।

आजकल अधिकांश लोग अपने घरों के मुख्य दरवाजे, छत, पार्किंग और बाहरी हिस्सों में कैमरे लगवाते हैं। इसका उद्देश्य अपने घर की सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है।

लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब सुरक्षा के लिए लगाया गया कैमरा किसी दूसरे व्यक्ति की निजी गतिविधियों को रिकॉर्ड करने लगे।

इसे कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है।

पहली स्थिति: किसी व्यक्ति ने अपने घर के मुख्य दरवाजे पर कैमरा लगाया है, जो केवल उसके दरवाजे और घर के सामने के सीमित हिस्से को रिकॉर्ड करता है। सामान्यतः यह सुरक्षा के उद्देश्य से किया गया उचित कदम हो सकता है।

दूसरी स्थिति: किसी व्यक्ति ने कैमरा इस तरह लगाया है कि उससे पड़ोसी के घर का मुख्य दरवाजा और वहां आने-जाने वाले लोगों की गतिविधियां लगातार रिकॉर्ड होती हैं। ऐसी स्थिति में निजता के अधिकार का सवाल उठ सकता है।

तीसरी स्थिति: किसी व्यक्ति ने कैमरा पड़ोसी की खिड़की, आंगन या ऐसे निजी स्थान की ओर कर दिया है, जहां परिवार के सदस्यों की व्यक्तिगत गतिविधियां रिकॉर्ड हो सकती हैं। यह निजता में गंभीर हस्तक्षेप हो सकता है।

इसलिए केवल कैमरा लगा होना ही विवाद का आधार नहीं है, बल्कि यह भी देखा जाना जरूरी है कि कैमरे का कोण क्या है, वह किस क्षेत्र को रिकॉर्ड कर रहा है और उसकी स्थापना का वास्तविक उद्देश्य क्या है।

पड़ोसियों के बीच CCTV को लेकर विवाद क्यों बढ़ रहे हैं?

शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी सीसीटीवी कैमरों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। पहले सुरक्षा के लिए केवल बड़े प्रतिष्ठानों, बैंकों, दुकानों और सरकारी कार्यालयों में कैमरे लगाए जाते थे। अब सामान्य घरों में भी कम कीमत पर अच्छे कैमरे उपलब्ध हैं।

इन कैमरों में ऐसी तकनीक भी आ गई है, जिससे मोबाइल फोन के माध्यम से कहीं से भी लाइव फुटेज देखा जा सकता है। कुछ कैमरों में आवाज रिकॉर्ड करने, रात में रिकॉर्डिंग करने और किसी गतिविधि का पता लगाकर अलर्ट भेजने की सुविधा भी होती है।

इस तकनीक ने सुरक्षा व्यवस्था को आसान बनाया है, लेकिन इसके दुरुपयोग की संभावनाएं भी बढ़ी हैं।

कई बार पड़ोसियों के बीच आपसी विवाद के कारण कैमरे का इस्तेमाल दूसरे व्यक्ति की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया जाता है। किसी के घर कौन आया, कितनी देर रुका, परिवार के सदस्य कब बाहर गए और कब लौटे, इस तरह की जानकारी लगातार रिकॉर्ड होना व्यक्ति के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है।

ऐसे मामलों में विवाद केवल कैमरे की स्थापना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि धीरे-धीरे पड़ोसियों के बीच तनाव और आपसी अविश्वास भी बढ़ने लगता है।

इसलिए सीसीटीवी लगाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि तकनीक का इस्तेमाल सुरक्षा के लिए होना चाहिए, न कि किसी की निजी जिंदगी में अनावश्यक हस्तक्षेप करने के लिए।

निजता प्रभावित होने पर व्यक्ति क्या कानूनी कदम उठा सकता है?

यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके पड़ोसी ने सीसीटीवी कैमरा इस तरह लगाया है कि उसके घर की निजी गतिविधियां रिकॉर्ड हो रही हैं, तो वह उचित कानूनी और प्रशासनिक उपाय अपना सकता है।

ऐसी स्थिति में सबसे पहले कैमरे की दिशा और उससे रिकॉर्ड होने वाले क्षेत्र के संबंध में वास्तविक स्थिति स्पष्ट करना उपयोगी होगा।

इसके बाद संबंधित व्यक्ति निम्नलिखित कदम उठा सकता है।

1. पड़ोसी से बातचीत करना: सबसे पहले विवाद को आपसी बातचीत से सुलझाने का प्रयास किया जा सकता है। पड़ोसी से कैमरे का कोण बदलने या उसे इस तरह समायोजित करने का अनुरोध किया जा सकता है कि दूसरे के निजी क्षेत्र की रिकॉर्डिंग न हो।

2. लिखित शिकायत देना: यदि बातचीत से समाधान नहीं निकलता है, तो संबंधित प्रशासनिक अधिकारी के समक्ष लिखित शिकायत प्रस्तुत की जा सकती है। शिकायत में कैमरे की स्थिति, उसकी दिशा और निजता प्रभावित होने के कारणों का उल्लेख करना चाहिए।

3. जिलाधिकारी के समक्ष प्रार्थना पत्र: इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस मामले में भी याचिकाकर्ता को संबंधित जिलाधिकारी के समक्ष आवेदन देने का निर्देश दिया गया है। इसलिए मामले के तथ्यों के अनुसार जिला प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग की जा सकती है।

4. साक्ष्य सुरक्षित रखना: यदि कैमरे की दिशा से निजता प्रभावित हो रही है, तो कैमरे की वास्तविक स्थिति के फोटो, वीडियो और अन्य उपलब्ध साक्ष्य सुरक्षित रखे जा सकते हैं। इससे शिकायत पर विचार करते समय संबंधित अधिकारी को स्थिति समझने में मदद मिल सकती है।

5. न्यायालय की शरण लेना: यदि प्रशासनिक स्तर पर उचित समाधान नहीं निकलता है, तो मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध कानूनी उपायों के आधार पर सक्षम न्यायालय में राहत मांगी जा सकती है।

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि प्रत्येक मामले में राहत का निर्णय उपलब्ध साक्ष्यों, परिस्थितियों और लागू कानून के आधार पर किया जाएगा।

CCTV लगाने वालों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी से घरों और प्रतिष्ठानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने वाले लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश निकलता है।

कैमरा लगवाते समय कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए।

  • कैमरे का रुख मुख्य रूप से अपनी संपत्ति और सुरक्षा क्षेत्र की ओर रखें।
  • पड़ोसी के घर के मुख्य दरवाजे, खिड़की या आंगन को अनावश्यक रूप से रिकॉर्ड न करें।
  • कैमरे का एंगल इस प्रकार समायोजित करें कि दूसरे व्यक्ति की निजी गतिविधियां रिकॉर्ड न हों।
  • जहां संभव हो, कैमरे में प्राइवेसी मास्किंग जैसी सुविधा का इस्तेमाल करें।
  • रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को परेशान करने, डराने या उसकी निजी जानकारी सार्वजनिक करने के लिए न करें।
  • कैमरे से प्राप्त फुटेज को अनावश्यक रूप से दूसरे लोगों के साथ साझा करने से बचें।

इन सावधानियों से न केवल पड़ोसियों के बीच होने वाले विवादों को रोका जा सकता है, बल्कि व्यक्ति अपनी सुरक्षा और दूसरों की निजता के बीच उचित संतुलन भी बनाए रख सकता है।

फैसले का व्यापक महत्व

इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब तकनीक ने लोगों की निगरानी करना पहले की तुलना में बहुत आसान बना दिया है।

आज एक छोटा-सा कैमरा किसी व्यक्ति के घर के बाहर होने वाली गतिविधियों को लगातार रिकॉर्ड कर सकता है। इंटरनेट से जुड़े कैमरों की मदद से इन गतिविधियों को दूर बैठे मोबाइल फोन पर भी देखा जा सकता है।

ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि सुरक्षा के नाम पर किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता को प्रभावित न किया जाए।

अदालत की टिप्पणी का संदेश स्पष्ट है कि व्यक्ति को अपनी सुरक्षा का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल पड़ोसी की निजी जिंदगी में दखल देने के लिए नहीं किया जा सकता।

यह फैसला उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो अपने पड़ोसियों के घरों की गतिविधियों पर नजर रखने के उद्देश्य से सीसीटीवी कैमरे लगाते हैं। उन्हें समझना होगा कि निजी संपत्ति पर कैमरा लगाने का अधिकार किसी दूसरे व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों से ऊपर नहीं है।

निष्कर्षतः, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सीसीटीवी कैमरे की स्थापना करते समय पड़ोसी की निजता का ध्यान रखना आवश्यक है। सुरक्षा के लिए कैमरा लगाना गलत नहीं है, लेकिन यदि उसका इस्तेमाल पड़ोसी के घर आने-जाने वाले लोगों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए होता है, तो यह निजता के अधिकार में हस्तक्षेप का मामला बन सकता है। अदालत ने याचिकाकर्ता योगेंद्र मौर्य को जिलाधिकारी के समक्ष प्रार्थना पत्र देने और जिलाधिकारी को आवेदन प्राप्त होने के एक महीने के भीतर उस पर निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

यह मामला हमें याद दिलाता है कि तकनीक का इस्तेमाल करते समय दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है, जितना अपनी सुरक्षा का ध्यान रखना।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।