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केरल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बच्ची के प्राइवेट पार्ट पर लिंग रखना केवल छूना नहीं, POCSO के तहत प्रवेशात्मक यौन हमला;

केरल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बच्ची के प्राइवेट पार्ट पर लिंग रखना केवल छूना नहीं, POCSO के तहत प्रवेशात्मक यौन हमला; 3 साल की बच्ची के मामले में दोषसिद्धि बरकरार

Kerala High Court POCSO Judgment 2026: केरल हाईकोर्ट ने बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि तीन साल की बच्ची के अंतर्वस्त्र हटाने के बाद उसके प्राइवेट पार्ट पर आरोपी द्वारा अपना लिंग रखना महज छूने की सामान्य घटना नहीं मानी जा सकती। यदि मामले के तथ्यों और साक्ष्यों से योनि में मामूली प्रवेश (Slightest Degree of Penetration) अथवा प्रवेश कराने के उद्देश्य से योनि में हस्तक्षेप (Manipulation) साबित होता है, तो यह यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) के तहत प्रवेशात्मक यौन हमला (Penetrative Sexual Assault) हो सकता है।

हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी एक दोषी व्यक्ति की अपील पर सुनवाई करते हुए की। न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन की एकलपीठ ने पीड़िता की गवाही, चिकित्सकीय साक्ष्य और मामले की परिस्थितियों का विश्लेषण करने के बाद विशेष अदालत द्वारा दी गई दोषसिद्धि को बरकरार रखा।

हालांकि, अदालत ने सजा के मामले में आरोपी को आंशिक राहत दी। हाईकोर्ट ने POCSO अधिनियम की धारा 42 का हवाला देते हुए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376AB के तहत दी गई अलग सजा को निरस्त कर दिया, जबकि POCSO अधिनियम के तहत दी गई सजाएं बरकरार रखीं।

यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अदालत ने केवल शारीरिक स्पर्श और प्रवेशात्मक यौन हमले के बीच कानूनी अंतर को स्पष्ट किया है।

क्या है पूरा मामला? तीन साल की बच्ची के साथ यौन अपराध का आरोप

यह मामला केरल का है, जिसमें एक व्यक्ति पर तीन साल की मासूम बच्ची के साथ यौन अपराध करने का आरोप लगाया गया था।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी ने बच्ची के अंतर्वस्त्र हटाने के बाद उसके जननांग पर अपना लिंग रखा था। इस घटना के दौरान बच्ची को दर्द महसूस हुआ और वह रोने लगी।

मामले की जांच पूरी होने के बाद आरोपी के खिलाफ संबंधित धाराओं में आरोपपत्र दाखिल किया गया। इसके बाद विशेष अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और पीड़िता की गवाही के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया।

विशेष अदालत ने आरोपी को POCSO अधिनियम की धारा 3(a) के साथ धारा 4(2), धारा 5(m) के साथ धारा 6 तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 376AB के तहत दोषी माना था।

अदालत ने संबंधित अपराधों के लिए 20 वर्ष के कठोर कारावास सहित सजा सुनाई थी।

विशेष अदालत के फैसले से असंतुष्ट होकर आरोपी ने केरल हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। उसकी मुख्य दलील यह थी कि अभियोजन पक्ष द्वारा बताई गई घटना को प्रवेशात्मक यौन हमला नहीं माना जा सकता। उसके अनुसार, यदि बच्ची के बयान को सही भी मान लिया जाए, तब भी अधिकतम यह मामला POCSO अधिनियम की धारा 7 के तहत यौन हमला (Sexual Assault) बनता है, न कि धारा 3 के तहत प्रवेशात्मक यौन हमला।

हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई करते हुए इस कानूनी सवाल की विस्तार से जांच की।

आरोपी की दलील: केवल छूने से प्रवेशात्मक यौन हमला साबित नहीं होता

हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से दलील दी गई कि पीड़िता के बयान के अनुसार आरोपी ने उसके प्राइवेट पार्ट पर अपना लिंग रखा था। लेकिन केवल ऐसा करने से यह नहीं माना जा सकता कि योनि में प्रवेश हुआ था।

आरोपी के वकील ने कहा कि प्रवेशात्मक यौन हमले के अपराध को साबित करने के लिए कानून में निर्धारित आवश्यक तत्वों का होना जरूरी है।

बचाव पक्ष के अनुसार, यदि आरोपी द्वारा बच्ची के जननांग को केवल छुआ गया था, तो उस स्थिति में POCSO अधिनियम की धारा 7 लागू हो सकती है। इस धारा के तहत यौन हमले के लिए धारा 8 में सजा निर्धारित है।

बचाव पक्ष ने चिकित्सकीय रिपोर्ट का भी सहारा लिया। उसका कहना था कि बच्ची की मेडिकल जांच में कोई बाहरी चोट नहीं मिली थी। इसलिए अभियोजन पक्ष द्वारा लगाए गए प्रवेशात्मक यौन हमले के आरोप को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

आरोपी ने अदालत से विशेष अदालत द्वारा दी गई दोषसिद्धि को रद्द करने की मांग की।

हालांकि, अभियोजन पक्ष ने इन दलीलों का विरोध किया। अभियोजन पक्ष का कहना था कि बच्ची की गवाही स्पष्ट थी और उसने बताया था कि आरोपी ने उसके अंतर्वस्त्र हटाने के बाद अपना लिंग उसके जननांग पर रखा, जिसके तुरंत बाद उसे दर्द हुआ और वह रोने लगी।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना की परिस्थितियां और पीड़िता की गवाही प्रवेश की न्यूनतम डिग्री या योनि में हस्तक्षेप की ओर संकेत करती हैं।

बच्ची की गवाही पर हाईकोर्ट ने जताया भरोसा

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पीड़िता के बयान को विशेष महत्व दिया।

अदालत ने पाया कि विशेष अदालत ने पहले ही बच्ची की गवाही देने की क्षमता की जांच की थी। इस प्रक्रिया को कानूनी भाषा में Voir Dire Test कहा जाता है। इसका उद्देश्य यह निर्धारित करना होता है कि बच्चा अदालत में पूछे गए सवालों को समझने और उनके उचित उत्तर देने में सक्षम है या नहीं।

विशेष अदालत ने बच्ची को गवाही देने के लिए सक्षम पाया था।

बच्ची ने अपने बयान में बताया था कि आरोपी ने उसके अंतर्वस्त्र हटाए और उसके प्राइवेट पार्ट पर अपना लिंग रखा। इसके बाद उसे दर्द महसूस हुआ और वह रोने लगी।

हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि जिरह (Cross-Examination) के दौरान बच्ची अपने बयान पर कायम रही।

अदालत के अनुसार, पीड़िता की गवाही को केवल इसलिए अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता कि वह बहुत छोटी उम्र की थी। जब बच्ची घटना के बारे में समझने योग्य और स्पष्ट बयान दे रही हो तथा जिरह के दौरान भी अपने बयान पर कायम रहे, तो उसकी गवाही का उचित मूल्यांकन करना आवश्यक है।

अदालत ने अन्य उपलब्ध साक्ष्यों और चिकित्सकीय साक्ष्यों पर भी विचार किया।

इस प्रकार हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष की उस दलील को स्वीकार नहीं किया कि अभियोजन का मामला केवल सामान्य स्पर्श तक सीमित था।

छूना और किसी अंग पर रखना दोनों अलग-अलग हैं: हाईकोर्ट

इस मामले में हाईकोर्ट के सामने सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न यह था कि क्या किसी बच्ची के प्राइवेट पार्ट पर आरोपी द्वारा अपना लिंग रखना केवल छूने की श्रेणी में आएगा या इसे प्रवेशात्मक यौन हमले के रूप में भी देखा जा सकता है?

न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने इस अंतर को समझाते हुए कहा कि ‘Touching’ और ‘Placing’ समान अर्थ वाले शब्द नहीं हैं।

अदालत ने दोनों शब्दों के अर्थ में अंतर स्पष्ट किया।

Touching (छूना): किसी वस्तु या शरीर के अंग को स्पर्श करना। यह संपर्क क्षणिक भी हो सकता है।

Placing (रखना): किसी वस्तु को एक निश्चित स्थान या स्थिति में स्थापित करना। इसमें वस्तु को किसी विशेष स्थान पर रखने की क्रिया शामिल होती है।

अदालत ने कहा कि किसी अंग को छूना और उस पर किसी वस्तु या अंग को एक निश्चित स्थिति में रखना, दोनों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।

मौजूदा मामले में आरोपी ने बच्ची के अंतर्वस्त्र हटाए और उसके जननांग पर अपना लिंग रखा था। इसके तुरंत बाद बच्ची को दर्द हुआ और वह रोने लगी।

हाईकोर्ट के अनुसार, इन परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी की इस हरकत को केवल सामान्य स्पर्श मानकर हल्के में नहीं लिया जा सकता।

अदालत ने माना कि उपलब्ध तथ्यों से या तो प्रवेश की न्यूनतम डिग्री हुई थी अथवा योनि में ऐसा हस्तक्षेप किया गया था, जिससे प्रवेश कराने की स्थिति उत्पन्न हुई।

इसलिए मामले के तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर यह कृत्य POCSO अधिनियम की धारा 3 के तहत प्रवेशात्मक यौन हमला बनता है।

POCSO Act की धारा 3 और धारा 7 में क्या है अंतर?

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में POCSO अधिनियम की धारा 3 और धारा 7 के बीच अंतर को भी समझाया।

1. धारा 3 – प्रवेशात्मक यौन हमला (Penetrative Sexual Assault)

POCSO अधिनियम की धारा 3 के तहत किसी बच्चे के शरीर में निर्धारित अंग से प्रवेश करना या कानून में बताए गए अन्य प्रवेश संबंधी कृत्य अपराध की श्रेणी में आते हैं।

इसमें योनि, मूत्रमार्ग, गुदा या बच्चे के शरीर के किसी अन्य निर्धारित हिस्से में लिंग का किसी भी सीमा तक प्रवेश शामिल है।

कानून के अनुसार, प्रवेश की न्यूनतम डिग्री भी अपराध स्थापित करने के लिए पर्याप्त हो सकती है। पूर्ण प्रवेश होना आवश्यक नहीं है।

इसके अलावा, धारा 3 में ऐसे कृत्य भी शामिल हैं जिनमें बच्चे के शरीर के किसी हिस्से में प्रवेश कराने के उद्देश्य से हेरफेर किया जाता है।

2. धारा 7 – यौन हमला (Sexual Assault)

POCSO अधिनियम की धारा 7 उस स्थिति में लागू होती है, जब कोई व्यक्ति यौन उद्देश्य से बच्चे की योनि, लिंग, गुदा या स्तन को छूता है अथवा बच्चे से अपने या किसी अन्य व्यक्ति के ऐसे अंगों को छूने के लिए कहता है।

इसके अतिरिक्त, बिना प्रवेश के यौन उद्देश्य से शारीरिक संपर्क स्थापित करने वाले अन्य कृत्य भी इस धारा के अंतर्गत आते हैं।

इस अपराध के लिए धारा 8 में सजा का प्रावधान है।

मुख्य अंतर: धारा 7 में बिना प्रवेश के यौन उद्देश्य से शारीरिक संपर्क अपराध है, जबकि धारा 3 में कानून में निर्धारित प्रवेशात्मक कृत्य शामिल हैं। इसलिए किसी मामले में कौन-सी धारा लागू होगी, यह घटना की वास्तविक परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करेगा।

12 साल से कम उम्र की बच्ची होने के कारण लागू हुई गंभीर अपराध की धारा 5(m)

हाईकोर्ट ने इस मामले में पीड़िता की उम्र को भी महत्वपूर्ण माना।

बच्ची की उम्र घटना के समय केवल तीन वर्ष थी। POCSO अधिनियम में 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चे के साथ प्रवेशात्मक यौन हमला किए जाने पर इसे गंभीर प्रवेशात्मक यौन हमला (Aggravated Penetrative Sexual Assault) माना जाता है।

इस संबंध में POCSO अधिनियम की धारा 5(m) महत्वपूर्ण है।

धारा 5 के अंतर्गत कुछ विशेष परिस्थितियों में प्रवेशात्मक यौन हमले को गंभीर श्रेणी में रखा गया है। इनमें 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चे के साथ किया गया ऐसा अपराध भी शामिल है।

धारा 5 के तहत गंभीर प्रवेशात्मक यौन हमले के लिए धारा 6 में कठोर सजा का प्रावधान है।

अदालत ने पाया कि पीड़िता की उम्र तीन वर्ष थी और मामले के तथ्यों से प्रवेशात्मक यौन हमले के आवश्यक तत्व स्थापित होते हैं।

इसलिए आरोपी के खिलाफ POCSO अधिनियम की धारा 5(m) भी लागू होती है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने विशेष अदालत द्वारा आरोपी को दोषी ठहराने के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

IPC की धारा 376AB के तहत अलग सजा क्यों की गई निरस्त?

इस मामले में हाईकोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि तो बरकरार रखी, लेकिन सजा के संबंध में एक महत्वपूर्ण कानूनी त्रुटि को ठीक किया।

विशेष अदालत ने आरोपी को POCSO अधिनियम की धारा 6 के साथ-साथ भारतीय दंड संहिता की धारा 376AB के तहत भी सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट ने इस पहलू पर विचार करते हुए POCSO अधिनियम की धारा 42 का उल्लेख किया।

दरअसल, धारा 42 में उन परिस्थितियों के लिए प्रावधान है, जहां एक ही कृत्य POCSO अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के कुछ संबंधित प्रावधानों के तहत अपराध बनता है।

ऐसी स्थिति में दोनों कानूनों के तहत अलग-अलग सजाएं देने के बजाय अधिक कठोर सजा वाले प्रावधान के अनुसार सजा दी जाती है।

अदालत ने कहा कि जब आरोपी को POCSO अधिनियम की धारा 6 के तहत सजा दी जा चुकी है, तब उसी कृत्य के लिए IPC की धारा 376AB के तहत अलग से सजा देना उचित नहीं है।

इसलिए हाईकोर्ट ने IPC की धारा 376AB के तहत दी गई अलग सजा को निरस्त कर दिया।

हालांकि, POCSO अधिनियम के तहत दी गई सजाओं को बरकरार रखा गया।

इस प्रकार आरोपी को दोषसिद्धि के मामले में कोई राहत नहीं मिली, लेकिन सजा के एक हिस्से में उसे कानूनी राहत प्रदान की गई।

हाईकोर्ट ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार की

पूरे मामले में उपलब्ध साक्ष्यों, बच्ची की गवाही, चिकित्सकीय रिपोर्ट और संबंधित कानूनी प्रावधानों का परीक्षण करने के बाद केरल हाईकोर्ट ने विशेष अदालत के फैसले को मुख्य रूप से सही माना।

अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्ची के अंतर्वस्त्र हटाने के बाद उसके जननांग पर लिंग रखना और उससे बच्ची को दर्द होना, परिस्थितियों के आधार पर प्रवेश की न्यूनतम डिग्री या प्रवेश कराने के लिए योनि में हस्तक्षेप को दर्शाता है।

इसलिए आरोपी के खिलाफ प्रवेशात्मक यौन हमले का अपराध स्थापित होता है।

अदालत ने आरोपी की दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन IPC की धारा 376AB के तहत अलग से दी गई सजा को निरस्त कर दिया।

इस तरह आरोपी की अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली गई।

फैसले का कानूनी महत्व: बच्चों के यौन शोषण के मामलों में साक्ष्यों का महत्व

केरल हाईकोर्ट का यह फैसला POCSO अधिनियम के तहत अपराधों के वर्गीकरण और उनके मूल्यांकन के संबंध में महत्वपूर्ण है।

इस फैसले से स्पष्ट होता है कि किसी यौन अपराध की प्रकृति निर्धारित करते समय केवल घटना के एक हिस्से को देखकर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। अदालत को पीड़ित बच्चे की गवाही, घटना से पहले और बाद की परिस्थितियों, चिकित्सकीय साक्ष्यों और आरोपी के कथित कृत्य का समग्र मूल्यांकन करना होता है।

साथ ही, मेडिकल जांच में बाहरी चोट न मिलना अपने आप में प्रवेशात्मक यौन हमले के आरोप को खारिज करने का निर्णायक आधार नहीं है।

इस मामले में अदालत ने बच्ची की गवाही को महत्वपूर्ण माना और उपलब्ध परिस्थितियों के आधार पर प्रवेश की न्यूनतम डिग्री या योनि में हस्तक्षेप का निष्कर्ष निकाला।

यह निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि POCSO अधिनियम की धारा 3 के तहत अपराध स्थापित करने के लिए पूर्ण प्रवेश आवश्यक नहीं है। कानून में निर्धारित न्यूनतम प्रवेश भी पर्याप्त हो सकता है।

बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों के मामलों में यह दृष्टिकोण पीड़ितों को न्याय दिलाने और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

मामले का विवरण (Case Details)

विवरण जानकारी
केस का नाम Shaji v. State of Kerala
न्यायालय केरल हाईकोर्ट
न्यायाधीश जस्टिस ए. बदरुद्दीन
अपील संख्या Criminal Appeal No. 1265 of 2023
निर्णय की तारीख 13 अक्टूबर 2026
निर्णय उद्धरण 2026:KER:78048
प्रमुख कानून POCSO Act, 2012
प्रमुख धाराएं धारा 3, 4(2), 5(m), 6 और 42
IPC की धारा 376AB

निष्कर्ष: केरल हाईकोर्ट का यह फैसला बताता है कि नाबालिग बच्चे के साथ यौन अपराध के मामले में किसी कृत्य को केवल सामान्य स्पर्श बताकर उसकी गंभीरता कम नहीं की जा सकती। यदि साक्ष्य और परिस्थितियां प्रवेश की न्यूनतम डिग्री या प्रवेश कराने के लिए आवश्यक हस्तक्षेप को साबित करती हैं, तो POCSO अधिनियम के तहत प्रवेशात्मक यौन हमले का अपराध बन सकता है। अदालत ने तीन साल की बच्ची के मामले में आरोपी की दोषसिद्धि बरकरार रखकर इसी कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट किया है।


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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।