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क्रिप्टो एक्सचेंज में 6.3 अरब डॉलर की ऐतिहासिक चोरी: भारतीय निवेशकों का पैसा कितना सुरक्षित? टैक्स व पंजीकरण के बावजूद सुरक्षा की गारंटी नहीं

क्रिप्टो एक्सचेंज में 6.3 अरब डॉलर की ऐतिहासिक चोरी: भारतीय निवेशकों का पैसा कितना सुरक्षित? टैक्स व पंजीकरण के बावजूद सुरक्षा की गारंटी नहीं

दुनिया के सबसे बड़े क्रिप्टो एक्सचेंज बाइनेंस में हुई लगभग 6.3 अरब डॉलर (करीब 53 हजार करोड़ रुपये) की कथित साइबर चोरी ने पूरी दुनिया के डिजिटल मुद्रा बाजार में हलचल मचा दी है। इस घटना ने एक बार फिर क्रिप्टोकरेंसी में निवेश करने वाले लोगों की सुरक्षा, एक्सचेंजों की जवाबदेही और सरकारों की नियामक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत में क्रिप्टो निवेश पर 30 प्रतिशत टैक्स, प्रत्येक लेनदेन पर 1 प्रतिशत टीडीएस और एक्सचेंजों के लिए वित्तीय खुफिया इकाई (FIU) में पंजीकरण जैसी शर्तें लागू हैं। इसके बावजूद यदि किसी एक्सचेंज से निवेशकों की अरबों डॉलर की संपत्ति चोरी हो जाए, तो उसकी भरपाई की कानूनी जिम्मेदारी किसकी होगी? यही वह सवाल है, जिसका जवाब भारतीय क्रिप्टो निवेशक जानना चाहते हैं।

डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ क्रिप्टोकरेंसी ने निवेश की दुनिया में अपनी अलग जगह बना ली है। बिटकॉइन, ईथर और अन्य डिजिटल मुद्राओं में निवेश करने वालों की संख्या लगातार बढ़ी है। खासकर युवाओं के बीच क्रिप्टोकरेंसी को निवेश के एक नए विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है। मोबाइल फोन के माध्यम से कुछ ही मिनटों में खाता खोलना, पैसा जमा करना और डिजिटल करेंसी खरीदना संभव हो गया है।

लेकिन इस सुविधा के साथ एक बड़ा जोखिम भी जुड़ा हुआ है। शेयर बाजार में निवेश करने वाले लोगों के लिए जहां सेबी जैसी नियामक संस्था और निवेशक संरक्षण से जुड़ी व्यवस्थाएं मौजूद हैं, वहीं क्रिप्टोकरेंसी के मामले में निवेशकों की सुरक्षा का ढांचा अभी भी कई सवालों के घेरे में है।

बाइनेंस में हुई बड़ी सेंधमारी ने इस कमजोरी को एक बार फिर उजागर किया है।

बाइनेंस में कैसे हुई 6.3 अरब डॉलर की चोरी?

29 अक्टूबर की रात दुनिया के प्रमुख क्रिप्टो एक्सचेंज बाइनेंस में साइबर हमले की खबर सामने आई। उपलब्ध विवरण के अनुसार, हैकर्स ने एक्सचेंज की सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लगाकर लगभग 6.3 अरब डॉलर की डिजिटल संपत्ति पर कब्जा कर लिया। भारतीय मुद्रा में यह रकम लगभग 53 हजार करोड़ रुपये बैठती है।

यह आंकड़ा क्रिप्टोकरेंसी के इतिहास में सबसे बड़ी चोरी के रूप में बताया जा रहा है। इससे पहले फरवरी 2025 में बायबिट एक्सचेंज से लगभग 1.5 अरब डॉलर की डिजिटल संपत्ति चोरी होने की घटना सामने आई थी।

बाइनेंस के मामले में कंपनी की ओर से ग्राहकों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए अपने खजाने, आपातकालीन भंडार और बीमा कोष का इस्तेमाल करने की बात कही गई। कंपनी ने लगभग 90 प्रतिशत नुकसान की भरपाई का दावा भी किया।

हालांकि, किसी कंपनी द्वारा नुकसान की भरपाई का भरोसा देना और निवेशकों को कानूनी रूप से सुरक्षित होना दो अलग-अलग बातें हैं।

यदि किसी छोटे क्रिप्टो एक्सचेंज के साथ ऐसी घटना होती है, तो क्या उसके पास अरबों डॉलर का नुकसान उठाने की क्षमता होगी? यदि कंपनी के पास पर्याप्त पूंजी नहीं है और वह दिवालिया हो जाती है, तो निवेशकों के पैसे की भरपाई कैसे होगी?

इन सवालों का जवाब केवल कंपनी के आश्वासन से नहीं मिल सकता। इसके लिए मजबूत नियामक व्यवस्था और स्पष्ट कानूनी जिम्मेदारी जरूरी है।

उत्तर कोरिया के हैकर समूह पर संदेह

क्रिप्टो चोरी की इस घटना के पीछे किसका हाथ है, इसे लेकर भी जांच की जा रही है।

ब्लॉकचेन विश्लेषण से जुड़ी कंपनियों टीआरएम लैब्स और चेनालिसिस के आकलन के अनुसार, इस हमले के पीछे उत्तर कोरिया से जुड़े हैकर समूह का हाथ होने की आशंका जताई गई है। इस समूह को ‘ट्रेडरट्रेटर’ के नाम से जाना जाता है और इसे पहले से चर्चित लाजरस समूह से संबंधित बताया गया है।

शुरुआती जानकारी के अनुसार, हमलावरों ने बाइनेंस के एक इंजीनियर के हैक किए गए लैपटॉप को निशाना बनाया। इसके बाद सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लगाकर कुछ ही मिनटों में बड़ी मात्रा में डिजिटल संपत्ति निकाल ली गई।

यह घटना साइबर सुरक्षा के एक महत्वपूर्ण पहलू को सामने लाती है। किसी बड़े वित्तीय संस्थान की सुरक्षा केवल उसके मुख्य सर्वर या डिजिटल वॉलेट तक सीमित नहीं होती। उसके कर्मचारियों के लैपटॉप, ईमेल, लॉगिन सिस्टम और आंतरिक नेटवर्क भी सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा होते हैं।

यदि इनमें से किसी एक कमजोर कड़ी पर हमला सफल हो जाता है, तो उसका नुकसान हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।

आज बैंकिंग, भुगतान और निवेश की दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है। ऐसे में साइबर सुरक्षा केवल तकनीकी विभाग की जिम्मेदारी नहीं रह गई है, बल्कि यह किसी भी वित्तीय संस्थान के अस्तित्व और विश्वसनीयता से जुड़ा विषय बन गई है।

ब्लॉकचेन होने के बावजूद चोरी की रकम कैसे ठिकाने लगाई जाती है?

क्रिप्टोकरेंसी की सबसे बड़ी विशेषताओं में ब्लॉकचेन तकनीक को गिना जाता है। इसमें लेनदेन का रिकॉर्ड डिजिटल बही-खाते में दर्ज होता है। सार्वजनिक ब्लॉकचेन पर किए गए लेनदेन को कोई भी व्यक्ति देख सकता है।

सामान्य बैंकिंग व्यवस्था में यदि किसी खाते से संदिग्ध तरीके से बड़ी रकम निकाली जाती है, तो बैंक संबंधित खाते को फ्रीज कर सकता है। लेकिन विकेंद्रीकृत क्रिप्टो नेटवर्क में हर स्थिति में ऐसी कोई एक केंद्रीय संस्था मौजूद नहीं होती, जो लेनदेन को रोक सके।

हैकर्स चोरी की गई डिजिटल संपत्ति को सीधे इस्तेमाल करने के बजाय उसे अलग-अलग वॉलेट में भेजते हैं। इसके बाद रकम को छोटे हिस्सों में बांटकर अलग-अलग क्रिप्टोकरेंसी में बदला जाता है।

कई बार इसके लिए विकेंद्रीकृत एक्सचेंजों, विभिन्न ब्लॉकचेन नेटवर्क और दूसरे डिजिटल माध्यमों का सहारा लिया जाता है।

इस प्रक्रिया में असली हमलावर तक पहुंचना जांच एजेंसियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

हालांकि, ब्लॉकचेन पर लेनदेन का रिकॉर्ड सार्वजनिक होने के कारण जांच एजेंसियों और विश्लेषण कंपनियों को धन के प्रवाह का पता लगाने में मदद भी मिलती है।

बाइनेंस मामले में भी चोरी की गई डिजिटल संपत्ति को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर दूसरी क्रिप्टोकरेंसी में बदलने की कोशिश की गई। डॉलर आधारित स्टेबलकॉइन को विकेंद्रीकृत एक्सचेंजों पर कम कीमत में बेचने की बात भी सामने आई।

टेथर, सर्कल और रिपल ने फ्रीज की बड़ी रकम

इस घटना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि कुछ केंद्रीय रूप से नियंत्रित डिजिटल मुद्रा जारी करने वाली कंपनियों ने संदिग्ध लेनदेन पर कार्रवाई की।

टेथर, सर्कल और रिपल जैसी कंपनियां अपने कुछ डिजिटल टोकन के संचालन और नियंत्रण से जुड़ी व्यवस्थाएं रखती हैं। निर्धारित कानूनी और तकनीकी परिस्थितियों में ये कंपनियां कुछ वॉलेट पतों को प्रतिबंधित या फ्रीज कर सकती हैं।

उपलब्ध विवरण के अनुसार, चोरी के बाद लगभग 2.7 अरब डॉलर की डिजिटल संपत्ति फ्रीज किए जाने की बात सामने आई।

इससे एक महत्वपूर्ण अंतर समझ में आता है। जहां किसी डिजिटल संपत्ति के संचालन में कोई जवाबदेह केंद्रीय संस्था मौजूद होती है, वहां संदिग्ध धन को रोकने की संभावना बढ़ जाती है।

इसके विपरीत, विकेंद्रीकृत नेटवर्क पर मौजूद बिटकॉइन और ईथर जैसी संपत्तियों को किसी एक कंपनी के आदेश से सामान्यतः फ्रीज नहीं किया जा सकता।

यही कारण है कि क्रिप्टोकरेंसी की दुनिया में विकेंद्रीकरण और जवाबदेही के बीच संतुलन को लेकर लगातार बहस होती रही है।

उत्तर कोरिया के प्रतिबंधित हथियार कार्यक्रमों से भी जुड़ी चिंता

क्रिप्टोकरेंसी की चोरी केवल निवेशकों के आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी यह गंभीर विषय है।

संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने विभिन्न रिपोर्टों में उत्तर कोरिया से जुड़े साइबर हमलों और क्रिप्टोकरेंसी की चोरी को उसके प्रतिबंधित हथियार कार्यक्रमों के लिए धन जुटाने के संभावित माध्यमों में शामिल किया है।

इसका अर्थ यह है कि किसी बड़े क्रिप्टो एक्सचेंज की सुरक्षा में हुई चूक का असर केवल उस कंपनी या उसके ग्राहकों तक सीमित नहीं रह सकता।

यदि चोरी की गई डिजिटल संपत्ति का इस्तेमाल प्रतिबंधित गतिविधियों को वित्तपोषित करने में किया जाता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी चुनौती बन सकती है।

भारत के लिए यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि साइबर अपराध, आतंकवादी वित्तपोषण और अंतरराष्ट्रीय धन हस्तांतरण पर नियंत्रण राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे हैं।

भारत में वजीरएक्स की हैकिंग ने पहले ही दिखा दी थी कमजोरी

भारत में क्रिप्टो निवेशकों के सामने ऐसी समस्या पहले भी आ चुकी है।

जुलाई 2024 में भारतीय क्रिप्टो एक्सचेंज वजीरएक्स में बड़ी साइबर सेंधमारी हुई थी। इस घटना में लगभग 23 करोड़ डॉलर की डिजिटल संपत्ति चोरी होने की जानकारी सामने आई थी।

इस हमले के तार भी उत्तर कोरिया से जुड़े लाजरस समूह से जोड़े गए थे।

घटना के बाद बड़ी संख्या में ग्राहकों के खाते प्रभावित हुए। एक्सचेंज की सेवाएं और निकासी संबंधी गतिविधियां लंबे समय तक बाधित रहीं।

सबसे बड़ी परेशानी उन निवेशकों को हुई, जिनकी रकम और डिजिटल संपत्ति एक्सचेंज पर फंसी हुई थी।

कंपनी की ओर से नुकसान के बंटवारे और पुनर्गठन से संबंधित प्रस्ताव सामने आए। मामले में सिंगापुर की अदालत के माध्यम से भी कानूनी प्रक्रिया अपनाई गई।

इस घटनाक्रम ने भारतीय निवेशकों के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा किया कि यदि भारत में रहने वाला व्यक्ति भारतीय क्रिप्टो एक्सचेंज पर पैसा लगाता है और एक्सचेंज किसी विदेशी न्यायिक क्षेत्र में पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू करता है, तो निवेशक को न्याय पाने के लिए किन कानूनी रास्तों का सहारा लेना पड़ेगा?

भारतीय ग्राहक, भारतीय निवेश और भारतीय बाजार होने के बावजूद विवाद के समाधान में विदेशी न्यायिक व्यवस्था की भूमिका सामने आना निश्चित रूप से चिंता का विषय है।

कॉइनडीसीएक्स में भी हुई थी करोड़ों डॉलर की सेंधमारी

जुलाई 2025 में देश के प्रमुख क्रिप्टो एक्सचेंज कॉइनडीसीएक्स से लगभग 4.4 करोड़ डॉलर की डिजिटल संपत्ति चोरी होने की घटना सामने आई थी।

इस मामले में कंपनी ने कहा था कि ग्राहकों की संपत्ति सुरक्षित है और नुकसान कंपनी के अपने खजाने से पूरा किया जाएगा।

साथ ही, मामले की जांच में भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल यानी CERT-In के साथ सहयोग की बात भी सामने आई।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। यदि कोई कंपनी अपनी वित्तीय स्थिति और व्यावसायिक निर्णय के आधार पर ग्राहकों के नुकसान की भरपाई करती है, तो यह उसकी ओर से उठाया गया कदम है।

लेकिन निवेशकों के लिए वास्तविक सुरक्षा तब होगी, जब कानून के तहत हर एक्सचेंज पर पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था, वित्तीय क्षमता और नुकसान की स्थिति में भुगतान की स्पष्ट जिम्मेदारी निर्धारित हो।

केवल कंपनी की आर्थिक स्थिति या प्रबंधन की इच्छा पर निवेशकों की सुरक्षा निर्भर नहीं होनी चाहिए।

भारत में क्रिप्टो पर 30 प्रतिशत टैक्स, फिर भी निवेशक असुरक्षित

भारत में क्रिप्टोकरेंसी और वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (VDA) पर कर व्यवस्था लागू है।

आयकर अधिनियम की धारा 115BBH के तहत वर्चुअल डिजिटल एसेट के हस्तांतरण से होने वाली आय पर 30 प्रतिशत की दर से कर लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त लागू अधिभार और उपकर भी देय हो सकते हैं।

वहीं, धारा 194S के तहत निर्धारित शर्तों के अनुसार वर्चुअल डिजिटल एसेट के हस्तांतरण पर भुगतान के समय 1 प्रतिशत टीडीएस काटने का प्रावधान है।

इन प्रावधानों के कारण क्रिप्टो निवेश से जुड़े लेनदेन सरकार की कर व्यवस्था के दायरे में आते हैं।

इसके अलावा, भारत में क्रिप्टो एक्सचेंज और वर्चुअल डिजिटल एसेट सेवा प्रदाताओं के लिए वित्तीय खुफिया इकाई (FIU-IND) में पंजीकरण और धनशोधन निरोधक नियमों का पालन करना भी आवश्यक है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य संदिग्ध लेनदेन पर नजर रखना, मनी लॉन्ड्रिंग रोकना और वित्तीय अपराधों की जांच में सहायता करना है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है।

टैक्स वसूलना, लेनदेन की निगरानी करना और निवेशकों के पैसे की सुरक्षा करना तीन अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं।

किसी एक्सचेंज का FIU-IND में पंजीकृत होना अपने आप यह गारंटी नहीं देता कि हैकिंग या दिवालियापन की स्थिति में ग्राहकों की पूरी रकम वापस मिल जाएगी।

भारत में क्रिप्टो निवेशकों के सामने यही सबसे बड़ी नियामकीय चुनौती है।

सेबी की तरह क्रिप्टो निवेशकों के लिए सुरक्षा व्यवस्था क्यों नहीं?

भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों की सुरक्षा के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड यानी सेबी (SEBI) की नियामक भूमिका है।

शेयर बाजार में ब्रोकर, स्टॉक एक्सचेंज, डिपॉजिटरी और क्लियरिंग कॉरपोरेशन एक निर्धारित कानूनी और नियामकीय ढांचे के अंतर्गत काम करते हैं।

ग्राहकों की प्रतिभूतियों और धन के अलग-अलग रखरखाव, जोखिम प्रबंधन, पूंजी संबंधी आवश्यकताओं और अन्य सुरक्षा उपायों के लिए नियम बनाए गए हैं।

इसके अलावा निवेशकों की शिकायतों के समाधान के लिए भी निर्धारित व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं।

क्रिप्टोकरेंसी के क्षेत्र में ऐसी व्यापक और एकीकृत निवेशक संरक्षण व्यवस्था का अभाव महसूस किया जाता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी क्रिप्टो एक्सचेंज में साइबर हमला हो जाता है और ग्राहकों की डिजिटल संपत्ति चोरी हो जाती है, तो यह सवाल उठता है कि नुकसान की भरपाई कौन करेगा?

क्या एक्सचेंज के पास पर्याप्त आपातकालीन पूंजी है?

क्या ग्राहकों की डिजिटल संपत्ति कंपनी की अपनी संपत्ति से अलग सुरक्षित रखी गई है?

क्या एक्सचेंज नियमित रूप से स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट कराता है?

क्या ग्राहकों को उनकी संपत्ति की वास्तविक स्थिति की जानकारी मिलती है?

क्या कंपनी के दिवालिया होने पर ग्राहकों की संपत्ति को प्राथमिकता के आधार पर वापस किया जा सकेगा?

इन सवालों का स्पष्ट कानूनी जवाब निवेशकों के हित में आवश्यक है।

अधिक टैक्स के कारण विदेशी एक्सचेंजों की ओर बढ़ सकता है निवेश

भारत में क्रिप्टो पर लागू कर व्यवस्था को लेकर भी लंबे समय से बहस होती रही है।

30 प्रतिशत कर और प्रत्येक निर्धारित लेनदेन पर 1 प्रतिशत टीडीएस के कारण निवेशकों को वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ता है।

विशेष रूप से सक्रिय ट्रेडिंग करने वाले निवेशकों के लिए टीडीएस का प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि बार-बार लेनदेन करने पर रकम का एक हिस्सा कर के रूप में कटता रहता है।

इसके परिणामस्वरूप कुछ निवेशक विदेशी या कम प्रचलित क्रिप्टो प्लेटफॉर्म की ओर आकर्षित हो सकते हैं।

ऐसे प्लेटफॉर्म पर नियामकीय निगरानी, शिकायत निवारण और संपत्ति की सुरक्षा की स्थिति अलग-अलग हो सकती है।

यदि किसी निवेशक का पैसा ऐसे विदेशी एक्सचेंज में फंस जाता है, जिसका भारत में कोई स्पष्ट कानूनी प्रतिनिधित्व नहीं है, तो उसके लिए राहत प्राप्त करना और भी कठिन हो सकता है।

इसलिए केवल कर व्यवस्था बनाना पर्याप्त नहीं है। सरकार को यह भी देखना होगा कि निवेशकों के लिए सुरक्षित और पारदर्शी बाजार व्यवस्था कैसे तैयार की जाए।

क्रिप्टो निवेशकों के लिए क्या होना चाहिए कानूनी सुरक्षा का ढांचा?

बाइनेंस, वजीरएक्स और कॉइनडीसीएक्स जैसी घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि भारत में क्रिप्टो निवेशकों की सुरक्षा के लिए कुछ महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं पर विचार किया जा सकता है।

1. एक्सचेंजों के लिए न्यूनतम पूंजी की अनिवार्यता

सरकार को ऐसी व्यवस्था पर विचार करना चाहिए, जिसके तहत क्रिप्टो एक्सचेंजों के पास उनके कारोबार और जोखिम के अनुपात में पर्याप्त पूंजी और आपातकालीन भंडार हो।

2. ग्राहकों की संपत्ति अलग रखने का नियम

निवेशकों की डिजिटल संपत्ति और कंपनी की अपनी संपत्ति के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। इससे कंपनी के वित्तीय संकट या दिवालियापन की स्थिति में ग्राहकों के हितों की रक्षा करने में मदद मिल सकती है।

3. नियमित साइबर सुरक्षा ऑडिट

क्रिप्टो एक्सचेंजों के सिस्टम, डिजिटल वॉलेट, कर्मचारियों के एक्सेस और आंतरिक नेटवर्क की नियमित स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।

4. नुकसान की भरपाई की स्पष्ट जिम्मेदारी

हैकिंग, आंतरिक धोखाधड़ी या सुरक्षा संबंधी लापरवाही के कारण नुकसान होने पर एक्सचेंज की जिम्मेदारी और मुआवजे की प्रक्रिया कानून में स्पष्ट होनी चाहिए।

5. निवेशकों के लिए शिकायत निवारण व्यवस्था

ग्राहकों को ऐसी व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिए, जहां वे अपनी डिजिटल संपत्ति फंसने, निकासी रोके जाने या धोखाधड़ी की स्थिति में शिकायत दर्ज कर सकें और समयबद्ध समाधान प्राप्त कर सकें।

निष्कर्ष: क्रिप्टो बाजार को केवल टैक्स के दायरे में लाना पर्याप्त नहीं

क्रिप्टोकरेंसी ने निवेश की दुनिया में नई संभावनाएं पैदा की हैं, लेकिन इसके साथ साइबर अपराध और वित्तीय जोखिम भी तेजी से बढ़े हैं। बाइनेंस में 6.3 अरब डॉलर की कथित चोरी ने यह साबित कर दिया है कि दुनिया के बड़े से बड़े क्रिप्टो एक्सचेंज भी साइबर हमलों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं।

भारत में क्रिप्टो निवेश पर कर लगाया जा रहा है और एक्सचेंजों को FIU-IND के नियमों का पालन करना पड़ता है। इसके बावजूद निवेशकों की संपत्ति की सुरक्षा और नुकसान की भरपाई के लिए व्यापक कानूनी व्यवस्था की जरूरत बनी हुई है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि निवेशक की सुरक्षा किसी कंपनी की आर्थिक क्षमता या उसके प्रबंधन की सदिच्छा पर निर्भर नहीं रहनी चाहिए।

यदि कोई एक्सचेंज ग्राहकों की डिजिटल संपत्ति अपने प्लेटफॉर्म पर रखता है, तो उसके लिए सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही के स्पष्ट मानक होने चाहिए।

सरकार को ऐसी व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है, जिसमें क्रिप्टो कारोबार करने वाली कंपनियों की निगरानी के साथ-साथ निवेशकों के हितों को भी प्राथमिकता मिले।

आखिरकार, डिजिटल अर्थव्यवस्था की सफलता केवल तेज लेनदेन और अधिक टैक्स संग्रह से नहीं मापी जा सकती। असली सफलता तब होगी, जब डिजिटल माध्यम से निवेश करने वाले आम नागरिक का पैसा भी उतना ही सुरक्षित हो, जितना सुरक्षित रखने का भरोसा उसे दिया जाता है।


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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।