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दिल्ली में गैर-BS-VI वाहनों की एंट्री पर रोक को चुनौती देने वाली याचिका पर हाईकोर्ट का तत्काल सुनवाई से इनकार,

दिल्ली में गैर-BS-VI वाहनों की एंट्री पर रोक को चुनौती देने वाली याचिका पर हाईकोर्ट का तत्काल सुनवाई से इनकार, कहा- फैसले में कुछ गलत नहीं

दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सरकार द्वारा 1 नवंबर से गैर-BS-VI वाहनों की राजधानी में एंट्री पर लगाए गए प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने याचिकाकर्ता की दलीलें सुनने के बाद कहा कि सरकार के इस फैसले में फिलहाल कुछ गलत नजर नहीं आता और मामले में तत्काल सुनवाई की आवश्यकता भी नहीं है। हालांकि, याचिका को सामान्य प्रक्रिया के तहत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है। इस प्रतिबंध का असर दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले लाखों वाहन मालिकों पर पड़ सकता है, विशेषकर उन लोगों पर जो रोजाना नौकरी, व्यापार और अन्य कामों के सिलसिले में दिल्ली आते-जाते हैं।

        राजधानी दिल्ली में सर्दियों के मौसम की शुरुआत के साथ ही वायु प्रदूषण एक बार फिर गंभीर चिंता का विषय बन गया है। हर साल अक्टूबर के अंतिम सप्ताह और नवंबर महीने में दिल्ली तथा आसपास के इलाकों में प्रदूषण का स्तर बढ़ने लगता है। हवा की गति कम होने, तापमान में गिरावट, पराली जलाने, निर्माण गतिविधियों और वाहनों से निकलने वाले धुएं के कारण वातावरण में प्रदूषक तत्व जमा होने लगते हैं।

प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए दिल्ली सरकार और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) की ओर से अलग-अलग प्रतिबंधात्मक कदम उठाए जाते हैं। इसी क्रम में दिल्ली सरकार ने 1 नवंबर से BS-VI उत्सर्जन मानकों से नीचे वाले वाहनों की राजधानी में एंट्री पर रोक लगाने का निर्णय लिया। इस फैसले को लेकर वाहन मालिकों और दिल्ली-एनसीआर के दैनिक यात्रियों के बीच चिंता पैदा हुई। इसके बाद सरकार के निर्णय को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

हाईकोर्ट ने तत्काल सुनवाई की मांग स्वीकार नहीं की

दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले को तत्काल सुनवाई के लिए कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव सांब्रे और न्यायमूर्ति संजय शर्मा की पीठ के समक्ष शुक्रवार को प्रस्तुत किया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से वकील ने अदालत को बताया कि सरकार के फैसले का असर केवल दिल्ली में रहने वाले वाहन मालिकों पर नहीं पड़ेगा, बल्कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के दूसरे शहरों में रहने वाले हजारों-लाखों लोगों को भी परेशानी होगी।

दलील दी गई कि बड़ी संख्या में लोग गुरुग्राम, नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद और आसपास के क्षेत्रों से प्रतिदिन अपने निजी वाहनों से दिल्ली आते हैं। इनमें नौकरीपेशा लोगों के साथ व्यापारी, छोटे कारोबारी और अन्य कामकाजी लोग भी शामिल हैं।

इनमें से अनेक लोगों के पास ऐसे वाहन हैं, जो BS-VI उत्सर्जन मानकों के अनुरूप नहीं हैं। ऐसे वाहनों को 1 नवंबर से दिल्ली में प्रवेश की अनुमति नहीं मिलने पर उनकी रोजमर्रा की आवाजाही प्रभावित हो सकती है।

याचिकाकर्ता के वकील ने इस आधार पर मामले की तत्काल सुनवाई करने का अनुरोध किया।

हालांकि, पीठ ने तत्काल सुनवाई की आवश्यकता से सहमति नहीं जताई। अदालत ने कहा कि फैसले में कुछ भी गलत नहीं है और इस मामले में तत्काल सुनवाई की जरूरत नहीं है।

पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा, ”नहीं, माफ कीजिए। इसमें कुछ भी गलत नहीं है और न ही तत्काल सुनवाई की जरूरत।”

अदालत की इस टिप्पणी के बाद तत्काल सुनवाई की मांग स्वीकार नहीं की गई। हालांकि, याचिका को खारिज नहीं किया गया है। इसे सामान्य प्रक्रिया के तहत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया।

याचिकाकर्ता ने दिल्ली-एनसीआर के लोगों की परेशानी का उठाया मुद्दा

याचिका में सबसे महत्वपूर्ण सवाल दिल्ली और एनसीआर के बीच रोजाना होने वाले आवागमन को लेकर उठाया गया।

दरअसल, दिल्ली केवल राजधानी ही नहीं, बल्कि आसपास के शहरों के लिए रोजगार, शिक्षा, व्यापार और चिकित्सा सुविधाओं का भी बड़ा केंद्र है। दिल्ली में लाखों लोग दूसरे शहरों से आकर काम करते हैं।

गुरुग्राम और नोएडा में रहने वाले कई लोग दिल्ली में नौकरी करते हैं, जबकि दिल्ली में रहने वाले लोग भी प्रतिदिन गुरुग्राम, फरीदाबाद और गाजियाबाद जाते हैं।

ऐसे में यदि गैर-BS-VI वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाई जाती है, तो इसका प्रभाव उन लोगों पर भी पड़ सकता है, जिनका दिल्ली में रहना या काम करना अनिवार्य है।

उदाहरण के तौर पर किसी व्यक्ति के पास BS-IV या BS-III मानक वाली कार है और वह प्रतिदिन गाजियाबाद या नोएडा से दिल्ली स्थित अपने कार्यालय जाता है, तो प्रतिबंध लागू होने के बाद उसे अपने वाहन के स्थान पर दूसरा परिवहन साधन तलाशना पड़ेगा।

याचिकाकर्ता की ओर से इसी व्यावहारिक परेशानी को अदालत के सामने रखा गया था।

हालांकि, हाईकोर्ट ने फिलहाल इस आधार पर सरकार के निर्णय पर रोक लगाने या तत्काल सुनवाई करने की आवश्यकता नहीं समझी।

1 नवंबर से 31 जनवरी 2027 तक लागू रहेगा प्रतिबंध

दिल्ली सरकार के निर्णय के अनुसार, 1 नवंबर 2026 से 31 जनवरी 2027 तक BS-VI उत्सर्जन मानकों से नीचे वाले वाहनों की राजधानी में एंट्री प्रतिबंधित रहेगी।

इसमें संबंधित श्रेणियों के दोपहिया वाहन, चारपहिया वाहन और टैक्सी आदि शामिल हैं।

इस फैसले का उद्देश्य दिल्ली में सर्दियों के दौरान वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करना है। सरकार का मानना है कि पुराने उत्सर्जन मानकों वाले वाहनों से निकलने वाले प्रदूषक तत्व वायु गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।

दिल्ली में बड़ी संख्या में ऐसे वाहन चलते हैं, जो BS-III, BS-IV और अन्य पुराने उत्सर्जन मानकों के तहत निर्मित हुए हैं। प्रतिबंध लागू होने के बाद इन वाहनों के मालिकों को राजधानी में प्रवेश के लिए वैकल्पिक साधनों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है।

यहां यह समझना जरूरी है कि BS-VI एक उत्सर्जन मानक है, जिसका उद्देश्य वाहनों से निकलने वाले हानिकारक प्रदूषकों को नियंत्रित करना है। यह मानक पुराने BS-IV और BS-III मानकों की तुलना में अधिक सख्त है।

भारत में BS-VI मानक को 1 अप्रैल 2020 से नए वाहनों के लिए लागू किया गया था।

किन वाहनों को प्रतिबंध से मिलेगी छूट?

सरकार के निर्णय में कुछ श्रेणियों के वाहनों को प्रतिबंध से छूट भी प्रदान की गई है।

इनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित वाहन शामिल हैं:

1. इलेक्ट्रिक वाहन: बिजली से चलने वाले वाहनों को प्रतिबंध से छूट दी गई है। इलेक्ट्रिक वाहनों से सामान्य परिचालन के दौरान टेलपाइप उत्सर्जन नहीं होता, इसलिए इन्हें प्रदूषण नियंत्रण की दृष्टि से राहत दी गई है।

2. सीएनजी वाहन: सीएनजी से चलने वाले वाहनों को भी निर्धारित प्रतिबंध से छूट प्रदान की गई है।

3. एंबुलेंस: आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं में इस्तेमाल होने वाली एंबुलेंस को प्रतिबंध के दायरे से बाहर रखा गया है।

4. दमकल वाहन: आग लगने और अन्य आपातकालीन परिस्थितियों में इस्तेमाल होने वाले दमकल वाहनों को भी प्रवेश की अनुमति रहेगी।

5. पुलिस वाहन: कानून-व्यवस्था और सुरक्षा संबंधी कार्यों में इस्तेमाल होने वाले पुलिस वाहनों को छूट दी गई है।

इन छूटों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए लगाए गए प्रतिबंधों के कारण आवश्यक आपातकालीन सेवाएं प्रभावित न हों।

10 लाख से अधिक वाहनों पर पड़ सकता है असर

दिल्ली में गैर-BS-VI वाहनों की एंट्री पर रोक का असर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विभिन्न शहरों में रहने वाले वाहन मालिकों पर पड़ सकता है।

एनसीआर में दिल्ली के अलावा नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम, फरीदाबाद और सोनीपत जैसे प्रमुख शहर शामिल हैं।

इन शहरों के बीच प्रतिदिन लाखों लोग निजी वाहनों से यात्रा करते हैं। बड़ी संख्या में लोगों के पास पुराने उत्सर्जन मानकों वाले वाहन हैं।

उपलब्ध आकलन के अनुसार, इस प्रतिबंध से 10 लाख से अधिक वाहनों के प्रभावित होने की संभावना जताई जा रही है।

हालांकि, वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि कितने वाहन प्रतिदिन दिल्ली में प्रवेश करते हैं और उनमें से कितने निर्धारित मानकों के अंतर्गत प्रतिबंधित श्रेणी में आते हैं।

इस फैसले का सबसे अधिक असर उन लोगों पर पड़ सकता है, जिनकी आजीविका या नौकरी दिल्ली आने-जाने पर निर्भर है।

टैक्सी और निजी परिवहन सेवाओं से जुड़े लोगों के लिए भी यह निर्णय महत्वपूर्ण है। यदि उनके वाहन निर्धारित उत्सर्जन मानकों को पूरा नहीं करते हैं, तो उन्हें अपने वाहन के संचालन और आय को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

प्रदूषण नियंत्रण के लिए निर्माण कार्यों पर भी प्रतिबंध

दिल्ली सरकार और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग केवल वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाकर प्रदूषण नियंत्रित करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, बल्कि इसके लिए कई अन्य कदम भी उठाए जा रहे हैं।

इसी क्रम में दिल्ली-एनसीआर में निर्माण और तोड़फोड़ से संबंधित गतिविधियों पर भी प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया गया है।

निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, 5 नवंबर से 20 नवंबर तक निर्माण और विध्वंस से जुड़े कार्यों पर प्रतिबंध रहेगा।

निर्माण गतिविधियों से निकलने वाली धूल दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण का एक महत्वपूर्ण कारण मानी जाती है। भवन निर्माण, सड़कों की खुदाई, पुराने भवनों को तोड़ने और निर्माण सामग्री के खुले परिवहन से बड़ी मात्रा में धूल वातावरण में फैलती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि निर्माण स्थलों पर उचित धूल नियंत्रण उपाय नहीं अपनाए जाते हैं, तो इसका प्रभाव आसपास के क्षेत्रों की वायु गुणवत्ता पर पड़ता है।

इसी वजह से प्रदूषण की गंभीर स्थिति में निर्माण और तोड़फोड़ से संबंधित गतिविधियों पर अस्थायी रोक लगाने जैसे कदम उठाए जाते हैं।

हालांकि, आवश्यक और छूट प्राप्त परियोजनाओं के संबंध में संबंधित सरकारी आदेशों की शर्तें लागू होंगी।

सरकारी और निजी कार्यालयों में 50 प्रतिशत कर्मचारियों को बुलाने का निर्देश

प्रदूषण कम करने के लिए कार्यालयों में कर्मचारियों की उपस्थिति को लेकर भी महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है।

वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग के निर्देश के अनुसार, दिल्ली, गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर, गुरुग्राम, फरीदाबाद और सोनीपत में सरकारी तथा निजी कार्यालयों को 5 नवंबर से 20 नवंबर तक अधिकतम 50 प्रतिशत कर्मचारियों के साथ काम करने की व्यवस्था अपनानी होगी।

शेष कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम के माध्यम से काम करने के लिए कहा गया है।

इस व्यवस्था के पीछे उद्देश्य यह है कि कार्यालयों में कर्मचारियों की उपस्थिति कम होने से रोजाना सड़कों पर निकलने वाले वाहनों की संख्या में कमी आएगी।

दिल्ली-एनसीआर में सुबह और शाम के समय ट्रैफिक का दबाव काफी अधिक रहता है। लाखों कर्मचारी अपने निजी वाहनों या सार्वजनिक परिवहन के माध्यम से कार्यालय पहुंचते हैं।

यदि कार्यालयों में सीमित कर्मचारियों को बुलाया जाता है और बाकी कर्मचारियों को घर से काम करने की सुविधा मिलती है, तो सड़कों पर वाहनों का दबाव कम किया जा सकता है।

हालांकि, इस व्यवस्था को लागू करने में कंपनियों और सरकारी कार्यालयों के सामने भी कई व्यावहारिक चुनौतियां हो सकती हैं। विशेषकर ऐसे विभागों और संस्थानों में जहां कर्मचारियों की भौतिक उपस्थिति आवश्यक होती है, वहां कामकाज प्रभावित न हो, इसका ध्यान रखना होगा।

दिल्ली में हर साल सर्दियों में क्यों बढ़ता है प्रदूषण?

दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या किसी एक कारण से पैदा नहीं होती। इसके पीछे कई प्राकृतिक और मानवीय कारण एक साथ काम करते हैं।

सर्दियों के मौसम में तापमान कम होने और हवा की गति धीमी पड़ने से प्रदूषक तत्व वातावरण में लंबे समय तक बने रह सकते हैं।

इसके अतिरिक्त आसपास के राज्यों में पराली जलाने की घटनाएं, वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक गतिविधियां, निर्माण कार्यों की धूल और कचरा जलाने जैसी गतिविधियां भी प्रदूषण बढ़ाने में योगदान करती हैं।

दिल्ली के भौगोलिक और मौसमी हालात भी इस समस्या को गंभीर बनाते हैं। जब हवा की गति कम होती है, तब प्रदूषक तत्व आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक फैल नहीं पाते।

नतीजतन वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) तेजी से बढ़ सकता है।

इसी स्थिति को देखते हुए हर साल सर्दियों में ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) के तहत अलग-अलग स्तरों पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं।

इनमें निर्माण गतिविधियों पर रोक, वाहनों से संबंधित प्रतिबंध, औद्योगिक गतिविधियों पर नियंत्रण और अन्य आपातकालीन कदम शामिल हो सकते हैं।

क्या हाईकोर्ट के फैसले से प्रतिबंध खत्म हो गया है?

इस मामले में एक महत्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है। दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की तत्काल सुनवाई की मांग स्वीकार नहीं की है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने याचिका पर अंतिम फैसला सुना दिया है।

अदालत ने फिलहाल सरकार के निर्णय पर रोक लगाने से इनकार किया और याचिका को सामान्य प्रक्रिया के तहत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है।

इसलिए जब तक सक्षम न्यायालय की ओर से कोई अलग आदेश जारी नहीं होता, तब तक सरकार द्वारा घोषित प्रतिबंध अपनी निर्धारित शर्तों के अनुसार लागू रहेगा।

आगे की सुनवाई में याचिकाकर्ता की दलीलों, सरकार के पक्ष और संबंधित नियमों पर विचार किया जा सकता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि तत्काल सुनवाई से इनकार करना और किसी याचिका को अंतिम रूप से खारिज करना दो अलग-अलग न्यायिक प्रक्रियाएं हैं। इस मामले में उपलब्ध जानकारी के अनुसार अदालत ने केवल तत्काल सुनवाई की मांग पर विचार किया है।

निष्कर्ष: प्रदूषण नियंत्रण और आम नागरिकों की परेशानी के बीच संतुलन जरूरी

दिल्ली में गैर-BS-VI वाहनों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय प्रदूषण नियंत्रण के उद्देश्य से लिया गया है। लेकिन इसका सीधा प्रभाव उन लाखों लोगों पर पड़ सकता है, जो दिल्ली और एनसीआर के बीच प्रतिदिन आवागमन करते हैं।

एक ओर राजधानी में स्वच्छ हवा उपलब्ध कराना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है, वहीं दूसरी ओर नौकरी, व्यापार और जरूरी कामों के लिए दिल्ली आने वाले नागरिकों की व्यावहारिक समस्याओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

दिल्ली हाईकोर्ट ने फिलहाल इस मामले में तत्काल सुनवाई से इनकार करते हुए कहा है कि फैसले में कुछ गलत नहीं है और जल्द सुनवाई की आवश्यकता नहीं है। अब याचिका पर सामान्य प्रक्रिया के तहत सुनवाई होगी।

आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रतिबंध के लागू होने से दिल्ली की वायु गुणवत्ता में कितना सुधार आता है और एनसीआर के वाहन मालिकों को इससे कितनी परेशानी होती है।

प्रदूषण नियंत्रण के लिए सख्त कदम उठाना जरूरी है, लेकिन उनकी सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि उन्हें लागू करते समय आम नागरिकों की जरूरतों और परिवहन संबंधी वास्तविकताओं का कितना ध्यान रखा जाता है।


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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

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