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जानवरों पर प्रयोग के नए नियमों का मसौदा विवादों में: पेटा इंडिया ने की वापसी की मांग, जानिए क्या बदलना चाहती है केंद्र सरकार

जानवरों पर प्रयोग के नए नियमों का मसौदा विवादों में: पेटा इंडिया ने की वापसी की मांग, जानिए क्या बदलना चाहती है केंद्र सरकार

नई दिल्ली। वैज्ञानिक अनुसंधान, दवाओं के परीक्षण और चिकित्सा क्षेत्र में नई खोजों के लिए लंबे समय से जानवरों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। कई दवाओं और चिकित्सा तकनीकों को विकसित करने में पशुओं पर किए गए प्रयोगों की भूमिका रही है। हालांकि, समय के साथ जानवरों के प्रति क्रूरता, उन्हें होने वाली शारीरिक पीड़ा और उनके जीवन के अधिकार को लेकर दुनिया भर में बहस तेज हुई है। भारत में भी इस विषय पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं कि वैज्ञानिक अनुसंधान के नाम पर जानवरों को कितनी पीड़ा दी जा सकती है और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार के पास कौन-कौन से प्रभावी प्रावधान होने चाहिए।

इसी बीच केंद्र सरकार ने जानवरों पर होने वाले वैज्ञानिक प्रयोगों को नियंत्रित करने के लिए नए नियमों का मसौदा पेश किया है। सरकार की ओर से प्रस्तावित इन नियमों का उद्देश्य पशुओं पर होने वाले प्रयोगों की निगरानी, संस्थानों के पंजीकरण और प्रयोगों के दौरान उनकी सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को व्यवस्थित करना बताया गया है।

लेकिन इस प्रस्तावित व्यवस्था को लेकर पशु अधिकार संगठनों ने चिंता जताई है। विशेष रूप से पशु अधिकार संगठन पेटा इंडिया (PETA India) ने मसौदे को वापस लेने की मांग की है। संगठन का आरोप है कि प्रस्तावित नियम कुछ ऐसी परिस्थितियों में जानवरों पर प्रयोग करने का रास्ता खोल सकते हैं, जहां पहले से मौजूद सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है।

इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए जानवरों का इस्तेमाल जरूरी है या अब समय आ गया है कि प्रयोगशालाओं में आधुनिक तकनीकों के माध्यम से पशुओं के इस्तेमाल को पूरी तरह समाप्त करने की दिशा में कदम उठाए जाएं।

6 अक्टूबर को केंद्र सरकार ने जारी किया नए नियमों का मसौदा

केंद्र सरकार ने 6 अक्टूबर 2026 को जानवरों पर वैज्ञानिक प्रयोगों से संबंधित नए नियमों का मसौदा पेश किया। इसे 7 अक्टूबर 2026 को सरकारी राजपत्र (Official Gazette) में प्रकाशित किया गया।

सरकार ने इस प्रस्ताव पर आम जनता, विशेषज्ञों और संबंधित संगठनों से सुझाव तथा आपत्तियां मांगी हैं। इसके लिए 5 नवंबर 2026 तक का समय निर्धारित किया गया है।

इसका अर्थ है कि प्रस्तावित नियमों को अंतिम रूप देने से पहले संबंधित पक्ष अपनी राय सरकार के सामने रख सकते हैं। सरकार प्राप्त सुझावों और आपत्तियों पर विचार करने के बाद मसौदे में आवश्यक बदलाव कर सकती है।

नए नियमों को पशुओं पर प्रयोगों के नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण के लिए समिति (Committee for Control and Supervision of Experiments on Animals-CCSEA) की ओर से तैयार किया गया है।

प्रस्तावित नियम पुराने 1968 और 1998 के नियमों की जगह लेने के उद्देश्य से लाए गए हैं। इनका संबंध उन संस्थानों और प्रयोगशालाओं से है, जहां वैज्ञानिक अनुसंधान, शिक्षा, दवा विकास और अन्य परीक्षणों के लिए जानवरों का इस्तेमाल किया जाता है।

क्या है CCSEA और इसकी जिम्मेदारी क्या है?

CCSEA यानी पशुओं पर प्रयोगों के नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण के लिए समिति एक नियामक व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य वैज्ञानिक प्रयोगों में इस्तेमाल होने वाले जानवरों के साथ होने वाले व्यवहार की निगरानी करना है।

इसका मुख्य काम यह सुनिश्चित करना है कि प्रयोगशालाओं में पशुओं का इस्तेमाल निर्धारित नियमों के अनुसार हो। किसी भी संस्थान को मनमाने तरीके से जानवरों पर प्रयोग करने की छूट नहीं होनी चाहिए।

इस व्यवस्था के अंतर्गत प्रयोग करने वाले संस्थानों का पंजीकरण, प्रयोगों की निगरानी, पशुओं की देखभाल और निर्धारित मानकों का पालन महत्वपूर्ण विषय हैं।

प्रस्तावित नए नियमों में भी CCSEA को महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है। विशेष रूप से गंभीर प्रकृति के प्रयोगों के लिए समिति की मंजूरी को आवश्यक बताया गया है।

इसका उद्देश्य यह है कि किसी प्रयोग के वैज्ञानिक औचित्य के साथ-साथ उससे जानवरों को होने वाली संभावित पीड़ा और जोखिम का भी मूल्यांकन किया जा सके।

नए नियमों में जानवरों के स्थान पर विकल्पों के इस्तेमाल पर जोर

प्रस्तावित मसौदे की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि जहां भी संभव हो, वैज्ञानिक प्रयोगों में जानवरों के स्थान पर दूसरे विकल्पों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

आधुनिक विज्ञान में अब ऐसी कई तकनीकें विकसित हो रही हैं, जिनके माध्यम से बिना जीवित जानवरों पर प्रयोग किए भी वैज्ञानिक परीक्षण किए जा सकते हैं।

इनमें कंप्यूटर आधारित मॉडल, कृत्रिम कोशिकाएं, मानव कोशिकाओं पर आधारित परीक्षण, ऊतक मॉडल और अन्य आधुनिक प्रयोगशाला तकनीकें शामिल हैं।

उदाहरण के लिए, किसी दवा के संभावित प्रभाव का अध्ययन करने के लिए कुछ परिस्थितियों में मानव कोशिकाओं और प्रयोगशाला में विकसित ऊतकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

इसी तरह कंप्यूटर मॉडलिंग के जरिए भी कुछ प्रकार के परीक्षण किए जा सकते हैं।

वैज्ञानिक अनुसंधान में ऐसे विकल्पों को बढ़ावा देने का उद्देश्य जानवरों को अनावश्यक पीड़ा से बचाना है।

हालांकि, हर प्रकार के वैज्ञानिक परीक्षण में इन विकल्पों का इस्तेमाल संभव नहीं है। कुछ मामलों में दवा या किसी अन्य उत्पाद का पूरे जीवित शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका अध्ययन करने के लिए अलग-अलग प्रकार के परीक्षणों की आवश्यकता हो सकती है।

यही वह बिंदु है जहां वैज्ञानिकों और पशु अधिकार संगठनों के बीच मतभेद सामने आते हैं। वैज्ञानिक अनुसंधान से जुड़े कुछ पक्ष पशु प्रयोगों को पूरी तरह समाप्त करने को व्यावहारिक नहीं मानते, जबकि पशु अधिकार संगठन आधुनिक विकल्पों को प्राथमिकता देने की मांग कर रहे हैं।

चार श्रेणियों में बांटे जाएंगे जानवरों पर होने वाले प्रयोग

नए मसौदे में वैज्ञानिक प्रयोगों को उनकी प्रकृति और जानवरों को होने वाली संभावित पीड़ा के आधार पर चार श्रेणियों में बांटने का प्रस्ताव है।

इस वर्गीकरण का उद्देश्य यह समझना है कि किसी प्रयोग के दौरान जानवरों को कितनी परेशानी हो सकती है और उसके लिए किस स्तर की निगरानी तथा अनुमति की आवश्यकता होगी।

1. नॉन-रिकवरी प्रयोग (Non-Recovery)

इस श्रेणी में ऐसे प्रयोग शामिल होते हैं, जिनमें जानवर को सामान्य होश में आने से पहले ही प्रयोग की प्रक्रिया समाप्त कर दी जाती है। आमतौर पर इस प्रकार के प्रयोगों में बेहोशी से संबंधित व्यवस्था महत्वपूर्ण होती है।

2. हल्के प्रयोग (Mild Experiments)

इस श्रेणी में ऐसे प्रयोग आते हैं, जिनसे जानवरों को सीमित और अस्थायी असुविधा या हल्की पीड़ा हो सकती है। इनका प्रभाव सामान्यतः कम गंभीर माना जाता है।

3. मध्यम प्रयोग (Moderate Experiments)

मध्यम श्रेणी के प्रयोगों में जानवरों को अपेक्षाकृत अधिक परेशानी, दर्द या तनाव का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए ऐसे प्रयोगों में उचित निगरानी और निर्धारित सुरक्षा उपायों का पालन जरूरी होगा।

4. गंभीर प्रयोग (Severe Experiments)

यह सबसे संवेदनशील श्रेणी है। इसमें ऐसे प्रयोग शामिल हो सकते हैं, जिनसे जानवरों को गंभीर दर्द, शारीरिक कष्ट या लंबे समय तक परेशानी हो सकती है।

मसौदे के अनुसार, गंभीर श्रेणी के प्रयोगों के लिए CCSEA की मंजूरी आवश्यक होगी।

हालांकि, इसी वर्गीकरण को लेकर पेटा इंडिया ने सवाल उठाए हैं। संगठन का कहना है कि केवल प्रयोगों को अलग-अलग श्रेणियों में बांट देना पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी प्रयोग में जानवरों को असहनीय पीड़ा न झेलनी पड़े।

लंबे समय तक दर्द देने वाले प्रयोगों पर रोक का प्रस्ताव

प्रस्तावित नियमों में ऐसे प्रयोगों को अनुमति नहीं देने की बात कही गई है, जिनसे जानवरों को लंबे समय तक दर्द और गंभीर पीड़ा का सामना करना पड़े।

इस प्रावधान को पशु कल्याण की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

वैज्ञानिक अनुसंधान के दौरान जानवरों को होने वाली पीड़ा को कम करना किसी भी जिम्मेदार प्रयोगशाला की प्राथमिकता होनी चाहिए। प्रयोग के दौरान दर्द कम करने के लिए उचित चिकित्सा व्यवस्था, निगरानी और पशु चिकित्सक की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

लेकिन पेटा इंडिया का कहना है कि मसौदे में एक तरफ गंभीर पीड़ा को रोकने की बात कही गई है, वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे प्रयोगों के लिए भी गुंजाइश दिखाई देती है, जिनमें जानवरों को अत्यधिक दर्द सहना पड़ सकता है।

संगठन के अनुसार, नियमों में स्पष्टता होनी चाहिए कि किस परिस्थिति में किसी प्रयोग को गंभीर माना जाएगा और किन परिस्थितियों में उसे पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाएगा।

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत सुरक्षित जानवरों पर भी प्रयोग को लेकर विवाद

पेटा इंडिया की सबसे बड़ी आपत्तियों में से एक वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षित जानवरों से संबंधित प्रस्ताव है।

संगठन का कहना है कि मसौदे में वैज्ञानिक कारणों और आवश्यक कानूनी मंजूरी की स्थिति में ऐसे जानवरों पर भी प्रयोग की संभावना रखी गई है, जिन्हें वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत सुरक्षा प्राप्त है।

यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए भारत में अलग कानूनी व्यवस्था मौजूद है।

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 का उद्देश्य वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा करना तथा अवैध शिकार और अन्य गतिविधियों पर नियंत्रण स्थापित करना है।

ऐसे में यदि किसी संरक्षित वन्यजीव पर वैज्ञानिक प्रयोग की अनुमति दी जाती है, तो उसके लिए स्पष्ट कानूनी आधार, उचित अनुमति और सख्त निगरानी की आवश्यकता होगी।

पेटा का तर्क है कि संरक्षित प्रजातियों को वैज्ञानिक प्रयोगों में शामिल करने की संभावनाएं बढ़ाने के बजाय उनकी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

हालांकि, किसी विशेष प्रजाति पर प्रयोग की अनुमति का प्रश्न संबंधित कानूनों और प्रस्तावित नियमों में निर्धारित शर्तों के अधीन होगा।

आवारा कुत्तों और बिल्लियों पर प्रयोग की अनुमति का प्रावधान

मसौदे का एक अन्य महत्वपूर्ण और विवादित पहलू आवारा कुत्तों और बिल्लियों से जुड़ा है।

पेटा इंडिया के अनुसार, प्रस्तावित नियमों में कुछ विशेष परिस्थितियों में आवारा कुत्तों और बिल्लियों पर प्रयोग करने की अनुमति का प्रावधान रखा गया है।

इस विषय पर पशु अधिकार संगठनों की चिंता स्वाभाविक है। भारत के शहरों और कस्बों में बड़ी संख्या में आवारा कुत्ते और बिल्लियां रहती हैं। इनकी देखभाल, उपचार और सुरक्षा पहले से ही एक बड़ी चुनौती है।

ऐसे में यदि वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए इन जानवरों का इस्तेमाल किया जाता है, तो उनके चयन, सुरक्षा, चिकित्सा देखभाल और प्रयोग के बाद की स्थिति को लेकर स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए।

यह भी जरूरी है कि किसी जानवर को केवल इसलिए प्रयोग के लिए इस्तेमाल न किया जाए क्योंकि वह सड़क पर रहने वाला या किसी व्यक्ति के स्वामित्व से बाहर है।

पेटा इंडिया का कहना है कि आवारा जानवरों को प्रयोगों में शामिल करने की संभावनाएं पशु कल्याण के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं।

प्रत्येक संस्थान को कराना होगा CCSEA में पंजीकरण

प्रस्तावित नियमों में प्रयोग करने वाले संस्थानों के पंजीकरण को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

इसके अनुसार, जानवरों पर वैज्ञानिक प्रयोग करने वाली संस्थाओं को CCSEA के अंतर्गत पंजीकरण कराना होगा।

इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी संस्थान बिना निर्धारित अनुमति और निगरानी के पशुओं पर प्रयोग न कर सके।

पंजीकरण के माध्यम से संबंधित संस्थान की गतिविधियों, प्रयोगशाला की व्यवस्था और पशुओं की देखभाल से जुड़े मानकों पर निगरानी रखी जा सकेगी।

इससे उन संस्थानों की जवाबदेही भी तय हो सकेगी, जहां वैज्ञानिक प्रयोगों के नाम पर पशुओं के साथ लापरवाही या अनुचित व्यवहार किए जाने की शिकायतें सामने आती हैं।

हर प्रयोग में पशु चिकित्सक की निगरानी का प्रस्ताव

मसौदे में यह भी कहा गया है कि जानवरों पर होने वाले प्रयोग पशु चिकित्सक (Veterinarian) की निगरानी में किए जाएंगे।

इस प्रावधान का उद्देश्य प्रयोग के दौरान जानवरों की शारीरिक स्थिति पर नजर रखना और जरूरत पड़ने पर उचित चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना है।

पशु चिकित्सक यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं कि प्रयोग के दौरान जानवरों को अनावश्यक दर्द या परेशानी न हो।

इसके अलावा, जानवरों के स्वास्थ्य, उपचार और देखभाल से जुड़े मामलों में भी उनकी विशेषज्ञता उपयोगी होगी।

वैज्ञानिक प्रयोगों के दौरान केवल शोध के परिणामों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। यह भी जरूरी है कि प्रयोग में शामिल जानवरों के स्वास्थ्य और कल्याण की जिम्मेदारी तय हो।

नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों पर क्या कार्रवाई होगी?

प्रस्तावित मसौदे में नियमों का पालन नहीं करने वाले संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई की व्यवस्था भी की गई है।

यदि किसी संस्थान में गड़बड़ी या नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित संस्थान को पहले नोटिस दिया जाएगा।

इसके बाद उसे कमियों को दूर करने के लिए 15 दिन का समय देने का प्रस्ताव है।

यदि निर्धारित समय में संस्थान अपनी कमियों को ठीक नहीं करता है, तो उसका पंजीकरण निलंबित या रद्द किया जा सकता है।

इसका सीधा अर्थ है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों को वैज्ञानिक प्रयोग जारी रखने में परेशानी हो सकती है।

इसके अलावा, यदि किसी संस्थान की गतिविधियों से जानवरों की सुरक्षा को तत्काल खतरा पैदा होता है, तो संबंधित प्रयोगों को तुरंत रोकने की कार्रवाई भी की जा सकती है।

यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पशुओं पर प्रयोग करने वाली संस्थाओं की जवाबदेही केवल पंजीकरण तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। नियमों के उल्लंघन की स्थिति में प्रभावी कार्रवाई भी जरूरी है।

पेटा इंडिया ने क्यों की मसौदा वापस लेने की मांग?

पेटा इंडिया का कहना है कि विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में अब ऐसे कई विकल्प उपलब्ध हैं, जिनके माध्यम से जानवरों का इस्तेमाल किए बिना अनुसंधान किया जा सकता है।

दुनिया के कई देशों में आधुनिक तकनीकों के आधार पर ऐसे परीक्षण विकसित किए जा रहे हैं, जिनमें जीवित जानवरों को प्रयोगशाला में इस्तेमाल करने की आवश्यकता कम हो सकती है।

संगठन का मानना है कि भारत सरकार को भी ऐसी तकनीकों के विकास और इस्तेमाल के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए।

पेटा के अनुसार, नए नियमों का उद्देश्य केवल यह तय करना नहीं होना चाहिए कि जानवरों पर प्रयोग किस प्रकार किए जाएं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना होना चाहिए जिसमें धीरे-धीरे पशु प्रयोगों की आवश्यकता ही समाप्त हो जाए।

संगठन को विशेष रूप से तीन विषयों पर आपत्ति है।

पहला, संरक्षित वन्यजीवों पर कुछ परिस्थितियों में प्रयोग की संभावना।

दूसरा, आवारा कुत्तों और बिल्लियों पर प्रयोग करने की अनुमति से संबंधित प्रावधान।

तीसरा, गंभीर दर्द और पीड़ा वाले प्रयोगों को लेकर पर्याप्त स्पष्टता का अभाव।

पेटा का कहना है कि जब विज्ञान के पास वैकल्पिक तकनीकों की संभावनाएं मौजूद हैं, तो जानवरों को प्रयोगों में शामिल करने के नए रास्ते नहीं खोले जाने चाहिए।

इसी आधार पर संगठन ने प्रस्तावित मसौदे को वापस लेने और पशुओं की सुरक्षा के लिए अधिक कठोर नियम बनाने की मांग की है।

जानवरों के प्रति क्रूरता रोकने के लिए भारत में कौन-से कानून हैं?

भारत में पशुओं की सुरक्षा के लिए कई कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 (Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960) है।

इस कानून का उद्देश्य जानवरों को अनावश्यक दर्द और पीड़ा से बचाना है। इसके अंतर्गत पशुओं के साथ क्रूर व्यवहार को रोकने के लिए कानूनी व्यवस्था की गई है।

इसके अतिरिक्त, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के माध्यम से संरक्षित वन्यजीवों की सुरक्षा की जाती है।

भारत के संविधान में भी पशुओं के प्रति दया और करुणा का भाव रखने से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं।

अनुच्छेद 48A के तहत राज्य को पर्यावरण, वन और वन्यजीवों की रक्षा तथा उनमें सुधार करने का निर्देश दिया गया है।

वहीं अनुच्छेद 51A(g) प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य बताता है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे तथा जीवित प्राणियों के प्रति दया का भाव रखे।

हालांकि, वैज्ञानिक प्रयोगों से संबंधित मामलों में इन सामान्य प्रावधानों के साथ-साथ प्रयोगों के नियंत्रण और निगरानी के लिए बनाए गए विशेष नियमों का भी महत्व है।

इसलिए नए मसौदे को समझते समय मौजूदा पशु संरक्षण कानूनों और प्रस्तावित प्रयोग संबंधी नियमों के बीच तालमेल को भी ध्यान में रखना आवश्यक होगा।

क्या वैज्ञानिक अनुसंधान और पशु सुरक्षा के बीच संतुलन संभव है?

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या वैज्ञानिक अनुसंधान को आगे बढ़ाते हुए जानवरों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है?

एक ओर चिकित्सा विज्ञान में नई दवाओं, उपचार विधियों और वैज्ञानिक खोजों की आवश्यकता है। दूसरी ओर यह भी सच है कि जानवर संवेदनशील जीव हैं और उन्हें अनावश्यक दर्द या पीड़ा से बचाना मानवीय तथा कानूनी जिम्मेदारी है।

इस दिशा में दुनिया भर में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत अपनाया जाता है, जिसे 3Rs सिद्धांत कहा जाता है।

इसके तीन प्रमुख आधार हैं:

  • Replacement (विकल्प): जहां संभव हो, जानवरों के स्थान पर दूसरे वैज्ञानिक विकल्पों का इस्तेमाल किया जाए।
  • Reduction (कमी): प्रयोगों में इस्तेमाल होने वाले जानवरों की संख्या न्यूनतम रखी जाए।
  • Refinement (सुधार): प्रयोगों की प्रक्रिया को इस तरह बेहतर बनाया जाए कि जानवरों को कम से कम दर्द और परेशानी हो।

यदि भारत में प्रस्तावित नियम इन तीनों सिद्धांतों को प्रभावी तरीके से लागू करते हैं, तो पशु कल्याण और वैज्ञानिक अनुसंधान के बीच बेहतर संतुलन स्थापित किया जा सकता है।

लेकिन इसके लिए नियमों का स्पष्ट होना, स्वतंत्र निगरानी और उल्लंघन करने वालों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई भी जरूरी है।

5 नवंबर तक जनता दे सकती है अपनी आपत्तियां और सुझाव

केंद्र सरकार ने प्रस्तावित नियमों पर आम जनता और संबंधित पक्षों से 5 नवंबर 2026 तक सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं।

इसका मतलब है कि पशु अधिकार संगठनों, वैज्ञानिकों, चिकित्सा विशेषज्ञों, शिक्षण संस्थानों और आम नागरिकों को इस मसौदे पर अपनी राय रखने का अवसर दिया गया है।

इस अवधि में प्राप्त सुझावों के आधार पर सरकार प्रस्तावित नियमों की समीक्षा कर सकती है। जरूरत पड़ने पर प्रावधानों में संशोधन भी किया जा सकता है।

विशेषज्ञों के लिए यह महत्वपूर्ण अवसर है कि वे वैज्ञानिक प्रयोगों की वास्तविक आवश्यकताओं और पशु कल्याण से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय प्रस्तुत करें।

वहीं पशु अधिकार संगठनों के लिए यह मौका है कि वे उन प्रावधानों की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करें, जिनसे जानवरों की सुरक्षा प्रभावित होने की आशंका है।

निष्कर्ष

जानवरों पर वैज्ञानिक प्रयोगों से संबंधित नए नियमों का मसौदा केवल प्रयोगशालाओं की कार्यप्रणाली में बदलाव का मामला नहीं है, बल्कि यह विज्ञान, कानून, नैतिकता और पशु अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है।

केंद्र सरकार की ओर से प्रस्तावित व्यवस्था में संस्थानों का पंजीकरण, प्रयोगों का वर्गीकरण, पशु चिकित्सकों की निगरानी और गंभीर प्रयोगों के लिए CCSEA की मंजूरी जैसे प्रावधान शामिल हैं।

दूसरी ओर पेटा इंडिया ने आशंका जताई है कि कुछ प्रावधान जानवरों की मौजूदा सुरक्षा को कमजोर कर सकते हैं। संगठन की मांग है कि पशुओं पर प्रयोगों को बढ़ावा देने के बजाय ऐसे आधुनिक वैज्ञानिक विकल्प विकसित किए जाएं, जिनमें जानवरों का इस्तेमाल न करना पड़े।

अब सबकी नजर सरकार के अगले कदम पर है। 5 नवंबर 2026 तक प्राप्त होने वाली आपत्तियों और सुझावों के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अंतिम नियमों में क्या बदलाव किए जाते हैं।

क्योंकि वैज्ञानिक प्रगति तभी वास्तव में सार्थक मानी जा सकती है, जब उसके साथ जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता, मानवीय दृष्टिकोण और कानूनी जवाबदेही भी बनी रहे।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।