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सोशल मीडिया कंपनियों को बड़ा झटका: मेटा, टिकटॉक और एक्स ब्रिटेन के हाईकोर्ट में हारे मुकदमा, अब देना होगा यूजर्स की सुरक्षा से जुड़ा पूरा डेटा

सोशल मीडिया कंपनियों को बड़ा झटका: मेटा, टिकटॉक और एक्स ब्रिटेन के हाईकोर्ट में हारे मुकदमा, अब देना होगा यूजर्स की सुरक्षा से जुड़ा पूरा डेटा

        दुनिया की तीन बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों मेटा (Facebook और Instagram), टिकटॉक और एक्स (X) को ब्रिटेन में बड़ा कानूनी झटका लगा है। लंदन हाईकोर्ट ने ब्रिटिश नियामक संस्था ऑफकॉम (Ofcom) के पक्ष में फैसला सुनाते हुए इन कंपनियों की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने नियामक द्वारा मांगी गई विस्तृत जानकारी देने के आदेश को चुनौती दी थी।

इस फैसले को सोशल मीडिया कंपनियों पर सरकारी निगरानी और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अदालत के फैसले से साफ हो गया है कि सोशल मीडिया कंपनियां केवल अपने व्यावसायिक हितों या तकनीकी व्यवस्थाओं का हवाला देकर नियामक संस्थाओं से जरूरी जानकारी छिपा नहीं सकतीं।

ऑफकॉम ने फरवरी 2026 में इन कंपनियों से उनके प्लेटफॉर्म पर मौजूद आपत्तिजनक, हानिकारक और गैर-कानूनी सामग्री को लेकर विस्तृत आंकड़े मांगे थे। इसमें यह जानकारी भी शामिल थी कि कंपनियां कितनी पोस्ट हटाती हैं, कितनी पोस्ट की पहुंच सीमित करती हैं और कितने बच्चे तथा अन्य यूजर्स हानिकारक सामग्री के संपर्क में आते हैं।

तीनों कंपनियों ने इस मांग को अनुचित और अत्यधिक बोझिल बताते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। विशेष रूप से एक्स ने इस प्रक्रिया को अपने लिए बेहद खर्चीला और जटिल बताया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने कंपनियों की दलीलों को स्वीकार नहीं किया।

क्या है पूरा मामला?

ब्रिटेन में इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए Online Safety Act, 2023 लागू किया गया है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर बच्चों और अन्य यूजर्स को अवैध तथा हानिकारक सामग्री से सुरक्षित रखना है।

आज सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रह गया है। इसका इस्तेमाल समाचार, शिक्षा, व्यापार, राजनीतिक विचारों के आदान-प्रदान और व्यक्तिगत संवाद के लिए भी किया जाता है। लेकिन इसी के साथ ऑनलाइन उत्पीड़न, अश्लील सामग्री, हिंसक पोस्ट, आत्महत्या के लिए उकसाने वाली सामग्री, बाल शोषण और भ्रामक सूचनाओं जैसी समस्याएं भी बढ़ी हैं।

इन परिस्थितियों में ब्रिटिश सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी निर्धारित करने के लिए नया कानूनी ढांचा तैयार किया।

इस कानून के तहत ऑफकॉम को सोशल मीडिया कंपनियों की कार्यप्रणाली की निगरानी करने और जरूरत पड़ने पर उनसे जानकारी मांगने के अधिकार दिए गए हैं।

फरवरी 2026 में ऑफकॉम ने मेटा, टिकटॉक और एक्स को औपचारिक सूचना नोटिस जारी किए। इन नोटिसों के माध्यम से कंपनियों से कंटेंट मॉडरेशन (Content Moderation) से संबंधित विस्तृत आंकड़े मांगे गए थे।

नियामक यह जानना चाहता था कि कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म पर मौजूद हानिकारक सामग्री को रोकने के लिए वास्तव में क्या कदम उठा रही हैं और उनके प्रयास कितने प्रभावी साबित हो रहे हैं।

ऑफकॉम ने कंपनियों से कौन-कौन सी जानकारियां मांगी थीं?

ऑफकॉम द्वारा मांगी गई जानकारी सामान्य रिपोर्ट तक सीमित नहीं थी। नियामक सोशल मीडिया कंपनियों की आंतरिक कार्यप्रणाली और कंटेंट मॉडरेशन से संबंधित विस्तृत आंकड़ों का अध्ययन करना चाहता था।

इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित जानकारियां शामिल थीं।

1. हटाई गई पोस्ट का विवरण: कंपनियों को बताना था कि उनके प्लेटफॉर्म से कितनी पोस्ट, वीडियो और अन्य सामग्री हटाई गई। इसके पीछे क्या कारण थे और किन नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई की गई।

2. पोस्ट की पहुंच सीमित करने का विवरण: कई बार कंपनियां किसी विवादित पोस्ट को पूरी तरह हटाने के बजाय उसकी पहुंच कम कर देती हैं। इसे Visibility Restriction या Reach Reduction कहा जाता है। ऑफकॉम जानना चाहता था कि ऐसी कितनी पोस्ट पर कार्रवाई की गई।

3. हानिकारक सामग्री के संपर्क में आए यूजर्स: नियामक यह आंकड़ा भी चाहता था कि कितने यूजर्स ऐसी सामग्री के संपर्क में आए, जिसे बाद में हानिकारक या नियमों के विरुद्ध पाया गया।

4. शिकायतों और अपीलों की जानकारी: यूजर्स द्वारा की गई शिकायतों, रिपोर्ट और कंपनियों के खिलाफ दर्ज अपीलों से संबंधित आंकड़े भी महत्वपूर्ण थे।

5. कार्रवाई की समय-सीमा: किसी हानिकारक पोस्ट की शिकायत मिलने के बाद कंपनी ने कितने समय में कार्रवाई की और शिकायतों का निपटारा किस प्रकार किया गया।

6. बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा: ऑफकॉम विशेष रूप से यह समझना चाहता था कि बच्चे किस प्रकार की हानिकारक सामग्री के संपर्क में आ रहे हैं और सोशल मीडिया कंपनियां उन्हें इससे बचाने के लिए क्या कदम उठा रही हैं।

इन आंकड़ों के माध्यम से नियामक यह मूल्यांकन करना चाहता था कि सोशल मीडिया कंपनियां ऑनलाइन सुरक्षा कानून के तहत अपनी जिम्मेदारियों का कितना पालन कर रही हैं।

एक्स ने बताया था सबसे बोझिल और खर्चीली प्रक्रिया

इस पूरे विवाद में एलन मस्क के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स ने सबसे ज्यादा विरोध किया था।

कंपनी की ओर से अदालत में दलील दी गई कि ऑफकॉम द्वारा मांगी गई जानकारी का दायरा असाधारण रूप से बड़ा है। इसे एकत्र करने के लिए कंपनी को अपने विशाल डेटाबेस का विश्लेषण करना पड़ेगा और विशेष तकनीकी संसाधनों की जरूरत होगी।

एक्स का कहना था कि किसी नियामक संस्था द्वारा मांगी गई यह सबसे अधिक बोझिल सूचनात्मक मांगों में से एक है।

कंपनी के अनुसार, इस जानकारी को तैयार करने के लिए जटिल विश्लेषण, डेटा प्रोसेसिंग और तकनीकी कार्य करने होंगे। इसमें कई महीने लग सकते हैं और लाखों पाउंड खर्च होने की आशंका है।

कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि नियामक द्वारा मांगे गए कुछ आंकड़े उसके सामान्य व्यावसायिक कार्यों के लिए भी तैयार नहीं किए जाते। इसलिए उन्हें अलग से तैयार करना पड़ेगा।

मेटा और टिकटॉक ने भी ऑफकॉम की मांग को अनुपातहीन बताते हुए कहा कि इतनी बड़ी मात्रा में डेटा उपलब्ध कराने का आदेश कंपनियों पर अनावश्यक दबाव डालता है।

कंपनियों का मुख्य तर्क था कि नियामक को अपनी शक्तियों का इस्तेमाल उचित सीमा में करना चाहिए और उससे उतनी ही जानकारी मांगी जानी चाहिए, जितनी वास्तव में आवश्यक हो।

लेकिन अदालत ने इन दलीलों को पर्याप्त नहीं माना।

हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की कंपनियों की याचिका?

30 अक्टूबर 2026 को लंदन हाईकोर्ट ने मेटा, टिकटॉक और एक्स की चुनौती खारिज कर दी।

इस मामले में लॉर्ड जस्टिस सिंह और जस्टिस कॉलिन्स राइस ने ऑफकॉम की सूचना मांगने की शक्ति को स्वीकार करते हुए कंपनियों की आपत्तियों को खारिज किया।

अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या ऑफकॉम ने अपनी कानूनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कंपनियों से आवश्यकता से अधिक जानकारी मांगी थी और क्या इस प्रकार की मांग को गैर-अनुपातहीन या अवैध माना जा सकता है।

कंपनियों ने यह भी तर्क दिया था कि नियामक की मांगों से उन पर अत्यधिक प्रशासनिक और तकनीकी बोझ पड़ेगा।

हालांकि, अदालत ने माना कि केवल इस आधार पर किसी वैधानिक सूचना मांग को अवैध नहीं कहा जा सकता कि उसे पूरा करने में संबंधित कंपनी को अधिक समय, पैसा और तकनीकी संसाधन खर्च करने पड़ेंगे।

ऑफकॉम का काम ऑनलाइन सुरक्षा कानून के अनुपालन की जांच करना है। इसके लिए कंपनियों से आवश्यक जानकारी प्राप्त करना नियामक की जिम्मेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इस फैसले से ऑफकॉम को सोशल मीडिया कंपनियों की गतिविधियों का मूल्यांकन करने के लिए जरूरी आंकड़े प्राप्त करने में कानूनी मजबूती मिली है।

नियम तोड़ने पर वैश्विक कमाई का 10 प्रतिशत तक जुर्माना

ब्रिटेन के Online Safety Act, 2023 की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक इसके तहत निर्धारित आर्थिक दंड है।

इस कानून के तहत गंभीर उल्लंघन के मामलों में कंपनियों पर उनके वैश्विक कारोबार के 10 प्रतिशत तक जुर्माना लगाया जा सकता है। निर्धारित परिस्थितियों में जुर्माने की अधिकतम सीमा 18 मिलियन पाउंड भी है।

इसका मतलब है कि सोशल मीडिया कंपनियों के लिए ब्रिटेन में ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े नियमों की अनदेखी करना महंगा साबित हो सकता है।

यहां यह समझना जरूरी है कि केवल ऑफकॉम द्वारा जानकारी मांगने या अदालत में मुकदमा हारने से कंपनियों पर स्वतः 10 प्रतिशत जुर्माना नहीं लग जाता। जुर्माना लगाने के लिए संबंधित कानूनी उल्लंघन की जांच और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है।

यदि जांच में यह पाया जाता है कि किसी कंपनी ने कानून के तहत निर्धारित सुरक्षा संबंधी दायित्वों का गंभीर उल्लंघन किया है, तो उसके खिलाफ आर्थिक दंड की कार्रवाई की जा सकती है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य कंपनियों को यह संदेश देना है कि ऑनलाइन सुरक्षा केवल उनकी स्वैच्छिक नीति का विषय नहीं है, बल्कि कानूनी जिम्मेदारी भी है।

दूसरी तरफ मेटा पर सोशल मीडिया की लत लगाने का गंभीर आरोप

ब्रिटेन में कानूनी झटका लगने के साथ ही मेटा को अमेरिका में भी एक अलग तरह के मुकदमे का सामना करना पड़ रहा है।

यह मुकदमा सोशल मीडिया के कथित रूप से लत लगाने वाले डिजाइन और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर उसके प्रभाव से जुड़ा है।

एक अमेरिकी किशोरी ने मेटा के खिलाफ आरोप लगाया था कि कंपनी ने जानबूझकर फेसबुक और इंस्टाग्राम को इस तरह डिजाइन किया कि बच्चे और किशोर इन प्लेटफॉर्म का लगातार इस्तेमाल करने के लिए आकर्षित होते रहें।

किशोरी का आरोप था कि इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के अत्यधिक इस्तेमाल के कारण उसे गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा। वह अवसाद (Depression) और ईटिंग डिसऑर्डर (Eating Disorder) जैसी परेशानियों से प्रभावित हुई।

उसका कहना था कि सोशल मीडिया पर लगातार उपलब्ध रहने वाली सामग्री, बार-बार मिलने वाले नोटिफिकेशन, वीडियो का अपने आप चलना और लगातार स्क्रॉल करने की सुविधा ने उसके इस्तेमाल की आदत को नियंत्रित करना मुश्किल बना दिया।

किशोरी ने कंपनी पर यह आरोप भी लगाया कि उसे इन प्लेटफॉर्म के संभावित नुकसान की जानकारी होने के बावजूद ऐसे फीचर्स बनाए गए, जो कम उम्र के यूजर्स को लंबे समय तक ऐप पर बनाए रखते हैं।

मामले की सुनवाई अमेरिका के लॉस एंजिलिस में हो रही थी। यह मुकदमा सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ चल रहे हजारों समान मामलों में एक महत्वपूर्ण परीक्षण मामले के रूप में देखा जा रहा था।

ट्रायल शुरू होने के दौरान मेटा ने किया गोपनीय समझौता

इस मामले में 30 अक्टूबर 2026 को एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया।

मेटा ने मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही 18 वर्षीय अमेरिकी युवती K.D.B. के साथ समझौता कर लिया। यह समझौता उस समय हुआ, जब मामले में जूरी के चयन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी।

इससे पहले कंपनी एक अन्य किशोरी S.J. के साथ भी समझौता कर चुकी थी।

दोनों युवतियों ने आरोप लगाया था कि सोशल मीडिया कंपनियों के डिजाइन और फीचर्स ने उन्हें कम उम्र से ही इन प्लेटफॉर्म का अत्यधिक इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया।

इन मुकदमों में फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, यूट्यूब और स्नैपचैट जैसे प्लेटफॉर्म की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे।

हालांकि, संबंधित युवतियों ने टिकटॉक और यूट्यूब के साथ भी पहले ही समझौता कर लिया था।

मेटा के साथ दोनों किशोरियों के समझौते की आर्थिक शर्तें सार्वजनिक नहीं की गई हैं। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि कंपनी ने कितनी रकम देकर विवाद समाप्त किया।

समझौते के बाद मेटा के खिलाफ इन दोनों युवतियों के दावे ट्रायल में आगे नहीं बढ़ेंगे। इस घटनाक्रम के बाद मुकदमे की कार्यवाही मुख्य रूप से स्नैपचैट की मूल कंपनी Snap के खिलाफ जारी रहने की उम्मीद है।

यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि किसी मामले में समझौता होना अपने आप में आरोपों को स्वीकार करना या अदालत द्वारा कंपनी को दोषी ठहराया जाना नहीं है।

सोशल मीडिया के डिजाइन पर उठ रहे हैं गंभीर सवाल

इस मुकदमे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के डिजाइन से जुड़ा है।

आज फेसबुक, इंस्टाग्राम और टिकटॉक जैसे ऐप में कई ऐसे फीचर्स हैं, जिनका उद्देश्य यूजर को अधिक समय तक प्लेटफॉर्म पर सक्रिय रखना होता है।

इनमें प्रमुख हैं:

  • Infinite Scrolling: बिना रुके लगातार नई पोस्ट और वीडियो देखते रहने की सुविधा।
  • Auto Play: एक वीडियो समाप्त होने के बाद दूसरा वीडियो अपने आप चलना।
  • Push Notifications: बार-बार नोटिफिकेशन भेजकर यूजर का ध्यान ऐप की ओर आकर्षित करना।
  • Algorithmic Recommendations: यूजर की पसंद और गतिविधियों के आधार पर नई सामग्री दिखाना।
  • Personalized Feed: प्रत्येक यूजर को उसकी रुचि के अनुसार अलग-अलग सामग्री उपलब्ध कराना।

इन सुविधाओं से सोशल मीडिया का इस्तेमाल आसान और आकर्षक हो जाता है। लेकिन विशेषज्ञों और अभिभावकों के बीच यह चिंता भी बढ़ रही है कि कम उम्र के बच्चों के लिए इन सुविधाओं का अत्यधिक इस्तेमाल नुकसानदायक हो सकता है।

यदि कोई बच्चा घंटों सोशल मीडिया पर समय बिताता है, तो उसकी नींद, पढ़ाई, सामाजिक व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकते हैं।

हालांकि, यह भी जरूरी है कि किसी व्यक्ति की मानसिक स्वास्थ्य समस्या का कारण केवल सोशल मीडिया को मानने से पहले वैज्ञानिक और चिकित्सकीय प्रमाणों का मूल्यांकन किया जाए।

यही कारण है कि अमेरिका में चल रहे मुकदमों को सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय करने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

क्या सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय करने का समय आ गया है?

दुनिया भर में सोशल मीडिया कंपनियों की बढ़ती ताकत के साथ उनके कानूनी दायित्वों पर भी बहस तेज हो रही है।

पहले इंटरनेट कंपनियां अक्सर यह तर्क देती थीं कि उनके प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित सामग्री के लिए मुख्य रूप से संबंधित यूजर जिम्मेदार है। लेकिन अब सरकारें यह सवाल उठा रही हैं कि यदि कंपनियां अपने एल्गोरिदम के माध्यम से सामग्री को बढ़ावा देती हैं और यूजर्स की गतिविधियों को नियंत्रित करती हैं, तो उनकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

विशेष रूप से बच्चों की सुरक्षा के मामले में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है।

किसी बच्चे के पास इंटरनेट की दुनिया के सभी खतरों को समझने की पर्याप्त क्षमता नहीं होती। ऐसे में प्लेटफॉर्म संचालित करने वाली कंपनियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे उम्र के अनुसार सुरक्षा उपाय अपनाएं और हानिकारक सामग्री तक बच्चों की पहुंच रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाएं।

ब्रिटेन का Online Safety Act इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रयास है।

भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है यह मामला

ब्रिटेन की अदालत का यह फैसला भारत के लिए भी कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

भारत में करोड़ों लोग फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और टिकटॉक के विकल्प के रूप में उपलब्ध अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं। बच्चों और किशोरों के बीच भी इंटरनेट और सोशल मीडिया का उपयोग लगातार बढ़ रहा है।

भारत में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (Information Technology Act, 2000) और सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के माध्यम से डिजिटल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारियां निर्धारित की गई हैं।

इन नियमों के तहत सोशल मीडिया मध्यस्थों (Social Media Intermediaries) को शिकायत निवारण, निर्धारित समय में शिकायतों पर कार्रवाई और कानून के अनुसार कुछ सामग्री को हटाने जैसी जिम्मेदारियां निभानी होती हैं।

इसके अतिरिक्त, डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (Digital Personal Data Protection Act, 2023) बच्चों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान करता है।

इस कानून में बच्चों को 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है। बच्चों के व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण के लिए सत्यापन योग्य अभिभावकीय सहमति सहित विशेष दायित्व निर्धारित किए गए हैं।

हालांकि, ब्रिटेन और भारत के कानूनी ढांचे अलग-अलग हैं। इसलिए ब्रिटेन के हाईकोर्ट का फैसला भारत में सीधे लागू नहीं होगा।

फिर भी यह निर्णय इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण है कि किसी देश का नियामक सोशल मीडिया कंपनियों से उनके प्लेटफॉर्म की सुरक्षा व्यवस्था और वास्तविक कार्यप्रणाली से जुड़े आंकड़े मांग सकता है और कंपनियां केवल आर्थिक बोझ का हवाला देकर ऐसी मांग को आसानी से रोक नहीं सकतीं।

निष्कर्ष: डिजिटल दुनिया में कंपनियों की जिम्मेदारी भी होगी तय

मेटा, टिकटॉक और एक्स के खिलाफ लंदन हाईकोर्ट का फैसला केवल तीन बड़ी कंपनियों की कानूनी हार नहीं है। यह डिजिटल प्लेटफॉर्म के संचालन और उनकी जवाबदेही से जुड़े व्यापक सवालों को सामने लाता है।

एक तरफ सरकारें चाहती हैं कि इंटरनेट पर बच्चों को हानिकारक सामग्री से बचाया जाए। दूसरी तरफ सोशल मीडिया कंपनियां अपने व्यावसायिक हितों, तकनीकी स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े तर्क देती हैं।

लेकिन इन दोनों के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल आम यूजर की सुरक्षा का है।

यदि कोई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लाखों बच्चों और किशोरों तक पहुंच रखता है, तो उससे यह अपेक्षा करना गलत नहीं है कि वह अपने प्लेटफॉर्म को सुरक्षित बनाने के लिए प्रभावी कदम उठाए।

ब्रिटेन की अदालत ने अपने फैसले से यह स्पष्ट संदेश दिया है कि डिजिटल दुनिया में बड़ी कंपनियां कानून से ऊपर नहीं हैं। उन्हें अपने प्लेटफॉर्म पर होने वाली गतिविधियों के संबंध में नियामक संस्थाओं के प्रति जवाबदेह रहना होगा।

आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ऑफकॉम को प्राप्त होने वाले आंकड़ों से सोशल मीडिया कंपनियों की वास्तविक कार्यप्रणाली के बारे में क्या जानकारी सामने आती है और क्या इसका परिणाम बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा में ठोस सुधार के रूप में दिखाई देता है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।