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अपराध के समय पीड़िता नाबालिग थी तो ट्रायल के दौरान बालिग होने पर भी लागू रहेगा POCSO Act, गुजरात हाईकोर्ट का अहम फैसला

अपराध के समय पीड़िता नाबालिग थी तो ट्रायल के दौरान बालिग होने पर भी लागू रहेगा POCSO Act, गुजरात हाईकोर्ट का अहम फैसला

प्रस्तावना

यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) नाबालिग पीड़ितों को कानूनी संरक्षण देने वाला एक महत्वपूर्ण कानून है। इस कानून का उद्देश्य केवल अपराधियों को सजा दिलाना ही नहीं, बल्कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान पीड़ित बच्चे को मानसिक तनाव, सामाजिक दबाव और किसी भी प्रकार के अनुचित व्यवहार से बचाना भी है। इसी उद्देश्य से कानून में पीड़ित बच्चे की गवाही दर्ज करने, आरोपी से सीधे सामना कराने और बंद कमरे में सुनवाई करने से संबंधित विशेष प्रावधान किए गए हैं।

इसी विषय पर गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। अदालत ने कहा है कि यदि कथित यौन अपराध के समय पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम थी, तो मुकदमे की सुनवाई शुरू होने तक उसके बालिग हो जाने से पॉक्सो अधिनियम के तहत मिलने वाली प्रक्रियात्मक सुरक्षा समाप्त नहीं हो जाती।

अर्थात, यदि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी और बाद में वह 18 वर्ष की हो गई, तब भी उसकी गवाही दर्ज करने के दौरान POCSO Act के संबंधित प्रावधानों का पालन करना आवश्यक होगा।

जस्टिस मूल चंद त्यागी की पीठ ने यह टिप्पणी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए की। हाईकोर्ट ने अहमदाबाद (ग्रामीण) की विशेष पॉक्सो अदालत के पहले के आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि पीड़िता की गवाही कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार बंद कमरे में दर्ज की जाए।

क्या था पूरा मामला?

गुजरात हाईकोर्ट के सामने एक ऐसा मामला आया, जिसमें कथित यौन अपराध के समय पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम थी। हालांकि, जब मामले में ट्रायल शुरू होने की स्थिति आई, तब तक पीड़िता बालिग हो चुकी थी।

मामले में FIR 15 मार्च 2026 को दर्ज की गई थी। प्राथमिकी में दर्ज तथ्यों के अनुसार, कथित अपराध के समय पीड़िता की उम्र लगभग 17 वर्ष और 11 महीने थी।

इस मामले में पुलिस ने पॉक्सो अधिनियम के साथ भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita), 2023 के तहत भी अपराध दर्ज किया था।

विवाद उस समय सामने आया, जब पीड़िता की गवाही दर्ज करने की प्रक्रिया और उसके लिए लागू कानूनी सुरक्षा को लेकर सवाल उठा।

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में यह तर्क दिया गया कि अब पीड़िता 18 वर्ष की हो चुकी है। इसलिए उसे बालिग गवाह के रूप में देखा जाना चाहिए और अभियोजन पक्ष की गवाह से प्रभावी ढंग से जिरह करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।

याचिकाकर्ता का कहना था कि जब पीड़िता वर्तमान में नाबालिग नहीं है, तो उसकी गवाही दर्ज करने में पॉक्सो अधिनियम के तहत निर्धारित विशेष प्रक्रिया लागू करने का आधार नहीं होना चाहिए।

दूसरी ओर, राज्य सरकार ने इस दलील का विरोध किया। राज्य की ओर से कहा गया कि कथित अपराध के समय पीड़िता की उम्र 17 वर्ष और 11 महीने थी। इसलिए घटना के समय वह कानून की नजर में बच्ची थी और मामले की सुनवाई में पॉक्सो अधिनियम के प्रावधानों का पालन किया जाना जरूरी है।

राज्य सरकार ने विशेष अदालत द्वारा पीड़िता की गवाही दर्ज करते समय कानून में निर्धारित सुरक्षा उपाय अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

गुजरात हाईकोर्ट के सामने क्या था मुख्य कानूनी सवाल?

इस मामले में हाईकोर्ट के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि पॉक्सो अधिनियम के तहत मिलने वाली प्रक्रियात्मक सुरक्षा निर्धारित करने के लिए पीड़िता की उम्र किस समय देखी जानी चाहिए?

क्या यह देखा जाएगा कि कथित अपराध के समय पीड़िता नाबालिग थी या यह कि मुकदमे की सुनवाई और गवाही दर्ज होने के समय उसकी उम्र 18 वर्ष से अधिक हो चुकी है?

इस प्रश्न का महत्व इसलिए भी है क्योंकि कई मामलों में पुलिस जांच, आरोपपत्र दाखिल करने और अदालत में ट्रायल शुरू होने में काफी समय लग जाता है।

कई बार अपराध के समय नाबालिग रही पीड़िता मुकदमे की सुनवाई शुरू होने तक बालिग हो जाती है। यदि केवल वर्तमान उम्र को आधार बनाया जाए तो ऐसे मामलों में पीड़िता को मिलने वाली विशेष प्रक्रियात्मक सुरक्षा को लेकर विवाद पैदा हो सकता है।

हाईकोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट किया कि केवल ट्रायल शुरू होने तक पीड़िता के बालिग हो जाने से पॉक्सो अधिनियम के तहत लागू होने वाली प्रक्रियात्मक सुरक्षा समाप्त नहीं हो जाती।

POCSO Act की धारा 33(2) क्या कहती है?

पॉक्सो अधिनियम की धारा 33 विशेष अदालत (Special Court) की शक्तियों और कार्यप्रणाली से संबंधित है।

इस धारा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्चों से जुड़े यौन अपराधों के मामलों की सुनवाई सामान्य आपराधिक मुकदमों की तरह असंवेदनशील तरीके से न हो।

धारा 33(2) के अनुसार, विशेष अदालत को यह सुनिश्चित करना होता है कि बच्चे को बार-बार गवाही देने के लिए अदालत में न बुलाया जाए।

इस प्रावधान का उद्देश्य बच्चे को बार-बार उसी घटना को याद करने और उसके बारे में बयान देने से होने वाले मानसिक तनाव से बचाना है।

यौन अपराधों के मामलों में पीड़ित बच्चे को कई बार घटना के बारे में बताना पड़ सकता है। पुलिस जांच, मेडिकल परीक्षण और अदालत की कार्यवाही के दौरान बार-बार सवालों का सामना करना उसके लिए मानसिक रूप से कठिन हो सकता है।

इसलिए कानून ने विशेष अदालत को यह जिम्मेदारी दी है कि गवाही की प्रक्रिया को यथासंभव संवेदनशील और व्यवस्थित बनाया जाए।

इसके अलावा धारा 33 के अन्य प्रावधान भी बच्चे के हितों की सुरक्षा करते हैं। उदाहरण के लिए, धारा 33(3) के तहत विशेष अदालत को यह सुनिश्चित करना होता है कि बच्चे से आक्रामक तरीके से सवाल न पूछे जाएं और उसके चरित्र की हत्या करने जैसी पूछताछ न हो।

इसका मतलब यह नहीं है कि आरोपी को जिरह का अधिकार नहीं मिलेगा, बल्कि जिरह का तरीका ऐसा होना चाहिए जिससे बच्चे की गरिमा और मानसिक सुरक्षा प्रभावित न हो।

POCSO Act की धारा 36: आरोपी के सामने सीधे पेश नहीं होगी पीड़िता

पॉक्सो अधिनियम की धारा 36 बच्चों की गवाही दर्ज करने के दौरान उनकी सुरक्षा से संबंधित है।

इस प्रावधान का उद्देश्य यह है कि गवाही देते समय बच्चे को आरोपी के सीधे सामने आने की स्थिति से बचाया जा सके।

कई बार यौन अपराध के आरोपी और पीड़ित के बीच पारिवारिक, सामाजिक या अन्य प्रकार का संबंध होता है। ऐसे मामलों में आरोपी को सामने देखकर बच्चा डर सकता है या मानसिक दबाव में आ सकता है।

इससे उसकी गवाही प्रभावित होने की आशंका रहती है।

धारा 36 के तहत विशेष अदालत ऐसी व्यवस्था कर सकती है, जिससे बच्चा आरोपी के सीधे संपर्क या आमने-सामने आने की स्थिति में आए बिना अपना बयान दर्ज करा सके।

हालांकि, कानून यह भी सुनिश्चित करता है कि आरोपी अपने अधिवक्ता के माध्यम से गवाही सुन सके और जिरह करने के अधिकार का उपयोग कर सके।

इसका उद्देश्य दोनों पक्षों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना है। एक तरफ पीड़ित बच्चे को मानसिक सुरक्षा मिलती है, तो दूसरी तरफ आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई और बचाव का अवसर भी मिलता है।

POCSO Act की धारा 37: बंद कमरे में होगी सुनवाई

इस मामले में पॉक्सो अधिनियम की धारा 37 भी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

धारा 37 के अनुसार, पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराधों का ट्रायल बंद कमरे में (In-camera Trial) किया जाना चाहिए।

इसका अर्थ है कि ऐसे मामलों की सुनवाई आम जनता और अनावश्यक लोगों की मौजूदगी में खुले न्यायालय में नहीं की जाती।

विशेष अदालत को यह सुनिश्चित करना होता है कि पीड़ित बच्चे की गरिमा, निजता और मानसिक स्थिति का ध्यान रखा जाए।

कानून के अनुसार, बंद कमरे में सुनवाई के दौरान बच्चे के माता-पिता या ऐसा व्यक्ति उपस्थित रह सकता है, जिस पर बच्चा भरोसा करता हो। जरूरत पड़ने पर अदालत किसी अन्य उपयुक्त व्यक्ति की उपस्थिति की अनुमति भी दे सकती है।

इस प्रावधान का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य पीड़ित बच्चे को ऐसा वातावरण उपलब्ध कराना है, जिसमें वह बिना अनावश्यक डर और सामाजिक दबाव के अपनी बात रख सके।

यौन अपराधों के मामलों में पीड़ित की पहचान और निजी जीवन से जुड़ी जानकारी का संरक्षण भी बेहद महत्वपूर्ण है।

इसलिए बंद कमरे में सुनवाई का प्रावधान केवल अदालत की कार्यवाही को सीमित करने के लिए नहीं, बल्कि पीड़ित की सुरक्षा और सम्मान बनाए रखने के लिए बनाया गया है।

ट्रायल के समय बालिग होने से खत्म नहीं होगी कानूनी सुरक्षा

गुजरात हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि कथित अपराध के समय पीड़िता की उम्र 17 वर्ष और 11 महीने थी। इस कारण वह घटना के समय पॉक्सो अधिनियम के तहत बच्ची की श्रेणी में आती थी।

बाद में उसकी उम्र 18 वर्ष से अधिक हो जाने का अर्थ यह नहीं है कि मामले की सुनवाई में कानून के विशेष प्रावधानों को नजरअंदाज किया जा सकता है।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि पीड़िता की गवाही दर्ज करने के संबंध में पॉक्सो अधिनियम की धारा 33(2), 36 और 37 का पालन किया जाना आवश्यक है।

इस प्रकार अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि मुकदमे की सुनवाई में देरी या पीड़िता के बालिग हो जाने को उसकी प्रक्रियात्मक सुरक्षा समाप्त करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनमें घटना के समय पीड़ित बच्चा नाबालिग था, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ने के दौरान उसकी उम्र 18 वर्ष से अधिक हो गई।

विशेष POCSO कोर्ट का आदेश हाईकोर्ट ने क्यों रद्द किया?

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अहमदाबाद (ग्रामीण) की विशेष पॉक्सो अदालत के पहले के आदेश पर विचार किया।

हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता के बालिग हो जाने मात्र के आधार पर पॉक्सो अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रियात्मक सुरक्षा से इनकार नहीं किया जा सकता।

इसलिए हाईकोर्ट ने विशेष अदालत के पहले के आदेश को रद्द कर दिया।

अदालत ने निर्देश दिया कि पीड़िता की गवाही पॉक्सो अधिनियम की धारा 33(2), 36 और 37 के अनुसार दर्ज की जाए।

इस निर्देश के साथ हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण कर दिया।

फैसले का आरोपी के जिरह करने के अधिकार पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

इस फैसले को समझते समय एक महत्वपूर्ण बात ध्यान में रखना जरूरी है। पॉक्सो अधिनियम के तहत पीड़ित बच्चे को विशेष सुरक्षा देने का मतलब यह नहीं है कि आरोपी को अपना बचाव करने या अभियोजन पक्ष के गवाह से सवाल पूछने का अधिकार नहीं रहेगा।

भारतीय संविधान के तहत निष्पक्ष सुनवाई का सिद्धांत आपराधिक न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

आरोपी को अपने बचाव का अवसर मिलना चाहिए और उसे अभियोजन पक्ष के गवाहों से कानून के अनुसार जिरह करने का अधिकार प्राप्त है।

लेकिन यह अधिकार ऐसे तरीके से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जिससे पीड़ित बच्चे को अनावश्यक मानसिक प्रताड़ना या अपमान का सामना करना पड़े।

पॉक्सो अधिनियम इसी संतुलन को बनाए रखने का प्रयास करता है।

धारा 36 के तहत आरोपी को सीधे पीड़ित के सामने लाए बिना भी जिरह की व्यवस्था की जा सकती है। इसी तरह धारा 33 के तहत अदालत को यह सुनिश्चित करना होता है कि बच्चे से पूछे जाने वाले सवाल उचित और संवेदनशील हों।

इसलिए बंद कमरे में गवाही दर्ज होना या आरोपी से सीधे सामना न होना, अपने आप में निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन नहीं है।

POCSO Act के मामलों में यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत में यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा के लिए पॉक्सो अधिनियम एक विशेष कानून है। इसका उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण से बचाना और अपराध होने की स्थिति में उन्हें न्यायिक प्रक्रिया के दौरान भी सुरक्षित रखना है।

कई बार पीड़ित बच्चे को न्याय मिलने में वर्षों लग जाते हैं। इस दौरान उसकी उम्र बढ़ जाती है, वह अपनी पढ़ाई पूरी कर लेता है और वयस्क जीवन में प्रवेश कर जाता है।

लेकिन इससे घटना के समय उसकी स्थिति नहीं बदल जाती।

यदि कोई व्यक्ति अपराध के समय 18 वर्ष से कम उम्र का था, तो केवल बाद में बालिग हो जाने से घटना के समय उसकी कानूनी स्थिति नहीं बदली जा सकती।

गुजरात हाईकोर्ट का यह फैसला इसी महत्वपूर्ण सिद्धांत को रेखांकित करता है।

इससे विशेष अदालतों को भी यह संदेश मिलता है कि पॉक्सो मामलों में गवाही दर्ज करते समय पीड़ित की उम्र और घटना के समय उसकी कानूनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए कानून के निर्धारित प्रावधानों का पालन किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

गुजरात हाईकोर्ट का यह फैसला पॉक्सो अधिनियम के तहत पीड़ित बच्चों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अपराध के समय पीड़िता नाबालिग थी तो ट्रायल शुरू होने तक उसके बालिग हो जाने से गवाही दर्ज करने की विशेष प्रक्रिया समाप्त नहीं होगी।

इस फैसले का मूल उद्देश्य पीड़ित को न्यायिक प्रक्रिया के दौरान अनावश्यक मानसिक दबाव और असुविधा से बचाना है।

साथ ही आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई और जिरह के अधिकार को भी कानून के अनुसार सुरक्षित रखा गया है।

कानून का उद्देश्य केवल अपराध की सजा तय करना नहीं, बल्कि न्याय की प्रक्रिया को भी ऐसा बनाना है, जिसमें पीड़ित की गरिमा, सुरक्षा और अधिकारों का सम्मान हो। गुजरात हाईकोर्ट का यह निर्णय इसी सिद्धांत को मजबूती प्रदान करता है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।