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ऑनलाइन खरीदारी में धोखा मिलने पर चुप न रहें, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 देता है कानूनी अधिकार; घर बैठे कर सकते हैं शिकायत

ऑनलाइन खरीदारी में धोखा मिलने पर चुप न रहें, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 देता है कानूनी अधिकार; घर बैठे कर सकते हैं शिकायत

        आज के समय में ऑनलाइन खरीदारी भारतीय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है। मोबाइल फोन से लेकर कपड़े, जूते, इलेक्ट्रॉनिक सामान, फर्नीचर और घरेलू जरूरत की लगभग हर वस्तु इंटरनेट के माध्यम से खरीदी जा रही है। ऑनलाइन शॉपिंग ने बाजार को हमारी उंगलियों तक पहुंचा दिया है, लेकिन इसके साथ ही उपभोक्ताओं के सामने कई नई समस्याएं भी खड़ी हुई हैं।

कभी ऑर्डर किया गया सामान खराब निकलता है, कभी कंपनी की ओर से गलत उत्पाद भेज दिया जाता है और कभी सामान की कीमत लेने के बाद भी उसकी डिलीवरी नहीं की जाती। सबसे बड़ी परेशानी तब होती है, जब ग्राहक शिकायत करने की कोशिश करता है, लेकिन कंपनी का कस्टमर केयर उसकी बात सुनने के बजाय उसे बार-बार एक ही जवाब देता रहता है।

ऐसी स्थिति में बहुत से लोग हार मानकर अपना नुकसान स्वीकार कर लेते हैं। उन्हें लगता है कि ऑनलाइन कंपनी के खिलाफ शिकायत करने से कोई फायदा नहीं होगा। लेकिन भारतीय कानून में उपभोक्ताओं को ऐसे मामलों में कई महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए हैं।

भारत में उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 लागू है। इस कानून ने पुराने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 का स्थान लिया। नए कानून में ऑनलाइन खरीदारी, ई-कॉमर्स कंपनियों, भ्रामक विज्ञापनों, खराब उत्पादों और अनुचित व्यापारिक गतिविधियों से संबंधित कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए गए हैं।

इसका उद्देश्य केवल ग्राहक को खराब सामान के बदले पैसा वापस दिलाना नहीं है, बल्कि कंपनियों को उनकी जिम्मेदारियों के प्रति जवाबदेह बनाना भी है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 क्यों है महत्वपूर्ण?

पहले के समय में उपभोक्ता मुख्य रूप से दुकानों और स्थानीय व्यापारियों से सामान खरीदते थे। यदि कोई उत्पाद खराब निकलता था तो ग्राहक सीधे दुकानदार के पास जाकर शिकायत कर सकता था। लेकिन ऑनलाइन कारोबार के विस्तार ने खरीदारी का पूरा तरीका बदल दिया है।

अब ग्राहक एक शहर में बैठकर दूसरे राज्य में स्थित विक्रेता से सामान खरीदता है। कई बार उत्पाद किसी तीसरे पक्ष के विक्रेता द्वारा बेचा जाता है, जबकि भुगतान और ऑर्डर की प्रक्रिया किसी बड़े ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से पूरी होती है।

ऐसी परिस्थितियों में उपभोक्ता के लिए यह तय करना भी मुश्किल हो जाता है कि शिकायत किसके खिलाफ की जाए।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 ने इन बदलती परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उपभोक्ताओं को व्यापक कानूनी सुरक्षा प्रदान की है। इसमें उपभोक्ता अधिकारों के साथ-साथ ई-कॉमर्स, उत्पाद दायित्व और भ्रामक विज्ञापनों से जुड़े प्रावधान भी शामिल किए गए हैं।

अब अपने जिले में ही दर्ज करा सकते हैं उपभोक्ता शिकायत

नए कानून की सबसे महत्वपूर्ण सुविधाओं में से एक यह है कि उपभोक्ता को शिकायत दर्ज कराने के लिए विक्रेता के शहर तक जाने की जरूरत नहीं है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 34 के तहत जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत उस जिले में भी दर्ज कराई जा सकती है, जहां शिकायतकर्ता रहता है या व्यक्तिगत रूप से काम करता है।

इससे पहले उपभोक्ताओं को कई बार अपने विवाद के समाधान के लिए दूसरे शहरों के चक्कर लगाने पड़ते थे। इससे समय और पैसे दोनों की बर्बादी होती थी।

उदाहरण के लिए, यदि उत्तर प्रदेश के आगरा में रहने वाला कोई व्यक्ति दिल्ली की कंपनी से ऑनलाइन मोबाइल खरीदता है और मोबाइल खराब निकलता है, तो उसे केवल इस कारण दिल्ली जाने की जरूरत नहीं है। वह कानून में निर्धारित अन्य शर्तों के अधीन अपने निवास स्थान के अधिकार क्षेत्र वाले उपभोक्ता आयोग में शिकायत कर सकता है।

यह सुविधा विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है, जो छोटी रकम के विवाद के कारण दूसरे शहरों में जाने का खर्च नहीं उठा सकते।

उपभोक्ता आयोग की तीन स्तरीय व्यवस्था

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत उपभोक्ताओं की शिकायतों के निवारण के लिए तीन स्तरों पर आयोगों की व्यवस्था की गई है।

इनमें जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग और राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग शामिल हैं।

प्रत्येक आयोग का अधिकार क्षेत्र सामान या सेवा के लिए चुकाई गई कीमत के आधार पर निर्धारित होता है।

1. जिला उपभोक्ता आयोग

जिला आयोग उन मामलों की सुनवाई करता है, जिनमें वस्तु या सेवा के लिए चुकाई गई रकम 50 लाख रुपये तक है।

2. राज्य उपभोक्ता आयोग

राज्य आयोग उन मामलों की सुनवाई करता है, जिनमें वस्तु या सेवा के लिए चुकाई गई रकम 50 लाख रुपये से अधिक और 2 करोड़ रुपये तक है।

3. राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग उन मामलों की सुनवाई करता है, जिनमें वस्तु या सेवा के लिए चुकाई गई रकम 2 करोड़ रुपये से अधिक है।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि आयोग का आर्थिक अधिकार क्षेत्र केवल उपभोक्ता द्वारा मांगे गए मुआवजे की रकम से निर्धारित नहीं होता, बल्कि वस्तु या सेवा के लिए चुकाए गए प्रतिफल के आधार पर निर्धारित होता है।

इस व्यवस्था को केंद्र सरकार ने उपभोक्ता संरक्षण (जिला आयोग, राज्य आयोग और राष्ट्रीय आयोग की अधिकारिता) नियम, 2021 के माध्यम से निर्धारित किया है।

केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण को मिले विशेष अधिकार

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण यानी Central Consumer Protection Authority (CCPA) की स्थापना की गई है।

इस प्राधिकरण का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करना, अनुचित व्यापारिक गतिविधियों को रोकना और भ्रामक विज्ञापनों पर कार्रवाई करना है।

इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह केवल किसी एक व्यक्ति की शिकायत पर निर्भर नहीं रहता। उपभोक्ताओं के एक वर्ग के अधिकारों का उल्लंघन होने पर यह अपने स्तर पर भी कार्रवाई शुरू कर सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी कंपनी द्वारा पूरे देश में एक ऐसा विज्ञापन चलाया जा रहा है, जिसमें उत्पाद के बारे में गलत जानकारी दी जा रही है, तो प्राधिकरण मामले की जांच कर सकता है।

इसी प्रकार यदि किसी उत्पाद के कारण बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं को नुकसान पहुंच रहा है, तो प्राधिकरण आवश्यक जांच के बाद कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकता है।

अधिनियम की धारा 20 के तहत सीसीपीए को खतरनाक या असुरक्षित उत्पादों को वापस मंगाने, उनकी बिक्री रोकने और खरीदारों को कीमत वापस करने का निर्देश देने जैसे अधिकार प्राप्त हैं।

वहीं धारा 21 के तहत भ्रामक विज्ञापनों के संबंध में कार्रवाई और निर्धारित परिस्थितियों में जुर्माना लगाने का प्रावधान है।

हालांकि, यह समझना जरूरी है कि सीसीपीए मुख्य रूप से उपभोक्ताओं के सामूहिक हितों से जुड़े मामलों पर काम करता है। किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत शिकायत के समाधान के लिए राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन और संबंधित उपभोक्ता आयोग का रास्ता भी उपलब्ध है।

खराब उत्पाद मिलने पर निर्माता भी हो सकता है जिम्मेदार

नए कानून की एक महत्वपूर्ण विशेषता Product Liability यानी उत्पाद दायित्व का प्रावधान है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के अध्याय 6 में धारा 82 से 87 तक उत्पाद दायित्व से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं।

इसका मतलब है कि यदि किसी दोषपूर्ण उत्पाद के कारण उपभोक्ता को नुकसान होता है, तो परिस्थितियों के अनुसार निर्माता, उत्पाद विक्रेता या सेवा प्रदाता को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण में निर्माण संबंधी खराबी है और उसके कारण उपभोक्ता को शारीरिक या अन्य कानूनी रूप से मान्य नुकसान होता है, तो उत्पाद दायित्व के तहत मुआवजे का दावा किया जा सकता है।

धारा 84 में निर्माता की जिम्मेदारी से संबंधित प्रावधान हैं। इसमें निर्माण संबंधी दोष, डिजाइन की खामी, निर्धारित विनिर्देशों से अंतर, स्पष्ट वारंटी का पालन नहीं करना और पर्याप्त निर्देश या चेतावनी उपलब्ध न कराने जैसी परिस्थितियां शामिल हैं।

हालांकि, केवल सामान पसंद नहीं आने या मामूली खराबी के कारण हर मामले में उत्पाद दायित्व के तहत मुआवजा नहीं मिलता। इसके लिए कानून में निर्धारित दोष और नुकसान के बीच आवश्यक संबंध साबित करना होता है।

ऑनलाइन कंपनियों की भी हैं कानूनी जिम्मेदारियां

आज बहुत से लोग Amazon, Flipkart और अन्य ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से सामान खरीदते हैं। आमतौर पर ग्राहक को लगता है कि यदि सामान खराब आया है तो केवल विक्रेता ही जिम्मेदार होगा।

लेकिन ई-कॉमर्स कारोबार से संबंधित नियमों में प्लेटफॉर्म और विक्रेताओं की अलग-अलग जिम्मेदारियां निर्धारित की गई हैं।

उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम, 2020 के तहत ई-कॉमर्स संस्थाओं को अपने प्लेटफॉर्म पर आवश्यक जानकारी उपलब्ध करानी होती है।

इसमें विक्रेता की पहचान, शिकायत निवारण अधिकारी का विवरण, रिफंड, रिटर्न, एक्सचेंज, वारंटी, डिलीवरी और भुगतान से संबंधित जानकारी शामिल है।

ई-कॉमर्स कंपनियों को उपभोक्ताओं की शिकायतों के समाधान के लिए शिकायत निवारण व्यवस्था भी उपलब्ध करानी होती है।

नियमों के अनुसार शिकायत मिलने पर सामान्यतः 48 घंटे के भीतर उसकी प्राप्ति स्वीकार करनी होती है और एक महीने के भीतर उसका निवारण करने का प्रयास करना होता है।

इसका अर्थ है कि कोई कंपनी केवल यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती कि ग्राहक को ऐप पर शिकायत दर्ज कराने के अलावा कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध नहीं है।

ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराने का भी है विकल्प

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से शिकायत दाखिल करने की सुविधा भी दी गई है।

अब उपभोक्ता को हर मामले में शुरुआत से ही आयोग के कार्यालय में जाकर शिकायत दर्ज कराने की आवश्यकता नहीं है।

वर्तमान में उपभोक्ता आयोगों में ऑनलाइन शिकायत दाखिल करने के लिए e-Jagriti पोर्टल उपलब्ध है।

इसके माध्यम से उपभोक्ता संबंधित आयोग के समक्ष अपनी शिकायत प्रस्तुत कर सकते हैं।

शिकायत दर्ज करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज अपने पास रखना उपयोगी होता है।

इनमें शामिल हैं:

  1. सामान खरीदने का बिल या इनवॉइस।
  2. ऑनलाइन भुगतान की रसीद।
  3. ऑर्डर नंबर और डिलीवरी की जानकारी।
  4. खराब उत्पाद की तस्वीरें या वीडियो।
  5. कंपनी के साथ हुई ईमेल और चैट की बातचीत।
  6. विक्रेता या कंपनी को भेजी गई शिकायत की प्रति।
  7. मांगे गए रिफंड या मुआवजे का विवरण।

ये दस्तावेज शिकायत में लगाए गए आरोपों को प्रमाणित करने में मदद करते हैं।

राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन पर भी कर सकते हैं शिकायत

यदि किसी कंपनी की ओर से शिकायत का समाधान नहीं किया जा रहा है, तो उपभोक्ता राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (National Consumer Helpline) की सहायता ले सकते हैं।

यह उपभोक्ता मामलों के विभाग की ओर से संचालित व्यवस्था है।

उपभोक्ता हेल्पलाइन का टोल फ्री नंबर 1915 है। इसके अतिरिक्त ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से भी शिकायत दर्ज की जा सकती है।

यहां शिकायत दर्ज कराने के बाद संबंधित कंपनी या सेवा प्रदाता के समक्ष मामले को समाधान के लिए भेजा जा सकता है।

हालांकि, राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराना और उपभोक्ता आयोग में औपचारिक शिकायत दाखिल करना दोनों अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। यदि हेल्पलाइन के माध्यम से समाधान नहीं मिलता है, तो उपभोक्ता कानून के अनुसार संबंधित आयोग का दरवाजा खटखटा सकता है।

उपभोक्ता को मिल सकते हैं रिफंड और मुआवजे जैसे राहत

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत आयोग को कई प्रकार की राहत देने का अधिकार है।

यदि शिकायत में उपभोक्ता का पक्ष सही पाया जाता है, तो आयोग परिस्थितियों के अनुसार निम्नलिखित आदेश दे सकता है:

  • दोषपूर्ण वस्तु को ठीक कराने का आदेश।
  • खराब उत्पाद को बदलने का निर्देश।
  • उत्पाद की कीमत वापस करने का आदेश।
  • सेवा में कमी को दूर करने का निर्देश।
  • उपभोक्ता को हुए नुकसान के लिए मुआवजा।
  • अनुचित व्यापारिक गतिविधि को बंद करने का आदेश।
  • शिकायत के खर्च की भरपाई का आदेश।

इसका मतलब है कि उपभोक्ता केवल अपना पैसा वापस मांगने तक सीमित नहीं है। यदि मामले में पर्याप्त आधार मौजूद हैं, तो वह अन्य उचित राहत और मुआवजे की मांग भी कर सकता है।

शिकायत दर्ज करने की समय सीमा का रखें ध्यान

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 69 के अनुसार सामान्यतः शिकायत उस तारीख से दो वर्ष के भीतर दर्ज की जानी चाहिए, जिस दिन से शिकायत का कारण उत्पन्न हुआ।

यदि कोई उपभोक्ता दो वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद शिकायत करता है, तो आयोग पर्याप्त कारण से संतुष्ट होने पर देरी को माफ कर सकता है।

इसलिए उपभोक्ताओं को शिकायत दर्ज कराने में अनावश्यक देरी नहीं करनी चाहिए।

साथ ही, सामान खरीदने के बाद बिल, भुगतान की रसीद, डिलीवरी रिकॉर्ड और कंपनी के साथ हुई बातचीत को सुरक्षित रखना चाहिए। भविष्य में यही दस्तावेज कानूनी कार्रवाई के दौरान महत्वपूर्ण सबूत बन सकते हैं।

कानून मौजूद है, लेकिन जागरूकता की कमी सबसे बड़ी समस्या

भारत में उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी व्यवस्था मौजूद है, लेकिन बहुत से लोग अभी भी इसके बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं रखते।

ऑनलाइन खरीदारी में सामान खराब मिलने पर कई ग्राहक कंपनी के कस्टमर केयर से बार-बार संपर्क करते हैं। जब वहां से समाधान नहीं मिलता तो वे शिकायत करना छोड़ देते हैं।

उन्हें यह जानकारी नहीं होती कि उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराकर रिफंड, मुआवजा और अन्य कानूनी राहत प्राप्त करने का रास्ता भी खुला है।

यह भी जरूरी है कि उपभोक्ता अपनी शिकायत को मजबूत बनाने के लिए सभी दस्तावेज और सबूत सुरक्षित रखें। केवल सोशल मीडिया पर नाराजगी जताने से समस्या का कानूनी समाधान नहीं निकलता।

कंपनियों के ग्राहक सेवा केंद्र और चैटबॉट उपभोक्ता की समस्या सुनने का माध्यम हो सकते हैं, लेकिन वे कानून के तहत उपलब्ध अधिकारों का विकल्प नहीं हैं।

निष्कर्ष

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 ने भारत में खरीदारी करने वाले आम नागरिक को पहले की तुलना में अधिक व्यापक कानूनी सुरक्षा प्रदान की है। ऑनलाइन खरीदारी हो या किसी दुकान से सामान खरीदना, ग्राहक को गुणवत्तापूर्ण वस्तु और उचित सेवा प्राप्त करने का अधिकार है।

यदि कोई कंपनी खराब सामान देकर शिकायत को नजरअंदाज करती है, रिफंड देने से इनकार करती है या अनुचित व्यापारिक गतिविधियों में शामिल होती है, तो उपभोक्ता के पास कानूनी कार्रवाई का विकल्प मौजूद है।

इसलिए अगली बार ऑनलाइन खरीदा गया सामान खराब निकले या कंपनी शिकायत का समाधान करने से इनकार करे, तो चुपचाप नुकसान सहने के बजाय अपने कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल करें।

आखिरकार, बाजार में ग्राहक केवल सामान खरीदने वाला व्यक्ति नहीं है, बल्कि उसके अधिकारों की रक्षा करना भी कानून की जिम्मेदारी है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।