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ट्रेन से गिरकर यात्री की मौत पर टिकट नहीं मिलने से मुआवजा नहीं रोका जा सकता, झारखंड हाईकोर्ट ने रेलवे को 8 लाख रुपये देने का दिया आदेश

ट्रेन से गिरकर यात्री की मौत पर टिकट नहीं मिलने से मुआवजा नहीं रोका जा सकता, झारखंड हाईकोर्ट ने रेलवे को 8 लाख रुपये देने का दिया आदेश

         रेलवे में यात्रा के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं में मृतक के परिवार को मुआवजा पाने के लिए कई बार लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है। कई मामलों में रेलवे टिकट नहीं मिलने या यात्रा से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने के कारण मृतक के परिजनों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। लेकिन क्या किसी यात्री की दुर्घटना में मौत हो जाने के बाद केवल इसलिए उसके परिवार को मुआवजे से वंचित किया जा सकता है, क्योंकि दुर्घटनास्थल या शव के पास से रेलवे टिकट बरामद नहीं हुआ?

झारखंड हाईकोर्ट ने इस सवाल पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ट्रेन से गिरकर किसी यात्री की मौत होने के मामले में केवल टिकट बरामद नहीं होने को मुआवजा खारिज करने का निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता। मामले के अन्य साक्ष्यों और परिस्थितियों का भी निष्पक्ष मूल्यांकन करना जरूरी है।

हाईकोर्ट ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल, रांची के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें मृतक यात्री के परिजनों की मुआवजा याचिका खारिज कर दी गई थी। अदालत ने रेलवे को मृतक के आश्रितों को 8 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही मुआवजे की राशि पर आवेदन दाखिल करने की तारीख से भुगतान तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का भी आदेश दिया गया है।

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें अदालत ने स्पष्ट किया कि मुआवजे से जुड़े मामलों में केवल तकनीकी कमियों के आधार पर पीड़ित परिवार को न्याय से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

1. क्या है पूरा मामला, कैसे हुई थी यात्री की मौत?

यह मामला झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के चाईबासा क्षेत्र के निवासी बनमाली गोप की मौत से संबंधित है।

परिजनों के अनुसार, 1 सितंबर 2017 को बनमाली गोप झींकपानी रेलवे स्टेशन से केंडपोसी जाने के लिए टाटा-बड़बिल पैसेंजर ट्रेन में सवार हुए थे। उनके भाई हरीश गोप उन्हें स्टेशन तक छोड़ने आए थे। बताया गया कि उन्होंने बनमाली गोप की यात्रा के लिए रेलवे का विधिवत टिकट भी खरीदा था।

ट्रेन में उस समय काफी भीड़ थी। यात्रियों की अधिक संख्या होने के कारण बनमाली गोप को डिब्बे के अंदर खड़े होकर यात्रा करनी पड़ रही थी।

जब ट्रेन केंडपोसी रेलवे स्टेशन के पास पहुंची तो उतरने वाले यात्रियों के बीच काफी भीड़ और धक्का-मुक्की होने लगी। इसी दौरान ट्रेन को अचानक तेज झटका लगा। झटके के कारण बनमाली गोप अपना संतुलन खो बैठे और चलती ट्रेन से नीचे गिर गए।

इस दुर्घटना में उन्हें गंभीर चोटें आईं और उनकी मृत्यु हो गई।

घटना के बाद परिवार के सामने एक तरफ अपने सदस्य को खोने का दुख था, वहीं दूसरी तरफ परिवार के भविष्य और आर्थिक सुरक्षा का सवाल भी खड़ा हो गया। मृतक की पत्नी बैजंती गोप, मां जेमा गोदिन और दो नाबालिग बच्चे उनके आश्रित थे।

परिवार ने रेलवे से मुआवजे की मांग की, लेकिन टिकट बरामद नहीं होने के कारण मामला कानूनी विवाद में बदल गया।

2. शव के पास रेलवे टिकट नहीं मिलने पर ट्रिब्यूनल ने क्यों खारिज किया दावा?

दुर्घटना के बाद जब बनमाली गोप के शव की तलाशी ली गई तो उनके पास से रेलवे टिकट बरामद नहीं हुआ।

रेलवे दुर्घटना मुआवजे के मामलों में यात्री की वास्तविक यात्रा और दुर्घटना की परिस्थितियां महत्वपूर्ण होती हैं। रेलवे अधिनियम के अंतर्गत मुआवजा पाने के लिए यह साबित करना आवश्यक होता है कि मृतक संबंधित घटना के समय वैध रूप से ट्रेन में यात्रा कर रहा था और उसकी मृत्यु कानून के दायरे में आने वाली घटना के कारण हुई।

इसी आधार पर रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल, रांची ने मामले की सुनवाई की।

ट्रिब्यूनल ने 12 सितंबर 2023 को अपना निर्णय सुनाते हुए मृतक को वैध टिकट के साथ यात्रा करने वाला यात्री मानने से इनकार कर दिया। टिकट बरामद नहीं होने की बात को महत्वपूर्ण मानते हुए मृतक के परिजनों की मुआवजा याचिका खारिज कर दी गई।

इस फैसले के बाद मृतक की पत्नी, मां और बच्चों के सामने आर्थिक सहायता पाने का रास्ता लगभग बंद हो गया था।

हालांकि, परिवार ने ट्रिब्यूनल के इस निर्णय को अंतिम नहीं माना और न्याय के लिए झारखंड हाईकोर्ट में अपील दाखिल कर दी।

3. परिजनों ने हाईकोर्ट में क्या दलीलें दीं?

रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के आदेश के खिलाफ मृतक के आश्रितों ने झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

परिजनों की ओर से मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह पक्ष रखा गया कि बनमाली गोप दुर्घटना के समय टाटा-बड़बिल पैसेंजर ट्रेन में यात्रा कर रहे थे।

उनके भाई द्वारा स्टेशन पर टिकट खरीदे जाने और उन्हें ट्रेन में बैठाकर विदा करने की बात भी मामले में महत्वपूर्ण थी।

परिजनों का कहना था कि केवल इसलिए यात्रा से इनकार नहीं किया जा सकता कि दुर्घटना के बाद शव के पास से टिकट नहीं मिला। दुर्घटना के दौरान टिकट खो जाना, गिर जाना या कहीं अन्य स्थान पर छूट जाना संभव है।

इसके अतिरिक्त, दुर्घटना के समय ट्रेन में भीड़ और धक्का-मुक्की की स्थिति भी सामने रखी गई।

परिवार का तर्क था कि ट्रिब्यूनल को सभी परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को एक साथ देखकर निर्णय करना चाहिए था। केवल एक तकनीकी कमी के आधार पर मुआवजे का दावा खारिज करना उचित नहीं था।

4. झारखंड हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश को क्यों गलत माना?

इस मामले की सुनवाई झारखंड हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने की।

अदालत ने मामले के तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और ट्रिब्यूनल के निर्णय का परीक्षण किया।

हाईकोर्ट ने पाया कि रेलवे मृतक की मृत्यु को मुआवजे के दायरे से बाहर रखने वाली किसी कानूनी परिस्थिति को साबित करने में सफल नहीं रहा।

अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि रेलवे की ओर से आवश्यक डीआरएम रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई थी।

रेलवे दुर्घटना से संबंधित मामलों में दुर्घटना की परिस्थितियों की जांच और उससे संबंधित दस्तावेज महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसी जांच रिपोर्ट से यह समझने में सहायता मिलती है कि दुर्घटना कैसे हुई और क्या घटना रेलवे अधिनियम के अंतर्गत मुआवजे योग्य है।

हाईकोर्ट ने माना कि ट्रिब्यूनल ने उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों का समुचित मूल्यांकन किए बिना अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण अपनाया।

अदालत के अनुसार, किसी दुर्घटना में यात्री की मृत्यु होने के बाद केवल टिकट नहीं मिलने या गवाही में छोटी-मोटी कमियों के आधार पर परिवार को न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।

यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने टिकट को पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं माना, बल्कि यह स्पष्ट किया कि टिकट का न मिलना अपने आप में ऐसा निर्णायक प्रमाण नहीं है, जिससे मुआवजे का दावा समाप्त कर दिया जाए।

5. रेलवे अधिनियम की धारा 124-A क्या कहती है?

इस मामले में रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 124-A विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

इस धारा में ट्रेन में यात्रा के दौरान होने वाली कुछ दुर्घटनाओं और अनहोनी घटनाओं (Untoward Incidents) के लिए रेलवे की मुआवजा संबंधी जिम्मेदारी निर्धारित की गई है।

इसके अंतर्गत यदि किसी यात्री की मृत्यु या उसे शारीरिक चोट ऐसी अनहोनी घटना के कारण होती है, जो कानून के दायरे में आती है, तो रेलवे पर निर्धारित मुआवजा देने की जिम्मेदारी हो सकती है।

इस प्रावधान की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें रेलवे की लापरवाही या गलती साबित करना हर मामले में अनिवार्य नहीं है।

अर्थात यदि कोई यात्री ऐसी घटना का शिकार होता है, जो धारा 124-A के अंतर्गत आती है, तो केवल यह कहकर मुआवजे से इनकार नहीं किया जा सकता कि रेलवे कर्मचारी की कोई गलती साबित नहीं हुई।

हालांकि, इस धारा में कुछ अपवाद भी दिए गए हैं। यदि दुर्घटना निर्धारित कानूनी अपवादों के अंतर्गत आती है, तो रेलवे मुआवजे की जिम्मेदारी से मुक्त हो सकता है।

इन अपवादों में शामिल हैं:

  1. यात्री द्वारा आत्महत्या या आत्महत्या का प्रयास।
  2. यात्री द्वारा स्वयं को पहुंचाई गई चोट।
  3. यात्री का अपना आपराधिक कृत्य।
  4. यात्री का नशे या पागलपन की स्थिति में होना, जैसा कि कानून में निर्धारित है।
  5. प्राकृतिक कारणों या बीमारी के कारण मृत्यु अथवा चोट, जिसके लिए रेलवे जिम्मेदार नहीं है।

इसलिए प्रत्येक रेलवे दुर्घटना के मामले में घटना की वास्तविक परिस्थितियों और कानूनी प्रावधानों की जांच आवश्यक होती है।

वर्तमान मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि रेलवे मृतक की मृत्यु को मुआवजे से बाहर रखने वाली कानूनी स्थिति साबित नहीं कर सका।

6. ट्रेन से गिरना कब माना जाता है अनहोनी घटना?

रेलवे अधिनियम की धारा 123(c) में अनहोनी घटनाओं (Untoward Incidents) की परिभाषा दी गई है।

इसमें कुछ परिस्थितियों में ट्रेन से किसी यात्री का दुर्घटनावश गिरना भी शामिल है।

उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति वैध रूप से ट्रेन में यात्रा कर रहा हो और यात्रा के दौरान दुर्घटनावश ट्रेन से नीचे गिर जाए, जिससे उसे गंभीर चोट आए या उसकी मृत्यु हो जाए, तो संबंधित परिस्थितियों में यह धारा 124-A के अंतर्गत मुआवजे योग्य घटना हो सकती है।

लेकिन प्रत्येक स्थिति में मुआवजा स्वतः नहीं मिलता। मृतक का यात्री होना, घटना का स्वरूप और कानून में दिए गए अपवादों की जांच आवश्यक है।

इसीलिए रेलवे दुर्घटना से जुड़े मामलों में प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, स्टेशन से संबंधित रिकॉर्ड, टिकट खरीदने के संबंध में उपलब्ध साक्ष्य, पुलिस रिपोर्ट और रेलवे की जांच रिपोर्ट महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

इस मामले में हाईकोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों को समग्र रूप से देखने पर ट्रिब्यूनल के निर्णय को उचित नहीं पाया।

7. क्या रेलवे टिकट नहीं होने पर भी मुआवजा मिल सकता है?

इस फैसले से सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवाल यही सामने आता है कि यदि किसी यात्री की ट्रेन दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है और उसके पास से टिकट नहीं मिलता, तो क्या उसके परिवार को मुआवजा मिल सकता है?

इसका जवाब परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करता है।

टिकट यात्रा का महत्वपूर्ण प्रमाण है, लेकिन हर दुर्घटना में टिकट का सुरक्षित मिलना जरूरी नहीं है।

उदाहरण के लिए:

  • दुर्घटना के दौरान टिकट यात्री के हाथ से गिर सकता है।
  • भीड़ या धक्का-मुक्की में टिकट खो सकता है।
  • यात्री के सामान के साथ टिकट भी गायब हो सकता है।
  • दुर्घटना के बाद शव की तलाशी में टिकट नहीं मिलना संभव है।

ऐसी परिस्थितियों में अन्य साक्ष्यों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

परिवार के सदस्यों की गवाही, टिकट खरीदने वाले व्यक्ति का बयान, स्टेशन से संबंधित रिकॉर्ड, दुर्घटना की सूचना और अन्य उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर भी यात्रा से संबंधित तथ्यों का मूल्यांकन किया जा सकता है।

हालांकि, केवल परिजनों का दावा करना पर्याप्त नहीं होता। मामले के सभी साक्ष्यों की विश्वसनीयता और कानूनी प्रासंगिकता देखी जाती है।

झारखंड हाईकोर्ट के इस फैसले का महत्वपूर्ण संदेश यही है कि टिकट का नहीं मिलना अपने आप में मुआवजे के दावे को खारिज करने का अंतिम आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।

8. मृतक के परिवार को 8 लाख रुपये और 6 प्रतिशत ब्याज देने का आदेश

मामले की सुनवाई पूरी करने के बाद झारखंड हाईकोर्ट ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल, रांची के 12 सितंबर 2023 के आदेश को निरस्त कर दिया।

अदालत ने मृतक बनमाली गोप के आश्रितों की अपील स्वीकार करते हुए रेलवे को 8 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया।

इसके साथ ही अदालत ने मुआवजे की राशि पर आवेदन दाखिल करने की तारीख से लेकर वास्तविक भुगतान की तारीख तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश भी दिया।

इस फैसले से मृतक की पत्नी बैजंती गोप, मां जेमा गोदिन और दो नाबालिग बच्चों को राहत मिली है।

परिवार को दुर्घटना के कई वर्षों बाद कानूनी राहत मिली। यह मामला इस बात को भी सामने लाता है कि रेलवे दुर्घटना में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने के बाद उसके आश्रितों को मुआवजा प्राप्त करने के लिए कितनी लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।

9. रेलवे दुर्घटना में मृत्यु होने पर आश्रितों को क्या करना चाहिए?

रेलवे दुर्घटना में किसी यात्री की मृत्यु या गंभीर चोट लगने पर परिजनों को जल्द से जल्द आवश्यक कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई करनी चाहिए।

इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना जरूरी है:

पहला – दुर्घटना की सूचना दर्ज कराएं: संबंधित रेलवे पुलिस, जीआरपी या स्थानीय पुलिस को घटना की जानकारी दें और आवश्यक रिपोर्ट दर्ज कराएं।

दूसरा – उपलब्ध दस्तावेज सुरक्षित रखें: रेलवे टिकट, आरक्षण पर्ची, यात्रा से संबंधित मोबाइल संदेश और अन्य दस्तावेज सुरक्षित रखें।

तीसरा – प्रत्यक्षदर्शियों की जानकारी जुटाएं: यदि दुर्घटना के समय किसी व्यक्ति ने घटना देखी है तो उसका नाम, पता और संपर्क विवरण सुरक्षित रखें।

चौथा – पोस्टमार्टम और पुलिस रिपोर्ट प्राप्त करें: मृत्यु के कारण और दुर्घटना की परिस्थितियों को साबित करने में ये दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

पांचवां – रेलवे जांच रिपोर्ट की जानकारी लें: दुर्घटना से संबंधित रेलवे की जांच और डीआरएम रिपोर्ट जैसे दस्तावेज मामले में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

छठा – रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल में दावा दाखिल करें: रेलवे दुर्घटना से संबंधित मुआवजे के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल में आवेदन किया जा सकता है।

दावा दाखिल करने से पहले संबंधित कानूनी समय-सीमा और आवश्यक दस्तावेजों की जानकारी प्राप्त करना भी जरूरी है।

निष्कर्ष

झारखंड हाईकोर्ट का यह फैसला रेलवे दुर्घटना में मृतक के आश्रितों के अधिकारों के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया में केवल तकनीकी कमियों को आधार बनाकर किसी पीड़ित परिवार के वास्तविक दावे की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।

रेलवे टिकट यात्रा का महत्वपूर्ण प्रमाण जरूर है, लेकिन दुर्घटना के बाद उसका नहीं मिलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि व्यक्ति ट्रेन में यात्री के रूप में यात्रा नहीं कर रहा था।

रेलवे अधिनियम की धारा 124-A के अंतर्गत मुआवजे के मामले में दुर्घटना की वास्तविक परिस्थितियों, उपलब्ध साक्ष्यों और कानून में निर्धारित अपवादों का समुचित परीक्षण आवश्यक है।

इस फैसले से एक महत्वपूर्ण कानूनी संदेश सामने आता है कि दुर्घटना में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसके परिवार को न्याय दिलाने के लिए मामले के सभी तथ्यों पर विचार किया जाना चाहिए। केवल एक दस्तावेज की अनुपलब्धता के आधार पर मुआवजे का दावा खारिज करना उचित नहीं होगा।

इस प्रकार झारखंड हाईकोर्ट ने मृतक के आश्रितों को 8 लाख रुपये और 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश देकर उन्हें राहत प्रदान की है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।