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पासपोर्ट पुलिस वेरिफिकेशन में अब अधूरी जानकारी नहीं चलेगी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के DGP को दिया निर्देश

पासपोर्ट पुलिस वेरिफिकेशन में अब अधूरी जानकारी नहीं चलेगी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के DGP को दिया निर्देश

        पासपोर्ट बनवाने या दोबारा जारी कराने के लिए पुलिस सत्यापन रिपोर्ट में केवल मुकदमे का नंबर या चार्जशीट दाखिल होने की जानकारी देना पर्याप्त नहीं होगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया है कि पासपोर्ट आवेदकों की पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट में आपराधिक मामले की वर्तमान स्थिति का स्पष्ट उल्लेख किया जाए। रिपोर्ट में यह भी बताया जाना चाहिए कि संबंधित मामले में अदालत के समक्ष आरोपपत्र यानी चार्जशीट दाखिल की गई है या नहीं। यदि चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, तो अदालत ने उसका संज्ञान लिया है या नहीं, इसकी जानकारी भी दी जानी चाहिए।

न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने सुरेश यादव की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारियों को सत्यापन रिपोर्ट तैयार करते समय मामले की वास्तविक कानूनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। केवल केस क्राइम नंबर दर्ज कर देना या किसी व्यक्ति के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होने की जानकारी दे देना पर्याप्त नहीं है।

हाईकोर्ट ने प्रदेश के DGP को पुलिस सत्यापन फॉर्म में आवश्यक विवरण शामिल कराने और आदेश के अनुपालन के संबंध में रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। इस मामले को आगे की सुनवाई के लिए 4 नवंबर को सूचीबद्ध किया गया।

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक शिकायत या मुकदमा दर्ज होने मात्र से उसकी कानूनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं होती। जांच के दौरान पुलिस क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर सकती है, किसी सह-आरोपी के खिलाफ आरोपपत्र पेश किया जा सकता है या मामला अदालत में लंबित रह सकता है। ऐसे में पुलिस सत्यापन रिपोर्ट में अधूरी जानकारी होने से पासपोर्ट आवेदन के निस्तारण में अनावश्यक देरी हो सकती है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला सुरेश यादव के पासपोर्ट को दोबारा जारी करने से जुड़ा है। याची ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर अपना पासपोर्ट री-इश्यू कराने की मांग की थी। उनका कहना था कि उनके खिलाफ दर्ज एक आपराधिक मामले से संबंधित पुलिस सत्यापन रिपोर्ट के कारण उनका पासपोर्ट आवेदन लंबित पड़ा हुआ है।

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, उनका आवेदन 12 मई से लंबित था। पुलिस सत्यापन के दौरान आपराधिक मामले का उल्लेख सामने आने के बाद आवेदन पर निर्णय नहीं हो सका था।

ऐसी परिस्थितियों में आवेदक के सामने यह समस्या पैदा हो सकती है कि पुलिस रिपोर्ट में किसी मुकदमे का जिक्र होने के कारण पासपोर्ट कार्यालय आगे की कार्रवाई रोक दे, जबकि संबंधित मामले की जांच में आवेदक के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल ही न हुआ हो या पुलिस ने उसके संबंध में क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी हो।

सुरेश यादव के मामले में भी आपराधिक कार्यवाही की वास्तविक स्थिति महत्वपूर्ण बन गई। अदालत के समक्ष सरकारी वकील ने बताया कि जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने याची के संबंध में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी है।

सरकारी वकील ने यह भी बताया कि इसी मामले में सह-आरोपी राम ध्यान के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी। इसके साथ ही अदालत को बताया गया कि याची का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने पासपोर्ट आवेदन पर निर्णय लेने के लिए संबंधित प्राधिकरण को आवश्यक निर्देश दिए।

पुलिस ने याची के खिलाफ दाखिल की थी क्लोजर रिपोर्ट

इस मामले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकारी वकील के अनुसार, पुलिस ने जांच के बाद सुरेश यादव के संबंध में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी।

क्लोजर रिपोर्ट वह रिपोर्ट होती है, जिसे जांच पूरी करने के बाद पुलिस तब प्रस्तुत करती है, जब जांच के निष्कर्षों के आधार पर वह मामले को आगे चलाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाती या अन्य कानूनी कारणों से कार्यवाही समाप्त करने का प्रस्ताव रखती है।

हालांकि, क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होने और उसके स्वीकार किए जाने में अंतर है। पुलिस द्वारा क्लोजर रिपोर्ट पेश कर देने से मामला हर स्थिति में अपने आप समाप्त नहीं हो जाता। संबंधित मजिस्ट्रेट उस रिपोर्ट पर विचार कर सकता है और कानून के अनुसार उचित आदेश पारित कर सकता है।

यही कारण है कि पुलिस सत्यापन रिपोर्ट में केवल यह लिख देना पर्याप्त नहीं है कि किसी मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की गई है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि मजिस्ट्रेट ने उस रिपोर्ट पर कोई आदेश पारित किया है या नहीं और यदि आदेश दिया गया है, तो उसकी प्रकृति क्या है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस सत्यापन रिपोर्ट में इसी प्रकार की स्पष्टता की आवश्यकता पर जोर दिया।

यदि रिपोर्ट में केवल पुराने मुकदमे का उल्लेख किया जाता है, लेकिन जांच के निष्कर्ष और अदालत में हुई कार्यवाही की जानकारी नहीं दी जाती, तो पासपोर्ट कार्यालय के सामने मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाती।

इससे आवेदक के आवेदन पर निर्णय लेने में कठिनाई हो सकती है। इसलिए रिपोर्ट में आपराधिक कार्यवाही के वर्तमान चरण का उल्लेख करना जरूरी है।

सह-आरोपी के खिलाफ चार्जशीट, लेकिन याची के संबंध में अलग स्थिति

सुरेश यादव के मामले में एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि सरकारी वकील के अनुसार, सह-आरोपी राम ध्यान के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी, जबकि याची के संबंध में पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।

आपराधिक मामलों में यह अंतर समझना जरूरी है कि एक ही प्रकरण में नामजद या जांच के दायरे में आए सभी व्यक्तियों की कानूनी स्थिति समान होना आवश्यक नहीं है।

जांच के दौरान पुलिस उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अलग-अलग व्यक्तियों के संबंध में अलग निष्कर्ष पर पहुंच सकती है। किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया जा सकता है, जबकि दूसरे के संबंध में क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत की जा सकती है।

ऐसे में पुलिस सत्यापन रिपोर्ट में पूरे मुकदमे का केवल सामान्य विवरण देना पर्याप्त नहीं होगा। संबंधित पासपोर्ट आवेदक की अपनी स्थिति भी स्पष्ट की जानी चाहिए।

यदि किसी मामले में कई आरोपी हैं, तो केवल यह लिख देना कि मुकदमे में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, आवेदक की व्यक्तिगत स्थिति बताने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि आरोपपत्र किसके खिलाफ दाखिल किया गया है और आवेदक के संबंध में जांच का क्या निष्कर्ष निकला।

सुरेश यादव की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आए तथ्यों ने इसी आवश्यकता को रेखांकित किया।

पासपोर्ट आवेदन पर निर्णय लेने के लिए हाईकोर्ट ने क्या कहा?

मामले में उपलब्ध तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी को याची के लंबित आवेदन पर निर्णय लेना चाहिए।

अदालत ने संबंधित अधिकारी को निर्देश दिया कि वह याची के शैक्षणिक रिकॉर्ड, जन्मतिथि, नाम और अन्य आवश्यक विवरणों की जांच करे। इसके बाद आवेदन पर कानून के अनुसार निर्णय लिया जाए।

हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि आदेश की प्रमाणित प्रति संबंधित प्राधिकरण के समक्ष प्रस्तुत किए जाने के छह सप्ताह के भीतर आवेदन का निस्तारण किया जाए।

इस निर्देश का अर्थ है कि पासपोर्ट कार्यालय को निर्धारित समयसीमा के भीतर आवेदन पर विचार करना होगा। हालांकि, आवेदन का निस्तारण करने का निर्देश अपने आप पासपोर्ट जारी करने का आदेश नहीं है। संबंधित प्राधिकरण को आवश्यक दस्तावेजों और लागू नियमों के आधार पर निर्णय लेना होगा।

यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी आवेदन को तय समय में निपटाने और उसे मंजूर करने के बीच कानूनी अंतर होता है।

अदालत ने मामले में उपलब्ध तथ्यों को देखते हुए आवेदन पर उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया, ताकि पुलिस सत्यापन से जुड़ी स्थिति के कारण मामला अनिश्चितकाल तक लंबित न रहे।

पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट में कौन-कौन सी जानकारी देना जरूरी होगा?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस सत्यापन रिपोर्ट की सटीकता पर जोर देते हुए कहा कि रिपोर्ट में आपराधिक कार्यवाही की मौजूदा स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।

अदालत के निर्देशों के अनुसार, रिपोर्ट में निम्नलिखित जानकारियों का उल्लेख किया जाना चाहिए:

1. मुकदमे का वर्तमान विवरण: यदि पासपोर्ट आवेदक के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज है, तो केवल केस क्राइम नंबर लिखने के बजाय उसकी वर्तमान स्थिति भी स्पष्ट की जानी चाहिए।

2. चार्जशीट दाखिल हुई या नहीं: पुलिस को बताना होगा कि संबंधित मामले में अदालत के समक्ष आरोपपत्र दाखिल किया गया है या नहीं।

3. अदालत ने संज्ञान लिया या नहीं: यदि चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है, तो रिपोर्ट में यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित अदालत ने उसका संज्ञान लिया है या नहीं।

4. चार्जशीट दाखिल नहीं हुई तो वर्तमान स्थिति: यदि आरोपपत्र अभी तक अदालत में पेश नहीं किया गया है, तो पुलिस सत्यापन रिपोर्ट में यह भी बताया जाना चाहिए कि मामले की जांच किस चरण में है और आरोपपत्र की स्थिति क्या है।

5. क्लोजर रिपोर्ट का विवरण: यदि पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की है, तो रिपोर्ट में इसका उल्लेख किया जाना चाहिए।

6. मजिस्ट्रेट के आदेश की जानकारी: पुलिस को यह भी बताना होगा कि मजिस्ट्रेट ने क्लोजर रिपोर्ट पर कोई आदेश पारित किया है या नहीं।

7. मुकदमा शुरू होने की स्थिति: यदि मामले में मुकदमे की कार्यवाही शुरू हो चुकी है, तो उसकी मौजूदा स्थिति का उल्लेख भी पुलिस सत्यापन रिपोर्ट में किया जाना चाहिए।

इन जानकारियों से पासपोर्ट कार्यालय को यह समझने में मदद मिलेगी कि आवेदक के खिलाफ दर्ज मामले की वास्तविक कानूनी स्थिति क्या है।

केवल केस क्राइम नंबर लिखना पर्याप्त क्यों नहीं?

पुलिस सत्यापन का उद्देश्य पासपोर्ट आवेदक के संबंध में आवश्यक तथ्यों की जांच करना और संबंधित प्राधिकरण को सही जानकारी उपलब्ध कराना है। यदि रिपोर्ट में केवल मुकदमे का नंबर दर्ज कर दिया जाए, तो उससे यह स्पष्ट नहीं होता कि मामला किस स्थिति में है।

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज होने के बाद पुलिस जांच कर सकती है। जांच पूरी होने पर उसके संबंध में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की जा सकती है। किसी अन्य मामले में आरोपपत्र अदालत में पेश हो सकता है, लेकिन अदालत द्वारा संज्ञान लेने या आगे की कार्यवाही की स्थिति अलग हो सकती है।

इन सभी परिस्थितियों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।

यदि पुलिस रिपोर्ट में केवल मुकदमे का उल्लेख है और आगे की जानकारी नहीं दी गई है, तो पासपोर्ट कार्यालय को संबंधित मामले की स्थिति समझने के लिए अतिरिक्त जानकारी की जरूरत पड़ सकती है। इससे आवेदन के निस्तारण में देरी होने की आशंका रहती है।

हाईकोर्ट ने इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए पुलिस सत्यापन रिपोर्ट में विस्तृत और सटीक जानकारी दर्ज करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पासपोर्ट कार्यालय के सामने अधूरी जानकारी न पहुंचे और आवेदन पर निर्णय लेते समय संबंधित आपराधिक कार्यवाही की वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखा जा सके।

उत्तर प्रदेश के DGP को फॉर्म में बदलाव सुनिश्चित करने का निर्देश

हाईकोर्ट ने इस मामले को केवल सुरेश यादव के पासपोर्ट आवेदन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि पुलिस सत्यापन रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया में आवश्यक विवरण शामिल करने पर भी जोर दिया।

अदालत ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि पासपोर्ट आवेदनों के लिए तैयार की जाने वाली पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट में जरूरी जानकारियां शामिल की जाएं।

इसके साथ ही DGP को आदेश के अनुपालन के संबंध में रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया।

इस निर्देश का महत्व इसलिए है, क्योंकि पुलिस सत्यापन रिपोर्ट पासपोर्ट आवेदन की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। यदि रिपोर्ट में आपराधिक मामले की स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तो संबंधित प्राधिकरण को आवेदन के संबंध में निर्णय लेने में कठिनाई हो सकती है।

पुलिस सत्यापन फॉर्म में आवश्यक विवरण शामिल होने से जांच अधिकारी और पासपोर्ट कार्यालय के बीच जानकारी का आदान-प्रदान अधिक स्पष्ट हो सकता है।

हालांकि, फॉर्म में बदलाव किस प्रकार लागू किए जाएंगे और अनुपालन हलफनामे में क्या विवरण प्रस्तुत किए जाएंगे, इसकी जानकारी आगे की सुनवाई और संबंधित आदेशों से स्पष्ट होगी।

चार नवंबर को होगी मामले की अगली सुनवाई

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस सत्यापन रिपोर्ट में आवश्यक विवरण शामिल करने और आदेश के अनुपालन से संबंधित विषय को आगे की सुनवाई के लिए 4 नवंबर को सूचीबद्ध किया है।

अदालत ने प्रदेश के DGP को अनुपालन सुनिश्चित करने और रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। ऐसे में अगली सुनवाई के दौरान आदेश के अनुपालन की स्थिति महत्वपूर्ण रहेगी।

एक ओर अदालत ने सुरेश यादव के लंबित पासपोर्ट आवेदन पर निर्धारित समयसीमा में निर्णय लेने को कहा है, वहीं दूसरी ओर पुलिस सत्यापन रिपोर्ट की प्रक्रिया में आवश्यक जानकारी शामिल करने का निर्देश भी दिया है।

इस प्रकार मामले में व्यक्तिगत राहत और प्रशासनिक प्रक्रिया, दोनों पहलुओं पर ध्यान दिया गया है।

पासपोर्ट आवेदकों के लिए फैसले का क्या महत्व है?

यह मामला उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनके पासपोर्ट आवेदन पुलिस सत्यापन रिपोर्ट में दर्ज किसी आपराधिक मामले के कारण लंबित हैं।

अदालत के निर्देशों से यह स्पष्ट होता है कि पुलिस सत्यापन रिपोर्ट में आपराधिक मामले का केवल उल्लेख करने के बजाय उसकी वास्तविक स्थिति बताना जरूरी है। विशेष रूप से यह जानकारी महत्वपूर्ण है कि चार्जशीट दाखिल हुई है या नहीं, अदालत ने संज्ञान लिया है या नहीं और क्लोजर रिपोर्ट पर क्या कार्रवाई हुई है।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने पर उसका पासपोर्ट हर स्थिति में जारी किया जाना अनिवार्य है। पासपोर्ट जारी करने का निर्णय संबंधित कानून, लागू नियमों और मामले की वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर लिया जाएगा।

लेकिन रिपोर्ट में सही और पूरी जानकारी होने से संबंधित प्राधिकरण को आवेदन पर उचित निर्णय लेने में मदद मिल सकती है।

निष्कर्षतः, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट में आपराधिक मामले की वर्तमान स्थिति बताना जरूरी है। केवल केस क्राइम नंबर या चार्जशीट का उल्लेख करना पर्याप्त नहीं होगा। अदालत ने उत्तर प्रदेश के DGP को पुलिस सत्यापन फॉर्म में आवश्यक विवरण शामिल कराने और अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही, सुरेश यादव के लंबित आवेदन पर प्रमाणित आदेश प्रस्तुत किए जाने के छह सप्ताह के भीतर निर्णय लेने को कहा है।


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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।