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DPDP कानून 2023 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स की याचिका पर केंद्र को नोटिस;

DPDP कानून 2023 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स की याचिका पर केंद्र को नोटिस; 17 नवंबर को अगली सुनवाई

       डिजिटल मीडिया और खोजी पत्रकारिता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून, 2023 को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) और स्वतंत्र खोजी पत्रकार युक्ता मुद्गल की ओर से दायर इस याचिका में कानून के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कानून में पत्रकारिता के लिए पर्याप्त छूट नहीं होने से खोजी पत्रकारिता, गोपनीय समाचार स्रोतों की सुरक्षा और जनहित से जुड़ी खबरों के प्रकाशन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। अदालत ने कानून के प्रावधानों पर रोक लगाने की मांग से संबंधित आवेदन पर भी नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित की गई है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने नागरिकों के निजता के अधिकार और मीडिया की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे इस क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं, इसलिए सरकार और अदालत को ऐसे व्यावहारिक सुरक्षा उपाय सुझाएं, जिनसे कानून का दुरुपयोग रोका जा सके।

इस मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि एक ओर डिजिटल माध्यमों पर लोगों की निजी जानकारी की सुरक्षा आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर पत्रकारिता का काम सार्वजनिक हित से जुड़े तथ्यों को सामने लाना भी है। अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह प्रश्न है कि डेटा संरक्षण के उद्देश्य और स्वतंत्र पत्रकारिता की जरूरतों के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित किया जाए।

क्या है पूरा मामला?

डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम, 2023 का उद्देश्य डिजिटल व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण को नियंत्रित करना और व्यक्तियों की निजी जानकारी की सुरक्षा के लिए कानूनी व्यवस्था उपलब्ध कराना है। डिजिटल सेवाओं के विस्तार के साथ लोगों की व्यक्तिगत जानकारी का संग्रह, उपयोग और साझा करना तेजी से बढ़ा है। ऐसे में डेटा के दुरुपयोग को रोकना और लोगों को उनकी जानकारी पर उचित नियंत्रण देना इस कानून के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है।

हालांकि, डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन और स्वतंत्र खोजी पत्रकार युक्ता मुद्गल ने कानून के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि समाचार संगठनों और पत्रकारों के लिए स्पष्ट एवं पर्याप्त छूट का अभाव खोजी पत्रकारिता के कामकाज को कठिन बना सकता है।

डीएनपीए में 21 प्रमुख समाचार संगठनों के डिजिटल मंच शामिल हैं। एसोसिएशन का कहना है कि पत्रकारिता के दौरान कई बार ऐसे व्यक्तियों से संबंधित जानकारी सामने आती है, जिनके कार्य सार्वजनिक हित से जुड़े होते हैं। भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अनियमितताओं, सार्वजनिक पदों पर कदाचार और अन्य महत्वपूर्ण विषयों की जांच करते समय पत्रकारों को व्यक्तिगत डेटा का उपयोग करना पड़ सकता है।

ऐसी परिस्थितियों में यदि हर मामले में संबंधित व्यक्ति की सहमति लेना आवश्यक हो या डेटा हटाने से जुड़ी मांगों के कारण प्रकाशित सामग्री प्रभावित हो, तो पत्रकारिता के काम में व्यावहारिक कठिनाइयां उत्पन्न हो सकती हैं।

याचिकाकर्ताओं की चिंता केवल समाचार प्रकाशित करने तक सीमित नहीं है। उन्होंने सरकारी सूचनाओं तक पहुंच, समाचार स्रोतों की गोपनीयता, सूचना के अधिकार और डेटा संरक्षण बोर्ड की स्वतंत्रता जैसे मुद्दे भी उठाए हैं।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश किए गए तर्क हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अभी इन सभी आपत्तियों पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है। केंद्र सरकार का जवाब आने और आगे की सुनवाई के बाद ही मामले में कानूनी स्थिति स्पष्ट होगी।

पत्रकारिता के लिए विशेष छूट नहीं होने पर सवाल

याचिका में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा पत्रकारिता के लिए विशेष छूट का अभाव बताया गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने अदालत के समक्ष दलील दी कि कानून में पत्रकारिता की आवश्यकताओं को पर्याप्त रूप से ध्यान में नहीं रखा गया है।

पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खोजी रिपोर्टिंग है। इसमें पत्रकार किसी विषय से संबंधित दस्तावेज जुटाते हैं, विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त करते हैं और उपलब्ध तथ्यों की पुष्टि के बाद रिपोर्ट प्रकाशित करते हैं। कई बार यह प्रक्रिया ऐसे मामलों में होती है, जहां संबंधित व्यक्ति या संस्था जानकारी सार्वजनिक नहीं करना चाहती।

उदाहरण के लिए, यदि किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत हो या किसी सार्वजनिक संस्था में वित्तीय अनियमितताओं की जांच की जा रही हो, तो पत्रकारों को संबंधित व्यक्तियों के रिकॉर्ड, दस्तावेजों या अन्य व्यक्तिगत जानकारी का सहारा लेना पड़ सकता है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ऐसी परिस्थितियों में डेटा संरक्षण से जुड़ी शर्तें पत्रकारिता के काम को प्रभावित कर सकती हैं। यदि किसी खबर में उल्लेखित व्यक्ति की सहमति को आवश्यक मान लिया जाए, तो वह व्यक्ति खबर प्रकाशित होने से पहले ही उसके प्रकाशन का विरोध कर सकता है।

इससे ऐसी खबरों के प्रकाशन में बाधा आने की आशंका है, जिनका संबंध भ्रष्टाचार या सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों से हो।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि पत्रकारिता के नाम पर किसी व्यक्ति की निजी जानकारी का मनमाने ढंग से इस्तेमाल किया जाना चाहिए। निजता का अधिकार भी संवैधानिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। विवाद का मुख्य प्रश्न यह है कि जनहित में की जाने वाली पत्रकारिता और व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के बीच उचित कानूनी सीमा कैसे तय की जाए।

इसी वजह से इस मामले में अदालत के सामने दोनों पक्षों के हितों को ध्यान में रखते हुए समाधान तलाशने की चुनौती है।

क्या सहमति की शर्त से खोजी पत्रकारिता प्रभावित होगी?

याचिका में यह आशंका जताई गई है कि व्यक्तिगत डेटा के उपयोग और सहमति से संबंधित प्रावधान खोजी पत्रकारिता के लिए व्यावहारिक समस्याएं पैदा कर सकते हैं।

सामान्य परिस्थितियों में किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी का उपयोग करते समय उसकी निजता और डेटा संरक्षण का ध्यान रखना आवश्यक है। लेकिन पत्रकारिता के कई मामलों में जानकारी एकत्र करने का उद्देश्य किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी में अनावश्यक हस्तक्षेप करना नहीं, बल्कि किसी ऐसे तथ्य को सामने लाना होता है, जिसका व्यापक सार्वजनिक महत्व हो।

मान लीजिए कि किसी सरकारी परियोजना में धन के दुरुपयोग की शिकायत सामने आती है। पत्रकार इस मामले की जांच के दौरान संबंधित अधिकारियों के दस्तावेजों, वित्तीय रिकॉर्ड या अन्य सूचनाओं की पड़ताल करते हैं। यदि जांच से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की सहमति लेना आवश्यक हो जाए, तो जांच की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

कुछ मामलों में संबंधित व्यक्ति की सहमति मिलने की संभावना भी कम हो सकती है, विशेषकर तब, जब खबर में उसके संभावित कदाचार का खुलासा होने वाला हो।

वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने इसी प्रकार की आशंकाओं के आधार पर दलील दी कि कानून के प्रावधान पत्रकारिता की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकते हैं। उनके अनुसार, खबर प्रकाशित करने से पहले सहमति की बाध्यता पूर्व-सेंसरशिप जैसी स्थिति पैदा कर सकती है।

यहां पूर्व-सेंसरशिप का आशय ऐसी स्थिति से है, जिसमें किसी सामग्री के सार्वजनिक होने से पहले ही उसके प्रकाशन पर नियंत्रण या रोक जैसी बाधा उत्पन्न हो जाए।

हालांकि, अदालत को यह भी देखना होगा कि डेटा संरक्षण के नियमों का वास्तविक दायरा क्या है, वे पत्रकारिता पर किस प्रकार लागू होते हैं और क्या मौजूदा कानून में उपलब्ध प्रावधान इन चिंताओं का समाधान कर सकते हैं।

समाचार स्रोतों की गोपनीयता पर भी चिंता

याचिका में केंद्र सरकार की सूचना मांगने संबंधी शक्तियों पर भी सवाल उठाए गए हैं। विशेष रूप से DPDP अधिनियम की धारा 36 और संबंधित नियमों का उल्लेख करते हुए याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं होने से पत्रकारिता के गोपनीय स्रोतों की पहचान उजागर होने का खतरा पैदा हो सकता है।

खोजी पत्रकारिता में गोपनीय स्रोतों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। कई बार सरकारी विभागों, सार्वजनिक संस्थानों या अन्य संगठनों में काम करने वाले लोग किसी अनियमितता से संबंधित जानकारी पत्रकारों को उपलब्ध कराते हैं। वे ऐसा इसलिए कर सकते हैं, क्योंकि उन्हें आशंका होती है कि जानकारी सार्वजनिक करने पर उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है या उन्हें कार्यस्थल पर नुकसान उठाना पड़ सकता है।

यदि ऐसे स्रोतों की पहचान उजागर होने का खतरा बढ़ता है, तो भविष्य में लोग महत्वपूर्ण सूचनाएं साझा करने से पीछे हट सकते हैं।

इसका प्रभाव उन खबरों पर पड़ सकता है, जिनके माध्यम से सार्वजनिक धन के उपयोग, प्रशासनिक निर्णयों या सरकारी कामकाज से संबंधित अनियमितताओं का खुलासा होता है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सरकार को सूचना मांगने की शक्ति देते समय स्पष्ट सीमाएं और पर्याप्त सुरक्षा उपाय होने चाहिए। उनके अनुसार, गोपनीय पत्रकारिता स्रोतों की सुरक्षा सुनिश्चित करना स्वतंत्र मीडिया के लिए आवश्यक है।

हालांकि, सरकार की सूचना प्राप्त करने की शक्तियों का उद्देश्य और उनका वैधानिक दायरा भी महत्वपूर्ण होगा। अदालत को यह देखना होगा कि कानून के तहत उपलब्ध शक्तियों का प्रयोग किन परिस्थितियों में किया जा सकता है और उनके दुरुपयोग को रोकने के लिए क्या सुरक्षा व्यवस्था मौजूद है।

धारा 37 को चुनौती, खबरों की पहुंच सीमित होने की आशंका

डीएनपीए ने कानून की धारा 37 पर भी आपत्ति जताई है। याचिका में कहा गया है कि इस प्रावधान के तहत सार्वजनिक पहुंच को प्रतिबंधित करने की शक्ति का इस्तेमाल समाचार सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए किया जा सकता है।

डिजिटल समाचार संगठनों के लिए इंटरनेट एक प्रमुख माध्यम है। इसके जरिए खबरें बड़ी संख्या में लोगों तक तेजी से पहुंचती हैं। किसी समाचार सामग्री तक सार्वजनिक पहुंच सीमित होने की स्थिति में उसके पाठकों और दर्शकों की संख्या प्रभावित हो सकती है।

याचिकाकर्ताओं की चिंता यह है कि यदि कानून के तहत उपलब्ध शक्तियों का प्रयोग पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना किया जाता है, तो इसका असर ऐसी रिपोर्टों पर भी पड़ सकता है, जो सार्वजनिक हित से जुड़ी हों।

उदाहरण के तौर पर, किसी सरकारी नीति, प्रशासनिक कार्रवाई या सार्वजनिक पदाधिकारी के कामकाज पर प्रकाशित रिपोर्ट लोगों को महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करा सकती है। ऐसी सामग्री की पहुंच प्रभावित होने पर नागरिकों के सूचना प्राप्त करने के अवसर भी सीमित हो सकते हैं।

हालांकि, किसी सामग्री पर प्रतिबंध लगाने की शक्ति और उसका वैध इस्तेमाल अलग-अलग प्रश्न हैं। केवल इस आशंका के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कानून का इस्तेमाल अनिवार्य रूप से पत्रकारिता को रोकने के लिए ही होगा।

सुप्रीम कोर्ट के सामने यह जांचने का अवसर होगा कि संबंधित प्रावधान किस उद्देश्य से बनाए गए हैं, उनका दायरा कितना व्यापक है और क्या उनके इस्तेमाल के लिए पर्याप्त कानूनी सुरक्षा उपलब्ध है।

आरटीआई कानून में संशोधन को भी दी गई चुनौती

इस मामले में एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में किए गए बदलाव से संबंधित है। डीएनपीए ने DPDP अधिनियम की धारा 44(3) को चुनौती दी है, जिसके माध्यम से आरटीआई कानून की धारा 8(1)(j) में संशोधन किया गया।

सूचना का अधिकार कानून नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकरणों से जानकारी प्राप्त करने का अधिकार देता है। इसका उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देना है।

हालांकि, आरटीआई के तहत सूचना प्राप्त करने का अधिकार पूर्ण नहीं है। कानून में कुछ ऐसी श्रेणियां निर्धारित हैं, जिनमें जानकारी देने से छूट मिल सकती है। इनमें व्यक्तिगत जानकारी और अन्य संरक्षित सूचनाओं से संबंधित प्रावधान भी शामिल हैं।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि संशोधन के कारण व्यक्तिगत जानकारी के खुलासे पर व्यापक प्रतिबंध लग सकता है। इससे उन मामलों में भी सूचना प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है, जहां जानकारी का संबंध सार्वजनिक हित या किसी सरकारी अधिकारी के आधिकारिक कामकाज से हो।

यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि कई बार पत्रकार आरटीआई के माध्यम से सरकारी निर्णयों, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल से संबंधित दस्तावेज प्राप्त करते हैं। इन दस्तावेजों के आधार पर रिपोर्ट तैयार की जाती हैं और सरकारी संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करने में मदद मिलती है।

यदि व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित अपवादों का दायरा व्यापक हो जाता है, तो सूचना मांगने वाले नागरिकों और पत्रकारों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

दूसरी ओर, किसी व्यक्ति की निजी जानकारी को अनावश्यक रूप से सार्वजनिक होने से बचाना भी आवश्यक है। इसलिए इस विवाद में पारदर्शिता और निजता के अधिकार के बीच संतुलन का प्रश्न केंद्रीय महत्व रखता है।

सुप्रीम कोर्ट को इस मुद्दे पर विचार करते समय यह देखना होगा कि संशोधन का प्रभाव क्या है और क्या इससे आरटीआई कानून के मूल उद्देश्य पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है।

डेटा संरक्षण बोर्ड की स्वतंत्रता पर सवाल

याचिका में डेटा संरक्षण बोर्ड की संरचना और स्वतंत्रता को लेकर भी संवैधानिक चिंताएं व्यक्त की गई हैं।

डेटा संरक्षण बोर्ड का उद्देश्य कानून के तहत आने वाली शिकायतों और उल्लंघनों से संबंधित मामलों पर विचार करना तथा निर्धारित वैधानिक शक्तियों का प्रयोग करना है। इसलिए उसकी कार्यप्रणाली और निर्णय लेने की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण मानी जाती है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बोर्ड के सदस्यों के चयन में कार्यपालिका की भूमिका और न्यायिक सदस्य की अनिवार्यता का अभाव उसकी स्वतंत्रता को लेकर सवाल पैदा करता है।

उनकी चिंता यह है कि यदि किसी नियामक संस्था की संरचना और नियुक्ति प्रक्रिया में पर्याप्त स्वतंत्रता सुनिश्चित नहीं की जाती, तो उसके निष्पक्ष कामकाज को लेकर आशंकाएं पैदा हो सकती हैं।

इस मुद्दे पर अदालत को यह देखना होगा कि बोर्ड की नियुक्ति प्रक्रिया, कार्यकाल, अधिकारों और निर्णय लेने की व्यवस्था के संबंध में कानून क्या प्रावधान करता है। साथ ही, यह भी विचारणीय होगा कि क्या वर्तमान व्यवस्था स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्णय सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है।

हालांकि, केवल कार्यपालिका की भूमिका होने से किसी संस्था की स्वतंत्रता स्वतः समाप्त हो जाती है, ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए संबंधित कानून की पूरी व्यवस्था और संवैधानिक मानकों का परीक्षण आवश्यक है।

इसलिए डेटा संरक्षण बोर्ड की स्वतंत्रता से जुड़ा सवाल भी मामले की सुनवाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने संतुलित व्यवस्था बनाने पर दिया जोर

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने नागरिकों और मीडिया के अधिकारों के बीच संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे इस क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं और सरकार तथा अदालत को ऐसे सुरक्षा उपाय सुझाएं, जिनसे कानून के दुरुपयोग की आशंका कम की जा सके।

यह टिप्पणी मामले की व्यापक प्रकृति को दर्शाती है। एक ओर डिजिटल युग में व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर मीडिया को जनहित से जुड़े मामलों की स्वतंत्र जांच करने और तथ्य प्रकाशित करने का अवसर मिलना चाहिए।

डीएनपीए ने अदालत को बताया कि वह अपनी आपत्तियां संबंधित मंत्रालयों के समक्ष पहले ही रख चुका है। इसके बावजूद संगठन ने न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करके मामले में उसका पक्ष जानने की प्रक्रिया शुरू की है। कानून पर रोक लगाने की मांग से जुड़े आवेदन पर भी नोटिस जारी किया गया है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि नोटिस जारी होने का अर्थ कानून पर रोक लगना या याचिका स्वीकार कर लिया जाना नहीं है। इस स्तर पर अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। कानून के प्रावधानों की संवैधानिक वैधता और रोक लगाने की मांग पर अंतिम निर्णय अभी नहीं हुआ है।

17 नवंबर की सुनवाई पर रहेगी नजर

अब इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी। इस दौरान केंद्र सरकार अपना पक्ष रख सकती है और अदालत याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों पर आगे विचार कर सकती है।

मामले का परिणाम डिजिटल समाचार संगठनों, स्वतंत्र पत्रकारों, आरटीआई के माध्यम से जानकारी प्राप्त करने वालों और व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा से जुड़े व्यापक कानूनी विमर्श के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

यदि अदालत को लगता है कि कानून के किसी प्रावधान में संवैधानिक या व्यावहारिक समस्या है, तो वह लागू कानून के अनुसार उचित आदेश दे सकती है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार कानून के उद्देश्य, उसकी संरचना और उपलब्ध सुरक्षा उपायों के आधार पर अपना पक्ष रख सकती है।

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि सुप्रीम कोर्ट कानून के किसी प्रावधान पर रोक लगाएगा या उसे असंवैधानिक घोषित करेगा। ऐसा कोई अंतिम आदेश अभी पारित नहीं हुआ है।

निष्कर्ष

DPDP कानून, 2023 को चुनौती देने वाली डीएनपीए की याचिका ने निजता के अधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन का महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पत्रकारिता के लिए पर्याप्त छूट नहीं होने से खोजी रिपोर्टिंग, गोपनीय स्रोतों की सुरक्षा और आरटीआई के माध्यम से सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

वहीं, व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा भी डिजिटल युग की एक प्रमुख आवश्यकता है। इसलिए इस विवाद का समाधान किसी एक अधिकार को पूरी तरह प्राथमिकता देने के बजाय दोनों के बीच उचित कानूनी संतुलन स्थापित करने में निहित है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर दिया है और मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन आपत्तियों पर क्या जवाब देती है और अदालत पत्रकारिता की स्वतंत्रता तथा नागरिकों की निजता की सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर क्या रुख अपनाती है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।