आसाराम को सुप्रीम कोर्ट से झटका, पैरोल बढ़ाने से इनकार;
दुष्कर्म के मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे आसाराम को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली है। खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर पैरोल की अवधि बढ़ाने की मांग करने वाले आसाराम को अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पैरोल आगे नहीं बढ़ाई जाएगी। अदालत ने संकेत दिया है कि आत्मसमर्पण के बाद उनकी अपील पर आगे सुनवाई की जाएगी। इस मामले में अगली सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित की गई है।
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख ऐसे समय में सामने आया है, जब आसाराम की ओर से अपनी सजा को चुनौती देने के साथ-साथ अंतरिम राहत की मांग भी की जा रही है। उनकी ओर से खराब स्वास्थ्य और अन्य परिस्थितियों का हवाला दिया गया था। हालांकि, अदालत ने फिलहाल पैरोल की अवधि बढ़ाने की मांग स्वीकार नहीं की।
आसाराम को राजस्थान के जोधपुर और गुजरात के गांधीनगर में दर्ज अलग-अलग दुष्कर्म के मामलों में दोषी ठहराया जा चुका है। दोनों मामलों में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। इनमें से जोधपुर का मामला एक नाबालिग से दुष्कर्म से संबंधित है। इसी मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा था, जिसे आसाराम ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
पैरोल की अवधि समाप्त, अब जेल लौटना होगा
आसाराम को राजस्थान हाईकोर्ट से 20 दिन की पैरोल मिली थी। यह पैरोल मंगलवार, 28 अक्टूबर को समाप्त हो रही है। इसी के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पैरोल की अवधि पूरी होने के बाद उन्हें आत्मसमर्पण करना होगा। इसके बाद उनकी अपील पर आगे विचार किया जाएगा।
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि आसाराम फिलहाल पैरोल पर बाहर हैं। इस स्थिति में उनकी ओर से पैरोल की अवधि बढ़ाने और अन्य राहतों की मांग की गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया।
अदालत का रुख स्पष्ट था कि जब तक पैरोल की अवधि समाप्त नहीं हो जाती और संबंधित व्यक्ति आत्मसमर्पण नहीं कर देता, तब तक अपील पर आगे की सुनवाई के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाएगा।
आसाराम को मंगलवार शाम 5 बजे तक जोधपुर जेल में सरेंडर करना है। इसके बाद उनकी अपील पर 17 नवंबर को सुनवाई होनी है। हालांकि, अगली सुनवाई में किन कानूनी प्रश्नों पर कितना विस्तार से विचार होगा, यह अदालत की कार्यवाही पर निर्भर करेगा।
बीमार पत्नी से मिलने की मांग भी नहीं हुई स्वीकार
यह पहला अवसर नहीं है, जब आसाराम ने सुप्रीम कोर्ट से राहत पाने की कोशिश की हो। इससे पहले उन्होंने अपनी बीमार पत्नी से मिलने जाने के लिए अदालत में याचिका दायर की थी। हालांकि, उनकी यह मांग भी स्वीकार नहीं की गई।
आसाराम की ओर से अदालत के समक्ष विभिन्न आधारों पर राहत की मांग रखी गई थी। इनमें स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियां भी शामिल थीं। उनकी उम्र लगभग 85 वर्ष बताई गई है। बचाव पक्ष का कहना था कि उनकी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए राहत दी जानी चाहिए।
लेकिन अदालत ने फिलहाल पैरोल की अवधि बढ़ाने की अनुमति नहीं दी। इस निर्णय का सीधा असर उनकी जेल वापसी पर पड़ेगा।
यहां यह समझना जरूरी है कि पैरोल और जमानत दोनों अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाएं हैं। पैरोल के तहत किसी कैदी को निर्धारित शर्तों और अवधि के लिए जेल से बाहर रहने की अनुमति दी जाती है। दूसरी ओर, जमानत किसी मामले में न्यायिक प्रक्रिया के दौरान आरोपी या दोषसिद्ध व्यक्ति की रिहाई से संबंधित होती है, जो लागू कानूनी प्रावधानों और अदालत के आदेश पर निर्भर करती है।
इस मामले में आसाराम को मिली 20 दिन की पैरोल की अवधि समाप्त हो रही है। इसलिए उन्हें निर्धारित समय तक जेल में वापस जाना होगा। उनकी अपील पर सुनवाई जारी रहने का अर्थ यह नहीं है कि उनकी सजा अपने आप निलंबित हो गई है।
सुप्रीम कोर्ट में दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई
आसाराम से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दो अलग-अलग याचिकाएं विचाराधीन थीं। इनमें एक याचिका गुजरात में दर्ज दुष्कर्म के मामले में अंतरिम जमानत से संबंधित थी। दूसरी याचिका राजस्थान के जोधपुर में दर्ज नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखने के राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ थी।
दोनों मामलों की कानूनी परिस्थितियां अलग हैं। गुजरात का मामला गांधीनगर में दर्ज दुष्कर्म के आरोपों से जुड़ा है, जबकि राजस्थान का मामला जोधपुर में एक नाबालिग से दुष्कर्म से संबंधित है।
आसाराम को इन मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। राजस्थान हाईकोर्ट ने जोधपुर मामले में उनकी दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दलीलें रख रहे थे। वहीं, राजस्थान और गुजरात सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि पैरोल की अवधि समाप्त होने और आसाराम के आत्मसमर्पण करने के बाद अपील पर आगे सुनवाई की जाएगी। इस संबंध में मामले को 17 नवंबर के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
आईपीसी की धारा 376 को लेकर बचाव पक्ष की दलील
सुनवाई के दौरान आसाराम की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता दवे ने एक महत्वपूर्ण कानूनी दलील रखी। उन्होंने कहा कि आसाराम को अन्य आरोपों के तहत दोषी ठहराए जाने का प्रश्न अलग हो सकता है, लेकिन भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376 के तहत उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उनके अनुसार इस धारा के तहत अपराध का आरोप बनता ही नहीं है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 376 दुष्कर्म के अपराध के लिए दंड से संबंधित थी। यह प्रावधान दुष्कर्म के मामलों में दोषसिद्धि और सजा के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।
बचाव पक्ष की दलील का उद्देश्य दोषसिद्धि के कानूनी आधार को चुनौती देना है। हालांकि, किसी अधिवक्ता की ओर से अदालत में दी गई दलील को न्यायालय का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। इस प्रश्न पर अदालत क्या निर्णय लेती है, यह आगे की सुनवाई और उपलब्ध रिकॉर्ड के परीक्षण पर निर्भर करेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर आसाराम को पैरोल बढ़ाने की अनुमति नहीं दी है। साथ ही, अदालत ने संकेत दिया कि उनके आत्मसमर्पण के बाद अपील में उठाए गए कानूनी प्रश्नों पर विचार किया जाएगा।
इसलिए वर्तमान स्थिति में बचाव पक्ष की दलील को अदालत द्वारा स्वीकार किया गया निष्कर्ष मानना सही नहीं होगा। दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली अपील पर अंतिम निर्णय आने तक हाईकोर्ट के फैसले की कानूनी स्थिति बनी हुई है।
अदालत ने कहा—आत्मसमर्पण के बाद होगी आगे की सुनवाई
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि उसे पक्षकारों के अधिवक्ताओं से जानकारी मिली है कि दोषसिद्ध याचिकाकर्ता पैरोल पर बाहर है और उसे 20 दिन की पैरोल दी गई है।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि पैरोल की अवधि समाप्त होने और आत्मसमर्पण किए जाने के बाद अपील पर आगे सुनवाई की जाएगी। मामले को 17 नवंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया।
सुनवाई की शुरुआत में बचाव पक्ष के अधिवक्ता दवे ने अदालत को बताया कि राजस्थान के मामले में सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ पहले ही नोटिस जारी कर चुकी है और मौजूदा पीठ के समक्ष अपील पहली बार सूचीबद्ध हुई है।
इस पर राजस्थान और गुजरात सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को मामले की पृष्ठभूमि से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि आसाराम को राजस्थान और गुजरात, दोनों राज्यों में दोषी ठहराया जा चुका है।
मेहता के अनुसार, आसाराम ने स्वास्थ्य संबंधी कारणों का हवाला देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट में पैरोल की मांग की थी, लेकिन उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
मेहता ने यह भी बताया कि इसके बाद आसाराम ने राजस्थान हाईकोर्ट में एक और याचिका दायर की, जिस पर उन्हें 20 दिन की पैरोल प्रदान की गई।
इस प्रकार, पैरोल से संबंधित कार्यवाही और दोषसिद्धि के खिलाफ अपील दो अलग-अलग कानूनी पहलू हैं। अदालत ने फिलहाल पैरोल बढ़ाने की मांग स्वीकार नहीं की है और अपील पर आगे सुनवाई को आत्मसमर्पण के बाद के लिए निर्धारित किया है।
17 नवंबर की सुनवाई क्यों है महत्वपूर्ण?
आसाराम के मामले में 17 नवंबर की सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि उनकी अपील में दोषसिद्धि के कानूनी आधार को चुनौती दी गई है। बचाव पक्ष ने आईपीसी की धारा 376 के तहत दोषसिद्धि को लेकर सवाल उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि आत्मसमर्पण के बाद इस मामले में उठाए गए कानूनी प्रश्न पर सुनवाई की जाएगी।
हालांकि, अगली सुनवाई में अदालत का अंतिम फैसला आना जरूरी नहीं है। न्यायालय मामले के तथ्यों, रिकॉर्ड, संबंधित कानून और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार कर सकता है। इसके बाद सुनवाई जारी रखने, किसी विशेष कानूनी प्रश्न पर विचार करने या अन्य उपयुक्त आदेश देने का निर्णय लिया जा सकता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि दोषसिद्धि के खिलाफ अपील दायर होने मात्र से सजा समाप्त नहीं होती। जब तक सक्षम अदालत सजा को निलंबित करने, दोषसिद्धि पर रोक लगाने या अन्य राहत देने का आदेश नहीं देती, तब तक लागू न्यायिक आदेश प्रभावी रहते हैं।
आसाराम के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल पैरोल की अवधि बढ़ाने की मांग स्वीकार नहीं की है। उन्हें मंगलवार शाम 5 बजे तक जोधपुर जेल में आत्मसमर्पण करना होगा।
आसाराम मामले में अब आगे क्या होगा?
फिलहाल मामले में तीन बातें स्पष्ट हैं। पहली, आसाराम की 20 दिन की पैरोल मंगलवार, 28 अक्टूबर को समाप्त हो रही है। दूसरी, सुप्रीम कोर्ट ने पैरोल की अवधि बढ़ाने से इनकार कर दिया है और उन्हें शाम 5 बजे तक जोधपुर जेल में आत्मसमर्पण करना है। तीसरी, उनकी अपील पर अगली सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित की गई है।
आसाराम की ओर से पेश दलीलों में दोषसिद्धि के कानूनी आधार को चुनौती दी गई है। विशेष रूप से आईपीसी की धारा 376 के तहत दोषसिद्धि पर सवाल उठाया गया है। इस दलील पर अदालत का रुख आगे की सुनवाई में स्पष्ट होगा।
अभी अदालत ने दोषसिद्धि के खिलाफ अपील पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि आसाराम को इस मामले में राहत मिल गई है या उनकी सजा में कोई बदलाव हो गया है।
निष्कर्षतः, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल आसाराम को पैरोल बढ़ाने की राहत देने से इनकार कर दिया है। उन्हें निर्धारित समय तक जेल में आत्मसमर्पण करना होगा। इसके बाद 17 नवंबर को उनकी अपील पर सुनवाई आगे बढ़ेगी। अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि अदालत दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली दलीलों पर किस प्रकार विचार करती है और आगे क्या आदेश पारित करती है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।