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उत्तराखंड हाईकोर्ट को हल्द्वानी शिफ्ट करने का प्रस्ताव फिर खारिज, 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि पर उठे सवाल

उत्तराखंड हाईकोर्ट को हल्द्वानी शिफ्ट करने का प्रस्ताव फिर खारिज, 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि पर उठे सवाल

        नैनीताल से हल्द्वानी में उत्तराखंड हाईकोर्ट को स्थायी रूप से स्थानांतरित करने की योजना को एक बार फिर झटका लगा है। प्रस्तावित हाईकोर्ट परिसर के निर्माण के लिए 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि के इस्तेमाल की अनुमति मांगने वाले प्रस्ताव को क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति (Regional Empowered Committee—REC) ने खारिज कर दिया। समिति की आपत्ति मुख्य रूप से इस बात पर थी कि परियोजना के लिए उपयुक्त वैकल्पिक गैर-वन भूमि की संभावनाओं का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया है। साथ ही, प्रस्तावित स्थल को परियोजना के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक साबित करने में भी कमियां पाई गईं।

इस फैसले के बाद उत्तराखंड हाईकोर्ट को हल्द्वानी स्थानांतरित करने की योजना पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। हालांकि, समिति की आपत्तियों का समाधान करके और उपयुक्त गैर-वन भूमि की तलाश करके आगे की प्रक्रिया अपनाने की संभावना बनी हुई है।

30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि पर बनना है नया हाईकोर्ट परिसर

प्रस्ताव के अनुसार, नैनीताल जिले के हल्द्वानी क्षेत्र में लामाचौड़ ब्लॉक और भाखड़ा रेंज के अंतर्गत तराई केंद्रीय वन प्रभाग की 30.00 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि को परियोजना के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति मांगी गई थी। यह प्रस्ताव लोक निर्माण विभाग (PWD) के माध्यम से प्रस्तुत किया गया था।

योजना के तहत नैनीताल स्थित वर्तमान हाईकोर्ट परिसर को हल्द्वानी में स्थानांतरित करने के लिए नया भवन बनाया जाना प्रस्तावित है। इसके लिए वन भूमि के डायवर्जन यानी गैर-वानिकी उपयोग की अनुमति आवश्यक है।

लेकिन वन भूमि के इस्तेमाल से जुड़े प्रस्ताव पर विचार करते समय समिति ने केवल भवन निर्माण की जरूरत को ही पर्याप्त नहीं माना। उसने यह भी देखा कि क्या इसी परियोजना को किसी उपयुक्त गैर-वन भूमि पर स्थापित किया जा सकता है।

समिति के मुताबिक, प्रस्तावित स्थल को परियोजना के लिए अपरिहार्य बताने के पर्याप्त आधार सामने नहीं आए। इसी वजह से वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 के पैरा 1.10(i) के तहत प्रस्ताव को खारिज करने का निर्णय लिया गया।

समिति ने संबंधित उपयोगकर्ता एजेंसी और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि परियोजना के लिए उपयुक्त गैर-वन भूमि पर निर्माण की संभावना तलाशें।

आखिर क्यों जरूरी बताया जा रहा है हाईकोर्ट का स्थानांतरण?

उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी स्थानांतरित करने के पक्ष में कई तर्क दिए गए हैं। इनमें सबसे प्रमुख कारण वर्तमान परिसर में जगह की कमी और मुकदमों की संख्या में हुई वृद्धि है।

प्रस्ताव में बताया गया है कि वर्ष 2010 के आसपास हाईकोर्ट में लंबित मामलों की संख्या लगभग 4,000 थी, जो अब बढ़कर करीब 64,000 हो गई है। मुकदमों की बढ़ती संख्या के साथ न्यायिक कार्यों, अधिवक्ताओं, कर्मचारियों और अन्य आवश्यक सुविधाओं के लिए अधिक स्थान की जरूरत महसूस की जा रही है।

हाईकोर्ट के वर्तमान परिसर में उपलब्ध जगह सीमित होने के कारण भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने में कठिनाइयों का तर्क भी दिया गया है।

इसके अलावा, नैनीताल एक प्रमुख पर्यटन स्थल है। यहां मुकदमों की सुनवाई के लिए आने वाले वादियों, अधिवक्ताओं और अन्य लोगों को कई बार महंगे आवास और परिवहन संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पर्यटन सीजन के दौरान यातायात का दबाव और जाम की समस्या भी बढ़ जाती है।

हल्द्वानी में नया परिसर बनने से इन समस्याओं में कमी आने की उम्मीद जताई गई है। हालांकि, ये परियोजना के पक्ष में दिए गए तर्क हैं। इनके आधार पर वन भूमि के इस्तेमाल की अनुमति स्वतः नहीं मिल जाती। इसके लिए पर्यावरणीय नियमों और वैकल्पिक भूमि की उपलब्धता से जुड़े मानकों को पूरा करना भी जरूरी है।

सात मंजिला भवन और पार्किंग की है योजना

प्रस्तावित हाईकोर्ट भवन को G+7 संरचना के रूप में विकसित करने की योजना है। इसका अर्थ है कि भवन में भूतल के अतिरिक्त सात मंजिलें होंगी।

परियोजना में पर्याप्त पार्किंग और खुले स्थान की व्यवस्था करने का प्रस्ताव भी शामिल है। निर्माण की योजना भविष्य में बढ़ने वाली आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किए जाने की बात कही गई है।

प्रस्ताव में यह भी स्पष्ट किया गया है कि नए परिसर में आवासीय निर्माण शामिल नहीं होगा। यानी योजना का उद्देश्य हाईकोर्ट के न्यायिक और प्रशासनिक कामकाज के लिए आवश्यक भवन और उससे जुड़ी सुविधाएं विकसित करना है।

इसके बावजूद समिति ने यह सवाल उठाया कि जब परियोजना के लिए 30 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता बताई जा रही है, तो क्या इतनी भूमि गैर-वन क्षेत्र में उपलब्ध नहीं कराई जा सकती।

यही सवाल इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बनकर सामने आया।

123 पेड़ काटने का प्रस्ताव, सबसे ज्यादा पीपल के पेड़

नए प्रस्ताव के अनुसार, 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि के डायवर्जन से कुल 123 पेड़ प्रभावित होंगे। इनमें सबसे अधिक संख्या पीपल के पेड़ों की बताई गई है।

प्रस्ताव में दिए गए पेड़ों के विवरण के अनुसार:

पेड़ की प्रजाति प्रस्तावित संख्या
पीपल 75
सागौन 9
कोकट 19
बकुली 2
धौरी 2
बेल 3
सेमल 1
रोहिणी 2
हल्दू 2
यूकेलिप्टस 1
कंजू 1
अमलतास 1
खैर 1
अन्य विवरण में स्पष्ट नहीं 4
कुल 123

नोट: उपलब्ध प्रजातिवार सूची में दर्ज संख्याओं का योग 119 है, जबकि प्रस्ताव में कुल 123 पेड़ बताए गए हैं। इसलिए शेष चार पेड़ों की प्रजाति का विवरण मूल अभिलेख से सत्यापित किया जाना चाहिए।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी परियोजना के लिए काटे जाने वाले पेड़ों की संख्या कम होने का अर्थ यह नहीं है कि वन भूमि के इस्तेमाल का प्रभाव भी अपने आप कम हो जाता है। वन भूमि का क्षेत्रफल, उसका पारिस्थितिक महत्व, वन्यजीवों की आवाजाही और वैकल्पिक स्थल की उपलब्धता जैसे पहलुओं पर भी विचार किया जाता है।

इसलिए समिति के सामने केवल 123 पेड़ों का मुद्दा नहीं था, बल्कि 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि को गैर-वानिकी उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने की आवश्यकता का प्रश्न भी था।

वन भूमि के लिए 3.68 करोड़ रुपये से अधिक का NPV

प्रस्ताव में वन भूमि के इस्तेमाल के बदले देय नेट प्रेजेंट वैल्यू (NPV) की राशि 3,68,57,700 रुपये बताई गई है। यह लगभग 3 करोड़ 68 लाख 57 हजार 700 रुपये होती है।

NPV वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग से जुड़े पर्यावरणीय मूल्य के आकलन और निर्धारित नियमों के तहत देय राशि से संबंधित है।

लेकिन NPV का भुगतान कर देना वन भूमि के डायवर्जन की स्वतः अनुमति नहीं बन जाता। संबंधित प्राधिकरण को यह भी संतुष्ट होना पड़ता है कि परियोजना के लिए भूमि की आवश्यकता उचित है और लागू नियमों के तहत अन्य शर्तें पूरी की गई हैं।

इसी तरह प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation—CA) की व्यवस्था भी वन भूमि के इस्तेमाल की अनुमति से जुड़ी एक अलग शर्त है। यह वैकल्पिक गैर-वन भूमि की तलाश की आवश्यकता को समाप्त नहीं करती।

60 हेक्टेयर भूमि पर प्रतिपूरक वनीकरण का प्रस्ताव

प्रस्ताव में कुल 60 हेक्टेयर भूमि पर प्रतिपूरक वनीकरण करने की योजना का उल्लेख है। इसमें नैनीताल, अल्मोड़ा और रामनगर वन प्रभागों से संबंधित अलग-अलग स्थानों को शामिल किया गया है।

उपलब्ध विवरण के अनुसार, प्रस्तावित स्थान और क्षेत्रफल इस प्रकार हैं:

  1. औरा बासकोट, उनचाकोट, बेतालघाट: 13.495 हेक्टेयर भूमि, नैनीताल वन प्रभाग। इसके लिए 80,61,117 रुपये की राशि दर्ज है।
  2. कटीमा, मल्लिसेथी, बेतालघाट: 7.00 हेक्टेयर भूमि, अल्मोड़ा वन प्रभाग। इसके साथ 3,01,92,60 रुपये की राशि का उल्लेख है। इस आंकड़े और प्लांटेशन क्षेत्र के विवरण का मूल दस्तावेज से सत्यापन आवश्यक है।
  3. हल्द्यानी, जोशिक्खोला: 30.00 हेक्टेयर भूमि, अल्मोड़ा वन प्रभाग। विवरण में 14 हेक्टेयर के लिए 83,63,000 रुपये और 16 हेक्टेयर के लिए 95,57,400 रुपये दर्ज हैं।
  4. धोखाने, सुयालबारी, श्री कैंचीधाम: 3.847 हेक्टेयर भूमि, नैनीताल वन प्रभाग। इसके लिए 22,97,971 रुपये की राशि बताई गई है।
  5. गंगरकोट, बेडुली, श्री कैंचीधाम: 2.00 हेक्टेयर भूमि, अल्मोड़ा वन प्रभाग। इसके लिए 11,62,062 रुपये का उल्लेख है।
  6. दाऊं, नैनीताल: 3.658 हेक्टेयर भूमि, रामनगर वन प्रभाग। इसके लिए 21,85,073 रुपये दर्ज हैं।

प्रस्ताव में प्रतिपूरक वनीकरण के लिए कुल 3,46,45,883 रुपये की राशि भी दी गई है। हालांकि, उपलब्ध स्थानवार आंकड़ों और बताए गए कुल में अंतर दिखाई देता है। इसलिए अंतिम वित्तीय विवरण को मूल प्रस्ताव से मिलाना आवश्यक होगा।

यहां एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है। जब परियोजना के लिए प्रतिपूरक वनीकरण हेतु विभिन्न स्थानों पर गैर-वन भूमि उपलब्ध कराए जाने का उल्लेख है, तो हाईकोर्ट परिसर के निर्माण के लिए उपयुक्त गैर-वन भूमि की उपलब्धता का पर्याप्त परीक्षण क्यों नहीं किया गया?

समिति ने इसी विषय पर स्पष्टता मांगी।

कमेटी ने वैकल्पिक गैर-वन भूमि को लेकर उठाए सवाल

प्रस्ताव को खारिज करने के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारण वैकल्पिक भूमि की तलाश से संबंधित रहा।

समिति के सामने यह तथ्य रखा गया कि जिलाधिकारी ने 30 हेक्टेयर गैर-वन भूमि एक साथ उपलब्ध नहीं होने का प्रमाणपत्र दिया है। लेकिन समिति इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुई।

उसने सवाल उठाया कि जब इसी तहसील में प्रतिपूरक वनीकरण के लिए 13.495 हेक्टेयर और 7 हेक्टेयर गैर-वन भूमि उपलब्ध होने का विवरण दिया गया है, तो हाईकोर्ट के लिए गैर-वन भूमि की संभावनाओं की पर्याप्त जांच क्यों नहीं की गई।

समिति की आपत्ति का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित क्षेत्र में 30 हेक्टेयर उपयुक्त गैर-वन भूमि निश्चित रूप से उपलब्ध है। उसका मुख्य सवाल यह है कि वैकल्पिक स्थलों की तलाश और उनके अनुपयुक्त होने के कारणों को पर्याप्त प्रमाणों के साथ प्रस्तुत नहीं किया गया।

वन भूमि का इस्तेमाल करने वाले किसी बड़े सरकारी प्रोजेक्ट के लिए यह स्पष्ट करना आवश्यक होता है कि प्रस्तावित स्थान क्यों चुना गया और दूसरे संभावित स्थानों पर परियोजना स्थापित करना क्यों संभव नहीं है।

समिति ने इसी आधार पर राज्य सरकार और संबंधित एजेंसी को गैर-वन भूमि की संभावनाओं का दोबारा परीक्षण करने को कहा।

हाथी कॉरिडोर और मौजूदा हाईकोर्ट परिसर की स्थिति पर भी सवाल

बैठक में प्रस्तावित क्षेत्र के वन्यजीव महत्व को लेकर भी प्रश्न उठाए गए।

समिति ने पूछा कि क्या प्रस्तावित भूमि हाथी कॉरिडोर के अंतर्गत आती है। इस पर वन विभाग की ओर से स्थिति का सत्यापन किए जाने की आवश्यकता बताई गई।

प्रस्ताव में यह उल्लेख किया गया था कि संबंधित क्षेत्र किसी राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, बायोस्फीयर रिजर्व, टाइगर रिजर्व या वन्यजीव माइग्रेशन कॉरिडोर का हिस्सा नहीं है। हालांकि, हाथी कॉरिडोर से संबंधित सवाल पर अलग से पुष्टि की जरूरत सामने आई।

इसके अतिरिक्त, नैनीताल में वर्तमान हाईकोर्ट परिसर की कानूनी स्थिति को लेकर भी समिति ने जानकारी मांगी।

उपयोगकर्ता एजेंसी की ओर से बताया गया कि इस संबंध में समय आने पर स्थिति स्पष्ट की जाएगी और हाईकोर्ट के स्थानांतरण के बाद राज्य सरकार यह निर्णय लेगी कि वर्तमान परिसर की भूमि वन विभाग को हस्तांतरित की जाए या नहीं।

समिति के सवालों से स्पष्ट है कि परियोजना के मूल्यांकन में केवल प्रस्तावित नए भवन की जरूरत ही नहीं, बल्कि वर्तमान परिसर की भूमि के भविष्य के उपयोग और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े पहलुओं को भी स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।

प्रस्ताव में मिलीं कई तकनीकी और दस्तावेजी कमियां

वैकल्पिक भूमि के सवाल के अतिरिक्त प्रस्ताव में कई तकनीकी और दस्तावेजी कमियां भी दर्ज की गईं। इनमें प्रमुख रूप से निम्न बिंदु शामिल हैं:

1. परियोजना के विभिन्न घटकों का विवरण अधूरा: प्रस्ताव में कंपोनेंट ब्रेकअप सही तरीके से नहीं भरा गया था। इससे परियोजना के अलग-अलग हिस्सों और भूमि की वास्तविक आवश्यकता का स्पष्ट आकलन करने में कठिनाई हो सकती है।

2. आवेदक और प्राधिकरण पत्र में नाम का अंतर: प्रस्ताव के पार्ट-1 में आवेदक के रूप में लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता अशोक कुमार का नाम दर्ज था, जबकि अपलोड किया गया अथॉरिटी लेटर प्रत्यूष कुमार के नाम पर था। इस अंतर को स्पष्ट करना आवश्यक है।

3. HoFF की संस्तुति का अभाव: प्रस्ताव के साथ प्रमुख वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख (HoFF) की आवश्यक संस्तुति उपलब्ध नहीं कराई गई थी।

4. KML फाइल में अंतर: प्रस्तावित डायवर्जन क्षेत्र और मौजूदा सड़क के बीच KML फाइल में गैप दिखाई देने की आपत्ति उठाई गई। इससे भविष्य में अतिक्रमण की आशंका का सवाल पैदा होता है।

5. विस्तृत लेआउट प्लान नहीं: प्रस्ताव के साथ विस्तृत लेआउट प्लान के स्थान पर केवल एक प्रारंभिक या अस्थायी योजना प्रस्तुत की गई थी।

6. वन्यजीव प्रबंधन योजना: वन्यजीव प्रबंधन योजना (WLMP) को मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक (CWLW) से हस्ताक्षरित कराकर प्रस्तुत करने की आवश्यकता बताई गई।

7. 20 साल की प्लांटेशन योजना: वृक्षारोपण से संबंधित 20 वर्ष की योजना उपलब्ध कराने की आवश्यकता भी दर्ज की गई।

इन कमियों को दूर करना परियोजना की अगली प्रक्रिया के लिए जरूरी होगा। हालांकि, केवल दस्तावेजी कमियां दूर कर देना पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि समिति की मुख्य आपत्ति वैकल्पिक गैर-वन भूमि की तलाश और प्रस्तावित वन भूमि की अनिवार्यता को लेकर भी है।

पहले भी खारिज हो चुका है हाईकोर्ट स्थानांतरण का प्रस्ताव

उत्तराखंड हाईकोर्ट को हल्द्वानी स्थानांतरित करने के लिए इससे पहले भी प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया था।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गौलापार क्षेत्र से संबंधित प्रस्ताव संख्या FP/UK/OTHERS/435756/2023 को 24 जनवरी 2024 को क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने खारिज कर दिया था।

उस प्रस्ताव में लगभग 4,238 पेड़ों को काटने की आवश्यकता बताई गई थी। इसके अलावा, उसमें आवासीय निर्माण का प्रावधान भी शामिल था।

इसके मुकाबले नए प्रस्ताव में 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि के इस्तेमाल और 123 पेड़ों को काटने का विवरण दिया गया है। हालांकि, पुराने और नए प्रस्तावों में स्थान, योजना और अन्य परिस्थितियों का अंतर है। इसलिए केवल पेड़ों की संख्या के आधार पर दोनों प्रस्तावों की तुलना करना उचित नहीं होगा।

नए प्रस्ताव में भी समिति ने वैकल्पिक गैर-वन भूमि की पर्याप्त तलाश नहीं किए जाने को प्रमुख आधार बनाया है। इससे स्पष्ट है कि परियोजना के पक्ष में प्रशासनिक आवश्यकता प्रस्तुत करने के साथ-साथ वन भूमि के चयन को नियमों के अनुरूप उचित ठहराना भी जरूरी है।

रोजगार के अवसरों का भी दिया गया है तर्क

प्रस्ताव में परियोजना से रोजगार के अवसर पैदा होने की बात भी कही गई है।

निर्माण चरण में 1,450 स्थायी रोजगार और 49,8546 मानव दिवस का उल्लेख किया गया है। संचालन चरण के लिए 300 स्थायी रोजगार तथा 54,8700 मानव दिवस का विवरण दिया गया है।

हालांकि, मानव दिवस से संबंधित इन आंकड़ों का प्रारूप असामान्य है और इन्हें मूल प्रस्ताव से सत्यापित किया जाना चाहिए। मानव दिवस किसी परियोजना में एक व्यक्ति के एक दिन के काम के बराबर कार्य-इकाई को दर्शाता है।

परियोजना से रोजगार और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की संभावना इसके पक्ष में एक तर्क हो सकती है। लेकिन रोजगार सृजन, भवन की जरूरत और प्रशासनिक सुविधा जैसे लाभों के बावजूद वन भूमि के इस्तेमाल से संबंधित कानूनी शर्तों का पालन अनिवार्य रहेगा।

अब आगे क्या होगा?

क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति के निर्णय के बाद राज्य सरकार और लोक निर्माण विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती उपयुक्त गैर-वन भूमि की पहचान करना है।

यदि किसी वैकल्पिक स्थल पर परियोजना स्थापित करने की संभावना है, तो उसकी उपयुक्तता, उपलब्धता, पहुंच, आवश्यक क्षेत्रफल और निर्माण संबंधी जरूरतों का परीक्षण किया जा सकता है। यदि वैकल्पिक स्थल उपलब्ध नहीं होने का दावा किया जाता है, तो उसे पर्याप्त दस्तावेजों और ठोस कारणों के साथ प्रस्तुत करना होगा।

इसके साथ ही परियोजना के लेआउट, भूमि की सीमाओं, वन्यजीव प्रबंधन योजना, वृक्षारोपण की दीर्घकालिक योजना और अन्य दस्तावेजी कमियों को भी दूर करना होगा।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि समिति द्वारा प्रस्ताव खारिज किए जाने का अर्थ हाईकोर्ट को हल्द्वानी स्थानांतरित करने की पूरी योजना का स्थायी रूप से समाप्त हो जाना नहीं है। इसका सीधा अर्थ यह है कि प्रस्तुत वन भूमि डायवर्जन प्रस्ताव को मौजूदा स्वरूप में स्वीकार नहीं किया गया।

आगे की प्रक्रिया में राज्य सरकार वैकल्पिक गैर-वन भूमि तलाश सकती है या नियमों के अनुरूप आवश्यक जानकारी और दस्तावेजों के साथ उपयुक्त प्रस्ताव तैयार करने पर विचार कर सकती है। किसी नए प्रस्ताव को अनुमति मिलेगी या नहीं, यह संबंधित प्राधिकरणों के परीक्षण और लागू कानूनी प्रावधानों के अनुपालन पर निर्भर करेगा।

निष्कर्ष

उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी स्थानांतरित करने की योजना एक बार फिर वन भूमि से जुड़े सवालों के कारण अटक गई है। प्रस्तावित परिसर के लिए 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि के इस्तेमाल की अनुमति मांगने वाले प्रस्ताव को क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने वैकल्पिक गैर-वन भूमि की पर्याप्त तलाश नहीं किए जाने के आधार पर खारिज कर दिया।

एक ओर हाईकोर्ट में बढ़ते मुकदमों, सीमित स्थान और नैनीताल में यातायात व आवास की समस्याओं का तर्क दिया जा रहा है, तो दूसरी ओर वन भूमि के संरक्षण और वैकल्पिक स्थल की उपलब्धता से जुड़े प्रश्न भी महत्वपूर्ण हैं।

अब यह देखना होगा कि राज्य सरकार और लोक निर्माण विभाग गैर-वन भूमि की तलाश को लेकर क्या कदम उठाते हैं और क्या परियोजना के लिए ऐसा स्थान मिल पाता है, जो न्यायिक बुनियादी ढांचे की जरूरतों को पूरा करने के साथ वन संरक्षण से जुड़े कानूनी मानकों पर भी खरा उतरे।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।