IndianLawNotes.com

दिल्ली हाईकोर्ट का अहम फैसला: शिकायतकर्ता ही जांच अधिकारी हो तो रद्द हो सकती है FIR,

दिल्ली हाईकोर्ट का अहम फैसला: शिकायतकर्ता ही जांच अधिकारी हो तो रद्द हो सकती है FIR, तिमारपुर पार्षद प्रोमिला गुप्ता को राहत

अदालत ने कहा- निष्पक्ष जांच और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है एक ही अधिकारी का शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी होना, प्राथमिकी के साथ पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस जांच की निष्पक्षता को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि जब किसी आपराधिक मामले में शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी (Investigating Officer) एक ही व्यक्ति हो, तो जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। अदालत ने इसे प्राकृतिक न्याय और निष्पक्ष सुनवाई के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत माना है।

न्यायमूर्ति प्रतीक जालान की पीठ ने इस आधार पर तिमारपुर की पार्षद प्रोमिला गुप्ता के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द करने का आदेश दिया। यह मामला दिल्ली संपत्ति विरूपण निवारण अधिनियम, 2007 की धारा 3 के तहत दर्ज किया गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि जांच की प्रक्रिया में ऐसी बुनियादी खामी मौजूद है, तो केवल इस आधार पर उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि संबंधित मजिस्ट्रेट की अदालत पहले ही अपराध का संज्ञान ले चुकी है। किसी मामले में संज्ञान लिया जाना जांच की वैधानिकता और निष्पक्षता पर न्यायिक समीक्षा का रास्ता बंद नहीं करता।

प्रोमिला गुप्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर 29 नवंबर 2022 को तिमारपुर थाने में दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की मांग की थी। उनकी ओर से अदालत को बताया गया कि मामले में सब-इंस्पेक्टर सुरेंद्र सिंह ने शिकायतकर्ता की भूमिका निभाने के साथ-साथ जांच अधिकारी के रूप में भी काम किया। प्राथमिकी और आरोपपत्र में भी यही स्थिति सामने आई थी।

मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से भी यह स्वीकार किया गया कि शिकायतकर्ता पुलिस अधिकारी ने ही जांच की थी। इसके बावजूद राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि मजिस्ट्रेट की अदालत अपराध का संज्ञान ले चुकी है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को प्राथमिकी और संबंधित कार्यवाही जारी रखने के लिए पर्याप्त नहीं माना।

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि आपराधिक न्याय व्यवस्था में केवल अपराध की जांच करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि जांच का निष्पक्ष और कानून के अनुरूप होना भी आवश्यक है। पुलिस अधिकारी की भूमिका ऐसी होनी चाहिए कि जांच की विश्वसनीयता पर अनावश्यक संदेह पैदा न हो।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला दिल्ली के तिमारपुर क्षेत्र की पार्षद प्रोमिला गुप्ता के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी से संबंधित है। पुलिस ने उनके खिलाफ दिल्ली संपत्ति विरूपण निवारण अधिनियम, 2007 की धारा 3 के तहत 29 नवंबर 2022 को मामला दर्ज किया था।

इस अधिनियम का उद्देश्य सार्वजनिक और अन्य संपत्तियों को विरूपित किए जाने जैसी गतिविधियों पर रोक लगाना है। इसके तहत संबंधित परिस्थितियों में संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या उसे विरूपित करने से जुड़े कृत्यों के लिए कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

प्रोमिला गुप्ता ने अपने खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनकी याचिका का मुख्य आधार यह था कि जिस पुलिस अधिकारी ने शिकायत दर्ज कराई, उसी ने मामले की जांच भी की। याचिकाकर्ता के अनुसार, शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी की भूमिकाएं एक ही व्यक्ति द्वारा निभाए जाने से जांच की निष्पक्षता प्रभावित होती है।

मामले में सब-इंस्पेक्टर सुरेंद्र सिंह शिकायतकर्ता भी थे और जांच अधिकारी भी। इस तथ्य का उल्लेख प्राथमिकी और आरोपपत्र में होने की बात याचिकाकर्ता की ओर से अदालत के समक्ष रखी गई।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि ऐसी जांच को निष्पक्ष आपराधिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं माना जा सकता। उन्होंने अदालत का ध्यान दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व के फैसलों की ओर भी दिलाया, जिनमें इसी प्रकार की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए प्राथमिकी रद्द की गई थी।

हाईकोर्ट ने संबंधित कानूनी सिद्धांतों और मामले की परिस्थितियों पर विचार किया। अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी की भूमिका एक ही व्यक्ति द्वारा निभाए जाने की खामी को नजरअंदाज करके याचिकाकर्ता को आपराधिक मुकदमे का सामना करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

इसी आधार पर अदालत ने प्राथमिकी और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द करने का आदेश दिया।

याचिकाकर्ता ने FIR रद्द करने के लिए क्या दलील दी?

प्रोमिला गुप्ता की ओर से अधिवक्ता दुष्यंत नायक ने अदालत में दलील दी कि मामले की जांच की प्रक्रिया निष्पक्षता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

उनका कहना था कि इस मामले में सब-इंस्पेक्टर सुरेंद्र सिंह ने शिकायतकर्ता के रूप में मामला दर्ज कराया और बाद में उसी मामले के जांच अधिकारी भी बने। इस प्रकार शिकायत करने वाले अधिकारी ने ही अपने द्वारा दर्ज कराए गए मामले की जांच की।

आपराधिक न्याय व्यवस्था में जांच अधिकारी का काम तथ्यों और साक्ष्यों का स्वतंत्र रूप से परीक्षण करना होता है। उसे शिकायत में लगाए गए आरोपों की पुष्टि या खंडन के लिए उपलब्ध सामग्री जुटानी होती है। जांच के दौरान प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर यह तय किया जाता है कि अभियोजन के लिए पर्याप्त आधार मौजूद है या नहीं।

यदि शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी एक ही व्यक्ति हों, तो इस बात को लेकर चिंता उत्पन्न हो सकती है कि शिकायतकर्ता की अपनी भूमिका और आरोपों का स्वतंत्र परीक्षण किस तरह सुनिश्चित किया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से इसी बिंदु पर जोर दिया गया। अधिवक्ता ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट पहले भी संपत्ति विरूपण निवारण अधिनियम की धारा 3 के तहत दर्ज मामलों में ऐसी जांच प्रक्रिया को स्वीकार नहीं कर चुका है।

उन्होंने प्रेरणा बनाम राज्य और अमित कुमार बनाम दिल्ली सरकार के फैसलों का हवाला दिया। ये दोनों मामले भी इसी अधिनियम की धारा 3 के तहत दर्ज प्राथमिकी से संबंधित बताए गए।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि जब हाईकोर्ट पहले ही इस प्रकार की जांच की खामी पर विचार कर चुका है, तो वर्तमान मामले में भी उसी कानूनी सिद्धांत को लागू किया जाना चाहिए।

शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी एक ही व्यक्ति होने पर क्यों उठते हैं सवाल?

किसी भी आपराधिक मामले में जांच की निष्पक्षता का विशेष महत्व होता है। पुलिस जांच का उद्देश्य केवल शिकायतकर्ता के आरोपों को सही साबित करना नहीं, बल्कि घटना से संबंधित तथ्यों का पता लगाना भी है।

जांच अधिकारी को उपलब्ध साक्ष्यों का निष्पक्ष परीक्षण करना होता है। उसे उन तथ्यों पर भी ध्यान देना चाहिए, जो आरोपों का समर्थन करते हैं और उन तथ्यों पर भी, जो आरोपों पर संदेह पैदा कर सकते हैं।

जब शिकायतकर्ता ही जांच अधिकारी बन जाता है, तो उसकी दो अलग-अलग भूमिकाएं एक ही व्यक्ति में आ जाती हैं। इससे जांच की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं।

हालांकि, यह समझना जरूरी है कि प्रत्येक मामले में जांच की वैधता का प्रश्न संबंधित कानून, लागू न्यायिक निर्णयों और मामले के तथ्यों के आधार पर तय किया जाता है। शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी के एक होने से जुड़े कानूनी परिणामों को बिना संदर्भ के हर प्रकार के आपराधिक मामले पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

प्रोमिला गुप्ता के मामले में हाईकोर्ट ने विशेष रूप से संबंधित अधिनियम के तहत दर्ज प्राथमिकी, जांच की परिस्थितियों और पूर्व के न्यायिक फैसलों पर विचार किया।

अदालत ने माना कि इस मामले में जांच की खामी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी कारण प्राथमिकी और उससे संबंधित कार्यवाही को जारी रखना उचित नहीं माना गया।

राज्य सरकार ने क्या दलील दी?

सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक अदालत में पेश हुए। उन्होंने पुलिस अधिकारी से प्राप्त जानकारी के आधार पर स्वीकार किया कि इस मामले में शिकायतकर्ता ने ही जांच अधिकारी की भूमिका भी निभाई थी।

हालांकि, राज्य की ओर से एक अन्य दलील यह दी गई कि संबंधित मजिस्ट्रेट की अदालत पहले ही मामले का संज्ञान ले चुकी है।

आपराधिक प्रक्रिया में संज्ञान लेने का अर्थ है कि अदालत ने मामले को न्यायिक विचार के लिए स्वीकार करते हुए आगे की प्रक्रिया शुरू करने का आधार पाया है। संज्ञान के बाद परिस्थितियों के अनुसार समन जारी किया जा सकता है और आरोपी को अदालत के समक्ष उपस्थित होने के लिए कहा जा सकता है।

राज्य की ओर से दी गई दलील का आशय यह था कि जब मजिस्ट्रेट की अदालत मामले का संज्ञान ले चुकी है, तो इस स्तर पर प्राथमिकी रद्द करने का आधार नहीं बनता।

लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान ले लिए जाने से जांच की मूलभूत खामी समाप्त नहीं हो जाती।

यदि जांच की प्रक्रिया ही प्राकृतिक न्याय और निष्पक्षता के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत पाई जाती है, तो केवल संज्ञान लिए जाने के आधार पर उस खामी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

दूसरे शब्दों में, संज्ञान का आदेश किसी जांच को हर परिस्थिति में कानूनी चुनौती से मुक्त नहीं कर देता। हाईकोर्ट उचित मामले में प्राथमिकी और उससे जुड़ी कार्यवाही की वैधता की समीक्षा कर सकता है।

हाईकोर्ट ने पुराने फैसलों को क्यों माना महत्वपूर्ण?

प्रोमिला गुप्ता की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत के सामने प्रेरणा बनाम राज्य और अमित कुमार बनाम दिल्ली सरकार के फैसलों का उल्लेख किया।

इन फैसलों का संदर्भ इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि वे भी दिल्ली संपत्ति विरूपण निवारण अधिनियम की धारा 3 के तहत दर्ज प्राथमिकी से जुड़े थे।

किसी मामले में पहले दिए गए न्यायिक निर्णय बाद के समान मामलों में कानूनी सिद्धांतों को समझने में मदद करते हैं। यदि किसी अदालत ने पहले ही किसी विशेष प्रकार की जांच प्रक्रिया या कानूनी प्रावधान की व्याख्या की है, तो समान तथ्यों वाले मामले में उस निर्णय पर विचार किया जा सकता है।

हालांकि, किसी पूर्व फैसले की प्रयोज्यता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके तथ्य, कानूनी प्रश्न और वर्तमान मामले की परिस्थितियां कितनी समान हैं। केवल किसी पुराने निर्णय का उल्लेख कर देना पर्याप्त नहीं होता; अदालत को यह देखना होता है कि उसमें निर्धारित सिद्धांत वर्तमान मामले पर लागू होता है या नहीं।

इस मामले में हाईकोर्ट ने पूर्व के फैसलों से जुड़े कानूनी सिद्धांतों पर विचार किया और निष्कर्ष निकाला कि शिकायतकर्ता तथा जांच अधिकारी का एक ही व्यक्ति होना जांच की बुनियादी निष्पक्षता के विरुद्ध है।

अदालत ने इसी आधार पर याचिकाकर्ता को राहत दी।

प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का क्या है महत्व?

प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत किसी भी निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया की बुनियाद माने जाते हैं। इनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करने वाली कार्रवाई निष्पक्ष प्रक्रिया के माध्यम से हो।

प्राकृतिक न्याय का एक प्रसिद्ध सिद्धांत है कि कोई व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता। इसे सामान्यतः Nemo judex in causa sua कहा जाता है।

इस सिद्धांत का मूल भाव यह है कि निर्णय लेने वाला व्यक्ति निष्पक्ष होना चाहिए और उसके सामने किसी पक्ष के प्रति पूर्वाग्रह या हितों के टकराव की स्थिति नहीं होनी चाहिए।

हालांकि, पुलिस जांच और न्यायिक निर्णय की भूमिकाएं अलग हैं। जांच अधिकारी न्यायाधीश नहीं होता, लेकिन उससे भी अपेक्षा की जाती है कि वह तथ्यों और साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच करे।

यदि किसी मामले में शिकायतकर्ता ही जांच अधिकारी बन जाता है, तो यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या जांच स्वतंत्र रूप से की गई। इसी कारण अदालतों ने कुछ परिस्थितियों में ऐसी व्यवस्था को निष्पक्ष जांच के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना है।

प्रोमिला गुप्ता के मामले में हाईकोर्ट ने इसी बुनियादी चिंता पर ध्यान दिया। अदालत ने कहा कि जब जांच की प्रक्रिया में ऐसी खामी हो, तो मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लिया जाना उसे दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या अंतिम आदेश दिया?

न्यायमूर्ति प्रतीक जालान की पीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए प्रोमिला गुप्ता के खिलाफ 29 नवंबर 2022 को तिमारपुर थाने में दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया।

अदालत ने प्राथमिकी से जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियों को भी निरस्त करने का आदेश दिया। इस प्रकार याचिकाकर्ता को उस मामले में राहत मिली, जिसमें शिकायतकर्ता पुलिस अधिकारी ने ही जांच अधिकारी के रूप में भी काम किया था।

अदालत का फैसला जांच की निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित था। पीठ ने यह स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट द्वारा अपराध का संज्ञान लिए जाने के बावजूद जांच की बुनियादी खामी की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।

इस आदेश को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि हाईकोर्ट ने संबंधित मामले की प्राथमिकी और उससे जुड़ी कार्यवाही रद्द की है। इसे इस व्यापक निष्कर्ष के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए कि शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी के एक होने से हर मामले में स्वतः प्राथमिकी रद्द हो जाएगी। किसी भी मामले में लागू कानून, न्यायिक नजीर और विशिष्ट परिस्थितियां महत्वपूर्ण रहेंगी।

फैसले का व्यापक कानूनी महत्व

दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला पुलिस जांच की विश्वसनीयता और निष्पक्षता को लेकर महत्वपूर्ण संदेश देता है। आपराधिक न्याय व्यवस्था में शिकायत दर्ज होने के बाद जांच का स्वतंत्र और निष्पक्ष होना आवश्यक है, क्योंकि उसी जांच के आधार पर आरोपपत्र दाखिल किया जा सकता है और आरोपी को मुकदमे का सामना करना पड़ सकता है।

यदि जांच की प्रक्रिया में बुनियादी कानूनी खामी हो, तो अदालत उसके प्रभाव की समीक्षा कर सकती है। मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लिया जाना अपने आप में ऐसी जांच को वैध नहीं बना देता, जिसे अदालत प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत पाए।

प्रोमिला गुप्ता के मामले में हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी की दोहरी भूमिका को गंभीरता से लिया। अदालत ने पूर्व के फैसलों और संबंधित मामले की परिस्थितियों पर विचार करते हुए प्राथमिकी तथा सभी संबंधित कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।

निष्कर्षतः, दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि निष्पक्ष जांच आपराधिक न्याय व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है। शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी की भूमिका एक ही व्यक्ति द्वारा निभाए जाने से यदि जांच की बुनियादी निष्पक्षता प्रभावित होती है, तो अदालत उचित मामले में हस्तक्षेप कर सकती है। तिमारपुर पार्षद प्रोमिला गुप्ता को इसी आधार पर राहत मिली और उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी तथा उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियां रद्द कर दी गईं।

IndianLawNotes.com | कानूनी समाचार एवं न्यायिक फैसलों का विश्लेषण

✓
संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।