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दिल्ली हाईकोर्ट की बड़ी पहल: स्वच्छ सार्वजनिक शौचालय जीवन के अधिकार का हिस्सा, अब कॉलेज के छात्र करेंगे औचक निरीक्षण

दिल्ली हाईकोर्ट की बड़ी पहल: स्वच्छ सार्वजनिक शौचालय जीवन के अधिकार का हिस्सा, अब कॉलेज के छात्र करेंगे औचक निरीक्षण

दिल्ली हाईकोर्ट ने सार्वजनिक शौचालयों की बदहाल स्थिति और स्वच्छता व्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि स्वच्छ और स्वास्थ्यकर सार्वजनिक शौचालयों तक पहुंच जीवन के अधिकार का एक अहम हिस्सा है। इस व्यवस्था को बेहतर बनाने और जमीनी हकीकत सामने लाने के लिए अदालत ने दिल्ली के तीन प्रमुख सामाजिक कार्य संस्थानों के विद्यार्थियों की टीमें बनाकर नगर निगम के अंतर्गत आने वाले सार्वजनिक शौचालयों का औचक निरीक्षण कराने का प्रस्ताव रखा है। निरीक्षण के दौरान छात्र-छात्राएं शौचालयों की स्थिति का जायजा लेंगे, तस्वीरें खींचेंगे और अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेंगे। इस कार्य के लिए विद्यार्थियों को उचित मानदेय देने का भी प्रस्ताव है। अदालत की इस पहल का उद्देश्य केवल गंदगी की पहचान करना नहीं, बल्कि नगर निगम की जवाबदेही तय करना और सार्वजनिक सुविधाओं में सुधार सुनिश्चित करना है।

दिल्ली जैसे बड़े महानगर में लाखों लोग प्रतिदिन अपने काम, कारोबार, पढ़ाई और अन्य जरूरतों के लिए घर से बाहर निकलते हैं। ऐसे में सार्वजनिक शौचालयों की उपलब्धता और उनकी साफ-सफाई सीधे तौर पर आम नागरिकों के स्वास्थ्य, गरिमा और दैनिक जीवन को प्रभावित करती है। यदि सार्वजनिक स्थानों पर शौचालय तो मौजूद हों, लेकिन उनकी स्थिति इतनी खराब हो कि लोग उनका इस्तेमाल करने से बचें, तो ऐसी सुविधा का उद्देश्य ही अधूरा रह जाता है।

इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने सार्वजनिक शौचालयों की वास्तविक स्थिति का स्वतंत्र तरीके से आकलन कराने का प्रस्ताव रखा है। अदालत की यह पहल स्वच्छता व्यवस्था की निगरानी, नागरिक सुविधाओं की गुणवत्ता और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान आया प्रस्ताव

यह मामला जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसे वर्ष 2023 में ‘जन सेवा कल्याण समाज’ की ओर से दायर किया गया था। याचिका में सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति और उनकी स्वच्छता से संबंधित मुद्दे उठाए गए हैं।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह सवाल था कि सार्वजनिक शौचालयों की साफ-सफाई और रखरखाव सुनिश्चित करने के लिए मौजूद व्यवस्था को अधिक प्रभावी कैसे बनाया जाए।

नगर निगम की ओर से स्वच्छता और रखरखाव के लिए प्रयास किए जाने के बावजूद जमीनी स्तर पर अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने की बात सामने आई। इसके बाद अदालत ने ऐसी व्यवस्था पर विचार किया, जिसमें शौचालयों की वास्तविक स्थिति का निरीक्षण कराया जाए और उसकी रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जा सके।

इस मामले में कार्यवाहक मुख्य न्यायमूर्ति नितिन डब्ल्यू. सांबरे और न्यायमूर्ति संजय शर्मा की पीठ ने 16 अक्टूबर को आदेश पारित किया।

अदालत ने दिल्ली विश्वविद्यालय के दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कॉलेज ऑफ सोशल वर्क और दिल्ली विश्वविद्यालय के अदिति महाविद्यालय के प्रमुखों से निरीक्षण के लिए छात्र-छात्राओं की टीमें तैयार करने का आग्रह किया।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि अदालत ने इस स्तर पर निरीक्षण के लिए प्रस्ताव रखा है और संबंधित संस्थानों तथा नगर निगम के अधिकारियों से उनका पक्ष मांगा है। अंतिम व्यवस्था के संबंध में उचित आदेश उनकी प्रतिक्रिया पर विचार करने के बाद पारित किया जाना है।

किन कॉलेजों के छात्र करेंगे सार्वजनिक शौचालयों का निरीक्षण?

दिल्ली हाईकोर्ट ने इस कार्य के लिए तीन शैक्षणिक संस्थानों का उल्लेख किया है।

इनमें दिल्ली विश्वविद्यालय का दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क, जामिया मिल्लिया इस्लामिया का कॉलेज ऑफ सोशल वर्क और दिल्ली विश्वविद्यालय का अदिति महाविद्यालय शामिल हैं।

अदालत की मंशा है कि इन संस्थानों के छात्र-छात्राओं की टीमें सार्वजनिक शौचालयों का निरीक्षण करें और उनकी मौजूदा स्थिति का दस्तावेजीकरण करें।

इस प्रक्रिया में महिला और पुरुष, दोनों विद्यार्थियों को शामिल करने का प्रस्ताव है। इससे निरीक्षण के दौरान अलग-अलग उपयोगकर्ताओं के अनुभवों और जरूरतों को समझने में मदद मिल सकती है।

सार्वजनिक शौचालयों की समस्या केवल गंदगी तक सीमित नहीं होती। कई बार पानी की कमी, खराब दरवाजे, टूटे हुए नल, बंद शौचालय, रोशनी का अभाव और नियमित सफाई नहीं होने जैसी समस्याएं भी सामने आती हैं।

महिलाओं के लिए उपयोगी सुविधाओं की कमी, पर्याप्त गोपनीयता का अभाव और शौचालयों की असुरक्षित स्थिति भी गंभीर चिंता का विषय हो सकती है।

यदि निरीक्षण के दौरान इन पहलुओं पर व्यवस्थित जानकारी एकत्र की जाती है, तो प्रशासन को यह समझने में मदद मिल सकती है कि किन स्थानों पर तत्काल सुधार की जरूरत है।

हालांकि, निरीक्षण की अंतिम प्रक्रिया, उसका दायरा और रिपोर्ट तैयार करने के मानक संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया तथा अदालत के आगे के आदेशों पर निर्भर करेंगे।

तस्वीरों के साथ तैयार होगी विस्तृत रिपोर्ट

अदालत के प्रस्ताव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा निरीक्षण के बाद विस्तृत रिपोर्ट तैयार करना है। विद्यार्थियों से अपेक्षा की गई है कि वे सार्वजनिक शौचालयों की वास्तविक स्थिति का आकलन करें और तस्वीरों सहित अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करें।

तस्वीरों के माध्यम से शौचालयों की सफाई, उपलब्ध सुविधाओं और रखरखाव की स्थिति को समझना आसान हो सकता है। इससे अधिकारियों के सामने केवल सामान्य शिकायतें ही नहीं, बल्कि संबंधित स्थानों की स्थिति का दस्तावेजी रिकॉर्ड भी उपलब्ध होगा।

उदाहरण के लिए, यदि किसी शौचालय में पानी की व्यवस्था नहीं है, फर्श पर गंदगी जमा है या शौचालय का कोई हिस्सा क्षतिग्रस्त है, तो निरीक्षण रिपोर्ट में उस समस्या का उल्लेख किया जा सकता है।

इसी प्रकार, यदि किसी स्थान पर नियमित सफाई नहीं हो रही है या आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, तो तस्वीरों और लिखित विवरण के जरिए उस कमी को स्पष्ट किया जा सकता है।

ऐसी रिपोर्ट का उद्देश्य किसी अधिकारी या कर्मचारी को बिना जांच के दोषी ठहराना नहीं, बल्कि वास्तविक कमियों की पहचान करना और सुधार के लिए प्रशासन को ठोस जानकारी उपलब्ध कराना होना चाहिए।

यदि रिपोर्ट के आधार पर संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट रूप से पता चल सके कि किन शौचालयों में क्या समस्याएं हैं, तो मरम्मत, सफाई और रखरखाव की प्राथमिकताएं तय करने में भी आसानी होगी।

इससे सार्वजनिक धन से बनाई गई सुविधाओं के वास्तविक उपयोग और उनकी गुणवत्ता का आकलन करने का अवसर मिल सकता है।

निरीक्षण करने वाले विद्यार्थियों को मिलेगा मानदेय

अदालत ने यह भी प्रस्ताव रखा है कि निरीक्षण और रिपोर्ट तैयार करने के काम में शामिल विद्यार्थियों को उचित मानदेय दिया जाए।

यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि निरीक्षण के लिए विद्यार्थियों को अलग-अलग स्थानों पर जाना पड़ सकता है। उन्हें शौचालयों की स्थिति का आकलन करने, तस्वीरें लेने, आवश्यक विवरण दर्ज करने और रिपोर्ट तैयार करने में समय देना होगा।

मानदेय मिलने से इस कार्य में विद्यार्थियों की भागीदारी को प्रोत्साहन मिल सकता है। साथ ही, इसे केवल शैक्षणिक गतिविधि के बजाय एक जिम्मेदार सामाजिक कार्य के रूप में व्यवस्थित करने में सहायता मिल सकती है।

सामाजिक कार्य के विद्यार्थियों को समुदाय की समस्याओं, नागरिक सुविधाओं और सार्वजनिक संस्थानों की कार्यप्रणाली को समझने का अवसर भी मिल सकता है।

हालांकि, इस प्रस्ताव के व्यावहारिक क्रियान्वयन के लिए निरीक्षण का कार्यक्रम, विद्यार्थियों की भूमिका, रिपोर्ट का प्रारूप और भुगतान से संबंधित व्यवस्था स्पष्ट करना आवश्यक होगा। इन विषयों पर अंतिम निर्णय संबंधित संस्थानों और नगर निगम की प्रतिक्रिया के बाद अदालत के निर्देशों के अनुसार लिया जा सकता है।

स्वच्छ सार्वजनिक शौचालय जीवन के अधिकार से कैसे जुड़े हैं?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। न्यायिक व्याख्या में जीवन के अधिकार को केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं माना गया है। इसमें मानवीय गरिमा के साथ जीवन जीने के लिए आवश्यक परिस्थितियों का भी महत्व है।

स्वच्छता, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि किसी व्यक्ति को सार्वजनिक स्थान पर शौचालय की आवश्यकता हो और उपलब्ध सुविधा गंदी, असुरक्षित या अनुपयोगी हो, तो उसे कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

इसका प्रभाव महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और दिव्यांग व्यक्तियों पर विशेष रूप से पड़ सकता है। लंबे समय तक शौचालय का उपयोग न कर पाना, अस्वच्छ स्थानों का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर होना या जरूरत पड़ने पर उपयुक्त सुविधा नहीं मिलना किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य और गरिमा को प्रभावित कर सकता है।

स्वच्छ सार्वजनिक शौचालय केवल एक बुनियादी नागरिक सुविधा नहीं हैं। वे सार्वजनिक स्वास्थ्य और शहर में सुरक्षित आवागमन के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।

इसी व्यापक संदर्भ में हाईकोर्ट ने स्वच्छ और स्वास्थ्यकर सार्वजनिक शौचालयों तक पहुंच को जीवन के अधिकार का अहम हिस्सा बताया है।

इस टिप्पणी का अर्थ यह है कि सार्वजनिक सुविधाओं की गुणवत्ता को केवल निर्माण या उपलब्धता के आधार पर नहीं परखा जा सकता। यह भी देखना जरूरी है कि वे वास्तव में उपयोग करने योग्य हैं या नहीं और नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करती हैं या नहीं।

एमसीडी की जिम्मेदारी पर अदालत की सख्ती

अदालत ने स्पष्ट किया कि नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में आने वाले सार्वजनिक शौचालयों को साफ-सुथरा और उपयोग के योग्य बनाए रखना दिल्ली नगर निगम का सांविधिक कर्तव्य है।

किसी सार्वजनिक शौचालय का निर्माण कर देना या उसे नागरिकों के इस्तेमाल के लिए खोल देना ही पर्याप्त नहीं है। उसकी नियमित सफाई, पानी की उपलब्धता, आवश्यक मरम्मत और उचित रखरखाव भी जरूरी हैं।

यदि इन कामों में लगातार लापरवाही होती है, तो नागरिकों को उपलब्ध कराई गई सुविधा का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता।

अदालत ने कहा कि नगर निगम द्वारा स्वच्छता सुनिश्चित करने के प्रयासों के बावजूद जमीनी स्तर पर संतोषजनक परिणाम नहीं मिल रहे हैं। इस स्थिति में निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई करने की व्यवस्था पर विचार किया गया है।

प्रस्ताव के अनुसार, निरीक्षण से प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर स्वच्छता के प्रभारी अतिरिक्त आयुक्त उचित कदम उठाएंगे।

इससे संबंधित अधिकारी के सामने यह जिम्मेदारी होगी कि रिपोर्ट में सामने आई समस्याओं की समीक्षा की जाए और आवश्यक सुधार के लिए कदम उठाए जाएं।

यह व्यवस्था तभी प्रभावी साबित होगी, जब निरीक्षण के बाद रिपोर्ट पर कार्रवाई भी हो। यदि कमियों की पहचान तो कर ली जाए, लेकिन उनकी मरम्मत या सफाई के लिए कोई कदम नहीं उठाया जाए, तो निरीक्षण का अपेक्षित लाभ नहीं मिल सकेगा।

इसलिए निगरानी के साथ-साथ सुधार की समय-सीमा, जिम्मेदारी और कार्रवाई की समीक्षा भी महत्वपूर्ण होगी।

लापरवाही मिलने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही

दिल्ली हाईकोर्ट ने सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति के मामले में अधिकारियों की जवाबदेही पर भी जोर दिया है।

अदालत के समक्ष प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, किसी प्रकार की चूक पाए जाने पर संबंधित उप आयुक्त को जवाबदेह बनाया जाएगा। यदि लगातार लापरवाही सामने आती है, तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई की जा सकती है।

इस पहल का महत्व इसलिए है, क्योंकि सार्वजनिक सुविधाओं के रखरखाव में जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।

कई बार किसी शौचालय की खराब स्थिति को लेकर शिकायतें सामने आती हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि उसकी सफाई, मरम्मत या निगरानी के लिए कौन-सा अधिकारी जिम्मेदार है। ऐसी स्थिति में समस्या लंबे समय तक बनी रह सकती है।

यदि निरीक्षण रिपोर्ट में कमियों को स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाए और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी निर्धारित हो, तो सुधार की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित बन सकती है।

हालांकि, जवाबदेही तय करने का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक कमी के लिए किसी अधिकारी को बिना जांच के दंडित कर दिया जाए। संबंधित तथ्यों, जिम्मेदारियों और परिस्थितियों का उचित आकलन करना आवश्यक होगा।

लेकिन जहां लापरवाही स्थापित होती है, वहां नियमों के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। सार्वजनिक धन और नागरिक सुविधाओं के प्रभावी प्रबंधन के लिए यह आवश्यक है।

महिलाओं और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए क्यों जरूरी है बेहतर व्यवस्था?

सार्वजनिक शौचालयों की खराब स्थिति का असर सभी नागरिकों पर पड़ता है, लेकिन कुछ वर्गों को इससे अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

महिलाओं के लिए साफ-सुथरे शौचालयों की उपलब्धता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। सार्वजनिक स्थानों पर पर्याप्त सुविधाएं न होने से उन्हें यात्रा, कामकाज और अन्य दैनिक गतिविधियों में परेशानी हो सकती है।

इसी तरह, बच्चों और बुजुर्गों को भी स्वच्छ तथा सुरक्षित शौचालयों की आवश्यकता होती है। यदि किसी सुविधा में पानी नहीं है, फर्श फिसलन भरा है या दरवाजे और अन्य आवश्यक हिस्से खराब हैं, तो उसका उपयोग करना मुश्किल हो सकता है।

दिव्यांग व्यक्तियों के लिए भी ऐसे शौचालय जरूरी हैं, जिनका इस्तेमाल उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप किया जा सके। केवल शौचालय का मौजूद होना पर्याप्त नहीं है; वहां पहुंचने और उसका सुरक्षित उपयोग करने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है।

इसीलिए सार्वजनिक शौचालयों के निरीक्षण में साफ-सफाई के साथ-साथ उपयोगिता और पहुंच से जुड़े पहलुओं पर ध्यान देना उपयोगी होगा।

यदि इन सभी जरूरतों को ध्यान में रखकर सार्वजनिक सुविधाओं का मूल्यांकन किया जाए, तो नगर निगम को सुधार के लिए अधिक व्यावहारिक दिशा मिल सकती है।

अगली सुनवाई 2 नवंबर को, अब आगे क्या होगा?

दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 2 नवंबर के लिए सूचीबद्ध की है।

अदालत ने निरीक्षण के प्रस्ताव पर तीनों सामाजिक कार्य संस्थानों के प्रमुखों और नगर निगम के अधिकारियों से उनका पक्ष मांगा है। संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया पर विचार करने के बाद अदालत उचित आदेश पारित करेगी।

अगली सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि विद्यार्थियों की टीमें गठित करने और सार्वजनिक शौचालयों का औचक निरीक्षण कराने की व्यवस्था किस प्रकार लागू की जाएगी।

इसमें निरीक्षण का दायरा, रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया, संबंधित अधिकारियों की भूमिका और अन्य व्यावहारिक पहलुओं पर आगे निर्देश दिए जा सकते हैं।

फिलहाल, इस प्रस्ताव को अंतिम रूप से लागू हो चुकी व्यवस्था के रूप में देखना उचित नहीं होगा। अदालत ने इस संबंध में संबंधित पक्षों से प्रतिक्रिया मांगी है और आगे का निर्णय सुनवाई के बाद लिया जाना है।

फिर भी, अदालत की पहल से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि सार्वजनिक सुविधाओं की गुणवत्ता और उनकी निगरानी को गंभीरता से लिया जा रहा है।

निष्कर्ष

दिल्ली हाईकोर्ट की यह पहल सार्वजनिक स्वच्छता, नागरिक सुविधाओं और सरकारी जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि स्वच्छ और स्वास्थ्यकर सार्वजनिक शौचालयों तक पहुंच जीवन के अधिकार का अहम हिस्सा है। साथ ही, नगर निगम के अंतर्गत आने वाले शौचालयों की वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए सामाजिक कार्य के विद्यार्थियों से औचक निरीक्षण कराने का प्रस्ताव रखा है।

यदि यह व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है और निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर समय पर कार्रवाई की जाती है, तो सार्वजनिक शौचालयों की सफाई तथा रखरखाव में सुधार लाने में मदद मिल सकती है।

इस पहल की सफलता केवल निरीक्षण करने या रिपोर्ट तैयार करने पर निर्भर नहीं करेगी। वास्तविक परिणाम तब सामने आएंगे, जब रिपोर्ट में दर्ज कमियों को दूर किया जाएगा, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित होगी और नागरिकों को स्वच्छ तथा उपयोगी सुविधाएं मिलेंगी।

साफ-सुथरे सार्वजनिक शौचालय किसी शहर की बुनियादी जरूरत हैं। उनका रखरखाव केवल प्रशासनिक काम नहीं, बल्कि नागरिकों के स्वास्थ्य, सम्मान और गरिमापूर्ण जीवन से जुड़ी जिम्मेदारी है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।