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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मेडिकल जांच से इनकार करने पर यौन हिंसा पीड़िता का मुआवजा नहीं रोका जा सकता

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मेडिकल जांच से इनकार करने पर यौन हिंसा पीड़िता का मुआवजा नहीं रोका जा सकता, नाबालिग को 10 दिन में मिलेंगे 3 लाख रुपये

        इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यौन हिंसा की पीड़ित महिलाओं और बच्चियों के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर किसी पीड़िता को सरकारी मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसने मेडिकल जांच कराने की सहमति नहीं दी या उसके पास चोटों से संबंधित मेडिकल रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष नियमावली, 2015 के तहत लागू ऐसी शर्त को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जिसके कारण मेडिकल रिपोर्ट के अभाव में आर्थिक सहायता रोकी जा सकती थी। इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को जौनपुर की एक नाबालिग पीड़िता को 10 दिनों के भीतर तीन लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने का निर्देश दिया।

यह फैसला केवल एक बच्ची को आर्थिक सहायता दिलाने तक सीमित नहीं है। इसके जरिए अदालत ने महिलाओं और बच्चों की गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता, निजता तथा सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के तहत मिलने वाली सहायता के अधिकार पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। फैसले का मूल संदेश यह है कि किसी अपराध की पीड़िता को सहायता देने की प्रक्रिया ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिसमें उसे अपने अधिकारों और सरकारी मदद में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर होना पड़े।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले का है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, 28 जनवरी 2024 को शाहगंज थाने में आठ वर्षीय बच्ची के साथ यौन हिंसा के आरोप में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। घटना की जानकारी सामने आने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई।

बाद में, 8 मार्च 2024 को बच्ची को मेडिकल जांच के लिए ले जाया गया। हालांकि, बच्ची के परिवार ने इस जांच के लिए सहमति नहीं दी। इसके परिणामस्वरूप चोटों से संबंधित मेडिकल रिपोर्ट तैयार नहीं हो सकी।

मामले में पुलिस ने 20 मार्च को आरोपपत्र दाखिल कर दिया और आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन रहा। हालांकि, आपराधिक मुकदमे की सुनवाई और पीड़िता को सरकारी आर्थिक सहायता दिए जाने का प्रश्न दो अलग-अलग कानूनी पहलू हैं।

पीड़िता की मां ने अपनी बच्ची के लिए उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष के तहत आर्थिक सहायता की मांग की। इस योजना का उद्देश्य यौन हिंसा सहित निर्धारित अपराधों से प्रभावित महिलाओं और बच्चियों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है, ताकि वे अपराध के बाद उत्पन्न कठिन परिस्थितियों का सामना कर सकें।

लेकिन जिला स्तरीय समिति ने मेडिकल रिपोर्ट उपलब्ध नहीं होने के आधार पर आर्थिक सहायता का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। इस निर्णय से पीड़िता को सरकारी सहायता नहीं मिल सकी।

इसके बाद पीड़िता की मां ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में सहायता देने से इनकार करने के निर्णय को चुनौती दी गई। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या मेडिकल जांच के लिए सहमति नहीं देने या चोटों की मेडिकल रिपोर्ट उपलब्ध नहीं होने के कारण किसी पीड़िता को सरकारी मुआवजे से वंचित किया जा सकता है?

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने क्या कहा?

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने की।

अदालत ने मामले के तथ्यों और लागू नियमों पर विचार करते हुए कहा कि मेडिकल जांच के लिए सहमति देना व्यक्ति का कानूनी अधिकार है। किसी व्यक्ति की शारीरिक स्वायत्तता और गरिमा का सम्मान करना आवश्यक है। इसलिए मेडिकल जांच के लिए सहमति नहीं देने को सरकारी सहायता रोकने का स्वतःसिद्ध आधार नहीं बनाया जा सकता।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मेडिकल रिपोर्ट का उपलब्ध न होना और अपराध की घटना का न होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। केवल इसलिए कि किसी पीड़िता की चोटों के संबंध में मेडिकल रिपोर्ट नहीं बनी, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसके साथ अपराध नहीं हुआ या वह सहायता पाने की पात्र नहीं है।

अदालत के सामने यह भी महत्वपूर्ण था कि जिला स्तरीय समिति ने मेडिकल रिपोर्ट के अभाव को सहायता से इनकार करने का आधार बनाया था। ऐसे में यह देखना जरूरी था कि क्या प्रशासन किसी कल्याणकारी योजना की शर्त को इस तरह लागू कर सकता है, जिससे पीड़िता के मौलिक अधिकार प्रभावित हों।

हाईकोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट न होने के आधार पर मुआवजा रोकने वाली संबंधित शर्त को असंवैधानिक घोषित कर दिया। अदालत ने राज्य सरकार को नाबालिग पीड़िता को 10 दिनों के भीतर तीन लाख रुपये की सहायता देने का निर्देश भी दिया।

इस प्रकार अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी पीड़िता की सहायता का निर्णय केवल एक दस्तावेज की उपलब्धता के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। संबंधित मामले के तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानूनी प्रावधानों पर समुचित विचार करना आवश्यक है।

रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष योजना क्या है?

उत्तर प्रदेश में अपराध से प्रभावित महिलाओं और बच्चियों को सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष योजना संचालित की गई है। इसका उद्देश्य निर्धारित श्रेणियों के अपराधों से प्रभावित पीड़िताओं को आर्थिक सहयोग प्रदान करना है, ताकि वे अपराध के बाद पैदा होने वाली आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों का सामना कर सकें।

यौन हिंसा जैसी घटनाओं के बाद पीड़िता और उसके परिवार को कई तरह की समस्याओं से गुजरना पड़ सकता है। चिकित्सा, देखभाल, शिक्षा, आवागमन और अन्य आवश्यकताओं के लिए अतिरिक्त धन की जरूरत पड़ सकती है। कई मामलों में परिवार पहले से ही आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहा होता है।

ऐसी परिस्थितियों में सरकारी सहायता पीड़िता के पुनर्वास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

हालांकि, किसी योजना के तहत सहायता प्राप्त करने के लिए निर्धारित पात्रता और प्रक्रियाओं का पालन करना आवश्यक हो सकता है। लेकिन इन प्रक्रियाओं का उद्देश्य पात्र व्यक्तियों को सहायता उपलब्ध कराना होना चाहिए, न कि ऐसी तकनीकी शर्तें लागू करना जिनसे वास्तविक जरूरतमंद व्यक्ति सहायता से वंचित हो जाएं।

इसी संदर्भ में हाईकोर्ट का फैसला महत्वपूर्ण है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि मेडिकल रिपोर्ट को उपलब्ध साक्ष्यों में से एक के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन उसके अभाव को हर परिस्थिति में सहायता अस्वीकार करने का निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता।

मेडिकल जांच के लिए सहमति देना क्यों महत्वपूर्ण है?

मेडिकल जांच आपराधिक मामलों की जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इससे चोटों, शारीरिक स्थिति और अन्य चिकित्सकीय तथ्यों से संबंधित जानकारी मिल सकती है। यौन हिंसा के मामलों में भी चिकित्सा संबंधी साक्ष्य जांच और मुकदमे की सुनवाई में उपयोगी हो सकते हैं।

लेकिन मेडिकल जांच का महत्व होने का अर्थ यह नहीं है कि किसी व्यक्ति की सहमति और गरिमा को नजरअंदाज किया जा सकता है।

भारतीय कानून में किसी व्यक्ति के शरीर, निजता और गरिमा से जुड़े अधिकारों का विशेष महत्व है। मेडिकल जांच की प्रकृति और परिस्थितियों के अनुसार लागू कानूनी प्रावधानों का पालन करना आवश्यक होता है। विशेष रूप से बच्चों से जुड़े मामलों में उनकी सुरक्षा, संवेदनशीलता और सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है।

किसी बच्ची या उसके परिवार के मेडिकल जांच के लिए सहमति नहीं देने के पीछे अलग-अलग परिस्थितियां हो सकती हैं। परिवार मानसिक सदमे में हो सकता है, बच्ची भयभीत हो सकती है या जांच की प्रक्रिया को लेकर असमंजस की स्थिति हो सकती है।

हर मामले में इन कारणों का एक जैसा होना जरूरी नहीं है। लेकिन केवल जांच नहीं होने के आधार पर पीड़िता के साथ हुए कथित अपराध की गंभीरता को कम करके नहीं आंका जा सकता।

यदि मेडिकल जांच के लिए सहमति नहीं दी गई, तो जांच एजेंसी और संबंधित अधिकारियों को उपलब्ध अन्य सामग्री पर भी विचार करना चाहिए। इसके साथ ही पीड़िता और उसके परिवार को कानूनी प्रक्रिया तथा उपलब्ध सहायता के बारे में उचित जानकारी देना भी आवश्यक है।

यही वह महत्वपूर्ण अंतर है जिसे समझना जरूरी है। मेडिकल जांच अपराध की जांच में सहायक हो सकती है, लेकिन सरकारी सहायता के लिए किसी व्यक्ति की शारीरिक स्वायत्तता से समझौता कराना उचित नहीं है।

क्या मेडिकल रिपोर्ट नहीं होने का मतलब है कि अपराध साबित नहीं हुआ?

इस मामले में हाईकोर्ट की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी यह भी रही कि प्राथमिकी, आरोपपत्र या मेडिकल रिपोर्ट में से कोई भी दस्तावेज अपने आप यह अंतिम रूप से तय नहीं करता कि अपराध हुआ है या नहीं।

प्राथमिकी किसी संज्ञेय अपराध की सूचना के आधार पर दर्ज की जाती है। आरोपपत्र जांच पूरी होने के बाद पुलिस द्वारा सक्षम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। वहीं, मेडिकल रिपोर्ट चिकित्सकीय परीक्षण से संबंधित निष्कर्षों और तथ्यों को दर्ज कर सकती है।

इन सभी दस्तावेजों की कानूनी भूमिका अलग-अलग होती है।

आरोपपत्र दाखिल होने का अर्थ यह नहीं है कि आरोपी दोषी सिद्ध हो गया। इसी प्रकार, मेडिकल रिपोर्ट उपलब्ध न होने का अर्थ यह भी नहीं है कि अपराध की घटना हुई ही नहीं।

आपराधिक मुकदमे में आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों का मूल्यांकन न्यायालय साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर करता है। अभियोजन पक्ष को निर्धारित कानूनी मानक के अनुसार आरोप साबित करने होते हैं। आरोपी को भी कानून के तहत अपना बचाव प्रस्तुत करने का अधिकार प्राप्त होता है।

इसलिए किसी पीड़िता को सरकारी सहायता देने के प्रश्न को आपराधिक मुकदमे में दोषसिद्धि के प्रश्न के साथ पूरी तरह एक जैसा नहीं माना जा सकता।

यदि किसी योजना में सहायता के लिए पात्रता संबंधी शर्तें निर्धारित हैं, तो अधिकारियों को उनका कानून के अनुरूप मूल्यांकन करना चाहिए। लेकिन केवल मेडिकल रिपोर्ट न होने के आधार पर यह मान लेना कि पीड़िता सहायता की हकदार नहीं है, उचित नहीं होगा।

यह अंतर पीड़ितों के अधिकारों और आपराधिक न्याय व्यवस्था, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन कैसे हुआ?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य की कार्रवाई मनमानी न हो और समान परिस्थितियों वाले व्यक्तियों के साथ बिना उचित आधार के भेदभाव न किया जाए।

इस मामले में मेडिकल रिपोर्ट उपलब्ध होने और उपलब्ध नहीं होने के आधार पर पीड़िताओं के बीच अंतर किए जाने का प्रश्न सामने आया।

मान लीजिए कि दो बच्चियां समान प्रकृति के अपराध से प्रभावित हुई हैं। दोनों को आर्थिक सहायता की आवश्यकता है। लेकिन एक बच्ची की मेडिकल जांच हो गई और उसकी रिपोर्ट उपलब्ध है, जबकि दूसरी बच्ची की जांच के लिए सहमति नहीं दी गई।

यदि केवल इस अंतर के कारण पहली बच्ची को सरकारी सहायता मिल जाए और दूसरी बच्ची को पूरी तरह वंचित कर दिया जाए, तो यह सवाल उठता है कि क्या ऐसा अंतर करने का कोई उचित और संवैधानिक आधार है?

हाईकोर्ट ने इस तरह की स्थिति को मनमाना माना।

अदालत की दृष्टि में मेडिकल रिपोर्ट का अभाव अपने आप में ऐसा निर्णायक आधार नहीं हो सकता, जिसके कारण अन्यथा पात्र पीड़िता को आर्थिक सहायता से वंचित कर दिया जाए।

यहां अनुच्छेद 14 का महत्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि सरकारी योजनाओं का संचालन भी संविधान के अनुरूप होना चाहिए। प्रशासनिक समितियां और सरकारी अधिकारी किसी नियम को लागू करते समय मनमाने तरीके से निर्णय नहीं ले सकते।

इस फैसले से यह सिद्धांत सामने आता है कि कल्याणकारी योजनाओं की शर्तों को लागू करते समय समानता, तर्कसंगतता और पीड़िता के अधिकारों का ध्यान रखना आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और टू-फिंगर टेस्ट का संदर्भ

यौन हिंसा से जुड़े मामलों में पीड़िता की गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले भी महत्वपूर्ण निर्देश दे चुका है।

विशेष रूप से तथाकथित टू-फिंगर टेस्ट को लेकर न्यायपालिका ने स्पष्ट किया है कि यह परीक्षण पीड़िता की गरिमा का उल्लंघन करता है और इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, जिससे यह निर्धारित किया जा सके कि महिला के साथ यौन हिंसा हुई है या नहीं।

ऐसे परीक्षणों से जुड़े पुराने दृष्टिकोण में यह मान लिया जाता था कि महिला के शरीर की कुछ शारीरिक विशेषताओं से उसके यौन इतिहास या कथित घटना के संबंध में निष्कर्ष निकाला जा सकता है। आधुनिक चिकित्सकीय और कानूनी दृष्टिकोण में ऐसे निष्कर्षों को स्वीकार नहीं किया जाता।

किसी महिला का यौन इतिहास यह निर्धारित नहीं करता कि उसके साथ यौन हिंसा हुई है या नहीं। इसी तरह, शरीर पर चोट के निशान न होना भी अपने आप में यौन हिंसा की घटना को नकारने का आधार नहीं बनता।

हालांकि, टू-फिंगर टेस्ट और सामान्य चिकित्सकीय जांच अलग-अलग विषय हैं। प्रत्येक मेडिकल जांच को अनुचित नहीं कहा जा सकता। चिकित्सकीय परीक्षण उचित परिस्थितियों में महत्वपूर्ण साक्ष्य उपलब्ध करा सकता है। लेकिन ऐसी जांच कानून, सहमति, गरिमा और चिकित्सा संबंधी मानकों के अनुरूप होनी चाहिए।

वर्तमान मामले में भी मूल प्रश्न यही था कि मेडिकल जांच या रिपोर्ट के अभाव को पीड़िता के खिलाफ इस तरह इस्तेमाल किया जा सकता है या नहीं कि उसे सरकारी सहायता से वंचित कर दिया जाए।

अदालत के फैसले का महत्व इस बात में है कि पीड़िता के अधिकारों और सरकारी सहायता के बीच ऐसा संबंध नहीं बनाया जाना चाहिए, जिसमें एक अधिकार का उपयोग दूसरे अधिकार को समाप्त करने के लिए किया जाए।

क्या इस फैसले से सभी पीड़िताओं को अपने आप मुआवजा मिल जाएगा?

हाईकोर्ट के इस फैसले को समझते समय एक महत्वपूर्ण बात ध्यान में रखना जरूरी है। मेडिकल रिपोर्ट नहीं होने के आधार पर सहायता रोकने वाली शर्त को असंवैधानिक घोषित करने का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक मामले में हर पीड़िता को बिना किसी प्रक्रिया या पात्रता जांच के स्वतः मुआवजा मिल जाएगा।

सरकारी योजनाओं के तहत आर्थिक सहायता प्राप्त करने के लिए निर्धारित कानूनी प्रावधानों और पात्रता संबंधी शर्तों का पालन आवश्यक हो सकता है।

संबंधित अधिकारियों को यह देखना होगा कि मामला योजना के दायरे में आता है या नहीं, आवश्यक दस्तावेज कौन-से उपलब्ध हैं और लागू नियमों के अनुसार सहायता देने की पात्रता बनती है या नहीं।

लेकिन निर्णय लेते समय मेडिकल रिपोर्ट के अभाव को ही सहायता अस्वीकार करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। अधिकारियों को अन्य उपलब्ध सामग्री और मामले की परिस्थितियों पर भी विचार करना होगा।

इस प्रकार, फैसले का उद्देश्य सहायता प्रक्रिया को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप बनाना है।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अदालत ने इस मामले में नाबालिग पीड़िता को तीन लाख रुपये की सहायता देने का विशिष्ट निर्देश दिया है। इस राशि और समय-सीमा को प्रत्येक मामले पर स्वतः लागू मानने से पहले संबंधित योजना, मामले के तथ्यों और लागू न्यायिक आदेशों को देखना आवश्यक होगा।

पीड़िताओं के पुनर्वास में क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

यौन हिंसा का प्रभाव केवल घटना तक सीमित नहीं रहता। पीड़िता और उसके परिवार को मानसिक तनाव, सामाजिक दबाव, सुरक्षा संबंधी चिंताओं और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

नाबालिग बच्चियों के मामलों में यह स्थिति और संवेदनशील हो जाती है। उन्हें शिक्षा जारी रखने, सुरक्षित वातावरण में रहने और सामान्य जीवन की ओर लौटने के लिए परिवार तथा समाज के सहयोग की आवश्यकता होती है।

ऐसी परिस्थितियों में सरकारी सहायता केवल आर्थिक लेन-देन नहीं है। यह पीड़िता के पुनर्वास और उसके जीवन को दोबारा व्यवस्थित करने में मदद करने का एक माध्यम भी है।

यदि सहायता की प्रक्रिया में ऐसी शर्तें लागू कर दी जाएं, जिनके कारण वास्तविक जरूरतमंद व्यक्ति केवल तकनीकी कारणों से बाहर हो जाए, तो योजना का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।

इसलिए प्रशासनिक अधिकारियों के लिए यह आवश्यक है कि वे प्रत्येक आवेदन पर संवेदनशीलता और निष्पक्षता के साथ विचार करें। दस्तावेजों की जांच जरूरी है, लेकिन किसी दस्तावेज की अनुपलब्धता को हर परिस्थिति में सहायता रोकने का अंतिम कारण नहीं माना जाना चाहिए।

पीड़िता की गरिमा, निजता और कानूनी अधिकारों की रक्षा करना भी न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

सरकारी अधिकारियों और जिला स्तरीय समितियों के लिए क्या है संदेश?

इस फैसले से सरकारी अधिकारियों और आर्थिक सहायता के आवेदनों पर विचार करने वाली समितियों के सामने एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्पष्ट होता है। किसी भी कल्याणकारी योजना के तहत निर्णय लेते समय नियमों को संविधान और लागू कानूनों के अनुरूप समझना आवश्यक है।

यदि किसी आवेदन में मेडिकल रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है, तो संबंधित अधिकारी को यह देखना चाहिए कि अन्य कौन-से दस्तावेज और तथ्य उपलब्ध हैं। निर्णय केवल यांत्रिक तरीके से किसी एक दस्तावेज की अनुपस्थिति के आधार पर नहीं होना चाहिए।

साथ ही, योजना के अंतर्गत निर्धारित पात्रता, जांच प्रक्रिया और अन्य आवश्यकताओं का पालन भी किया जाना चाहिए। संवेदनशील मामलों में प्रशासनिक निर्णय लेते समय पीड़िता की परिस्थितियों और उसके अधिकारों पर समुचित विचार करना जरूरी है।

यदि किसी आवेदन को अस्वीकार किया जाता है, तो निर्णय लागू कानून और योजना के प्रावधानों के अनुरूप होना चाहिए। मनमाना या ऐसा निर्णय, जो संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित करता हो, न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकता है।

इस मामले में हाईकोर्ट ने संबंधित शर्त को असंवैधानिक घोषित करके यह स्पष्ट किया कि सरकारी सहायता की प्रक्रिया को इस तरह नहीं चलाया जा सकता, जिससे पीड़िता के अधिकारों पर अनुचित प्रतिबंध लगे।

निष्कर्ष: पीड़िता की गरिमा और अधिकारों से समझौता नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला यौन हिंसा से प्रभावित महिलाओं और बच्चियों के अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मेडिकल जांच के लिए सहमति देना व्यक्ति का अधिकार है और मेडिकल रिपोर्ट उपलब्ध नहीं होने मात्र से सरकारी मुआवजा रोकना उचित नहीं है।

जौनपुर की आठ वर्षीय बच्ची के मामले में अदालत ने राज्य सरकार को 10 दिनों के भीतर तीन लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने का निर्देश दिया। साथ ही, मेडिकल रिपोर्ट के अभाव में सहायता रोकने वाली संबंधित शर्त को असंवैधानिक घोषित किया।

इस फैसले का व्यापक संदेश यह है कि न्याय और सहायता की प्रक्रिया में पीड़िता की गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए। सरकारी योजनाओं का उद्देश्य जरूरतमंद लोगों तक सहायता पहुंचाना है। उनकी शर्तों को लागू करते समय यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि कोई पात्र पीड़िता केवल तकनीकी आधार पर अपने अधिकारों से वंचित न रह जाए।

कानून का उद्देश्य पीड़िता के लिए सहायता का रास्ता खोलना होना चाहिए, न कि ऐसी बाधाएं खड़ी करना जिनसे उसे न्याय और सम्मान के साथ जीवन जीने में और कठिनाइयों का सामना करना पड़े।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।