मेरठ ब्लू ड्रम हत्याकांड: मौत की सजा के खिलाफ मुस्कान और साहिल पहुंचे इलाहाबाद हाईकोर्ट, अभियोजन के सबूतों पर उठाए सवाल
मेरठ के चर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में दोषी ठहराए गए मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी है। दोनों ने खुद को निर्दोष बताते हुए सभी आरोपों से बरी करने की मांग की है। अपील में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों, गवाहों के बयानों, बरामदगी की प्रक्रिया और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की वैधता पर सवाल उठाए गए हैं।
क्या है पूरा मामला?
उत्तर प्रदेश के मेरठ में सामने आया ब्लू ड्रम हत्याकांड वर्ष 2025 के चर्चित आपराधिक मामलों में शामिल रहा। इस मामले में मुस्कान रस्तोगी और उसके साथी साहिल शुक्ला को सौरभ राजपूत की हत्या का दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई गई थी। अब दोनों दोषियों ने निचली अदालत के फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
दोनों की ओर से दाखिल अपील में कहा गया है कि निचली अदालत का फैसला अवैध और मनमाना है तथा अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। अपीलकर्ताओं ने अदालत से सभी आरोपों से बरी किए जाने की मांग की है।
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, मेरठ जिला जेल के वरिष्ठ जेल अधीक्षक वीरेश राज शर्मा ने बताया कि दोनों की ओर से शुक्रवार को वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील शुक्ला ने अपील दाखिल की। अधिवक्ता के अनुसार, मुस्कान और साहिल ने उन्हें अपना वकील नियुक्त करने की सहमति दी थी, जिसके बाद निचली अदालत के निर्णय को चुनौती दी गई।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक खंडपीठ अगले सप्ताह मामले की सुनवाई कर सकती है। हालांकि, अपील दाखिल होना और उस पर अंतिम निर्णय आना दो अलग-अलग चरण हैं। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान ही यह तय होगा कि निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने वाले तर्कों में कितना कानूनी आधार है।
1. मार्च 2025 में हुई थी सौरभ राजपूत की हत्या
यह मामला मेरठ के ब्रह्मपुरी थाना क्षेत्र में 3 मार्च 2025 को हुई सौरभ राजपूत की हत्या से संबंधित है। सौरभ पूर्व मर्चेंट नेवी अधिकारी थे और मुस्कान रस्तोगी के पति थे।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, सौरभ की हत्या के बाद उनके शव को छिपाने के लिए सीमेंट और कंक्रीट से भरे नीले प्लास्टिक ड्रम का इस्तेमाल किया गया था। इसी कारण यह मामला आम लोगों के बीच ब्लू ड्रम हत्याकांड के नाम से चर्चित हुआ।
पुलिस ने घटना की जांच की और मुस्कान तथा साहिल को गिरफ्तार किया। जांच के दौरान जुटाए गए साक्ष्यों के आधार पर दोनों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाया गया।
मामले की गंभीरता और परिस्थितियों के कारण इस मुकदमे पर व्यापक सार्वजनिक ध्यान रहा। हालांकि, किसी भी आपराधिक मामले में जनचर्चा या आरोपों की गंभीरता अपने आप दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकती। अदालत को अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर निर्णय लेना होता है।
इसी सिद्धांत के तहत निचली अदालत में मामले की सुनवाई हुई और अब दोषियों ने उस निर्णय को उच्च न्यायालय में चुनौती दी है।
2. निचली अदालत ने कब सुनाई थी मौत की सजा?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, मेरठ के जिला न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा की अदालत ने 30 सितंबर को मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को हत्या तथा शव छिपाने के प्रयास से संबंधित मामले में दोषी ठहराया था। इसके बाद 14 अक्टूबर को दोनों को मृत्युदंड सुनाया गया।
बताया गया कि मुकदमे की सुनवाई लगभग 13 महीने चली और इस दौरान 126 सुनवाइयां हुईं।
निचली अदालत ने अभियोजन पक्ष के सामने आए साक्ष्यों और मुकदमे के दौरान प्रस्तुत सामग्री पर विचार करने के बाद दोषसिद्धि का निर्णय दिया था। इसके बाद सजा की मात्रा निर्धारित करते हुए दोनों को मौत की सजा सुनाई गई।
अब अपील में दोनों दोषियों ने इसी निर्णय और सजा को चुनौती दी है। उनका कहना है कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू समझना जरूरी है। भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में दोषसिद्धि के खिलाफ अपील का अधिकार उपलब्ध है। अपीलीय अदालत यह जांच सकती है कि निचली अदालत ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया या नहीं, कानूनी सिद्धांतों का पालन हुआ या नहीं और दोषसिद्धि तथा सजा कानून के अनुरूप हैं या नहीं।
इसलिए मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद हाईकोर्ट में अपील दाखिल करना न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
3. अभियोजन के परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर सवाल
मुस्कान और साहिल की अपील का एक प्रमुख आधार यह है कि पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था।
परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) ऐसे साक्ष्य होते हैं, जिनमें अपराध की घटना को किसी प्रत्यक्षदर्शी द्वारा सीधे देखे जाने के बजाय विभिन्न परिस्थितियों और तथ्यों के बीच संबंध स्थापित करके निष्कर्ष निकाला जाता है।
उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति की घटनास्थल पर मौजूदगी, घटना से पहले और बाद का आचरण, वस्तुओं की बरामदगी, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और अन्य परिस्थितियां मिलकर अभियोजन की कहानी का समर्थन कर सकती हैं।
लेकिन केवल कई परिस्थितियों का मौजूद होना पर्याप्त नहीं है। आपराधिक मुकदमे में अभियोजन को यह स्थापित करना होता है कि परिस्थितियों की पूरी कड़ी आरोपित अपराध की ओर संकेत करती है और उससे निकलने वाला निष्कर्ष उचित संदेह से परे हो।
अपील में दोनों दोषियों ने दावा किया है कि ट्रायल कोर्ट ने स्थापित कानूनी सिद्धांतों की अनदेखी की और परिस्थितियों के आधार पर ऐसे निष्कर्ष निकाले, जिन्हें वे अटकलों पर आधारित मानते हैं।
हालांकि, यह अपीलकर्ताओं का पक्ष है। इन तर्कों को स्वीकार करना या खारिज करना हाईकोर्ट का काम होगा। केवल अपील में किसी कमी का उल्लेख कर दिए जाने से यह साबित नहीं हो जाता कि निचली अदालत का फैसला गलत था।
4. हथियार, सीमेंट और ड्रम की खरीद के गवाहों पर आपत्ति
अपील में हथियार, सीमेंट और ड्रम की खरीद से संबंधित गवाहों के बयानों में कथित विरोधाभासों का मुद्दा भी उठाया गया है।
अभियोजन पक्ष के लिए किसी वस्तु की खरीद या उपलब्धता से संबंधित गवाही महत्वपूर्ण हो सकती है, विशेष रूप से तब जब उस वस्तु को कथित अपराध से जोड़ा जा रहा हो।
लेकिन ऐसी गवाही का मूल्यांकन करते समय अदालत को यह देखना होता है कि गवाह ने वास्तव में क्या देखा, उसकी जानकारी कितनी विश्वसनीय है और उसके बयान की पुष्टि अन्य साक्ष्यों से होती है या नहीं।
अपीलकर्ताओं ने दावा किया है कि संबंधित वस्तुओं की खरीद की पुष्टि के लिए सीसीटीवी फुटेज पेश नहीं की गई और न ही वैध खरीद रसीदें उपलब्ध कराई गईं।
इस तर्क के जरिए वे अभियोजन की उस कहानी पर सवाल उठाना चाहते हैं, जिसमें कथित तौर पर इन वस्तुओं की खरीद को अपराध से जोड़कर देखा गया।
हालांकि, किसी वस्तु की खरीद की रसीद या सीसीटीवी फुटेज का उपलब्ध न होना हर मामले में अपने आप अभियोजन के पूरे मुकदमे को समाप्त नहीं करता। अदालत को यह देखना होता है कि अन्य साक्ष्य क्या हैं, गवाहों के बयान कितने विश्वसनीय हैं और उपलब्ध सामग्री के आधार पर अपराध से संबंधित निष्कर्ष निकाला जा सकता है या नहीं।
इस मामले में हाईकोर्ट को अपील में उठाए गए तर्कों और निचली अदालत के रिकॉर्ड का परीक्षण करना होगा।
5. बरामदगी के दस्तावेजों पर स्वतंत्र गवाहों के हस्ताक्षर का मुद्दा
अपीलकर्ताओं ने बरामदगी से संबंधित दस्तावेजों पर स्वतंत्र गवाहों के हस्ताक्षर नहीं होने का मुद्दा भी उठाया है।
आपराधिक जांच में बरामदगी का विशेष महत्व हो सकता है। यदि पुलिस किसी वस्तु को अपराध से संबंधित बताकर जब्त करती है, तो उस कार्रवाई की प्रक्रिया, दस्तावेजी रिकॉर्ड और बरामद वस्तु की पहचान का सही होना महत्वपूर्ण है।
स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी कई परिस्थितियों में बरामदगी की विश्वसनीयता के मूल्यांकन में सहायता कर सकती है। लेकिन किसी बरामदगी की वैधता केवल एक औपचारिक पहलू से तय नहीं होती। संबंधित कानून, मामले के तथ्य, गवाहों के बयान और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों को साथ देखकर निर्णय लिया जाता है।
मुस्कान और साहिल की ओर से यह दावा किया गया है कि बरामदगी से संबंधित दस्तावेजों में स्वतंत्र गवाहों के हस्ताक्षर नहीं हैं।
हाईकोर्ट को यह देखना होगा कि संबंधित दस्तावेज किस प्रकार तैयार किए गए थे, बरामदगी की प्रक्रिया के बारे में निचली अदालत के सामने क्या सामग्री रखी गई और कथित कमी का मामले की दोषसिद्धि पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि अपील में उठाई गई आपत्ति को अदालत द्वारा स्वीकार किया जाना अभी शेष है। फिलहाल इसे अपीलकर्ताओं के कानूनी तर्क के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
6. वीडियोग्राफी की प्रक्रिया में कथित अनियमितताएं
अपील में जांच के दौरान वीडियोग्राफी की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
आधुनिक आपराधिक जांच में घटनास्थल, तलाशी, बरामदगी और अन्य महत्वपूर्ण गतिविधियों की रिकॉर्डिंग साक्ष्य के रूप में उपयोगी हो सकती है। वीडियोग्राफी से किसी कार्रवाई की परिस्थितियों को समझने और दस्तावेजी रिकॉर्ड की पुष्टि करने में मदद मिल सकती है।
लेकिन ऐसी रिकॉर्डिंग का मूल्यांकन करते समय उसकी प्रामाणिकता, तैयार करने की प्रक्रिया, रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के तरीके और अन्य साक्ष्यों के साथ उसके संबंध को देखना जरूरी होता है।
अपीलकर्ताओं का दावा है कि मामले में वीडियोग्राफी की प्रक्रिया में अनियमितताएं थीं। उनके अनुसार, इन कमियों का असर अभियोजन के साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर पड़ सकता है।
इस संबंध में हाईकोर्ट को यह देखना होगा कि कथित अनियमितताएं वास्तव में रिकॉर्ड से साबित होती हैं या नहीं और यदि कोई कमी थी, तो उसका कानूनी प्रभाव क्या है।
हर प्रक्रियात्मक त्रुटि का परिणाम समान नहीं होता। कुछ कमियां साक्ष्य के मूल्यांकन को प्रभावित कर सकती हैं, जबकि कुछ मामलों में अदालत अन्य विश्वसनीय सामग्री के आधार पर भी निष्कर्ष निकाल सकती है। अंतिम निर्णय लागू कानून और मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा।
7. इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के प्रमाणपत्र को लेकर क्या है विवाद?
अपील में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के लिए आवश्यक प्रमाणपत्रों की कमी का मुद्दा भी उठाया गया है।
आजकल आपराधिक मामलों में मोबाइल फोन, डिजिटल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, इलेक्ट्रॉनिक संदेश और अन्य डिजिटल सामग्री महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। लेकिन इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को अदालत में साक्ष्य के रूप में पेश करते समय संबंधित साक्ष्य कानून की आवश्यकताओं का पालन करना होता है।
इस मामले में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि 1 जुलाई 2024 से भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) लागू है। इसलिए वर्ष 2025 की घटना और उसके बाद हुई कार्यवाही के संबंध में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का मूल्यांकन लागू संक्रमणकालीन प्रावधानों और संबंधित साक्ष्य कानून के अनुसार किया जाना चाहिए।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 63 इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की स्वीकार्यता से संबंधित प्रावधानों में शामिल है। निर्धारित परिस्थितियों में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड प्रस्तुत करते समय आवश्यक प्रमाणपत्र और अन्य शर्तों का पालन करना पड़ सकता है।
अपीलकर्ताओं का कहना है कि मामले में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के लिए आवश्यक प्रमाणपत्रों की कमी थी।
यदि यह आपत्ति रिकॉर्ड से समर्थित होती है, तो हाईकोर्ट को यह विचार करना पड़ सकता है कि संबंधित इलेक्ट्रॉनिक सामग्री को कानून के अनुसार किस प्रकार प्रस्तुत किया गया था और उसका साक्ष्य के रूप में उपयोग उचित था या नहीं।
हालांकि, केवल प्रमाणपत्र से संबंधित आपत्ति उठाए जाने से सभी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य अपने आप अमान्य नहीं हो जाते। अदालत को संबंधित रिकॉर्ड और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर निर्णय करना होगा।
8. मौत की सजा के मामले में हाईकोर्ट की भूमिका
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि निचली अदालत ने दोनों दोषियों को मृत्युदंड सुनाया है।
भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में मौत की सजा सबसे कठोर दंड है। इसलिए ऐसे मामलों में न्यायिक परीक्षण और वैधानिक प्रक्रिया का विशेष महत्व होता है।
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 366 के तहत सत्र न्यायालय द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को हाईकोर्ट की पुष्टि के लिए भेजने की व्यवस्था थी। हाईकोर्ट द्वारा पुष्टि किए जाने से पहले उस सजा को अंतिम रूप से लागू नहीं किया जा सकता था।
1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) में भी मृत्युदंड की पुष्टि से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं। हालांकि, किसी विशेष मामले में कौन-से प्रक्रियात्मक प्रावधान लागू होंगे, यह संबंधित कार्यवाही और संक्रमणकालीन नियमों के आधार पर निर्धारित किया जाता है।
मृत्युदंड के मामले में हाईकोर्ट को निचली अदालत के निष्कर्षों, साक्ष्यों, दोषसिद्धि और सजा से जुड़े प्रश्नों पर लागू कानून के अनुसार विचार करना होता है।
इसलिए मुस्कान और साहिल की अपील का महत्व केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि उन्होंने निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी है। यह भी महत्वपूर्ण है कि हाईकोर्ट मामले के साक्ष्यों और दोषसिद्धि के कानूनी आधार की समीक्षा करेगा।
9. क्या अपील दाखिल होने से दोषियों की सजा समाप्त हो जाती है?
इस प्रश्न का उत्तर है—नहीं।
किसी दोषी द्वारा अपील दाखिल करने का अर्थ यह नहीं है कि निचली अदालत का फैसला अपने आप रद्द हो गया है। अपील एक कानूनी उपाय है, जिसके माध्यम से उच्च न्यायालय से निर्णय की समीक्षा करने का अनुरोध किया जाता है।
जब तक सक्षम अदालत संबंधित फैसले में बदलाव नहीं करती या उसे रद्द नहीं करती, तब तक केवल अपील दाखिल होने को दोषमुक्ति नहीं माना जा सकता।
मृत्युदंड के मामलों में सजा की पुष्टि से संबंधित विशेष कानूनी प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होती है।
इस मामले में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला ने निचली अदालत के निर्णय को चुनौती देते हुए बरी किए जाने की मांग की है। अब उनकी दलीलों, अभियोजन पक्ष के जवाब और निचली अदालत के रिकॉर्ड के आधार पर आगे की न्यायिक प्रक्रिया चलेगी।
हाईकोर्ट अपील में उठाए गए प्रश्नों पर विचार करके कानून के अनुसार उचित निर्णय करेगा।
10. मामले में आगे क्या हो सकता है?
आगामी सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने अपीलकर्ताओं की ओर से उठाए गए विभिन्न मुद्दे आ सकते हैं। इनमें परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की विश्वसनीयता, गवाहों के बयानों में कथित विरोधाभास, बरामदगी के दस्तावेज, वीडियोग्राफी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों से संबंधित आपत्तियां शामिल हैं।
अदालत को यह देखना होगा कि निचली अदालत ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों का मूल्यांकन किस प्रकार किया और क्या दोषसिद्धि के निष्कर्ष उपलब्ध सामग्री तथा लागू कानून के अनुरूप हैं।
यह भी संभव है कि सुनवाई के दौरान किसी विशेष साक्ष्य या कानूनी प्रश्न पर विस्तार से विचार किया जाए। लेकिन हाईकोर्ट क्या निर्णय देगा, यह पहले से निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।
अपील में उठाए गए तर्कों की वास्तविक स्थिति का निर्धारण अदालत के समक्ष मौजूद मूल रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों से होगा।
इसलिए मामले की अगली सुनवाई और उसके बाद जारी होने वाले न्यायिक आदेश पर ध्यान देना महत्वपूर्ण होगा।
निष्कर्ष
मेरठ के ब्लू ड्रम हत्याकांड में मौत की सजा पाए मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दाखिल करके निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी है। दोनों ने अभियोजन के परिस्थितिजन्य साक्ष्यों, गवाहों के बयानों, बरामदगी की प्रक्रिया, वीडियोग्राफी और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए बरी किए जाने की मांग की है।
निचली अदालत ने दोनों को हत्या और शव छिपाने के प्रयास से संबंधित मामले में दोषी ठहराकर मृत्युदंड सुनाया था। अब हाईकोर्ट में अपील की प्रक्रिया के दौरान इन निष्कर्षों की कानूनी समीक्षा की जाएगी।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपील में लगाए गए आरोपों और उठाई गई आपत्तियों को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। अदालत को उपलब्ध साक्ष्यों, कानूनी प्रावधानों और दोनों पक्षों की दलीलों के आधार पर निर्णय करना होगा।
आपराधिक न्याय व्यवस्था में अपील का अधिकार इसलिए महत्वपूर्ण है, ताकि निचली अदालत के निर्णयों की उच्च न्यायालय द्वारा समीक्षा हो सके और कानून के अनुसार न्याय सुनिश्चित किया जा सके। इस चर्चित मामले में भी आगे की दिशा हाईकोर्ट की सुनवाई और उसके आदेश से तय होगी।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।