पॉक्सो मामले में राकेश चंद्र को आजीवन कारावास, एक लाख रुपये का जुर्माना; फतेहगढ़ पुलिस की प्रभावी पैरवी के बाद कोर्ट का फैसला
उत्तर प्रदेश में महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध होने वाले गंभीर अपराधों में दोषियों को सजा दिलाने के लिए पुलिस और अभियोजन पक्ष की प्रभावी पैरवी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसी क्रम में कायमगंज थाना क्षेत्र से जुड़े एक गंभीर यौन अपराध के मामले में विशेष पॉक्सो न्यायालय ने अभियुक्त राकेश चंद्र को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। न्यायालय ने दोषी पर एक लाख रुपये का अर्थदंड भी लगाया है। यह फैसला 22 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया।
पुलिस के अनुसार, मामले की विवेचना पूरी करने के बाद समय से आरोप-पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया था। इसके बाद मुकदमे की सुनवाई के दौरान पुलिस, मॉनीटरिंग सेल और अभियोजन पक्ष ने प्रभावी पैरवी की। न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों और अभियोजन पक्ष की दलीलों पर विचार करने के बाद अभियुक्त को दोषी ठहराया गया।
इस कार्रवाई को गंभीर अपराधों में दोषियों को सजा दिलाने के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा की जा रही प्रभावी पैरवी के प्रयासों से जोड़कर देखा जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
प्राप्त पुलिस विवरण के अनुसार, अभियुक्त राकेश चंद्र पुत्र बृजभान के विरुद्ध थाना कायमगंज में वर्ष 2023 में एक गंभीर आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। अभियुक्त का स्थायी पता अचरिया वाखरपुर, थाना मेरापुर बताया गया है, जबकि उसका वर्तमान पता मोहल्ला छपट्टी, थाना कायमगंज, जनपद फतेहगढ़ दर्ज किया गया था।
इस मामले में थाना कायमगंज पर मुकदमा अपराध संख्या 78/2023 दर्ज हुआ था। संबंधित वाद संख्या 471/2023 बताई गई है। अभियुक्त के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 377 तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 यानी पॉक्सो अधिनियम की धारा 5M/6 के अंतर्गत अभियोग पंजीकृत किया गया था।
मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने विवेचना की प्रक्रिया पूरी की और आरोप-पत्र न्यायालय में भेजा। इसके बाद न्यायालय में मुकदमे की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने अभियुक्त के विरुद्ध अपना पक्ष प्रस्तुत किया और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपों को साबित करने का प्रयास किया।
अंततः विशेष पॉक्सो न्यायालय ने 22 अक्टूबर 2026 को अभियुक्त को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास और एक लाख रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई।
पुलिस की विवेचना और अभियोजन की पैरवी की रही अहम भूमिका
किसी भी आपराधिक मामले में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद विवेचना और न्यायालय में अभियोजन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। केवल मुकदमा दर्ज होना अपने आप में दोष सिद्ध होने के लिए पर्याप्त नहीं है। आरोपों को न्यायालय में विधि के अनुसार प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर साबित करना आवश्यक होता है।
इस मामले में पुलिस के अनुसार, थाना कायमगंज की टीम ने विवेचना पूरी कर समयबद्ध तरीके से आरोप-पत्र न्यायालय में प्रेषित किया। इसके बाद मॉनीटरिंग सेल, अभियोजन पक्ष और न्यायालय में पैरवी करने वाले पुलिसकर्मियों ने मुकदमे की सुनवाई के दौरान समन्वय के साथ कार्य किया।
पुलिस विभाग में मॉनीटरिंग सेल का उद्देश्य गंभीर आपराधिक मामलों की न्यायालयीन कार्यवाही पर नजर रखना और संबंधित अधिकारियों के साथ समन्वय स्थापित करना होता है, ताकि मुकदमे की पैरवी में अनावश्यक देरी न हो तथा आवश्यक साक्ष्य और अभिलेख समय पर उपलब्ध कराए जा सकें।
हालांकि, प्रत्येक मामले में दोषसिद्धि का निर्णय न्यायालय द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और लागू कानून के आधार पर स्वतंत्र रूप से किया जाता है। पुलिस या अभियोजन की पैरवी अपने आप में दोषसिद्धि का विकल्प नहीं है, बल्कि न्यायालय को मामले के तथ्यों और साक्ष्यों से अवगत कराने की प्रक्रिया का हिस्सा है।
पॉक्सो अधिनियम क्या है?
बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए संसद ने लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 बनाया है। इसे सामान्य रूप से पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) कहा जाता है।
इस कानून का मुख्य उद्देश्य 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को यौन उत्पीड़न, यौन हमले और अश्लील उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किए जाने जैसे अपराधों से सुरक्षा देना है। यह कानून बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों से संबंधित मामलों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालयों की व्यवस्था भी करता है।
पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत अपराध की प्रकृति और गंभीरता के अनुसार अलग-अलग दंड निर्धारित किए गए हैं। कुछ गंभीर अपराधों के लिए कठोर कारावास और जुर्माने का प्रावधान है।
इस कानून की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि इसमें बच्चों के हितों और उनकी गरिमा को ध्यान में रखते हुए न्यायिक प्रक्रिया अपनाने पर जोर दिया गया है। ऐसे मामलों में पीड़ित बच्चे की पहचान की गोपनीयता बनाए रखना भी आवश्यक है।
इसलिए पॉक्सो से संबंधित किसी भी मामले की रिपोर्टिंग करते समय मीडिया और अन्य व्यक्तियों को ऐसी जानकारी प्रकाशित करने से बचना चाहिए, जिससे पीड़ित बच्चे की पहचान उजागर हो सकती हो।
भारतीय दंड संहिता की धाराओं में दर्ज हुआ था मुकदमा
पुलिस के उपलब्ध विवरण के अनुसार, यह मुकदमा भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 377 के साथ पॉक्सो अधिनियम की संबंधित धाराओं के अंतर्गत दर्ज किया गया था।
भारतीय दंड संहिता की धारा 376 बलात्कार के अपराध के लिए दंड से संबंधित थी। वहीं, धारा 377 ऐतिहासिक रूप से अप्राकृतिक यौन अपराधों से संबंधित प्रावधान रही है। इन धाराओं का उल्लेख वर्ष 2023 में दर्ज मामले की प्राथमिकी में किया गया था।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 ने भारतीय दंड संहिता का स्थान लिया है और नए आपराधिक कानून 1 जुलाई 2024 से लागू हुए। हालांकि, किसी अपराध पर कौन-सा दंड कानून लागू होगा, यह अपराध की तारीख, लागू वैधानिक प्रावधानों और संक्रमण संबंधी नियमों पर निर्भर करता है।
इस मामले में प्राथमिकी वर्ष 2023 की बताई गई है। इसलिए मुकदमे में भारतीय दंड संहिता की धाराओं का उल्लेख पुराने कानून के अंतर्गत दर्ज अभियोग के संदर्भ में किया गया है।
इसी तरह, पॉक्सो अधिनियम की धारा 5 गंभीर या गंभीरतर परिस्थितियों में किए गए यौन हमले से संबंधित है, जबकि धारा 6 ऐसे गंभीर अपराध के लिए दंड निर्धारित करती है। पुलिस विवरण में धारा 5M का उल्लेख किया गया है। इस उपधारा या खंड की सटीक वैधानिक पहचान मूल प्राथमिकी अथवा आरोप-पत्र से सत्यापित की जानी चाहिए, ताकि समाचार में किसी कानूनी प्रावधान का गलत उल्लेख न हो।
आजीवन कारावास का क्या अर्थ है?
आजीवन कारावास भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में एक गंभीर दंड है। सामान्य अर्थ में इसका आशय दोषी को उसके शेष प्राकृतिक जीवन के लिए कारावास की सजा देना है, जब तक कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा कानून के अनुसार सजा में छूट, परिवर्तन या अन्य वैधानिक राहत न दी जाए।
आजीवन कारावास का अर्थ हर मामले में अपने आप 14 या 20 वर्ष की कैद नहीं होता। सजा की वास्तविक अवधि पर विचार करते समय न्यायालय के आदेश, लागू कानून और सजा में छूट से संबंधित वैधानिक नियमों को देखना आवश्यक होता है।
इस मामले में विशेष पॉक्सो न्यायालय द्वारा अभियुक्त को आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने की जानकारी पुलिस की ओर से दी गई है। इसके साथ एक लाख रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है। अर्थदंड की वसूली और उससे जुड़े अन्य परिणाम न्यायालय के आदेश तथा लागू कानून के अनुसार निर्धारित होंगे।
एक लाख रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया
आजीवन कारावास के अतिरिक्त न्यायालय ने अभियुक्त पर एक लाख रुपये का अर्थदंड लगाया है। आपराधिक मामलों में कारावास के साथ अर्थदंड लगाए जाने का उद्देश्य कानून के अनुसार दोषी को दंडित करना होता है।
हालांकि, अर्थदंड से संबंधित विस्तृत शर्तें, उसके भुगतान की समय-सीमा और भुगतान न किए जाने की स्थिति में लागू परिणामों की जानकारी न्यायालय के संपूर्ण निर्णय से ही स्पष्ट होगी। उपलब्ध पुलिस विवरण में इन अतिरिक्त शर्तों का उल्लेख नहीं किया गया है।
इसी कारण इस समाचार में अर्थदंड की राशि और कारावास की अवधि के अतिरिक्त कोई ऐसी शर्त नहीं जोड़ी गई है, जिसकी पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती।
प्रभावी पैरवी में इन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका
पुलिस की ओर से जारी विवरण के अनुसार, मामले में अभियोजन पक्ष, मॉनीटरिंग सेल और न्यायालय में पैरवी करने वाले कर्मचारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस प्रकरण में संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के नाम इस प्रकार बताए गए हैं—
- एडीजीसी: श्री तेज सिंह राजपूत
- कोर्ट मोहर्रिर: हेड कांस्टेबल राजेश कुमार
- पैरोकार: कांस्टेबल श्रीकृष्ण
इनके अतिरिक्त थाना कायमगंज की पुलिस टीम और मॉनीटरिंग सेल ने भी मामले की पैरवी में सहयोग किया।
गंभीर आपराधिक मामलों में पुलिस और अभियोजन पक्ष के बीच समन्वय आवश्यक होता है। विवेचना से संबंधित अभिलेख, गवाहों की उपस्थिति, साक्ष्यों का उचित प्रस्तुतीकरण और न्यायालय की कार्यवाही से जुड़े आवश्यक कदम मुकदमे की सुनवाई को आगे बढ़ाने में सहायक होते हैं।
हालांकि, किसी मामले में दोषसिद्धि का अंतिम आधार न्यायालय द्वारा स्वीकार किए गए साक्ष्य और लागू कानून होते हैं। इसलिए प्रभावी पैरवी का महत्व न्यायिक प्रक्रिया को सुचारु बनाने और अभियोजन पक्ष को अपना मामला प्रस्तुत करने का अवसर उपलब्ध कराने के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
गंभीर अपराधों में समयबद्ध न्याय क्यों जरूरी है?
गंभीर यौन अपराधों से जुड़े मामलों में समयबद्ध न्याय का विशेष महत्व है। मुकदमे की सुनवाई में अनावश्यक देरी होने से पीड़ित पक्ष को लंबे समय तक मानसिक और सामाजिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही, गवाहों की उपलब्धता और साक्ष्यों के उचित संरक्षण जैसे विषय भी महत्वपूर्ण होते हैं।
इसीलिए आपराधिक न्याय व्यवस्था में विवेचना को समय पर पूरा करना, आवश्यक साक्ष्य जुटाना और न्यायालय में मुकदमे की नियमित पैरवी करना महत्वपूर्ण माना जाता है।
हालांकि, समयबद्ध न्याय का अर्थ केवल जल्दी फैसला सुनाना नहीं है। निष्पक्ष सुनवाई, आरोपी को अपना पक्ष रखने का अवसर, साक्ष्यों का विधिसम्मत मूल्यांकन और न्यायालय की स्वतंत्रता भी उतने ही आवश्यक सिद्धांत हैं।
किसी व्यक्ति को दोषी तभी माना जाता है, जब न्यायालय उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर दोषसिद्धि का निष्कर्ष निकाले। इस मामले में पुलिस द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, विशेष पॉक्सो न्यायालय ने अभियुक्त को दोषी ठहराकर सजा सुनाई है।
निष्कर्ष
कायमगंज थाना क्षेत्र से जुड़े इस मामले में विशेष पॉक्सो न्यायालय द्वारा राकेश चंद्र को आजीवन कारावास और एक लाख रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई गई है। पुलिस के अनुसार, विवेचना के बाद समय से आरोप-पत्र दाखिल किया गया और मॉनीटरिंग सेल, अभियोजन पक्ष तथा न्यायालय में पैरवी करने वाले पुलिसकर्मियों ने मुकदमे की सुनवाई के दौरान प्रभावी पैरवी की।
यह मामला गंभीर अपराधों में पुलिस की विवेचना, अभियोजन के समन्वय और न्यायालयीन प्रक्रिया के महत्व को रेखांकित करता है। साथ ही, यह भी स्पष्ट करता है कि आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि और सजा का निर्धारण न्यायालय द्वारा साक्ष्यों तथा लागू कानून के आधार पर किया जाता है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।