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मृत्यु पूर्व बयान को मामूली विरोधाभास के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के दोषी की आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी

मृत्यु पूर्व बयान को मामूली विरोधाभास के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के दोषी की आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी

      हत्या के मामलों में मृत्यु पूर्व बयान (Dying Declaration) कई बार न्यायालय के सामने सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में आता है। जब किसी घायल व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और वह मृत्यु से पहले अपने ऊपर हुए हमले तथा हमलावर के संबंध में बयान दे चुका होता है, तो उस बयान की विश्वसनीयता का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। हालांकि, हर मामले में मृत्यु पूर्व बयान को बिना जांचे स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत को यह देखना होता है कि बयान स्वेच्छा से दिया गया था या नहीं, उसे दर्ज करने की परिस्थितियां क्या थीं और क्या अन्य साक्ष्य उसकी पुष्टि करते हैं।

इसी कानूनी सिद्धांत को दोहराते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के एक पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मृत्यु पूर्व बयान पर संदेह करने के लिए ठोस और उचित आधार होना चाहिए। केवल छोटे-मोटे विरोधाभासों के कारण ऐसे बयान को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले में आरोपी की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी।

अदालत ने पाया कि मृतक के मृत्यु पूर्व बयान को चश्मदीद गवाह की गवाही, चिकित्सकीय साक्ष्यों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी समर्थन मिलता है। ऐसे में अस्पताल पहुंचाने के तरीके को लेकर सामने आया मामूली अंतर अभियोजन के पूरे मामले को खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं था।

यह फैसला आपराधिक मुकदमों में साक्ष्यों के मूल्यांकन और मृत्यु पूर्व बयान की कानूनी अहमियत को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

1. क्या है पूरा मामला?

यह मामला उत्तर प्रदेश के बरेली निवासी कृष्ण कुमार उर्फ कुंभकरण से संबंधित है। उस पर आरोप था कि फरवरी 1987 की एक रात जमीन विवाद के दौरान उसने भीम सिंह के पेट में गुप्ती से वार किया था।

आरोप के अनुसार, हमले में भीम सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ और 25 फरवरी की सुबह उनकी मृत्यु हो गई।

घटना के बाद मामले की जांच हुई और आपराधिक मुकदमा ट्रायल कोर्ट के सामने पहुंचा। इस दौरान मृतक का मृत्यु पूर्व बयान भी महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में सामने आया। यह बयान कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किया गया था।

मुकदमे की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने जुलाई 1989 में कृष्ण कुमार उर्फ कुंभकरण को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

आरोपी ने इस निर्णय को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। अपील में अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों, मृत्यु पूर्व बयान की विश्वसनीयता और गवाहों के बयानों में कथित विरोधाभासों को लेकर सवाल उठाए गए।

हाईकोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या अभियोजन के साक्ष्यों में मौजूद बताए गए अंतर इतने गंभीर थे कि दोषसिद्धि को गलत ठहराया जा सके।

अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद आरोपी की दलीलों को स्वीकार नहीं किया और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा।

2. मृत्यु पूर्व बयान क्या होता है?

मृत्यु पूर्व बयान को अंग्रेजी में Dying Declaration कहा जाता है। इसका सामान्य अर्थ ऐसे व्यक्ति का बयान है, जो अपनी मृत्यु से पहले उस घटना या परिस्थितियों के संबंध में जानकारी देता है, जिसके कारण उसकी मृत्यु हुई हो या जो उसकी मृत्यु से संबंधित हों।

उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति पर चाकू से हमला किया जाता है और अस्पताल में उपचार के दौरान वह बताता है कि उस पर किसने हमला किया, हमला किस कारण हुआ और घटना किस प्रकार घटी, तो परिस्थितियों के अनुसार उसका बयान मृत्यु पूर्व बयान के रूप में प्रासंगिक हो सकता है।

भारतीय साक्ष्य कानून में इस प्रकार के बयान को विशेष महत्व दिया गया है। इसका कारण यह है कि कई मामलों में पीड़ित की मृत्यु हो जाने के कारण वह अदालत में आकर अपनी बात नहीं बता सकता। ऐसी स्थिति में मृत्यु से पहले दिया गया उसका बयान घटना के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करा सकता है।

हालांकि, मृत्यु पूर्व बयान को स्वीकार करने के लिए यह आवश्यक है कि अदालत उसकी विश्वसनीयता और प्रासंगिकता का परीक्षण करे।

अदालत यह देख सकती है कि बयान देने वाला व्यक्ति उस समय बयान देने की स्थिति में था या नहीं, बयान दर्ज करने की परिस्थितियां क्या थीं, उसमें किसी प्रकार का दबाव या हस्तक्षेप तो नहीं था और बयान के महत्वपूर्ण हिस्से अन्य साक्ष्यों से मेल खाते हैं या नहीं।

इसलिए मृत्यु पूर्व बयान का महत्व केवल इस बात से तय नहीं होता कि वह मृत्यु से पहले दिया गया था। उसकी वास्तविक विश्वसनीयता और मामले के तथ्यों से उसका संबंध भी महत्वपूर्ण होता है।

3. मृत्यु पूर्व बयान को लेकर हाईकोर्ट ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि मृत्यु पूर्व बयान की विश्वसनीयता पर संदेह करने के लिए ठोस आधार आवश्यक हैं।

अदालत के अनुसार, केवल मामूली विरोधाभासों के आधार पर किसी मृत्यु पूर्व बयान को खारिज नहीं किया जा सकता।

आपराधिक मुकदमों में गवाहों के बयानों और अन्य साक्ष्यों में कुछ अंतर सामने आ सकते हैं। हर अंतर का महत्व एक जैसा नहीं होता। किसी मामले में छोटा अंतर घटना के मूल स्वरूप को प्रभावित नहीं करता, जबकि किसी अन्य मामले में महत्वपूर्ण तथ्य को लेकर गंभीर विरोधाभास अभियोजन की कहानी पर संदेह पैदा कर सकता है।

इसलिए अदालत को यह देखना पड़ता है कि विरोधाभास किस विषय से संबंधित है और क्या उससे घटना के मूल तथ्यों, आरोपी की पहचान या अपराध किए जाने की परिस्थितियों पर वास्तविक संदेह उत्पन्न होता है।

वर्तमान मामले में आरोपी की ओर से अस्पताल पहुंचाने के तरीके को लेकर प्राथमिकी और मृत्यु पूर्व बयान में अंतर होने की दलील दी गई थी।

हाईकोर्ट ने इस अंतर को अभियोजन के पूरे मामले को अविश्वसनीय मानने के लिए पर्याप्त नहीं पाया। अदालत के सामने मृत्यु पूर्व बयान के समर्थन में चश्मदीद गवाह की गवाही और चिकित्सकीय साक्ष्य भी मौजूद थे।

इस प्रकार, अदालत ने साक्ष्यों का मूल्यांकन केवल किसी एक कथन या छोटे अंतर के आधार पर करने के बजाय पूरे घटनाक्रम और उपलब्ध प्रमाणों को ध्यान में रखकर किया।

4. प्राथमिकी और मृत्यु पूर्व बयान में क्या अंतर बताया गया?

आरोपी की ओर से पेश अधिवक्ता ने दलील दी कि प्राथमिकी और मृत्यु पूर्व बयान में घायल भीम सिंह को अस्पताल पहुंचाने के तरीके को लेकर अंतर था।

बचाव पक्ष के अनुसार, इस अंतर के कारण अभियोजन की कहानी की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।

प्राथमिकी (FIR) किसी संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस तक पहुंचाने और आपराधिक जांच की शुरुआत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। दूसरी ओर, मृत्यु पूर्व बयान घटना के संबंध में घायल व्यक्ति द्वारा दी गई जानकारी होती है, जो उसकी मृत्यु के बाद साक्ष्य के रूप में प्रासंगिक हो सकती है।

दोनों का उद्देश्य और दर्ज किए जाने की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। इसलिए इनके बीच किसी अंतर का महत्व निर्धारित करने के लिए संबंधित तथ्यों की जांच जरूरी है।

उदाहरण के लिए, यदि दो दस्तावेजों में केवल यह अंतर हो कि घायल को अस्पताल ले जाने के लिए किस व्यक्ति ने वाहन की व्यवस्था की, तो यह अंतर अपने आप में हमले के आरोपी की पहचान को गलत साबित नहीं करता।

इसके विपरीत, यदि बयान में हमलावर की पहचान, घटना के स्थान या हमले की मूल परिस्थितियों को लेकर गंभीर और अस्पष्ट विरोधाभास हों, तो अदालत को उन पर विशेष ध्यान देना होगा।

इस मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि अस्पताल पहुंचाने के तरीके को लेकर सामने आया अंतर इतना महत्वपूर्ण नहीं था कि इससे अभियोजन की पूरी कहानी खारिज कर दी जाए।

5. चश्मदीद गवाह की गवाही क्यों महत्वपूर्ण रही?

इस मामले में मृत्यु पूर्व बयान के अतिरिक्त चश्मदीद गवाह की गवाही भी अभियोजन के समर्थन में महत्वपूर्ण रही।

चश्मदीद गवाह वह व्यक्ति होता है, जिसने कथित घटना को अपनी आंखों से देखा हो। उसकी गवाही से घटना के तरीके, हमलावर की पहचान और अन्य महत्वपूर्ण परिस्थितियों के बारे में जानकारी मिल सकती है।

हालांकि, किसी व्यक्ति का चश्मदीद होने का दावा कर देना ही उसकी गवाही को अंतिम रूप से विश्वसनीय नहीं बना देता। अदालत को उसके बयान की निरंतरता, उसकी घटना देखने की क्षमता, अन्य साक्ष्यों से उसके मेल और जिरह के दौरान सामने आए तथ्यों का मूल्यांकन करना होता है।

आरोपी की ओर से यह भी दलील दी गई कि चश्मदीद गवाह का बयान दर्ज करने में देरी हुई थी।

बचाव पक्ष की दृष्टि से ऐसी देरी गवाह की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का आधार हो सकती है। लेकिन केवल देरी होने से गवाही स्वतः गलत नहीं हो जाती।

अदालत को यह देखना होता है कि देरी का कोई उचित कारण था या नहीं, उस दौरान गवाह के बयान में बदलाव की आशंका थी या नहीं और उसकी गवाही को अन्य साक्ष्यों से समर्थन मिलता है या नहीं।

वर्तमान मामले में हाईकोर्ट ने समग्र साक्ष्यों पर विचार करते हुए आरोपी की दलीलों को दोषसिद्धि समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं माना।

6. डॉक्टर की पुष्टि और पोस्टमार्टम रिपोर्ट की भूमिका

हत्या के मामलों में चिकित्सकीय साक्ष्य का विशेष महत्व होता है। डॉक्टर की गवाही और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से चोटों की प्रकृति, उनकी गंभीरता, शरीर के किस हिस्से पर चोट लगी और मृत्यु का संभावित कारण समझने में सहायता मिलती है।

इस मामले में मृतक के मृत्यु पूर्व बयान की पुष्टि चश्मदीद गवाह की गवाही के साथ चिकित्सकीय साक्ष्यों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी हुई।

जब किसी घायल व्यक्ति के बयान में हमले की जानकारी दी गई हो और चिकित्सकीय साक्ष्य उस विवरण के महत्वपूर्ण हिस्सों के अनुरूप हों, तो इससे बयान की विश्वसनीयता को समर्थन मिल सकता है।

हालांकि, चिकित्सकीय साक्ष्य और मौखिक गवाही के बीच अंतर होने पर अदालत को यह भी देखना होता है कि वह अंतर कितना महत्वपूर्ण है। प्रत्येक मामले में केवल पोस्टमार्टम रिपोर्ट या केवल मौखिक बयान के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

अदालत उपलब्ध सभी साक्ष्यों को एक साथ देखकर यह तय करती है कि अभियोजन अपना मामला उचित संदेह से परे साबित कर पाया है या नहीं।

इस मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि मृत्यु पूर्व बयान को अन्य साक्ष्यों का समर्थन प्राप्त था। यही कारण रहा कि बचाव पक्ष द्वारा उठाए गए मामूली विरोधाभासों को दोषसिद्धि समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया।

7. आरोपी ने अपने बचाव में क्या कहा?

आरोपी की ओर से यह भी दलील दी गई कि घटना के समय वह अपने पिता को बचाने का प्रयास कर रहा था और इसी दौरान हुई हाथापाई में भीम सिंह को गलती से चोट लग गई।

इस दलील के माध्यम से बचाव पक्ष ने घटना की परिस्थितियों और आरोपी की भूमिका को अलग रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की।

आपराधिक मामलों में आरोपी को अपना बचाव प्रस्तुत करने और अभियोजन के साक्ष्यों को चुनौती देने का अधिकार प्राप्त है। अदालत का दायित्व है कि वह दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध साक्ष्यों पर निष्पक्ष रूप से विचार करे।

यदि कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि चोट जानबूझकर नहीं पहुंचाई गई थी या घटना किसी आकस्मिक परिस्थिति में हुई, तो अदालत को उस दावे का मूल्यांकन मामले के तथ्यों के आधार पर करना होता है।

यह देखा जाता है कि चोट किस प्रकार पहुंची, इस्तेमाल किया गया हथियार क्या था, चोट शरीर के किस हिस्से पर लगी और घटना से संबंधित अन्य साक्ष्य क्या संकेत देते हैं।

केवल यह कह देना कि चोट गलती से लगी थी, अपने आप में आरोपी को दोषमुक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं होता। दूसरी ओर, अभियोजन को भी अपने आरोपों को विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित करना होता है।

वर्तमान मामले में हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष की दलीलों और अभियोजन के साक्ष्यों पर विचार करने के बाद ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया।

8. भारतीय साक्ष्य अधिनियम और मृत्यु पूर्व बयान का कानूनी आधार

मृत्यु पूर्व बयान की स्वीकार्यता भारतीय साक्ष्य कानून का महत्वपूर्ण विषय है।

इस मामले के समय लागू पुराने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 32(1) में ऐसे व्यक्ति के बयान की प्रासंगिकता का प्रावधान था, जो अपनी मृत्यु के कारण या उन परिस्थितियों के संबंध में बयान देता है जिनके परिणामस्वरूप उसकी मृत्यु हुई।

अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) लागू है। इसकी धारा 26 में उन परिस्थितियों से संबंधित प्रासंगिक तथ्यों का प्रावधान है, जिनमें मृत व्यक्ति द्वारा अपनी मृत्यु के कारण या उससे संबंधित परिस्थितियों के बारे में दिया गया बयान शामिल हो सकता है।

नए साक्ष्य कानून के प्रावधानों को समझते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी पुराने मामले पर कौन-सा कानून लागू होगा, यह घटना की तारीख और संबंधित संक्रमणकालीन प्रावधानों पर निर्भर कर सकता है।

चूंकि प्रस्तुत मामला फरवरी 1987 की घटना से संबंधित है, इसलिए उस समय लागू कानून और मुकदमे पर लागू विधिक व्यवस्था के संदर्भ में उसके निर्णय को समझना चाहिए।

मृत्यु पूर्व बयान की स्वीकार्यता और उसका साक्ष्यात्मक महत्व अलग-अलग प्रश्न हैं। किसी बयान का कानून के अंतर्गत प्रासंगिक होना यह नहीं बताता कि वह हर परिस्थिति में स्वतः सत्य मान लिया जाएगा। अदालत को उसकी विश्वसनीयता का भी मूल्यांकन करना होता है।

9. आजीवन कारावास की सजा क्यों बरकरार रही?

ट्रायल कोर्ट ने जुलाई 1989 में कृष्ण कुमार उर्फ कुंभकरण को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इसी फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

अपील में बचाव पक्ष ने मृत्यु पूर्व बयान और प्राथमिकी में कथित अंतर, चश्मदीद गवाह का बयान देर से दर्ज किए जाने तथा घटना के दौरान हाथापाई होने की दलीलें रखीं।

लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि मृत्यु पूर्व बयान को चश्मदीद गवाह की गवाही और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से समर्थन प्राप्त था। अस्पताल पहुंचाने के तरीके से संबंधित मामूली अंतर अभियोजन के मूल मामले को अविश्वसनीय बनाने के लिए पर्याप्त नहीं था।

अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करते हुए आरोपी की अपील खारिज कर दी।

इसका परिणाम यह हुआ कि ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा बरकरार रही।

इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि अपीलीय अदालत किसी आपराधिक मामले में केवल विरोधाभासों की संख्या नहीं देखती, बल्कि उनकी प्रकृति और मामले के मूल तथ्यों पर उनके प्रभाव का मूल्यांकन करती है।

यदि किसी विरोधाभास से अभियोजन की कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा प्रभावित नहीं होता और अन्य विश्वसनीय साक्ष्य आरोपों की पुष्टि करते हैं, तो केवल छोटे अंतर के आधार पर दोषसिद्धि समाप्त करना आवश्यक नहीं है।

10. इस फैसले से क्या कानूनी सिद्धांत सामने आता है?

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले से आपराधिक न्याय व्यवस्था में साक्ष्यों के समग्र मूल्यांकन का महत्व सामने आता है।

पहला, मृत्यु पूर्व बयान किसी हत्या के मुकदमे में महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकता है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता का मूल्यांकन परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।

दूसरा, बयान पर संदेह करने के लिए केवल मामूली अंतर पर्याप्त नहीं होता। यह देखना आवश्यक है कि कथित विरोधाभास मामले के मूल तथ्यों को प्रभावित करता है या नहीं।

तीसरा, चश्मदीद गवाह की गवाही, डॉक्टर की पुष्टि और पोस्टमार्टम रिपोर्ट जैसे साक्ष्य एक-दूसरे को समर्थन दे सकते हैं। अदालत इन सभी का संयुक्त मूल्यांकन कर सकती है।

चौथा, आरोपी को अपना बचाव प्रस्तुत करने और अभियोजन के साक्ष्यों को चुनौती देने का पूरा अधिकार है। लेकिन बचाव पक्ष की दलीलों का मूल्यांकन भी उपलब्ध तथ्यों के आधार पर किया जाता है।

पांचवां, आपराधिक अपील में दोषसिद्धि को चुनौती देने के लिए यह दिखाना आवश्यक होता है कि निचली अदालत के फैसले में ऐसी कानूनी या साक्ष्य संबंधी त्रुटि है, जिसके कारण उसमें हस्तक्षेप किया जाना चाहिए।

निष्कर्षतः, मृत्यु पूर्व बयान की विश्वसनीयता का निर्णय किसी एक छोटे विरोधाभास के आधार पर नहीं किया जा सकता। अदालत को बयान दर्ज करने की परिस्थितियों, उसकी विषयवस्तु और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों को ध्यान में रखना होता है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी दृष्टिकोण के आधार पर आरोपी की अपील खारिज करते हुए हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।