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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: SP के आदेश पर ब्लॉक हुआ न्यूज कंपनी का फेसबुक पेज बहाल होगा, मेटा को 24 घंटे में कार्रवाई के निर्देश

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: SP के आदेश पर ब्लॉक हुआ न्यूज कंपनी का फेसबुक पेज बहाल होगा, मेटा को 24 घंटे में कार्रवाई के निर्देश

      पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया पर समाचार सामग्री को ब्लॉक करने की सरकारी शक्तियों और अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने यमुनानगर के पुलिस अधीक्षक (SP) द्वारा जारी उस निर्देश को रद्द कर दिया, जिसके आधार पर मेटा ने एक न्यूज कंपनी का फेसबुक पेज भारत में ब्लॉक कर दिया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के तहत किसी सामग्री को ब्लॉक करने का निर्देश देने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और अधिकारी की पात्रता का पालन करना जरूरी है।

अदालत के अनुसार, संबंधित नियमों के तहत ऐसा निर्देश पुलिस उपमहानिरीक्षक (DIG) या उससे ऊपर के रैंक के विशेष रूप से अधिकृत अधिकारी द्वारा ही जारी किया जा सकता है। अदालत ने पुलिस अधीक्षक की कार्रवाई को अधिकार क्षेत्र से बाहर और मनमाना करार देते हुए 21 अगस्त 2026 को जारी निर्देश को रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के 24 घंटे के भीतर पुलिस अधीक्षक मेटा को फेसबुक पेज उसकी मूल स्थिति में बहाल करने के लिए कहें। अदालत ने मेटा को भी संबंधित पेज बहाल करने का निर्देश दिया।

इस फैसले का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किसी समाचार संगठन का पेज ब्लॉक होने से उसकी खबरों के प्रसार, पाठकों तक पहुंच और डिजिटल उपस्थिति पर सीधा असर पड़ सकता है। अदालत ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि कंटेंट ब्लॉक करने की प्रक्रिया में संबंधित यूजर को जानकारी देना आवश्यक है, ताकि वह उपलब्ध कानूनी उपायों का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल कर सके।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला हरियाणा के यमुनानगर के पुलिस अधीक्षक द्वारा जारी एक निर्देश से संबंधित है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एसपी के निर्देश के आधार पर मेटा ने एक न्यूज कंपनी का फेसबुक पेज भारत में ब्लॉक कर दिया था।

न्यूज कंपनी के फेसबुक पेज के ब्लॉक होने के बाद इस कार्रवाई को कानूनी चुनौती दी गई। विवाद का प्रमुख मुद्दा यह था कि क्या पुलिस अधीक्षक को सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत सोशल मीडिया सामग्री को ब्लॉक करने का ऐसा निर्देश जारी करने का अधिकार था।

मामले में अदालत के सामने यह सवाल भी आया कि यदि किसी सोशल मीडिया पेज को ब्लॉक करने का आदेश जारी किया जाता है, तो क्या संबंधित यूजर को उस आदेश की प्रति दी जानी चाहिए, ताकि वह उसके खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई कर सके।

हाईकोर्ट ने लागू नियमों की व्याख्या करते हुए कहा कि कंटेंट ब्लॉक करने के मामले में निर्धारित अधिकारी और प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। किसी अधिकारी द्वारा अपने पद के सामान्य अधिकारों के आधार पर ऐसा निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं है, यदि संबंधित नियम उस काम के लिए विशेष प्राधिकरण निर्धारित करते हैं।

अदालत ने 21 अगस्त 2026 को जारी निर्देश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही फेसबुक पेज को बहाल करने के संबंध में भी स्पष्ट निर्देश दिए।

इस फैसले से यह सिद्धांत सामने आता है कि सोशल मीडिया पर सामग्री को प्रतिबंधित करने की सरकारी शक्ति का इस्तेमाल कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर ही किया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने SP के आदेश को क्यों किया रद्द?

हाईकोर्ट ने मामले में सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के नियम 3(1)(डी) का उल्लेख किया। अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को सामग्री ब्लॉक करने का निर्देश देने के लिए किस स्तर के अधिकारी को अधिकृत किया जा सकता है।

अदालत ने कहा कि संबंधित नियमों के तहत ऐसा निर्देश निर्धारित रैंक के विशेष रूप से अधिकृत अधिकारी द्वारा लिखित रूप में दिया जाना चाहिए। अदालत के अनुसार, इस मामले में पुलिस अधीक्षक द्वारा जारी निर्देश आवश्यक कानूनी शर्तों को पूरा नहीं करता था।

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि संबंधित एसपी को प्रतिनिधि अधिकारी के रूप में अधिकृत किया गया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी अधिकारी को प्रतिनिधि के रूप में अधिकृत किए जाने का दावा अपने आप उसे हर प्रकार की कानूनी शक्ति प्रदान नहीं करता। यह देखना जरूरी है कि संबंधित नियम किस अधिकारी को निर्देश जारी करने की अनुमति देते हैं और क्या उस अधिकारी की नियुक्ति या प्राधिकरण नियमों के अनुरूप है।

यदि कानून किसी विशेष कार्य के लिए अधिकारी का रैंक या प्राधिकरण निर्धारित करता है, तो उसका पालन करना आवश्यक है। निर्धारित शर्तों को पूरा किए बिना जारी किया गया निर्देश अधिकार क्षेत्र से बाहर माना जा सकता है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पुलिस अधीक्षक की कार्रवाई को अधिकार क्षेत्र से बाहर और मनमाना माना तथा संबंधित निर्देश को रद्द कर दिया।

IT Rules 2021 के नियम 3(1)(डी) का क्या महत्व है?

सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और अन्य मध्यस्थों के दायित्वों से संबंधित हैं। इन नियमों में शिकायतों के निपटारे, कानूनी निर्देशों के अनुपालन और डिजिटल सामग्री से संबंधित विभिन्न प्रक्रियाओं का प्रावधान किया गया है।

नियम 3(1)(डी) के अंतर्गत कुछ परिस्थितियों में मध्यस्थों को संबंधित सरकारी प्राधिकरण या सक्षम अदालत के निर्देशों के अनुसार कार्रवाई करनी पड़ सकती है।

हालांकि, सामग्री को ब्लॉक करने का निर्देश जारी करने की प्रक्रिया में सक्षम प्राधिकारी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यदि कोई सरकारी निर्देश लागू नियमों के तहत निर्धारित आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता, तो उसकी वैधता पर सवाल उठ सकता है।

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने इसी पहलू पर जोर दिया कि संबंधित नियमों के तहत निर्धारित रैंक के विशेष रूप से अधिकृत अधिकारी द्वारा ही ऐसा निर्देश दिया जाना चाहिए।

इसका उद्देश्य केवल प्रशासनिक औपचारिकता पूरी करना नहीं है। निर्धारित प्रक्रिया यह सुनिश्चित करने में भी मदद करती है कि डिजिटल सामग्री को ब्लॉक करने जैसे महत्वपूर्ण निर्णय उचित अधिकार, जवाबदेही और कानूनी आधार के साथ लिए जाएं।

सोशल मीडिया पर समाचार सामग्री को ब्लॉक करने का प्रभाव व्यापक हो सकता है। इसलिए ऐसे मामलों में संबंधित कानून और नियमों का पालन करना महत्वपूर्ण है।

क्या हर पुलिस अधीक्षक सोशल मीडिया पेज ब्लॉक करने का निर्देश दे सकता है?

इस मामले में हाईकोर्ट के फैसले से यह स्पष्ट होता है कि किसी पुलिस अधिकारी के पद पर होने मात्र से उसे सोशल मीडिया सामग्री को ब्लॉक करने का हर प्रकार का निर्देश जारी करने का अधिकार नहीं मिल जाता।

पुलिस अधिकारियों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने और अपराधों की जांच करने के लिए विभिन्न शक्तियां प्राप्त हैं। लेकिन किसी विशेष कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत कार्रवाई करने के लिए संबंधित कानून में निर्धारित शर्तों को पूरा करना भी आवश्यक है।

यदि किसी नियम के तहत किसी खास रैंक के अधिकारी या विशेष रूप से अधिकृत प्राधिकारी को ही निर्देश जारी करने का अधिकार दिया गया है, तो उससे नीचे के अधिकारी को उस प्रक्रिया का पालन करना होगा।

इस मामले में राज्य सरकार ने एसपी को प्रतिनिधि अधिकारी के रूप में अधिकृत किए जाने की दलील दी थी। हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और निर्देश रद्द कर दिया।

हालांकि, इस फैसले को इस अर्थ में नहीं समझना चाहिए कि पुलिस कभी भी सोशल मीडिया सामग्री के संबंध में कार्रवाई नहीं कर सकती। अदालत का निर्णय संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत निर्देश जारी करने के अधिकार और निर्धारित प्रक्रिया से जुड़ा है।

किसी सामग्री को ब्लॉक करने की वैधता का निर्धारण लागू कानून, संबंधित अधिकारी के अधिकार और आदेश जारी करने की परिस्थितियों के आधार पर किया जाएगा।

यूजर को कंटेंट ब्लॉक करने के निर्देश की कॉपी देना क्यों जरूरी?

हाईकोर्ट ने फैसले में एक और महत्वपूर्ण पहलू पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि कंटेंट ब्लॉक करने के निर्देश की प्रति संबंधित यूजर को भी दी जानी चाहिए, ताकि उसे पता चल सके कि उसकी सामग्री या पेज को किस आधार पर प्रतिबंधित किया गया है।

किसी सोशल मीडिया पेज के ब्लॉक होने पर संबंधित यूजर के लिए यह जानना जरूरी हो सकता है कि कार्रवाई किस आदेश के तहत की गई और उसका कानूनी आधार क्या है।

यदि यूजर को आदेश की जानकारी ही नहीं मिलती, तो उसके लिए यह समझना कठिन हो सकता है कि कार्रवाई को चुनौती देने के लिए कौन-सा कानूनी उपाय अपनाया जाए।

इसी कारण अदालत ने आदेश की प्रति उपलब्ध कराने के महत्व को रेखांकित किया।

कानूनी प्रक्रिया में पारदर्शिता का अर्थ यह भी है कि प्रभावित व्यक्ति को उसके खिलाफ की गई कार्रवाई के बारे में आवश्यक जानकारी प्राप्त हो। इससे वह संबंधित प्राधिकारी के समक्ष अपनी आपत्ति रख सकता है और कानून में उपलब्ध उपायों का इस्तेमाल कर सकता है।

यदि किसी सामग्री को ब्लॉक करने का आदेश दिया गया है, तो संबंधित यूजर को उसके आधार की जानकारी देना निष्पक्ष प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

इस मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि आदेश की जानकारी के बिना यूजर प्रभावी ढंग से अपील नहीं कर सकता। इसलिए संबंधित व्यक्ति को निर्देश की प्रति उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

नियम 3(2) के तहत शिकायत निवारण और अपील का महत्व

हाईकोर्ट ने सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के नियम 3(2) में उपलब्ध शिकायत निवारण व्यवस्था का भी उल्लेख किया।

डिजिटल प्लेटफॉर्म से संबंधित विवादों में शिकायत निवारण की प्रक्रिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। किसी यूजर को लगता है कि उसके खिलाफ की गई कार्रवाई गलत है या उसके अधिकार प्रभावित हुए हैं, तो वह लागू नियमों के तहत उपलब्ध प्रक्रिया का सहारा ले सकता है।

लेकिन इस व्यवस्था का प्रभावी इस्तेमाल करने के लिए यूजर को संबंधित कार्रवाई की जानकारी होना आवश्यक है।

यदि किसी पेज को ब्लॉक करने के आदेश की प्रति या उसके आधार की जानकारी संबंधित व्यक्ति को उपलब्ध नहीं होती, तो वह यह तय करने में कठिनाई महसूस कर सकता है कि किस आधार पर आपत्ति उठाई जाए।

यही वजह है कि अदालत ने आदेश की प्रति उपलब्ध कराने पर जोर दिया।

हालांकि, नियम 3(2) के तहत शिकायत निवारण की प्रक्रिया और किसी सरकारी ब्लॉकिंग निर्देश के खिलाफ उपलब्ध अन्य कानूनी उपायों के बीच अंतर को समझना भी जरूरी है। किसी विशेष मामले में कौन-सा उपाय उपलब्ध होगा, यह संबंधित नियमों और आदेश की प्रकृति पर निर्भर करता है।

हाईकोर्ट की टिप्पणी का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सामग्री ब्लॉक करने की प्रक्रिया में प्रभावित यूजर को अंधेरे में न रखा जाए और वह अपने कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल कर सके।

मेटा को फेसबुक पेज बहाल करने के निर्देश

हाईकोर्ट ने केवल पुलिस अधीक्षक के निर्देश को रद्द करने तक ही मामला सीमित नहीं रखा। अदालत ने फेसबुक पेज की बहाली के संबंध में भी निर्देश जारी किए।

अदालत के आदेश के अनुसार, आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के 24 घंटे के भीतर पुलिस अधीक्षक को मेटा से संबंधित फेसबुक पेज उसकी मूल स्थिति में बहाल करने के लिए कहना होगा। मेटा को भी पेज बहाल करने का निर्देश दिया गया।

इस निर्देश का महत्व इसलिए है, क्योंकि किसी पेज को ब्लॉक करने के कारण और उस पेज को बहाल करने की प्रक्रिया एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं।

जब सामग्री ब्लॉक करने के आधार पर जारी आदेश को अदालत रद्द कर देती है, तो उसके बाद संबंधित प्लेटफॉर्म पर पेज की स्थिति को लेकर आवश्यक कार्रवाई की जरूरत हो सकती है।

इस मामले में अदालत ने बहाली के लिए स्पष्ट समयसीमा निर्धारित की है। प्रमाणित प्रति मिलने के 24 घंटे के भीतर कार्रवाई करने का निर्देश देकर अदालत ने आदेश के अनुपालन को समयबद्ध बनाया है।

यह ध्यान रखना चाहिए कि 24 घंटे की समयसीमा अदालत के आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने से जुड़ी है। इसलिए समयसीमा की गणना उसी आधार पर की जाएगी।

समाचार संगठनों और डिजिटल मीडिया के लिए फैसले का महत्व

डिजिटल युग में फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म समाचार संगठनों के लिए पाठकों तक पहुंचने का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुके हैं। अनेक समाचार संस्थान अपने पेज के जरिए खबरें, वीडियो, रिपोर्ट और अन्य सामग्री प्रकाशित करते हैं।

यदि किसी समाचार संगठन का पेज ब्लॉक हो जाता है, तो उसकी डिजिटल पहुंच प्रभावित हो सकती है। पाठकों को नियमित खबरें मिलना बंद हो सकती हैं और संगठन को अपनी सामग्री दूसरे माध्यमों से साझा करनी पड़ सकती है।

इसी कारण कंटेंट ब्लॉक करने की प्रक्रिया में वैधानिक अधिकार और उचित प्रक्रिया का पालन महत्वपूर्ण है।

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के इस फैसले से यह संदेश मिलता है कि डिजिटल सामग्री को ब्लॉक करने के लिए संबंधित अधिकारियों को कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा।

यह फैसला सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को भी यह याद दिलाता है कि सरकारी निर्देशों के अनुपालन में लागू कानूनी ढांचे और अदालतों के आदेशों का महत्व है।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी भी परिस्थिति में ऑनलाइन सामग्री को ब्लॉक नहीं किया जा सकता। कानून के तहत सक्षम प्राधिकारी द्वारा उचित प्रक्रिया के साथ जारी निर्देशों पर कार्रवाई की जा सकती है।

मुख्य प्रश्न यह है कि कार्रवाई वैधानिक अधिकार के तहत और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार की गई है या नहीं।

निष्कर्ष: सोशल मीडिया पर रोक लगाने के लिए कानूनी प्रक्रिया अनिवार्य

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का यह फैसला सोशल मीडिया सामग्री को ब्लॉक करने के मामले में अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र और यूजर के प्रक्रियात्मक अधिकारों को रेखांकित करता है।

अदालत ने यमुनानगर के पुलिस अधीक्षक द्वारा 21 अगस्त 2026 को जारी उस निर्देश को रद्द कर दिया, जिसके आधार पर मेटा ने एक न्यूज कंपनी का फेसबुक पेज भारत में ब्लॉक किया था। हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित नियमों के तहत निर्धारित रैंक के विशेष रूप से अधिकृत अधिकारी को ही ऐसा निर्देश जारी करना चाहिए।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित यूजर को निर्देश की प्रति दी जानी चाहिए, ताकि वह कार्रवाई का आधार समझ सके और उपलब्ध कानूनी उपायों का प्रभावी इस्तेमाल कर सके।

इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के 24 घंटे के भीतर पुलिस अधीक्षक मेटा को फेसबुक पेज बहाल करने के लिए कहें। मेटा को भी पेज बहाल करने का निर्देश दिया गया।

इस फैसले का व्यापक संदेश यह है कि सोशल मीडिया पर सामग्री को ब्लॉक करने जैसी कार्रवाई भी कानून के दायरे में रहकर की जानी चाहिए। किसी अधिकारी के पास सामान्य प्रशासनिक या पुलिस शक्तियां होना पर्याप्त नहीं है; उसे संबंधित कानून के तहत निर्धारित अधिकार और प्रक्रिया का पालन करना होगा।

डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सामग्री को प्रतिबंधित करने के मामलों में वैधानिक अधिकार, पारदर्शिता और प्रभावित व्यक्ति को जानकारी देना महत्वपूर्ण है। यही सिद्धांत सरकारी कार्रवाई और नागरिकों के कानूनी अधिकारों के बीच उचित संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।