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चाइनीज मंझे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, पुलिस की कार्रवाई को बताया नाकाफी; सरकार से एसओपी बनाने को कहा

चाइनीज मंझे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, पुलिस की कार्रवाई को बताया नाकाफी; सरकार से एसओपी बनाने को कहा

      चाइनीज मंझे से होने वाली दुर्घटनाओं और आम लोगों की जान पर मंडराते खतरे को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने मंझे की बिक्री और इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए पुलिस की ओर से किए जा रहे प्रयासों को नाकाफी बताते हुए कहा कि सरकार के हलफनामे में भले ही कार्रवाई का विवरण दिया गया हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग दिखाई दे रही है। आज भी समाचार पत्रों में चाइनीज मंझे से लोगों के घायल होने की खबरें सामने आ रही हैं। इससे स्पष्ट होता है कि इस खतरनाक मंझे के खिलाफ की जा रही कार्रवाई को और प्रभावी बनाने की जरूरत है।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि चाइनीज मंझे के खिलाफ कार्रवाई केवल कुछ दिनों तक चलने वाला अभियान नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जो लगातार काम करती रहे। यदि पुलिस विभाग के पास इस खतरे से निपटने के लिए कोई मानक संचालन प्रक्रिया यानी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) नहीं है, तो सरकार को इसे तैयार करना चाहिए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रतिबंधित मंझे की बिक्री, भंडारण और इस्तेमाल के खिलाफ नियमित रूप से कार्रवाई की जा सके।

यह आदेश मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली एवं न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने डॉ. कमल कुमार जायसवाल की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। अदालत की टिप्पणी से यह स्पष्ट संदेश निकलता है कि किसी खतरनाक वस्तु पर प्रतिबंध लगा देना पर्याप्त नहीं है। जब तक प्रतिबंध का प्रभाव जमीन पर दिखाई नहीं देता और आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती, तब तक प्रशासन की जिम्मेदारी समाप्त नहीं मानी जा सकती।

सरकार के हलफनामे और जमीनी हकीकत में अंतर पर अदालत की चिंता

चाइनीज मंझे के इस्तेमाल से होने वाली दुर्घटनाएं लंबे समय से चिंता का विषय रही हैं। इस मंझे की धार इतनी खतरनाक हो सकती है कि इसकी चपेट में आने वाला व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो जाए। कई बार सड़क पर दोपहिया वाहन चलाने वाले लोग इसकी चपेट में आ जाते हैं। गर्दन, चेहरे और शरीर के अन्य खुले हिस्सों पर लगने वाली चोटें जानलेवा भी साबित हो सकती हैं।

इसी खतरे को देखते हुए चाइनीज मंझे के खिलाफ कार्रवाई की मांग की जाती रही है। प्रशासन की ओर से समय-समय पर छापेमारी, जब्ती और अन्य कार्रवाई किए जाने की जानकारी भी दी जाती है। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने जब यह मामला आया, तो अदालत ने सरकारी पक्ष की ओर से प्रस्तुत कार्रवाई के विवरण और वास्तविक परिस्थितियों के बीच अंतर की ओर ध्यान दिलाया।

अदालत ने कहा कि सरकार ने अपने हलफनामे में चाइनीज मंझे के इस्तेमाल के खिलाफ कड़ी कार्रवाई किए जाने की बात कही है। इसके बावजूद समाचार पत्रों में लगातार ऐसी खबरें प्रकाशित हो रही हैं, जिनमें इस मंझे के कारण आम लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आती है।

अदालत की चिंता का मुख्य आधार यही था कि यदि कार्रवाई वास्तव में प्रभावी हो रही है, तो इस तरह की घटनाओं पर नियंत्रण क्यों नहीं दिखाई दे रहा है? पुलिस के प्रयास केवल कागजों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। उनका असर बाजारों, दुकानों, सार्वजनिक स्थानों और उन क्षेत्रों में दिखाई देना चाहिए, जहां इस खतरनाक मंझे की बिक्री या इस्तेमाल की आशंका बनी रहती है।

इस टिप्पणी को प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी के रूप में देखा जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि किसी अभियान की सफलता का आकलन केवल दर्ज मुकदमों, जब्त मंझे की मात्रा या की गई छापेमारी की संख्या से नहीं किया जा सकता। यह देखना भी जरूरी है कि प्रतिबंधित वस्तु की उपलब्धता में कितनी कमी आई है और उससे होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने में कितनी सफलता मिली है।

जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान उठा महत्वपूर्ण सवाल

डॉ. कमल कुमार जायसवाल की जनहित याचिका के माध्यम से चाइनीज मंझे से जुड़े खतरे का मुद्दा अदालत के समक्ष आया। जनहित याचिकाओं का उद्देश्य ऐसे मामलों को न्यायालय के सामने लाना होता है, जिनका प्रभाव किसी एक व्यक्ति तक सीमित न होकर समाज के बड़े हिस्से पर पड़ता है।

चाइनीज मंझे का मामला भी इसी प्रकृति का है। इसका इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति भले ही पतंग उड़ाने के उद्देश्य से ऐसा करता हो, लेकिन इसकी चपेट में कोई राहगीर, मोटरसाइकिल सवार, साइकिल चालक या अन्य व्यक्ति आ सकता है। कई बार दुर्घटना का शिकार होने वाले व्यक्ति का पतंगबाजी से कोई संबंध भी नहीं होता।

ऐसी परिस्थितियों में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि प्रतिबंधित मंझे की बिक्री और इस्तेमाल को रोकने के लिए प्रशासन किस तरह की निगरानी कर रहा है। केवल घटना घटने के बाद कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। प्रशासन को उन परिस्थितियों को भी नियंत्रित करना होगा, जिनके कारण ऐसी दुर्घटनाएं होती हैं।

हाईकोर्ट ने इसी संदर्भ में पुलिस की कार्रवाई को आवश्यक प्रयासों से कम बताया। अदालत की टिप्पणी से यह स्पष्ट हुआ कि इस समस्या से निपटने के लिए अधिक व्यवस्थित और निरंतर कार्रवाई की आवश्यकता है।

सरकार ने मांगा समय, पुलिस की कार्रवाई का विवरण देने की बात

सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने अदालत से समय मांगा। सरकारी पक्ष को यह बताना था कि चाइनीज मंझे के खिलाफ अब तक क्या प्रयास किए गए हैं और पुलिस विभाग के पास इस खतरे से निपटने के लिए कोई मानक संचालन प्रक्रिया मौजूद है या नहीं।

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी प्रतिबंध को प्रभावी बनाने के लिए स्पष्ट प्रशासनिक व्यवस्था की जरूरत होती है। यदि कार्रवाई के लिए कोई निश्चित प्रक्रिया नहीं है, तो अलग-अलग क्षेत्रों में पुलिस का काम करने का तरीका अलग हो सकता है। कहीं नियमित छापेमारी हो सकती है, जबकि दूसरे क्षेत्र में कार्रवाई केवल किसी घटना के बाद शुरू की जा सकती है।

एक स्पष्ट एसओपी होने से यह तय किया जा सकता है कि किस स्तर पर कौन अधिकारी जिम्मेदार होगा, प्रतिबंधित मंझे की बिक्री की सूचना मिलने पर क्या कदम उठाए जाएंगे और समय-समय पर अभियान की समीक्षा कैसे होगी।

सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि इस संबंध में किए गए प्रयासों की जानकारी देने के लिए समय की आवश्यकता है। इसके बाद अदालत ने एसओपी के मुद्दे पर विशेष ध्यान दिया और कहा कि यदि ऐसी कोई प्रक्रिया पहले से मौजूद नहीं है, तो सरकार उसे तैयार करे।

अदालत का निर्देश इस बात को रेखांकित करता है कि चाइनीज मंझे के खिलाफ कार्रवाई में निरंतरता होनी चाहिए। किसी विशेष त्योहार, मौसम या दुर्घटना के बाद अभियान चलाने के बजाय ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, जिसके तहत पूरे वर्ष आवश्यक निगरानी और कार्रवाई की जा सके।

क्या होती है एसओपी और चाइनीज मंझे पर रोक में इसकी भूमिका क्या होगी?

एसओपी का पूरा नाम स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर है। हिंदी में इसे मानक संचालन प्रक्रिया कहा जाता है। यह किसी विशेष काम को करने के लिए निर्धारित नियमों, जिम्मेदारियों और चरणों का व्यवस्थित विवरण होता है।

सरकारी विभागों और पुलिस व्यवस्था में एसओपी का महत्व इसलिए है क्योंकि इससे अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश मिलते हैं कि किसी परिस्थिति में उन्हें किस प्रकार काम करना है। इससे कार्रवाई में एकरूपता आती है और जिम्मेदारियों का निर्धारण करना आसान होता है।

चाइनीज मंझे के मामले में ऐसी प्रक्रिया कई स्तरों पर उपयोगी साबित हो सकती है।

पहला, प्रतिबंधित मंझे की बिक्री पर निगरानी। पुलिस को उन बाजारों और दुकानों पर नजर रखने की जरूरत होगी, जहां इस तरह के मंझे की बिक्री की आशंका हो। इसके लिए स्थानीय स्तर पर नियमित निरीक्षण और सूचना एकत्र करने की व्यवस्था बनाई जा सकती है।

दूसरा, भंडारण और आपूर्ति की जांच। केवल फुटकर दुकानों पर कार्रवाई करने से समस्या का पूर्ण समाधान नहीं होगा। प्रतिबंधित मंझा कहां से आ रहा है, उसे किस माध्यम से दुकानों तक पहुंचाया जा रहा है और इसकी आपूर्ति में कौन लोग शामिल हैं, इन पहलुओं की भी कानून के अनुसार जांच जरूरी है।

तीसरा, शिकायत मिलने पर त्वरित कार्रवाई। यदि किसी नागरिक को प्रतिबंधित मंझे की बिक्री या इस्तेमाल की जानकारी मिलती है, तो शिकायत दर्ज कराने और उस पर कार्रवाई की स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए। इससे आम लोगों को भी इस खतरे को रोकने में सहयोग करने का अवसर मिलेगा।

चौथा, नियमित अभियान और समीक्षा। पुलिस की कार्रवाई किसी एक दिन या सप्ताह तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। समय-समय पर अभियान की समीक्षा होनी चाहिए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि प्रतिबंधित मंझे की बिक्री और इस्तेमाल पर कितना नियंत्रण हुआ है।

पांचवां, जवाबदेही का निर्धारण। एसओपी के माध्यम से यह स्पष्ट किया जा सकता है कि अलग-अलग स्तर पर किन अधिकारियों की क्या जिम्मेदारी होगी। इससे कार्रवाई में लापरवाही होने पर जिम्मेदारी निर्धारित करने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, एसओपी तैयार करने के साथ-साथ उसका प्रभावी क्रियान्वयन भी उतना ही आवश्यक होगा। यदि निर्देश जारी कर दिए जाएं, लेकिन उनका पालन न हो, तो केवल दस्तावेज तैयार करने से समस्या का समाधान नहीं होगा।

चाइनीज मंझा आम लोगों के लिए क्यों बनता है गंभीर खतरा?

पतंग उड़ाना भारत में मनोरंजन और परंपरा से जुड़ी गतिविधि है। कई राज्यों में त्योहारों और विशेष अवसरों पर बड़ी संख्या में लोग पतंगबाजी करते हैं। लेकिन पतंग उड़ाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली डोर यदि अत्यधिक धारदार या खतरनाक हो, तो यह मनोरंजन दूसरों के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है।

चाइनीज मंझे के नाम से पहचानी जाने वाली खतरनाक डोर के संबंध में सबसे बड़ी चिंता इसकी काटने की क्षमता को लेकर है। बाजार में प्रचलित कुछ प्रतिबंधित डोरों पर कांच, धातु या अन्य धारदार पदार्थों का इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसी डोर सामान्य धागे की तुलना में अधिक गंभीर चोट पहुंचा सकती है।

सड़क पर चलने वाले दोपहिया वाहन चालकों के लिए यह विशेष रूप से खतरनाक है। मोटरसाइकिल या स्कूटर पर यात्रा करते समय चालक का चेहरा और गर्दन खुली रहती है। सड़क के ऊपर या किनारे लटक रही पतंग की डोर अचानक सामने आने पर चालक को संभलने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता।

ऐसी स्थिति में गर्दन या चेहरे पर गंभीर कट लग सकता है। दुर्घटना के कारण चालक का संतुलन बिगड़ सकता है और वाहन गिरने से अतिरिक्त चोटें भी आ सकती हैं। इस प्रकार खतरा केवल डोर से लगने वाली चोट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सड़क दुर्घटना की आशंका भी बढ़ जाती है।

बच्चे, पैदल यात्री और साइकिल सवार भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। इसके अतिरिक्त पक्षियों के पंख और शरीर इस डोर में उलझने से घायल हो सकते हैं। इसलिए चाइनीज मंझे का इस्तेमाल सार्वजनिक सुरक्षा और पर्यावरण, दोनों के लिहाज से चिंता का विषय है।

यह समझना आवश्यक है कि किसी वस्तु का इस्तेमाल व्यक्तिगत मनोरंजन के लिए किया जा रहा हो, तब भी उससे दूसरे व्यक्तियों की सुरक्षा को खतरे में डालने का अधिकार नहीं मिल जाता।

प्रतिबंध होने के बावजूद बिक्री कैसे बनती है चुनौती?

किसी प्रतिबंधित वस्तु की बिक्री रोकने में सबसे बड़ी चुनौती उसके उत्पादन, भंडारण, वितरण और अंतिम बिक्री की पूरी श्रृंखला पर नियंत्रण स्थापित करना है। यदि प्रशासन केवल कुछ दुकानों पर छापेमारी करता है, लेकिन आपूर्ति के दूसरे स्रोत सक्रिय रहते हैं, तो प्रतिबंधित वस्तु बाजार में उपलब्ध रह सकती है।

इसी तरह, यदि अभियान केवल किसी विशेष मौसम में चलाया जाता है, तो उसके बाद निगरानी कमजोर पड़ने पर प्रतिबंधित मंझे की बिक्री फिर शुरू हो सकती है।

इस समस्या का समाधान करने के लिए पुलिस और संबंधित प्रशासनिक विभागों के बीच समन्वय आवश्यक है। स्थानीय स्तर पर सूचनाओं का आदान-प्रदान, संदिग्ध बिक्री केंद्रों की जांच और कानून के अनुसार कार्रवाई इस दिशा में उपयोगी कदम हो सकते हैं।

इसके साथ ही नागरिकों को भी जागरूक करना जरूरी है। कई बार लोग किसी डोर की खतरनाक प्रकृति से पूरी तरह परिचित नहीं होते और केवल उसकी काटने की क्षमता को बेहतर मानकर उसे खरीद लेते हैं। उन्हें यह समझाना आवश्यक है कि ऐसी डोर किसी अन्य व्यक्ति की जान के लिए खतरा बन सकती है।

दुकानदारों और विक्रेताओं को भी प्रतिबंधित मंझे की बिक्री से होने वाले कानूनी परिणामों की जानकारी होनी चाहिए। हालांकि, जागरूकता को पुलिस कार्रवाई का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। जहां कानून का उल्लंघन हो, वहां संबंधित कानूनी प्रावधानों के अनुसार प्रभावी कार्रवाई आवश्यक है।

अदालत ने कहा, कार्रवाई एक बार की नहीं बल्कि लगातार चलने वाली हो

इलाहाबाद हाईकोर्ट की सुनवाई में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि अदालत ने कार्रवाई की निरंतरता पर जोर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि चाइनीज मंझे के खतरे से निपटने के लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जो केवल एक बार कार्रवाई करके समाप्त न हो जाए।

अक्सर देखा जाता है कि किसी गंभीर दुर्घटना के बाद प्रशासन सक्रिय होता है। कुछ स्थानों पर छापेमारी होती है, प्रतिबंधित वस्तुएं जब्त की जाती हैं और लोगों को चेतावनी दी जाती है। लेकिन समय बीतने के साथ अभियान की गति कम हो जाती है।

ऐसी स्थिति में प्रतिबंधित वस्तुओं की बिक्री फिर शुरू होने की आशंका बनी रहती है। यही कारण है कि नियमित निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है।

एसओपी के माध्यम से पुलिस की कार्रवाई को व्यवस्थित किया जा सकता है। इसमें नियमित निरीक्षण, शिकायतों पर कार्रवाई, आपूर्ति के स्रोतों की जांच और अभियान की समीक्षा जैसे पहलुओं को शामिल किया जा सकता है। इससे कार्रवाई किसी अधिकारी की व्यक्तिगत पहल पर निर्भर रहने के बजाय एक निर्धारित प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बन सकती है।

हालांकि, एसओपी के वास्तविक प्रावधान क्या होंगे, यह सरकार की ओर से तैयार किए जाने वाले दस्तावेज पर निर्भर करेगा। अदालत की टिप्पणी का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि इस खतरे से निपटने के लिए प्रभावी और निरंतर व्यवस्था विकसित की जाए।

अगली सुनवाई पर एसओपी पेश करने का निर्देश

हाईकोर्ट ने सरकार से कहा कि यदि चाइनीज मंझे के खतरे से निपटने के लिए पुलिस विभाग में कोई एसओपी मौजूद नहीं है, तो उसे तैयार किया जाए। अदालत ने निर्देश दिया कि अगली तारीख पर इस संबंध में एसओपी न्यायालय के सामने पेश की जाए।

यह निर्देश मामले में महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे सरकार को केवल पहले की गई कार्रवाई का विवरण देने के बजाय भविष्य में अपनाई जाने वाली व्यवस्था के संबंध में भी स्पष्ट जानकारी प्रस्तुत करनी होगी।

अदालत यह जानना चाहती है कि प्रतिबंधित मंझे की बिक्री और इस्तेमाल पर नियंत्रण के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं तथा आगे इस खतरे को रोकने के लिए कौन-सी व्यवस्था लागू की जा सकती है।

इस स्तर पर यह कहना उचित नहीं होगा कि अदालत ने सरकार की ओर से प्रस्तावित किसी विशेष एसओपी को मंजूरी दे दी है या उसमें किसी खास प्रावधान को अनिवार्य कर दिया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अदालत ने एसओपी की मौजूदगी के बारे में जानकारी मांगी है और ऐसी प्रक्रिया नहीं होने पर उसे तैयार करके अगली सुनवाई पर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

आगे की सुनवाई में सरकार की ओर से प्रस्तुत जानकारी और एसओपी के विवरण के आधार पर मामले में आगे की दिशा स्पष्ट हो सकती है।

पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी केवल कार्रवाई दिखाने तक सीमित नहीं

इस मामले से एक व्यापक सवाल भी सामने आता है कि सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े नियमों का पालन किस तरह सुनिश्चित किया जाए। किसी खतरनाक वस्तु पर प्रतिबंध लगाने का उद्देश्य तभी पूरा होता है, जब आम लोगों को उसके दुष्परिणामों से वास्तविक सुरक्षा मिले।

पुलिस की जिम्मेदारी केवल अपराध दर्ज करने या प्रतिबंधित सामग्री जब्त करने तक सीमित नहीं हो सकती। उसे यह भी देखना होता है कि ऐसी सामग्री बाजार में दोबारा उपलब्ध न हो और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।

इसी तरह, प्रशासन को कार्रवाई के परिणामों का मूल्यांकन करना चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में लगातार दुर्घटनाएं हो रही हैं, तो वहां की परिस्थितियों की समीक्षा करके आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए।

चाइनीज मंझे के मामले में अदालत की टिप्पणी इसी व्यावहारिक दृष्टिकोण की ओर संकेत करती है। सरकारी हलफनामे में कार्रवाई का उल्लेख होना महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके साथ यह भी दिखना चाहिए कि कार्रवाई से खतरे को कम करने में कितनी सफलता मिली।

इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी एक घटना से पूरी पुलिस व्यवस्था के प्रयासों का निष्कर्ष निकाल लिया जाए। लेकिन जब प्रतिबंध के बावजूद दुर्घटनाओं की खबरें लगातार सामने आती हैं, तो प्रशासन के लिए अपनी रणनीति की समीक्षा करना आवश्यक हो जाता है।

निष्कर्ष

चाइनीज मंझे पर रोक को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी सार्वजनिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने डॉ. कमल कुमार जायसवाल की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पुलिस की कार्रवाई को नाकाफी बताया और सरकार से इस खतरे से निपटने के लिए प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करने पर जोर दिया।

अदालत ने कहा कि सरकार के हलफनामे में कार्रवाई का विवरण होने के बावजूद समाचार पत्रों में लोगों के घायल होने की खबरें सामने आ रही हैं। सरकारी वकील ने इस संबंध में किए गए प्रयासों और एसओपी की जानकारी देने के लिए समय मांगा। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि ऐसी कोई मानक संचालन प्रक्रिया मौजूद नहीं है, तो सरकार उसे तैयार करके अगली सुनवाई पर पेश करे।

इस आदेश का व्यापक संदेश यह है कि प्रतिबंध तभी प्रभावी माना जा सकता है, जब उसका पालन सुनिश्चित हो और आम लोगों की सुरक्षा पर उसका सकारात्मक असर दिखाई दे। चाइनीज मंझे से होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए नियमित निगरानी, प्रभावी पुलिस कार्रवाई, आपूर्ति के स्रोतों पर नियंत्रण और जनजागरूकता की आवश्यकता है।

आखिरकार, पतंगबाजी मनोरंजन का साधन हो सकती है, लेकिन किसी की जान को खतरे में डालकर किया गया मनोरंजन स्वीकार्य नहीं है। प्रशासन, पुलिस, विक्रेताओं और नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है कि सुरक्षित विकल्पों को अपनाया जाए और खतरनाक मंझे के इस्तेमाल को रोकने के लिए कानून का पालन किया जाए। अदालत की यह पहल इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।