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मंदिर की जमीन सरकार को उपहार में नहीं दी जा सकती, राज्य मालिक नहीं संरक्षक है: सुप्रीम कोर्ट

मंदिर की जमीन सरकार को उपहार में नहीं दी जा सकती, राज्य मालिक नहीं संरक्षक है: सुप्रीम कोर्ट ने गिफ्ट डीड रद्द की, ₹31,000 मासिक किराया देने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: मंदिर की संपत्ति पर सरकार का अधिकार केवल नियमन और संरक्षण तक सीमित, ट्रस्टी नहीं कर सकता मनमाना हस्तांतरण; तमिलनाडु सरकार पर ₹1 लाख का जुर्माना भी लगाया

मंदिरों की संपत्तियों के अधिकार, उनके प्रबंधन और धार्मिक संस्थानों की जमीन के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार मंदिर की संपत्तियों की संरक्षक और नियामक है, उनकी मालिक नहीं। इसलिए सरकार किसी ट्रस्टी से मंदिर की संपत्ति उपहार के रूप में स्वीकार नहीं कर सकती, भले ही उस जमीन का इस्तेमाल किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए ही क्यों न किया जाना हो।

यह फैसला तमिलनाडु के इरोड जिले में स्थित नागपालयम मरियम्मन-पोन्नाचियम्मन मंदिर की जमीन से जुड़े विवाद में आया। मंदिर की एक एकड़ और दस सेंट जमीन पर तालुक कार्यालय बनाने के उद्देश्य से मंदिर के एक अस्थायी ट्रस्टी ने राज्य सरकार के पक्ष में उपहार विलेख यानी गिफ्ट डीड निष्पादित किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस उपहार विलेख को कानून के विरुद्ध मानते हुए अमान्य घोषित कर दिया।

न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि किसी धार्मिक संस्थान की संपत्ति का प्रबंधन करने का अधिकार होने का अर्थ यह नहीं है कि सरकार उस संपत्ति को अपनी इच्छा के अनुसार इस्तेमाल कर सकती है। मंदिर की जमीन जिस धार्मिक उद्देश्य के लिए समर्पित की गई है, उसके संरक्षण और उचित प्रबंधन की जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों की है।

अदालत ने तमिलनाडु सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वह जमीन के इस्तेमाल के बदले निर्धारित किराया 8 मार्च 2019 से गणना करते हुए तीन महीने के भीतर बकाया राशि का भुगतान करे। मासिक किराया 31,000 रुपये निर्धारित किया गया। इसके अतिरिक्त, राज्य सरकार पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया, जिसे मंदिर को दिया जाना है।

इस फैसले का महत्व केवल एक मंदिर की जमीन तक सीमित नहीं है। यह धार्मिक और धर्मार्थ संस्थानों की संपत्तियों के प्रबंधन, ट्रस्टियों की जिम्मेदारी तथा सरकारी अधिकारियों की कानूनी जवाबदेही से जुड़े महत्वपूर्ण सिद्धांतों को सामने लाता है।

क्या है पूरा मामला?

विवाद तमिलनाडु के इरोड जिले में स्थित नागपालयम मरियम्मन-पोन्नाचियम्मन मंदिर की जमीन से संबंधित है। मंदिर की एक एकड़ और दस सेंट जमीन का इस्तेमाल तालुक कार्यालय के निर्माण के लिए किया जाना था।

इसी उद्देश्य से मंदिर के एक अस्थायी ट्रस्टी ने 30 अगस्त 2017 को एक गिफ्ट डीड के माध्यम से जमीन राज्य सरकार को हस्तांतरित कर दी। इसके बाद राजस्व विभाग ने जमीन को तालुक कार्यालय के नाम पर दर्ज कर लिया और सरकारी जमीन के रूप में वर्गीकृत कर दिया। इस जमीन पर सार्वजनिक धन का इस्तेमाल करके निर्माण कार्य भी शुरू कर दिया गया।

हालांकि, इस हस्तांतरण को चुनौती दी गई। आपत्ति यह थी कि मंदिर का ट्रस्टी धार्मिक संस्थान की संपत्ति का मनमाने ढंग से हस्तांतरण नहीं कर सकता। मंदिर की जमीन को उपहार में देने से पहले संबंधित कानून के तहत निर्धारित आवश्यकताओं का पालन किया जाना चाहिए था।

मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा। मार्च 2019 में हाईकोर्ट ने लेन-देन को चुनौती देने वाली रिट याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने माना था कि तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 की धारा 34 में उपहार या समझौते का स्पष्ट उल्लेख नहीं होने के कारण इस तरह के हस्तांतरण पर रोक नहीं मानी जा सकती।

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। शीर्ष अदालत ने विवादित जमीन की प्रकृति और लागू कानूनी प्रावधानों पर विचार किया। अदालत ने पाया कि यह जमीन धार्मिक संस्थान के भरण-पोषण और देखरेख के लिए दी गई इनाम संपत्ति थी। इसलिए इस मामले में धारा 41 महत्वपूर्ण थी।

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए गिफ्ट डीड को अमान्य घोषित कर दिया।

मंदिर की संपत्ति का मालिक कौन होता है?

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू मंदिर की संपत्ति के स्वामित्व और उसके प्रबंधन के बीच अंतर को स्पष्ट करना है।

अदालत ने कहा कि राज्य सरकार मंदिर की संपत्तियों की संरक्षक और नियामक है। वह इन संपत्तियों की मालिक नहीं बन जाती। किसी मंदिर की जमीन या अन्य संपत्ति धार्मिक उद्देश्य के लिए समर्पित की जाती है, तो उसे ट्रस्टी या सरकारी अधिकारी की निजी अथवा सरकारी संपत्ति की तरह नहीं देखा जा सकता।

मंदिर की संपत्ति का इस्तेमाल उस उद्देश्य के अनुरूप होना चाहिए, जिसके लिए उसे समर्पित किया गया है। ट्रस्टी की भूमिका संपत्ति को सुरक्षित रखने, उसका उचित प्रबंधन करने और मंदिर के हितों की रक्षा करने की होती है।

यदि किसी ट्रस्टी को मंदिर की जमीन का प्रबंधन करने का अधिकार दिया गया है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह जमीन को अपनी इच्छा से किसी अन्य व्यक्ति या संस्था को दान कर सकता है। उसे संबंधित कानून, ट्रस्ट की शर्तों और धार्मिक संस्थान के हितों के अनुसार ही निर्णय लेना होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत पर जोर दिया कि किसी संपत्ति का संरक्षक होना और उसका मालिक होना दो अलग-अलग बातें हैं। राज्य सरकार को मंदिर की संपत्ति के नियमन और संरक्षण का अधिकार प्राप्त हो सकता है, लेकिन उस अधिकार के आधार पर वह संपत्ति को अपने स्वामित्व में नहीं ले सकती।

यह सिद्धांत धार्मिक संस्थानों की संपत्तियों के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है। यदि संरक्षक को ही संपत्ति का मालिक मान लिया जाए, तो संपत्ति जिस उद्देश्य के लिए समर्पित की गई है, उससे अलग इस्तेमाल किए जाने का खतरा पैदा हो सकता है।

तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम की धारा 41 क्यों महत्वपूर्ण है?

इस विवाद में तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 की धारा 41 प्रमुख कानूनी आधार बनी।

उपलब्ध विवरण के अनुसार, विवादित जमीन धार्मिक संस्थान के भरण-पोषण और देखरेख के लिए दी गई इनाम संपत्ति थी। इस प्रकार की संपत्ति के हस्तांतरण पर धारा 41 के अंतर्गत विशेष प्रतिबंध लागू होते हैं।

अदालत ने कहा कि ऐसी जमीन को उपहार के रूप में हस्तांतरित करना कानून के विरुद्ध है। धारा 41 के तहत इस तरह के उपहार को अमान्य माना जाएगा।

इस प्रावधान का उद्देश्य धार्मिक संस्थानों को समर्पित संपत्तियों को अनुचित हस्तांतरण से बचाना है। मंदिर की जमीन से होने वाली आय का इस्तेमाल संस्थान के भरण-पोषण, धार्मिक गतिविधियों और अन्य निर्धारित उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है। यदि जमीन ही बिना किसी प्रतिफल के किसी दूसरे पक्ष को दे दी जाए, तो मंदिर के हित प्रभावित हो सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के उपहार को बाद में किसी अधिकारी या सरकार की मंजूरी से वैध नहीं बनाया जा सकता। जब कानून स्वयं ऐसे उपहार पर रोक लगाता है, तो प्रशासनिक स्वीकृति उस निषेध को समाप्त नहीं कर सकती।

अदालत ने इस मामले में धारा 34 के बजाय धारा 41 को लागू माना, क्योंकि जमीन की प्रकृति धार्मिक संस्थान के भरण-पोषण के लिए दी गई इनाम संपत्ति की थी।

इससे यह सिद्धांत सामने आता है कि किसी संपत्ति के हस्तांतरण की वैधता निर्धारित करने के लिए केवल दस्तावेज का नाम देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना आवश्यक है कि संपत्ति किस प्रकार की है और उस पर कौन-सा कानूनी प्रावधान लागू होता है।

जनहित के नाम पर मंदिर की जमीन का उपहार क्यों नहीं दिया जा सकता?

राज्य सरकार की ओर से विवादित हस्तांतरण का बचाव इस आधार पर किया गया था कि जमीन पर तालुक कार्यालय बनाया जा रहा था। यह कार्यालय सार्वजनिक प्रशासन की जरूरतों को पूरा करता है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी काम का सार्वजनिक उद्देश्य से जुड़ा होना अपने आप में मंदिर की संपत्ति को उपहार में लेने का कानूनी आधार नहीं बन सकता।

जनहित और कानूनी वैधता दो अलग-अलग प्रश्न हैं। कोई परियोजना आम जनता के लिए उपयोगी हो सकती है, लेकिन उसके लिए इस्तेमाल की जाने वाली संपत्ति का हस्तांतरण संबंधित कानून के अनुरूप होना भी आवश्यक है।

सरकारी कार्यालय बनाने की आवश्यकता होने का अर्थ यह नहीं है कि मंदिर की जमीन को बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के सरकार के नाम किया जा सकता है।

यदि सरकार को किसी धार्मिक संस्थान की जमीन की जरूरत है, तो उसे लागू कानून के तहत उपलब्ध वैध विकल्पों पर विचार करना होगा। जहां कानून किराये या लीज के माध्यम से जमीन के इस्तेमाल की अनुमति देता है, वहां संबंधित शर्तों का पालन किया जा सकता है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गिफ्ट डीड को अमान्य घोषित किया, लेकिन तालुक कार्यालय के इस्तेमाल के लिए बनी लीज को रद्द नहीं किया। अदालत ने जमीन के उपयोग के बदले किराये का भुगतान करने और मंदिर के हितों की रक्षा करने के निर्देश दिए।

इससे स्पष्ट है कि अदालत ने एक ओर अवैध उपहार को स्वीकार नहीं किया, वहीं दूसरी ओर पहले से निर्मित सार्वजनिक कार्यालय के व्यावहारिक पहलू को भी ध्यान में रखा।

ट्रस्टी की जिम्मेदारी और समझदारी भरे प्रबंधन का सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम की धाराओं 27 और 28 का भी उल्लेख किया। इन प्रावधानों के तहत धार्मिक संस्थानों के ट्रस्टियों को संस्थान और उसकी संपत्तियों का प्रबंधन सावधानीपूर्वक करना होता है।

अदालत ने समझाया कि ट्रस्टी को उसी प्रकार विवेकपूर्ण ढंग से निर्णय लेना चाहिए, जैसे कोई समझदार व्यक्ति अपने निजी मामलों और संपत्ति का प्रबंधन करता है।

इस सिद्धांत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि धार्मिक संस्थान की संपत्ति का इस्तेमाल उसके हितों के विरुद्ध न हो। ट्रस्टी को ऐसे निर्णय लेने चाहिए जिनसे संस्थान के संसाधनों का उचित संरक्षण हो और उसके निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति होती रहे।

उपहार में संपत्ति देने पर सामान्यतः कोई प्रतिफल प्राप्त नहीं होता। ऐसे में यदि मंदिर की जमीन किसी दूसरे पक्ष को बिना किसी लाभ के दे दी जाती है, तो यह सवाल उठता है कि इससे मंदिर को क्या फायदा हुआ।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी संदर्भ में कहा कि किसी धार्मिक संस्थान की संपत्ति को बिना प्रतिफल उपहार में देना समझदारी भरे प्रबंधन के सिद्धांत के अनुरूप नहीं माना जा सकता, विशेषकर तब जब कानून स्वयं इस प्रकार के हस्तांतरण पर रोक लगाता हो।

इस फैसले से ट्रस्टियों को यह संदेश मिलता है कि उन्हें धार्मिक संपत्तियों के संबंध में निर्णय लेते समय अपने व्यक्तिगत विचारों या किसी बाहरी संस्था की प्रशासनिक जरूरतों के बजाय संबंधित संस्थान के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

गिफ्ट डीड को शुरू से ही अमान्य क्यों माना गया?

सुप्रीम कोर्ट ने विवादित उपहार विलेख को शुरुआत से ही अमान्य माना। कानूनी भाषा में इसे नल एंड वॉइड कहा जाता है।

इसका अर्थ है कि संबंधित दस्तावेज को कानून के तहत वैध हस्तांतरण का प्रभाव नहीं दिया जा सकता। यदि कानून किसी विशेष प्रकार के उपहार को स्पष्ट रूप से निषिद्ध करता है, तो केवल दस्तावेज तैयार कर देने या उसका पंजीकरण करा लेने से वह हस्तांतरण वैध नहीं बन जाता।

अदालत ने कहा कि धारा 41 के अंतर्गत प्रतिबंधित उपहार को बाद में आयुक्त या सरकार की मंजूरी से भी वैध नहीं बनाया जा सकता।

फैसले में तमिलनाडु में लागू रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 की धारा 22-A का भी उल्लेख किया गया। अदालत ने माना कि आवश्यक कानूनी शर्तों और मंजूरी के अभाव में गिफ्ट डीड का वैध पंजीकरण नहीं किया जा सकता था।

इसके अतिरिक्त, अदालत ने कहा कि यदि धारा 34 लागू भी होती, तब भी आवश्यक आयुक्तीय मंजूरी और सरकारी अनुमति के अभाव में यह लेन-देन वैध नहीं ठहराया जा सकता था।

इस प्रकार, विवादित दस्तावेज को केवल इसलिए सही नहीं माना जा सकता था कि उसके आधार पर सरकारी कार्यालय का निर्माण कर दिया गया था।

तमिलनाडु सरकार के आचरण पर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के आचरण पर भी टिप्पणी की। अदालत ने गौर किया कि राज्य सरकार ने गिफ्ट डीड का बचाव तब भी जारी रखा, जब उसके अपने हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग ने यह स्पष्ट कर दिया था कि जमीन देवता की है और ट्रस्टी को इसे हस्तांतरित करने का अधिकार नहीं था।

इसके बावजूद राजस्व विभाग ने जमीन को तालुक कार्यालय के नाम पर दर्ज किया और सरकारी जमीन के रूप में वर्गीकृत कर दिया। सार्वजनिक धन से निर्माण कार्य भी किया गया।

अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि राज्य सरकार ने मंदिर की संपत्ति के संबंध में कानूनी स्थिति को समझने और उसका पालन करने में देर की।

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार धार्मिक संस्थानों की संपत्तियों की संरक्षक होने के नाते इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। उसे स्वयं उन कानूनों का पालन करना चाहिए, जिनके तहत ऐसी संपत्तियों का नियमन किया जाता है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार द्वारा बाद में अपनी गलती स्वीकार कर लेने से पहले किए गए कार्यों का महत्व समाप्त नहीं हो जाता। कई वर्षों तक मंदिर की जमीन को सरकारी संपत्ति की तरह इस्तेमाल किया गया, जबकि हस्तांतरण को कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं थी।

इसी संदर्भ में अदालत ने राज्य सरकार पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया, जिसे मंदिर को भुगतान किया जाना है।

सरकार को देना होगा 31,000 रुपये मासिक किराया

सुप्रीम कोर्ट ने गिफ्ट डीड को अमान्य घोषित करने के साथ-साथ मंदिर की जमीन के इस्तेमाल के बदले किराये का निर्धारण भी किया।

शुरुआत में एक समिति ने जमीन का मासिक किराया 13,235 रुपये तय किया था। बाद में जमीन और इमारत के मूल्य तथा लागू किराया निर्धारण के फॉर्मूले पर विचार किया गया।

उपलब्ध विवरण के अनुसार, धार्मिक संस्थानों की जमीन के मूल्यांकन के लिए लागू सरकारी फॉर्मूले के तहत गाइडलाइन वैल्यू या बाजार मूल्य, जो भी अधिक हो, उसका 225 प्रतिशत आधार बनाया गया। इस आधार पर जमीन और इमारत का कुल मूल्य लगभग 3.04 करोड़ रुपये आंका गया।

इसके बाद कुल मूल्य के 0.1 प्रतिशत के आधार पर किराये की गणना की गई। इस गणना से मासिक किराया लगभग 30,438 रुपये निकला, जिसे पूर्णांकित करके 31,000 रुपये प्रति माह निर्धारित किया गया।

अदालत ने निर्देश दिया कि बढ़ा हुआ किराया 8 मार्च 2019 से लागू माना जाएगा। राज्य सरकार को पहले भुगतान की गई राशि घटाने के बाद बाकी बकाया तीन महीने के भीतर चुकाना होगा।

इसके अतिरिक्त, मंदिर ट्रस्ट को लीज की अवधि, नवीनीकरण और अन्य शर्तों के संबंध में लागू कानून के अनुसार निर्णय लेने का अधिकार रहेगा। किराये की समीक्षा प्रत्येक तीन वर्ष में की जानी चाहिए और निर्धारित किराया 31,000 रुपये प्रति माह से कम नहीं किया जा सकता।

यह व्यवस्था इस बात को स्पष्ट करती है कि किसी सरकारी कार्यालय का सार्वजनिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल होना मंदिर को उसकी संपत्ति से मिलने वाले उचित आर्थिक लाभ से वंचित करने का आधार नहीं बन सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने लीज रद्द करने से इनकार क्यों किया?

हालांकि अदालत ने गिफ्ट डीड को अमान्य घोषित कर दिया, लेकिन उसने राज्य सरकार के पक्ष में बनी लीज को रद्द करने से इनकार कर दिया।

इसका प्रमुख कारण यह था कि तालुक कार्यालय का निर्माण सार्वजनिक धन से पहले ही हो चुका था और वह क्षेत्र की प्रशासनिक जरूरतों को पूरा कर रहा था।

अदालत ने इस व्यावहारिक परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए जमीन के इस्तेमाल को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय किराये और लीज की शर्तों के माध्यम से मंदिर के हितों की रक्षा करने का रास्ता अपनाया।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। गिफ्ट डीड को अमान्य घोषित करने का अर्थ यह है कि उसके आधार पर मंदिर की जमीन का स्वामित्व सरकार को हस्तांतरित नहीं हुआ। वहीं लीज के तहत किसी संपत्ति का इस्तेमाल निर्धारित शर्तों और अवधि के अनुसार किया जा सकता है।

इसलिए अदालत ने उपहार विलेख को वैध नहीं माना, लेकिन जमीन के इस्तेमाल के लिए किराया चुकाने और लीज की शर्तों का पालन करने की व्यवस्था को बनाए रखा।

इससे यह भी स्पष्ट होता है कि सार्वजनिक परियोजना की उपयोगिता और धार्मिक संपत्ति के कानूनी स्वामित्व को अलग-अलग आधारों पर देखा जाना चाहिए।

धार्मिक संस्थानों की संपत्ति के लिए भविष्य में क्या निर्देश दिए गए?

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार और हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग को निर्देश दिया कि धार्मिक संस्थानों की संपत्तियों से संबंधित किसी भी लेन-देन को मंजूरी देने या लागू करने से पहले अधिनियम की धाराओं 34, 34-A और 41 तथा उनके तहत बनाए गए नियमों का सख्ती से पालन किया जाए।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक और धर्मार्थ संस्थानों की संपत्तियों से संबंधित निर्णय लेते समय सरकारी प्रशासनिक सुविधा के बजाय संबंधित संस्थान के हितों और लाभ को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

इन निर्देशों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि धार्मिक संस्थानों की जमीन और अन्य संपत्तियों का इस्तेमाल कानून के अनुसार हो। ट्रस्टी और सरकारी अधिकारी किसी भी संपत्ति के हस्तांतरण या उपयोग के संबंध में निर्णय लेते समय निर्धारित कानूनी सीमाओं का उल्लंघन न करें।

यह फैसला धार्मिक संपत्तियों के संरक्षण के साथ-साथ प्रशासनिक जवाबदेही का भी महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह बताता है कि सरकारी विभागों को भी अपने अधिकारों का इस्तेमाल कानून के दायरे में रहकर करना होगा।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला धार्मिक संस्थानों की संपत्तियों के अधिकार और उनके प्रबंधन से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट करता है। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार मंदिर की जमीन की संरक्षक और नियामक है, उसकी मालिक नहीं। इसलिए मंदिर की संपत्ति को बिना वैध कानूनी आधार के सरकार को उपहार में नहीं दिया जा सकता, भले ही उस पर किसी सार्वजनिक कार्यालय का निर्माण किया जाना हो।

तमिलनाडु के नागपालयम मरियम्मन-पोन्नाचियम्मन मंदिर की जमीन से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गिफ्ट डीड को अमान्य घोषित करते हुए मद्रास हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया। अदालत ने राज्य सरकार को 31,000 रुपये मासिक किराया देने, 8 मार्च 2019 से बकाया राशि की गणना कर तीन महीने के भीतर भुगतान करने और मंदिर को एक लाख रुपये जुर्माना देने का निर्देश दिया।

साथ ही, अदालत ने स्पष्ट किया कि मंदिर की संपत्ति का प्रबंधन करने वाले ट्रस्टियों को संबंधित कानून के अनुसार काम करना होगा। सरकार और धार्मिक बंदोबस्ती विभाग को भी भविष्य में संपत्ति संबंधी निर्णय लेते समय लागू कानूनी प्रावधानों का सख्ती से पालन करना होगा।

इस फैसले का मूल संदेश स्पष्ट है—मंदिर की संपत्ति किसी ट्रस्टी या सरकारी अधिकारी की निजी इच्छा से हस्तांतरित नहीं की जा सकती। उसका संरक्षण, प्रबंधन और इस्तेमाल कानून तथा धार्मिक संस्थान के हितों के अनुरूप होना चाहिए।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।