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मासिक धर्म स्वच्छता मौलिक अधिकार, फिर भी राज्यों ने नहीं दी रिपोर्ट; सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी, केंद्र से मांगा जवाब

मासिक धर्म स्वच्छता मौलिक अधिकार, फिर भी राज्यों ने नहीं दी रिपोर्ट; सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी, केंद्र से मांगा जवाब

        सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: अनुच्छेद 21 के तहत मासिक धर्म स्वास्थ्य के अधिकार को केवल कागजों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को बताना होगा कि फैसले को लागू करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता, स्वास्थ्य सुविधाओं और सुरक्षित वातावरण की उपलब्धता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर केंद्र सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की जिम्मेदारी पर सवाल उठाए हैं। शीर्ष अदालत ने इस बात पर नाराजगी जताई कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अब तक केंद्र सरकार को यह जानकारी नहीं दी है कि मासिक धर्म स्वच्छता को मौलिक अधिकार का हिस्सा मानने वाले न्यायालय के फैसले को जमीन पर लागू करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

न्यायमूर्ति जेबी पार्डीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि यदि न्यायालय के फैसले में कही गई बातें केवल कागजों तक सीमित रह जाएंगी, तो इस मौलिक अधिकार का वास्तविक लाभ लड़कियों और महिलाओं तक कैसे पहुंचेगा।

अदालत की टिप्पणी का सीधा संबंध उन लाखों लड़कियों और महिलाओं से है, जिन्हें मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता संबंधी सुविधाओं, सुरक्षित सैनिटरी उत्पादों, साफ शौचालयों और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी की कमी का सामना करना पड़ता है। विशेष रूप से स्कूलों में पढ़ने वाली किशोरियों के लिए ये सुविधाएं बेहद महत्वपूर्ण हैं। कई बार आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने के कारण लड़कियां स्कूल जाने से बचती हैं और कुछ परिस्थितियों में उनकी पढ़ाई भी प्रभावित होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही स्पष्ट किया था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में मासिक धर्म से जुड़े स्वास्थ्य का अधिकार भी शामिल है। अब अदालत यह जानना चाहती है कि इस फैसले को लागू करने के लिए संबंधित सरकारों ने वास्तविक स्तर पर क्या किया है।

केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि केंद्र ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है, लेकिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ओर से अब तक अपेक्षित जवाब नहीं मिला है।

न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह इस मामले को गंभीरता से उठाए और संबंधित राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों से जानकारी प्राप्त करे। मामले की अगली सुनवाई 14 नवंबर को निर्धारित की गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से क्यों जताई नाराजगी?

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि मासिक धर्म स्वच्छता को मौलिक अधिकार का हिस्सा घोषित किए जाने के बाद उसे लागू करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

अदालत ने एक सितंबर को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि वे न्यायालय द्वारा पहचानी गई कमियों पर ध्यान दें और अगली सुनवाई तक इस संबंध में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करें।

लेकिन सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से बताया गया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अब तक इस संबंध में कोई जवाब नहीं दिया है।

इस पर न्यायमूर्ति जेबी पार्डीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने सवाल उठाया कि यदि फैसले में कही गई बातें केवल कागजों तक सीमित रहेंगी, तो इस मौलिक अधिकार को लागू कैसे किया जाएगा?

अदालत की यह टिप्पणी सरकारी व्यवस्था के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करती है। किसी अधिकार को न्यायिक मान्यता मिल जाना महत्वपूर्ण है, लेकिन उसका वास्तविक लाभ तभी मिलता है जब संबंधित विभाग उसके लिए आवश्यक सुविधाएं, संसाधन और प्रशासनिक व्यवस्था उपलब्ध कराएं।

यदि स्कूलों में पर्याप्त शौचालय नहीं हैं, सैनिटरी पैड उपलब्ध नहीं हैं या उनके सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था नहीं है, तो केवल सरकारी दिशा-निर्देश जारी करने से समस्या का समाधान नहीं होगा।

इसी प्रकार, यदि लड़कियों को मासिक धर्म के दौरान होने वाले शारीरिक बदलावों और स्वच्छता के महत्व के बारे में उचित जानकारी नहीं मिलती, तो स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बनी रह सकती हैं।

इसलिए अदालत की चिंता केवल रिपोर्ट प्रस्तुत करने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे यह सुनिश्चित करने का उद्देश्य भी है कि मौलिक अधिकार को लागू करने के लिए बनाई गई व्यवस्था का लाभ जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे।

अनुच्छेद 21 में मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार क्यों महत्वपूर्ण है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण प्रदान करता है। न्यायपालिका ने समय-समय पर इसकी व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है। इसमें गरिमा के साथ जीवन जीने और उससे जुड़ी आवश्यक परिस्थितियों का भी महत्व है।

स्वास्थ्य, स्वच्छता और गरिमा का आपस में गहरा संबंध है। यदि किसी व्यक्ति को बुनियादी स्वच्छता सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, तो उसका स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। इसी तरह, मासिक धर्म से जुड़ी आवश्यकताओं की अनदेखी लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सामाजिक भागीदारी पर असर डाल सकती है।

मासिक धर्म एक प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया है। इसके बावजूद समाज के कई हिस्सों में इससे जुड़ी जानकारी की कमी, संकोच और सामाजिक धारणाओं के कारण लड़कियों को आवश्यक सहायता नहीं मिल पाती।

कुछ स्थानों पर किशोरियों को सैनिटरी पैड आसानी से उपलब्ध नहीं होते। कहीं साफ और सुरक्षित शौचालयों की कमी होती है, तो कहीं इस्तेमाल किए गए सैनिटरी उत्पादों के निस्तारण की उचित व्यवस्था नहीं होती।

इन परिस्थितियों में मासिक धर्म स्वास्थ्य को जीवन के अधिकार से जोड़ना महत्वपूर्ण हो जाता है। इससे सरकारों की जिम्मेदारी पर ध्यान केंद्रित होता है कि वे इस विषय को केवल व्यक्तिगत स्वच्छता का मामला न मानें, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और गरिमा से जुड़े व्यापक प्रश्न के रूप में देखें।

हालांकि, अनुच्छेद 21 के तहत किसी अधिकार की न्यायिक मान्यता का अर्थ यह नहीं है कि उसे लागू करने के लिए हर परिस्थिति में एक ही प्रकार की योजना अपनाई जाएगी। संबंधित कानूनों, न्यायालय के निर्देशों और व्यावहारिक जरूरतों के अनुसार आवश्यक कदम तय किए जा सकते हैं।

30 जनवरी के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने 30 जनवरी को दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में मासिक धर्म से जुड़े स्वास्थ्य का अधिकार भी शामिल है।

यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मासिक धर्म स्वास्थ्य से संबंधित सुविधाओं की कमी का असर केवल शारीरिक स्वास्थ्य पर नहीं पड़ता, बल्कि शिक्षा, आत्मविश्वास और सामाजिक जीवन पर भी पड़ सकता है।

किसी किशोरी को यदि स्कूल में साफ शौचालय, पानी और मासिक धर्म के दौरान जरूरी उत्पाद उपलब्ध नहीं होते, तो उसके लिए नियमित रूप से कक्षाओं में उपस्थित रहना कठिन हो सकता है। ऐसी स्थिति में शिक्षा प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है।

इसी तरह, उचित स्वच्छता सुविधाओं का अभाव संक्रमण और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की आशंका बढ़ा सकता है। मासिक धर्म के दौरान साफ-सफाई बनाए रखने और इस्तेमाल किए गए उत्पादों को सुरक्षित तरीके से बदलने तथा निस्तारित करने की सुविधा आवश्यक है।

अदालत के फैसले का महत्व इस बात में है कि उसने मासिक धर्म स्वास्थ्य को केवल व्यक्तिगत सुविधा का विषय मानने के बजाय संवैधानिक अधिकार के व्यापक संदर्भ में देखा।

इससे सरकारों के सामने यह जिम्मेदारी भी स्पष्ट होती है कि वे स्वास्थ्य और शिक्षा से संबंधित योजनाओं को इस प्रकार लागू करें, जिससे लड़कियों और महिलाओं को आवश्यक सुविधाएं मिल सकें।

अब अदालत यह जानना चाहती है कि इस फैसले के बाद सरकारों ने किन कमियों को पहचाना है और उन्हें दूर करने के लिए क्या कदम उठाए हैं।

लड़कियों की पढ़ाई से जुड़ा है मासिक धर्म स्वच्छता का सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान विशेष रूप से उन लड़कियों के हितों पर ध्यान दिया, जो मासिक धर्म से जुड़ी समस्याओं के कारण पढ़ाई छोड़ देती हैं।

यह टिप्पणी बताती है कि अदालत इस मुद्दे को केवल स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित नहीं मान रही, बल्कि इसे शिक्षा के अवसरों और लड़कियों के भविष्य से भी जोड़कर देख रही है।

किसी किशोरी के लिए स्कूल में नियमित उपस्थिति उसकी शैक्षणिक प्रगति का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। यदि मासिक धर्म के दौरान आवश्यक सुविधाओं की कमी के कारण उसे बार-बार स्कूल से अनुपस्थित रहना पड़े, तो उसकी पढ़ाई प्रभावित हो सकती है।

ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में यह समस्या अधिक गंभीर रूप ले सकती है। कुछ परिवारों के लिए नियमित रूप से सैनिटरी पैड खरीदना आर्थिक रूप से कठिन हो सकता है। वहीं, स्कूलों में पर्याप्त सुविधाएं न होने पर छात्राओं को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

मासिक धर्म से जुड़ी सामाजिक झिझक भी एक बड़ी चुनौती है। कई किशोरियां अपनी परेशानी के बारे में शिक्षकों या परिवार के सदस्यों से खुलकर बात नहीं कर पातीं। इससे आवश्यक सहायता मिलने में देरी हो सकती है।

यदि स्कूलों में मासिक धर्म स्वास्थ्य के बारे में उचित जानकारी दी जाए, छात्राओं के लिए स्वच्छ शौचालय उपलब्ध हों और जरूरत पड़ने पर सैनिटरी उत्पाद मिल सकें, तो उनकी नियमित उपस्थिति में मदद मिल सकती है।

इसके लिए केवल स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर्याप्त नहीं होगी। शिक्षा विभाग, स्थानीय प्रशासन, स्कूल प्रबंधन और स्वास्थ्य सेवाओं के बीच समन्वय भी आवश्यक है।

स्कूलों में किन सुविधाओं की जरूरत है?

मासिक धर्म स्वच्छता के अधिकार को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता महत्वपूर्ण है।

पहली जरूरत साफ और सुरक्षित शौचालयों की है। छात्राओं के लिए ऐसे शौचालय होने चाहिए, जहां पर्याप्त गोपनीयता हो और नियमित सफाई की व्यवस्था की जाती हो। पानी की उपलब्धता भी आवश्यक है।

दूसरी जरूरत सैनिटरी उत्पादों तक पहुंच है। आर्थिक कठिनाइयों के कारण किसी छात्रा को आवश्यक उत्पादों से वंचित नहीं रहना चाहिए। स्कूलों में जरूरत के अनुसार सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने की व्यवस्था उपयोगी हो सकती है।

तीसरी जरूरत सुरक्षित निस्तारण की है। इस्तेमाल किए गए सैनिटरी उत्पादों को खुले स्थानों पर फेंकना या अनुचित तरीके से निस्तारित करना स्वच्छता और पर्यावरण दोनों के लिए समस्या पैदा कर सकता है। इसलिए स्थानीय परिस्थितियों और पर्यावरणीय मानकों के अनुसार सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था जरूरी है।

चौथी जरूरत स्वास्थ्य संबंधी जानकारी की है। छात्राओं को मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता, सामान्य शारीरिक बदलावों और जरूरत पड़ने पर चिकित्सा सहायता लेने के बारे में सही जानकारी मिलनी चाहिए। शिक्षकों और स्वास्थ्यकर्मियों को भी इस विषय पर संवेदनशीलता के साथ संवाद करने की आवश्यकता है।

पांचवीं जरूरत शिकायत और सहायता की व्यवस्था है। यदि किसी स्कूल में आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, तो छात्राओं और अभिभावकों को अपनी समस्या बताने का उचित माध्यम मिलना चाहिए। शिकायतों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए।

इन व्यवस्थाओं का लाभ तभी मिलेगा, जब सुविधाएं केवल कागजों पर दर्ज न हों, बल्कि नियमित रूप से उपलब्ध और उपयोग योग्य रहें।

केंद्र सरकार ने क्या बताया?

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि भारत सरकार ने इस विषय को गंभीरता से लिया है।

हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ओर से अब तक कोई जवाब नहीं मिला है।

यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्कूलों में स्वच्छता सुविधाओं, स्वास्थ्य सेवाओं और स्थानीय स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन में राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों की अहम भूमिका होती है।

केंद्र सरकार नीतिगत दिशा-निर्देश और समन्वय संबंधी कदम उठा सकती है, लेकिन विभिन्न राज्यों में वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार योजनाओं को लागू करने के लिए संबंधित प्रशासनिक तंत्र की सक्रियता आवश्यक है।

यदि राज्यों की ओर से रिपोर्ट ही प्रस्तुत नहीं की जाती, तो यह आकलन करना कठिन हो जाता है कि किन क्षेत्रों में सुविधाएं उपलब्ध हैं और कहां अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत है।

अदालत के निर्देश के बाद केंद्र सरकार को इस विषय पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जानकारी मांगने तथा उनके जवाब प्राप्त करने की प्रक्रिया को गंभीरता से आगे बढ़ाना होगा।

हालांकि, उपलब्ध जानकारी में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि किन राज्यों ने कौन-सी योजनाएं लागू की हैं या किस राज्य में कितनी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसलिए इस संबंध में किसी विशेष राज्य की स्थिति के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

राज्यों की रिपोर्ट से क्या स्पष्ट हो सकता है?

राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की रिपोर्ट से यह समझने में मदद मिल सकती है कि मासिक धर्म स्वच्छता के अधिकार को लागू करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।

रिपोर्ट में स्कूलों में शौचालयों की उपलब्धता, सैनिटरी उत्पादों की व्यवस्था, स्वच्छता संबंधी जागरूकता कार्यक्रमों और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच जैसे पहलुओं की जानकारी उपयोगी हो सकती है।

इसके अतिरिक्त, यह भी पता लगाया जा सकता है कि किन क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी है और उन्हें दूर करने के लिए क्या योजनाएं बनाई गई हैं।

उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र के स्कूलों में शौचालय तो हैं, लेकिन उनमें पानी की व्यवस्था नहीं है, तो केवल शौचालयों की संख्या बताने से वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं होगी।

इसी तरह, यदि सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई है, तो यह देखना भी आवश्यक है कि छात्राओं को वास्तव में उत्पाद मिल रहे हैं या नहीं।

इस प्रकार की जानकारी से सरकारी योजनाओं की प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया जा सकता है। इसके आधार पर संसाधनों का उचित वितरण और कमियों को दूर करने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की चिंता इसी बात को लेकर है कि न्यायालय के फैसले को लागू करने की प्रक्रिया में जवाबदेही सुनिश्चित हो और संबंधित सरकारें अपनी जिम्मेदारी निभाएं।

क्या केवल सरकारी आदेश से समस्या का समाधान हो जाएगा?

मासिक धर्म स्वच्छता की समस्या का समाधान केवल आदेश जारी करने या रिपोर्ट प्रस्तुत करने से नहीं होगा। इसके लिए लगातार प्रयासों और बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता आवश्यक है।

किसी स्कूल में सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने की योजना तभी सफल मानी जा सकती है, जब जरूरत पड़ने पर छात्राओं को वे आसानी से मिल सकें। इसी तरह, शौचालय का निर्माण तभी उपयोगी होगा, जब उसकी सफाई, पानी और रखरखाव की नियमित व्यवस्था हो।

जागरूकता भी इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मासिक धर्म को लेकर गलत धारणाएं और सामाजिक संकोच दूर करने के लिए परिवारों, शिक्षकों और समुदायों की भूमिका महत्वपूर्ण है।

किशोरियों को ऐसी जानकारी मिलनी चाहिए, जिससे वे अपने स्वास्थ्य के बारे में सही निर्णय ले सकें। किसी असामान्य लक्षण या गंभीर परेशानी की स्थिति में चिकित्सा सहायता लेने के महत्व को भी समझाया जाना चाहिए।

सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि सुविधाओं की उपलब्धता आर्थिक स्थिति या निवास स्थान के कारण प्रभावित न हो। ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाली छात्राओं तक भी आवश्यक सहायता पहुंचनी चाहिए।

अदालत के फैसले को प्रभावी बनाने के लिए यही जरूरी होगा कि नीतिगत निर्णयों को व्यावहारिक व्यवस्था में बदला जाए और उनके क्रियान्वयन की नियमित समीक्षा की जाए।

14 नवंबर की सुनवाई पर टिकी नजरें

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस मुद्दे को गंभीरता से उठाए और राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों से जानकारी प्राप्त करे कि फैसले को लागू करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

मामले की अगली सुनवाई 14 नवंबर को निर्धारित की गई है। इस सुनवाई में संबंधित सरकारों की ओर से प्रस्तुत जानकारी महत्वपूर्ण हो सकती है।

अदालत यह देखना चाहती है कि मासिक धर्म स्वच्छता को मौलिक अधिकार का हिस्सा मानने वाले फैसले के बाद वास्तविक स्तर पर क्या प्रगति हुई है। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की रिपोर्ट से इस दिशा में किए गए प्रयासों तथा मौजूद कमियों की जानकारी मिल सकती है।

हालांकि, अगली सुनवाई में अदालत क्या आदेश देगी, यह पहले से निश्चित नहीं कहा जा सकता। यह संबंधित पक्षों की ओर से प्रस्तुत जानकारी और न्यायालय के समक्ष उठने वाले कानूनी प्रश्नों पर निर्भर करेगा।

फिलहाल, अदालत की टिप्पणी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संवैधानिक अधिकारों को केवल न्यायिक फैसलों और सरकारी दस्तावेजों तक सीमित नहीं रखा जा सकता।

निष्कर्ष

मासिक धर्म स्वच्छता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देना लड़कियों और महिलाओं के स्वास्थ्य, गरिमा तथा शिक्षा से जुड़े मुद्दों के लिए महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन इस अधिकार का वास्तविक महत्व तभी है, जब आवश्यक सुविधाएं उन तक पहुंचें, जिन्हें उनकी सबसे अधिक जरूरत है।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ओर से रिपोर्ट नहीं दिए जाने पर नाराजगी जताते हुए स्पष्ट किया कि फैसले को केवल कागजों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। केंद्र सरकार को इस विषय पर गंभीरता से कार्रवाई करने और संबंधित सरकारों से जानकारी प्राप्त करने का निर्देश दिया गया है।

अब राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की जिम्मेदारी है कि वे अपनी ओर से किए गए प्रयासों का विवरण प्रस्तुत करें और जहां कमियां हैं, उन्हें दूर करने के लिए ठोस कदम उठाएं।

मासिक धर्म स्वच्छता केवल सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने का विषय नहीं है। इसमें सुरक्षित शौचालय, साफ पानी, स्वास्थ्य संबंधी सही जानकारी, सुरक्षित निस्तारण और सामाजिक संकोच को दूर करना भी शामिल है।

संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत अधिकार की वास्तविक सार्थकता तभी है, जब हर लड़की को सम्मान, स्वास्थ्य और सुरक्षित वातावरण के साथ शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिले। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसी लक्ष्य को जमीन पर उतारने की दिशा में सरकारों की जवाबदेही को रेखांकित करती है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।