पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने के नियमों में बड़ा बदलाव: गन्ने के रस और शीरे से बने इथेनॉल पर रोक, अब मक्का और चावल पर बढ़ेगी निर्भरता
भारत में पेट्रोल की बढ़ती मांग, कच्चे तेल के आयात पर होने वाला भारी खर्च और पर्यावरण प्रदूषण को कम करने की जरूरत को देखते हुए केंद्र सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने के कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ाया है। इस योजना का उद्देश्य पेट्रोल में जैव ईंधन की निर्धारित मात्रा मिलाकर विदेशी तेल पर निर्भरता कम करना, किसानों को वैकल्पिक बाजार उपलब्ध कराना और ऊर्जा के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में आगे बढ़ना है। हालांकि, अब इसी इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखने की चिंता के बीच सरकार ने 2026-27 आपूर्ति वर्ष के लिए गन्ने के रस, चीनी की चाशनी और बी-हेवी शीरे से बने इथेनॉल की खरीद को पेट्रोल मिश्रण की ताजा निविदा में शामिल नहीं किया है।
इस फैसले से इथेनॉल उत्पादन के लिए कच्चे माल की खरीद की रणनीति में बदलाव आने की संभावना है। अब पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की जरूरत पूरी करने के लिए मक्का, टूटे चावल, भारतीय खाद्य निगम के अधिशेष चावल और सी-हेवी शीरे से बने इथेनॉल पर अधिक निर्भरता रहेगी। सरकार का यह कदम ऐसे समय में सामने आया है, जब देश में चीनी उत्पादन, गन्ने की उपलब्धता और प्रमुख उत्पादक राज्यों में मौसम की परिस्थितियों को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं।
पेट्रोलियम विपणन कंपनियों ने नवंबर 2026 से शुरू होने वाले आपूर्ति वर्ष के लिए लगभग 1,100 करोड़ लीटर इथेनॉल की खरीद के उद्देश्य से बोलियां आमंत्रित की हैं। इस खरीद का लक्ष्य पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण की जरूरत को पूरा करना है। लेकिन सवाल यह है कि गन्ने से बनने वाले इथेनॉल की खरीद को सीमित करने से चीनी उद्योग, किसानों, इथेनॉल उत्पादकों और आम उपभोक्ताओं पर क्या असर पड़ेगा? क्या मक्का और चावल से इथेनॉल का उत्पादन बढ़ाकर पेट्रोल में मिश्रण का लक्ष्य हासिल किया जा सकेगा? आइए, पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।
1. सरकार ने गन्ने से बने इथेनॉल पर रोक क्यों लगाई?
केंद्र सरकार के इस फैसले के पीछे सबसे प्रमुख चिंता घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने की है। भारत में गन्ना चीनी उत्पादन का मुख्य स्रोत है। इसी गन्ने से चीनी मिलें रस, शीरे और अन्य उप-उत्पादों के माध्यम से इथेनॉल भी तैयार करती हैं।
पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने इथेनॉल उत्पादन को प्रोत्साहित किया, ताकि चीनी मिलों को अपनी उपज के लिए अतिरिक्त बाजार मिल सके। इससे मिलों को आर्थिक लाभ प्राप्त करने और गन्ना किसानों के भुगतान में मदद मिलने की उम्मीद की गई थी।
लेकिन गन्ने से चीनी और इथेनॉल बनाने के बीच कच्चे माल के इस्तेमाल का सीधा संबंध है। जब गन्ने के रस या चीनी की चाशनी को इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तो उसी कच्चे माल से सीधे चीनी उत्पादन की संभावना कम हो जाती है। इसी प्रकार बी-हेवी शीरे का इस्तेमाल भी चीनी और इथेनॉल उत्पादन के बीच संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
यदि किसी वर्ष चीनी उत्पादन कम रहने की आशंका हो, तो सरकार के सामने यह चुनौती होती है कि घरेलू उपभोक्ताओं के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध रहे और कीमतों में अनावश्यक तेजी न आए।
महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों में कम बारिश के कारण उत्पादन पर संभावित असर की चिंता भी इस फैसले की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण बताई गई है। ऐसे हालात में गन्ने से बने इथेनॉल की खरीद को सीमित करके कच्चे माल का अधिक हिस्सा चीनी उत्पादन के लिए उपलब्ध रखने की कोशिश की जा सकती है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि ताजा खरीद निविदा में कुछ स्रोतों से बने इथेनॉल को शामिल नहीं करना पूरे देश में इथेनॉल उत्पादन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के समान नहीं है। इसका सीधा संबंध संबंधित आपूर्ति वर्ष के लिए पेट्रोलियम कंपनियों की खरीद व्यवस्था से है।
2. पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य क्या है?
भारत सरकार का इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम पेट्रोलियम क्षेत्र में आयात पर निर्भरता कम करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। इथेनॉल एक प्रकार का अल्कोहल है, जिसे जैविक कच्चे माल से तैयार किया जा सकता है। इसके उत्पादन के लिए गन्ने के उत्पादों के अलावा मक्का, चावल और अन्य स्टार्च या शर्करा युक्त पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है।
पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से पेट्रोलियम ईंधन की कुछ मात्रा का स्थान जैव ईंधन ले सकता है। इससे कच्चे तेल की मांग में कमी लाने में मदद मिल सकती है। इसके अतिरिक्त, इथेनॉल कार्यक्रम कृषि उत्पादों के लिए औद्योगिक मांग भी पैदा करता है।
भारत में पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसे सामान्य रूप से ई20 कार्यक्रम कहा जाता है। इस व्यवस्था में पेट्रोल में मात्रा के आधार पर 20 प्रतिशत तक इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य रखा जाता है।
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हर वर्ष बड़ी मात्रा में इथेनॉल की जरूरत होती है। मांग को पूरा करने के लिए उत्पादन क्षमता, कच्चे माल की उपलब्धता, परिवहन, भंडारण और पेट्रोलियम कंपनियों की खरीद व्यवस्था के बीच तालमेल आवश्यक है।
यदि गन्ने से बनने वाले इथेनॉल की उपलब्धता सीमित की जाती है, तो अन्य स्रोतों से उत्पादन बढ़ाना महत्वपूर्ण हो जाता है। यही कारण है कि मक्का और चावल जैसे अनाज इस कार्यक्रम में अधिक अहम भूमिका निभा सकते हैं।
हालांकि, इथेनॉल की उपलब्धता केवल कच्चे माल पर निर्भर नहीं करती। उत्पादन संयंत्रों की क्षमता, पानी और ऊर्जा की जरूरत, परिवहन लागत और खरीद मूल्य भी इस क्षेत्र की आर्थिक व्यवहार्यता को प्रभावित करते हैं।
3. करीब 1,100 करोड़ लीटर इथेनॉल खरीदने की तैयारी
पेट्रोलियम विपणन कंपनियों ने 2026-27 आपूर्ति वर्ष के लिए लगभग 1,100 करोड़ लीटर इथेनॉल की खरीद के उद्देश्य से बोलियां आमंत्रित की हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी बीपीसीएल ने 16 अक्टूबर को कंपनियों की ओर से यह निविदा जारी की।
इस खरीद का उद्देश्य पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण के लिए आवश्यक आपूर्ति सुनिश्चित करना है। इतनी बड़ी मात्रा में इथेनॉल की खरीद के लिए विभिन्न उत्पादन स्रोतों से पर्याप्त आपूर्ति मिलना आवश्यक होगा।
इथेनॉल उत्पादन करने वाली कंपनियों और चीनी मिलों के लिए पेट्रोलियम कंपनियों की खरीद निविदाएं महत्वपूर्ण होती हैं, क्योंकि इनसे उनके उत्पाद के लिए बाजार उपलब्ध होता है। यदि किसी स्रोत से बने इथेनॉल की खरीद सीमित कर दी जाती है, तो संबंधित उत्पादकों को अपने उत्पादन और बिक्री की योजना में बदलाव करना पड़ सकता है।
इस बार गन्ने के रस, चीनी की चाशनी और बी-हेवी शीरे से बने इथेनॉल को निविदा में शामिल नहीं किया गया है। इसके स्थान पर मक्का, टूटे चावल, भारतीय खाद्य निगम द्वारा खरीदे गए अधिशेष चावल और सी-हेवी शीरे से बने इथेनॉल की आपूर्ति के लिए बोलियां आमंत्रित की जा सकती हैं।
इस बदलाव के कारण अनाज आधारित इथेनॉल उत्पादन करने वाली इकाइयों के लिए बाजार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। दूसरी ओर, गन्ने के कुछ उत्पादों पर आधारित इथेनॉल संयंत्रों को अपनी बिक्री व्यवस्था के बारे में नए सिरे से योजना बनानी पड़ सकती है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि निविदा में लगभग 1,100 करोड़ लीटर की खरीद का उद्देश्य बताया गया है। वास्तविक आपूर्ति कितनी होगी, यह प्राप्त बोलियों, स्वीकृत मात्रा और उत्पादकों की आपूर्ति क्षमता पर निर्भर करेगा।
4. मक्का से बने इथेनॉल पर सरकार का क्या फैसला है?
इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्का एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है। इसमें स्टार्च की पर्याप्त मात्रा होती है, जिसे प्रसंस्करण के माध्यम से शर्करा में बदलकर इथेनॉल तैयार किया जा सकता है।
नई निविदा में मक्का आधारित इथेनॉल की आपूर्ति के लिए बोलियां लगाने की अनुमति दी गई है। इसके साथ ही मक्का से बने इथेनॉल पर प्रोत्साहन राशि घटाकर 68.86 रुपये प्रति लीटर कर दी गई है, जबकि पहले यह राशि 71.86 रुपये प्रति लीटर बताई गई थी।
प्रोत्साहन राशि में इस बदलाव का असर उत्पादकों की लागत और आपूर्ति संबंधी निर्णयों पर पड़ सकता है। इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों को यह देखना होगा कि मक्के की खरीद कीमत, प्रसंस्करण लागत, बिजली, पानी, परिवहन और अन्य खर्चों के बाद उत्पादन आर्थिक रूप से कितना लाभकारी रहता है।
मक्का आधारित इथेनॉल की मांग बढ़ने से किसानों के लिए अतिरिक्त बाजार उपलब्ध होने की संभावना है। यदि इथेनॉल संयंत्रों को नियमित और पर्याप्त मात्रा में मक्का की जरूरत होती है, तो इससे मक्का उत्पादकों को अपनी फसल बेचने के नए अवसर मिल सकते हैं।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। मक्का का इस्तेमाल पशु आहार, पोल्ट्री उद्योग और खाद्य उत्पादों में भी होता है। यदि इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के की मांग तेजी से बढ़ती है, तो अन्य उपयोगों के लिए उपलब्ध मात्रा और कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।
इसलिए मक्का आधारित इथेनॉल का विस्तार करते समय कृषि उत्पादन, पशु आहार की जरूरत और खाद्य बाजार के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक होगा।
5. टूटे चावल और एफसीआई के अधिशेष चावल का इस्तेमाल
नई खरीद व्यवस्था में टूटे चावल और भारतीय खाद्य निगम यानी एफसीआई द्वारा खरीदे गए अधिशेष चावल से बने इथेनॉल को भी शामिल किया गया है।
चावल आधारित इथेनॉल उत्पादन में अनाज के स्टार्च को पहले शर्करा में बदला जाता है। इसके बाद किण्वन और आसवन जैसी प्रक्रियाओं से इथेनॉल तैयार किया जाता है।
टूटे चावल का इस्तेमाल इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है कि यह सामान्य रूप से साबुत चावल की तुलना में अलग बाजार में बिकता है। हालांकि, इसकी उपलब्धता, कीमत और अन्य औद्योगिक उपयोगों को ध्यान में रखना जरूरी है।
एफसीआई के अधिशेष चावल के इस्तेमाल का उद्देश्य उपलब्ध अनाज संसाधनों का उपयोग करके इथेनॉल उत्पादन को समर्थन देना हो सकता है। लेकिन इस व्यवस्था में खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
भारत में चावल करोड़ों परिवारों के भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली और अन्य खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों के लिए अनाज की उपलब्धता सुनिश्चित करना सरकार की प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल है।
इसलिए अधिशेष चावल के इस्तेमाल का आकलन करते समय यह देखना जरूरी है कि संबंधित मात्रा वास्तव में उपलब्ध अधिशेष से आती है या उससे घरेलू खाद्य आपूर्ति पर दबाव पड़ने की आशंका है।
किसी भी स्थिति में इथेनॉल उत्पादन के लिए अनाज की मांग बढ़ाने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक होगा।
6. सी-हेवी शीरे से बने इथेनॉल को क्यों रखा गया है?
नई निविदा में सी-हेवी शीरे से बने इथेनॉल को शामिल किया गया है। इसे समझने के लिए गन्ना प्रसंस्करण की प्रक्रिया पर ध्यान देना जरूरी है।
जब गन्ने से चीनी बनाई जाती है, तो इस प्रक्रिया में शीरा भी निकलता है। अलग-अलग चरणों में प्राप्त शीरे की संरचना और उसमें बची हुई शर्करा की मात्रा अलग होती है। सामान्य रूप से बी-हेवी शीरे में सी-हेवी शीरे की तुलना में अधिक शर्करा बची होती है, जबकि सी-हेवी शीरा चीनी उत्पादन की अंतिम अवस्था में प्राप्त होता है।
इस अंतर के कारण इन दोनों स्रोतों से इथेनॉल बनाने का चीनी उत्पादन पर प्रभाव भी अलग हो सकता है।
बी-हेवी शीरे से इथेनॉल बनाने में अधिक शर्करा का उपयोग किया जा सकता है, जिसे अन्य परिस्थितियों में चीनी उत्पादन की दिशा में इस्तेमाल किया जा सकता था। इसके विपरीत, सी-हेवी शीरा चीनी निकालने के बाद बचा हुआ उत्पाद होता है।
इसी वजह से सी-हेवी शीरे से इथेनॉल का उत्पादन चीनी और इथेनॉल के बीच संतुलन बनाए रखने की रणनीति में उपयोगी हो सकता है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सी-हेवी शीरे से इथेनॉल बनाने में कोई लागत या संसाधन संबंधी चुनौती नहीं होती। उत्पादन की लागत, शीरे की उपलब्धता और संयंत्रों की क्षमता जैसे कारक यहां भी महत्वपूर्ण हैं।
7. क्या इस फैसले से चीनी की कीमतों पर असर पड़ेगा?
सरकार के फैसले का एक प्रमुख उद्देश्य घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना है। यदि गन्ने से बने कुछ प्रकार के इथेनॉल का उत्पादन सीमित होता है, तो संबंधित कच्चे माल का अधिक हिस्सा चीनी उत्पादन के लिए उपलब्ध हो सकता है।
लेकिन चीनी की कीमतों में वास्तव में कितना बदलाव होगा, यह केवल इथेनॉल खरीद नीति से तय नहीं होगा।
चीनी की घरेलू कीमतें कई कारकों से प्रभावित होती हैं। इनमें गन्ने का कुल उत्पादन, चीनी मिलों की पेराई क्षमता, मौसम, सिंचाई की उपलब्धता, चीनी की मांग, सरकारी नीतियां और भंडार की स्थिति शामिल हैं।
यदि किसी वर्ष गन्ने की फसल प्रभावित होती है, तो चीनी उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है। इसके विपरीत, अच्छी फसल और पर्याप्त उत्पादन से घरेलू बाजार में उपलब्धता बेहतर हो सकती है।
इसी तरह, गन्ने के रस और बी-हेवी शीरे से इथेनॉल उत्पादन पर रोक या खरीद में बदलाव से चीनी की उपलब्धता पर प्रभाव पड़ सकता है, लेकिन इसका वास्तविक परिणाम उत्पादन और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि केवल इस फैसले से चीनी की कीमतें निश्चित रूप से घट जाएंगी। इसका उद्देश्य उपलब्धता को सुरक्षित रखना है, जबकि अंतिम प्रभाव का आकलन उत्पादन और बाजार के आंकड़ों से ही किया जा सकेगा।
8. गन्ना किसानों और चीनी मिलों पर क्या होगा असर?
गन्ना किसानों के लिए इथेनॉल कार्यक्रम पिछले कुछ वर्षों में चीनी उद्योग से जुड़ा एक अतिरिक्त आर्थिक अवसर बनकर उभरा है। जब चीनी मिलें गन्ने के उत्पादों से इथेनॉल तैयार करती हैं, तो उन्हें चीनी के अलावा एक अन्य उत्पाद बेचने का अवसर मिलता है।
इससे मिलों की आय के स्रोतों में विविधता आ सकती है और गन्ना खरीद तथा किसानों के भुगतान की क्षमता पर सकारात्मक असर पड़ने की संभावना रहती है।
लेकिन यदि गन्ने के कुछ उत्पादों से बने इथेनॉल की खरीद सीमित होती है, तो संबंधित मिलों को अपनी उत्पादन योजना में बदलाव करना पड़ सकता है।
कुछ मिलें उपलब्ध कच्चे माल का अधिक हिस्सा चीनी उत्पादन की दिशा में इस्तेमाल कर सकती हैं। दूसरी ओर, जिन मिलों ने इथेनॉल उत्पादन के लिए विशेष संयंत्रों में निवेश किया है, उन्हें अपनी क्षमता और वैकल्पिक कच्चे माल की उपलब्धता का आकलन करना होगा।
किसानों पर इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति, गन्ने की मांग और भुगतान व्यवस्था में कितना बदलाव आता है।
यदि चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहती है और मिलों को उचित कीमत मिलती है, तो इसका लाभ उद्योग की स्थिरता में दिखाई दे सकता है। लेकिन यदि उत्पादन लागत बढ़ती है या मिलों की आय प्रभावित होती है, तो किसानों के भुगतान की स्थिति भी प्रभावित हो सकती है।
इसलिए इस फैसले का आकलन केवल इथेनॉल उत्पादन के आधार पर नहीं, बल्कि पूरे गन्ना-चीनी उद्योग की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
9. पेट्रोल की कीमतों पर क्या पड़ेगा असर?
आम उपभोक्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या इथेनॉल मिश्रण की नीति में बदलाव से पेट्रोल महंगा या सस्ता होगा।
इसका सीधा उत्तर देना मुश्किल है, क्योंकि पेट्रोल की खुदरा कीमतें कई कारकों पर निर्भर करती हैं। इनमें कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें, रुपये और डॉलर की विनिमय दर, रिफाइनिंग लागत, परिवहन खर्च, कर और तेल विपणन कंपनियों की मूल्य निर्धारण व्यवस्था शामिल हैं।
इथेनॉल मिश्रण से भारत को कच्चे तेल के आयात में कमी लाने में मदद मिल सकती है। लेकिन इथेनॉल की खरीद कीमत, उत्पादन लागत और मिश्रण के लिए आवश्यक ढांचे का खर्च भी महत्वपूर्ण होता है।
यदि गन्ने के उत्पादों की जगह मक्का या चावल से बने इथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ता है, तो कुल लागत पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, यह संबंधित कच्चे माल की कीमतों और उत्पादन क्षमता पर निर्भर करेगा।
इसीलिए यह मान लेना उचित नहीं होगा कि इस फैसले के बाद पेट्रोल की कीमतें तुरंत घट जाएंगी या निश्चित रूप से बढ़ जाएंगी।
पेट्रोल की कीमतों पर वास्तविक प्रभाव समझने के लिए इथेनॉल की खरीद लागत, कच्चे तेल की कीमत और तेल विपणन कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति को साथ रखकर देखना होगा।
10. पर्यावरण और ऊर्जा सुरक्षा के लिए क्या मायने हैं?
इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम का उद्देश्य केवल कृषि उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराना नहीं है। इसका संबंध ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण से भी है।
भारत अपनी पेट्रोलियम जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल का इस्तेमाल पेट्रोल की कुछ मात्रा का स्थान ले सकता है। इससे कच्चे तेल के आयात की जरूरत कम करने में सहायता मिल सकती है।
इथेनॉल एक जैव ईंधन है, लेकिन इसके पर्यावरणीय लाभों का आकलन करते समय पूरी उत्पादन प्रक्रिया को देखना आवश्यक है। इसमें कच्चे माल की खेती, उर्वरकों का इस्तेमाल, सिंचाई, प्रसंस्करण, परिवहन और उत्पादन संयंत्रों की ऊर्जा जरूरतें शामिल हैं।
यदि इथेनॉल उत्पादन के लिए बहुत अधिक पानी और ऊर्जा की आवश्यकता होती है, तो उसका पर्यावरणीय लाभ सीमित हो सकता है। इसी प्रकार, यदि खाद्य फसलों की मांग बढ़ने से खेती के संसाधनों पर दबाव पड़ता है, तो उसके व्यापक प्रभावों का भी मूल्यांकन जरूरी है।
इसलिए भारत के लिए ऐसी इथेनॉल नीति महत्वपूर्ण होगी, जो ऊर्जा सुरक्षा, कृषि आय, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित कर सके।
निष्कर्ष: इथेनॉल नीति में बदलाव से बदलेगी कच्चे माल की रणनीति
केंद्र सरकार द्वारा 2026-27 आपूर्ति वर्ष की ताजा खरीद निविदा में गन्ने के रस, चीनी की चाशनी और बी-हेवी शीरे से बने इथेनॉल को शामिल नहीं करने का फैसला चीनी की घरेलू उपलब्धता बनाए रखने की चिंता से जुड़ा है।
इसके तहत पेट्रोलियम कंपनियों ने लगभग 1,100 करोड़ लीटर इथेनॉल की खरीद के उद्देश्य से बोलियां आमंत्रित की हैं, ताकि पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण की जरूरत पूरी करने की दिशा में आगे बढ़ा जा सके। नई व्यवस्था में मक्का, टूटे चावल, एफसीआई के अधिशेष चावल और सी-हेवी शीरे से बने इथेनॉल की आपूर्ति पर ध्यान दिया गया है।
इस बदलाव से अनाज आधारित इथेनॉल उत्पादकों के लिए अवसर बढ़ सकते हैं, जबकि गन्ने के कुछ उत्पादों पर निर्भर मिलों को अपनी उत्पादन और बिक्री रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है। साथ ही, मक्का और चावल की बढ़ती औद्योगिक मांग का असर खाद्य बाजार और कृषि अर्थव्यवस्था पर किस प्रकार पड़ेगा, यह भी महत्वपूर्ण रहेगा।
आने वाले समय में इस नीति की सफलता इस बात से तय होगी कि सरकार घरेलू चीनी की उपलब्धता बनाए रखते हुए इथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य कितना प्रभावी ढंग से हासिल कर पाती है। इसके लिए कच्चे माल की पर्याप्त आपूर्ति, उचित खरीद मूल्य, किसानों के हित और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन जरूरी होगा।
कुल मिलाकर, यह फैसला इथेनॉल उत्पादन बंद करने के बजाय पेट्रोल में मिश्रण के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की प्राथमिकता में बदलाव का संकेत देता है। इसका वास्तविक असर चीनी की उपलब्धता, किसानों की आय, इथेनॉल की लागत और पेट्रोलियम आयात पर आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।