इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: 6 साल के बच्चे की पसंद कस्टडी का अंतिम आधार नहीं, मां को तुरंत सौंपने का आदेश
बच्चे की अभिरक्षा (Child Custody) से जुड़े मामलों में अदालत के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होता है कि बच्चे का भविष्य किसके साथ अधिक सुरक्षित रहेगा। क्या बच्चे की अपनी इच्छा के आधार पर यह तय किया जा सकता है कि वह मां के साथ रहेगा या दादी के पास? क्या लंबे समय तक मां से दूर रहने के बाद छह साल के बच्चे द्वारा किसी एक पक्ष के साथ रहने की इच्छा जताना अंतिम निर्णय का आधार बन सकता है?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि कम उम्र के बच्चे की पसंद को उसकी अभिरक्षा तय करने का निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता। छह साल का बच्चा सामान्यतः अपने भावनात्मक और शारीरिक हितों को पूरी तरह समझकर स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम नहीं होता। इसलिए उसकी इच्छा पर विचार करते समय उन परिस्थितियों को भी देखना जरूरी है, जिनमें वह इच्छा बनी है।
न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने आगरा फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए बच्चे की कस्टडी तत्काल उसकी मां को सौंपने का निर्देश दिया। साथ ही, बच्चे की दादी को उससे मिलने का अधिकार भी प्रदान किया।
यह फैसला केवल मां और दादी के बीच अभिरक्षा के विवाद तक सीमित नहीं है। यह स्पष्ट करता है कि ऐसे मामलों में बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है और उसकी इच्छा को परिस्थितियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला एक ऐसी महिला से जुड़ा है, जिसके पति की वर्ष 2020 में मृत्यु हो गई थी। उस समय उनका बेटा केवल आठ महीने का था। पति की मृत्यु के बाद बच्चे की देखभाल और उसकी अभिरक्षा को लेकर महिला तथा बच्चे की दादी के बीच विवाद उत्पन्न हो गया।
महिला का आरोप था कि बीमा दावा प्राप्त करने में सहायता करने के नाम पर उनसे कुछ खाली कागजों पर हस्ताक्षर कराए गए थे। बाद में कथित रूप से उन्हीं कागजों का इस्तेमाल एक समझौता तैयार करने के लिए किया गया, जिसमें बच्चे को उसकी दादी के पास रखने की बात कही गई थी।
महिला ने आरोप लगाया कि इस कथित समझौते के बाद उन्हें अपने बेटे से मिलने तक नहीं दिया गया। इस तरह बच्चा लंबे समय तक मां से दूर रहा।
दूसरी ओर, दादी का पक्ष था कि महिला ने बच्चे को छोड़ दिया था और बच्चा लंबे समय से उनके साथ रह रहा है। उनके अनुसार, बच्चा उनके साथ रहने का आदी हो चुका था। उन्होंने अपने पक्ष में बच्चे के बयान, कथित समझौते और उसके पिता की वसीयत का भी हवाला दिया।
विवाद बढ़ने पर महिला ने बच्चे की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए आगरा की फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी।
इसके बाद महिला ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। हाईकोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या कम उम्र के बच्चे को लंबे समय तक मां से दूर रखने के बाद उसकी वर्तमान पसंद को अभिरक्षा के फैसले का निर्णायक आधार बनाया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला क्यों पलटा?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों पर विचार करते हुए कहा कि बच्चे की अभिरक्षा तय करते समय केवल उसकी वर्तमान पसंद या किसी एक पक्ष के साथ उसके रहने की आदत को महत्व देना पर्याप्त नहीं है।
यदि कोई बच्चा लंबे समय से अपनी मां से दूर रहा है और उसे मां से मिलने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला है, तो उसकी इच्छा के पीछे मौजूद परिस्थितियों की जांच आवश्यक हो जाती है।
पीठ ने आशंका जताई कि मां से लंबे समय तक अलग रहने के दौरान बच्चे की सोच और भावनाएं प्रभावित हुई हो सकती हैं। ऐसे में उसकी पसंद को पूरी तरह स्वतंत्र और परिस्थितियों से अप्रभावित मान लेना उचित नहीं होगा।
अदालत की टिप्पणी का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बच्चे का बयान महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन उसे अन्य परिस्थितियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
अभिरक्षा का उद्देश्य यह पता लगाना नहीं है कि विवाद में किस पक्ष का दावा अधिक मजबूत दिखाई देता है। इसका वास्तविक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्चे को सुरक्षित वातावरण, उचित देखभाल, भावनात्मक स्थिरता और समुचित विकास के अवसर मिलें।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए बच्चे की कस्टडी तत्काल मां को सौंपने का निर्देश दिया।
बच्चे की अभिरक्षा में सर्वोपरि है उसका कल्याण
भारतीय कानून में बच्चे की अभिरक्षा से संबंधित विवादों में बच्चे का कल्याण (Welfare of the Child) सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत माना जाता है।
इसका अर्थ है कि अदालत केवल माता-पिता या अन्य रिश्तेदारों के अधिकारों को देखकर फैसला नहीं करती। वह यह भी देखती है कि बच्चे के शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और शैक्षणिक विकास के लिए कौन-सा वातावरण बेहतर होगा।
किसी बच्चे की देखभाल करने वाला व्यक्ति आर्थिक रूप से संपन्न हो सकता है, लेकिन केवल अधिक धन या बेहतर सुविधाएं होने से उसे स्वतः अभिरक्षा का अधिकार नहीं मिल जाता।
इसी प्रकार, किसी बच्चे का लंबे समय तक किसी रिश्तेदार के साथ रहना भी अपने आप में यह साबित नहीं करता कि भविष्य में उसी व्यक्ति के पास उसकी कस्टडी रहनी चाहिए।
अदालत बच्चे की उम्र, स्वास्थ्य, भावनात्मक जुड़ाव, देखभाल की व्यवस्था, पारिवारिक परिस्थितियों और अन्य प्रासंगिक तथ्यों पर विचार कर सकती है।
यदि बच्चे को किसी अभिभावक से लंबे समय तक दूर रखा गया हो, तो अदालत यह भी जांच सकती है कि अलगाव किन परिस्थितियों में हुआ और इसका बच्चे पर क्या प्रभाव पड़ा।
इस मामले में हाईकोर्ट ने इसी सिद्धांत को महत्व देते हुए स्पष्ट किया कि बच्चे की वर्तमान पसंद ही अभिरक्षा का अंतिम निर्धारक नहीं हो सकती।
क्या छह साल का बच्चा अपनी अभिरक्षा के बारे में फैसला कर सकता है?
कानून में बच्चे की इच्छा को पूरी तरह महत्वहीन नहीं माना गया है। लेकिन बच्चे की उम्र और उसकी समझ के स्तर के अनुसार उसके बयान का महत्व अलग-अलग हो सकता है।
छह साल की उम्र में बच्चा अपनी पसंद व्यक्त कर सकता है। वह यह भी बता सकता है कि उसे किसके साथ रहना अच्छा लगता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि वह अभिरक्षा से जुड़े सभी दीर्घकालिक परिणामों को समझने में सक्षम है।
उदाहरण के लिए, बच्चा उस व्यक्ति के साथ रहना पसंद कर सकता है जिसके साथ वह लंबे समय से रह रहा है। लेकिन यह पसंद हमेशा उसके समग्र कल्याण का पूरा प्रतिनिधित्व नहीं करती।
यदि बच्चे को लंबे समय तक दूसरे अभिभावक से मिलने का अवसर नहीं मिला है, तो उसकी भावनात्मक स्थिति पर भी विचार करना आवश्यक है।
इसीलिए अदालत को बच्चे की इच्छा के साथ-साथ उसकी उम्र, परिपक्वता, परिस्थितियों और दोनों पक्षों के साथ उसके संबंधों का मूल्यांकन करना चाहिए।
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना आवश्यक है। बच्चे की इच्छा को सुनना और उसकी इच्छा को ही अंतिम फैसला मान लेना दो अलग बातें हैं।
अदालत बच्चे की बात सुन सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय बच्चे के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखकर ही किया जाता है।
संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 की धाराएं 7 और 25 क्या कहती हैं?
इस मामले में महिला ने संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 (Guardians and Wards Act, 1890) की धाराओं 7 और 25 के तहत फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी।
इन प्रावधानों को समझना जरूरी है, क्योंकि बच्चे की अभिरक्षा से संबंधित कई विवादों में इनका महत्व होता है।
धारा 7: संरक्षक नियुक्त करने या घोषित करने की शक्ति
धारा 7 के अंतर्गत अदालत को परिस्थितियों के अनुसार किसी नाबालिग के व्यक्ति या संपत्ति के लिए संरक्षक नियुक्त करने अथवा घोषित करने की शक्ति प्राप्त है, बशर्ते संबंधित कानूनी शर्तें पूरी हों।
ऐसी कार्यवाही में अदालत को नाबालिग के कल्याण को ध्यान में रखना होता है।
इसका उद्देश्य केवल यह तय करना नहीं है कि परिवार में किस व्यक्ति का दावा अधिक मजबूत है। अदालत को यह देखना होता है कि प्रस्तावित संरक्षक की नियुक्ति बच्चे के हित में है या नहीं।
धारा 25: संरक्षक की अभिरक्षा से नाबालिग को वापस लाने का आदेश
धारा 25 उस स्थिति से संबंधित है, जब कोई नाबालिग अपने संरक्षक की अभिरक्षा से दूर हो जाता है और संरक्षक उसकी वापसी चाहता है।
यदि अदालत यह संतुष्ट हो कि नाबालिग की वापसी उसके कल्याण के लिए उचित है, तो वह कानून के अनुसार आवश्यक आदेश पारित कर सकती है।
इस प्रावधान के अंतर्गत बच्चे को वापस सौंपने का निर्णय भी उसके कल्याण को ध्यान में रखकर किया जाता है।
इसलिए अभिरक्षा संबंधी मामलों में किसी एक पक्ष के अधिकारों के साथ-साथ बच्चे के वास्तविक हितों का परीक्षण अत्यंत आवश्यक है।
क्या मां ही बच्चे की प्राकृतिक संरक्षक होती है?
इस मामले में हाईकोर्ट ने गीता हरिहरन बनाम भारतीय रिजर्व बैंक के फैसले का उल्लेख किया।
यह सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय है, जिसमें हिंदू अल्पसंख्यकता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 6 में प्रयुक्त शब्दों तथा मां की संरक्षकता से संबंधित कानूनी प्रश्न पर विचार किया गया था।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 6 में पिता के बाद मां की संरक्षकता को समझते समय प्रावधान की व्याख्या संकीर्ण तरीके से नहीं की जानी चाहिए। परिस्थितियों के अनुसार मां भी नाबालिग की प्राकृतिक संरक्षक के रूप में कार्य कर सकती है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि प्राकृतिक संरक्षक होना और हर परिस्थिति में बच्चे की अभिरक्षा का स्वतः अधिकार मिल जाना एक ही बात नहीं है।
अभिरक्षा के विवाद में अदालत को बच्चे का कल्याण सर्वोपरि रखना होता है। यदि किसी मामले में प्राकृतिक संरक्षक के साथ बच्चे का रहना उसके हित में हो, तो यह तथ्य महत्वपूर्ण होता है। लेकिन अंतिम निर्णय संबंधित परिस्थितियों और लागू कानून के आधार पर किया जाता है।
वर्तमान मामले में पति की मृत्यु के बाद मां की स्थिति, बच्चे की कम उम्र और मां से लंबे समय तक अलगाव जैसे तथ्यों पर विचार किया गया।
क्या दादी को बच्चे की कस्टडी मिल सकती है?
भारतीय कानून में ऐसा कोई सामान्य नियम नहीं है कि बच्चे की अभिरक्षा हमेशा मां को ही मिलेगी या दादी को कभी नहीं मिल सकती।
कुछ परिस्थितियों में बच्चे का कल्याण दादा-दादी या किसी अन्य रिश्तेदार के पास रहने में हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि प्राकृतिक अभिभावक बच्चे की देखभाल करने में असमर्थ हो या उसके साथ रहना बच्चे के हित में न हो, तो अदालत उपलब्ध तथ्यों पर विचार कर सकती है।
लेकिन केवल इसलिए कि बच्चा दादी के साथ लंबे समय से रह रहा है, यह नहीं माना जा सकता कि दादी को स्थायी रूप से अभिरक्षा मिलनी ही चाहिए।
इसी तरह, मां और बच्चे के बीच प्राकृतिक संबंध को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस मामले में हाईकोर्ट ने मां को कस्टडी सौंपने का आदेश दिया, लेकिन दादी को बच्चे से मिलने का अधिकार भी प्रदान किया।
इससे यह स्पष्ट होता है कि अदालत ने बच्चे की मां के साथ अभिरक्षा और दादी के साथ उसके संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया।
बच्चे के जीवन में दादी का भावनात्मक महत्व हो सकता है। इसलिए परिस्थितियों के अनुसार मुलाकात का अधिकार बच्चे को अपने पारिवारिक संबंध बनाए रखने में सहायता कर सकता है।
आर्थिक स्थिति से ही तय नहीं होगी बच्चे की कस्टडी
अभिरक्षा के मामलों में एक सामान्य धारणा यह है कि जो व्यक्ति आर्थिक रूप से अधिक मजबूत होगा, बच्चे की कस्टडी उसी को मिलनी चाहिए।
लेकिन कानून इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं करता कि आर्थिक संपन्नता ही अभिरक्षा का एकमात्र आधार हो।
इस मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति में ऐसा कोई अंतर नहीं था, जिसके आधार पर मां को बच्चे की अभिरक्षा से वंचित करना उचित ठहराया जा सके।
आर्थिक स्थिति निश्चित रूप से प्रासंगिक हो सकती है, क्योंकि बच्चे की शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन और अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति महत्वपूर्ण है। फिर भी अदालत को भावनात्मक देखभाल, सुरक्षा, स्थिरता और बच्चे के समग्र विकास पर भी विचार करना होता है।
बच्चे के हितों का आकलन किसी एक आर्थिक या सामाजिक मानदंड से नहीं किया जा सकता।
गीता हरिहरन मामले का कानूनी महत्व
गीता हरिहरन बनाम भारतीय रिजर्व बैंक का निर्णय भारतीय पारिवारिक कानून में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्राकृतिक संरक्षकता से संबंधित कानूनी प्रावधान की व्याख्या करते हुए मां की भूमिका को महत्व दिया था।
इस फैसले का व्यापक महत्व यह है कि मां की संरक्षकता को केवल औपचारिक या गौण अधिकार के रूप में नहीं देखा जा सकता। कानून की व्याख्या बच्चे के हितों और संबंधित परिस्थितियों को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए।
हालांकि, प्रत्येक अभिरक्षा विवाद का निर्णय उसके अपने तथ्यों के आधार पर होता है। किसी पुराने फैसले का उल्लेख होने मात्र से हर मामले में एक जैसा परिणाम आवश्यक नहीं हो जाता।
वर्तमान मामले में हाईकोर्ट ने बच्चे के कल्याण, मां से उसके संबंध और लंबे समय तक अलग रहने की परिस्थितियों को महत्व दिया।
फैसले का परिवारों और अभिरक्षा विवादों पर क्या असर पड़ेगा?
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन देता है, जहां बच्चे की पसंद को उसके भविष्य के संबंध में निर्णायक आधार बनाने की कोशिश की जाती है।
इससे यह सिद्धांत सामने आता है कि अदालत को बच्चे की इच्छा के पीछे मौजूद परिस्थितियों की जांच करनी चाहिए।
यदि किसी बच्चे को लंबे समय तक उसके एक अभिभावक से दूर रखा गया है, तो केवल यह तर्क देना पर्याप्त नहीं होगा कि अब वह दूसरे अभिभावक के साथ रहने का आदी हो चुका है।
हालांकि, इसका अर्थ यह भी नहीं है कि लंबे समय तक किसी अन्य व्यक्ति के साथ रहने के तथ्य को हमेशा नजरअंदाज कर दिया जाएगा। बच्चे की स्थिरता और भावनात्मक सुरक्षा भी उसके कल्याण का हिस्सा हैं।
अदालत को सभी परिस्थितियों का संतुलित मूल्यांकन करना होता है।
इस मामले में मां को कस्टडी सौंपने और दादी को मुलाकात का अधिकार देने का आदेश इसी व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि बच्चे की अभिरक्षा का निर्णय केवल उसकी तत्काल पसंद, किसी एक पक्ष के दावे या लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था के आधार पर नहीं किया जा सकता।
छह साल के बच्चे की इच्छा पर विचार करना महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे निर्णायक मानने से पहले उसकी उम्र, समझ, भावनात्मक स्थिति और पारिवारिक परिस्थितियों का परीक्षण जरूरी है।
अदालत ने आगरा फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त करते हुए बच्चे की कस्टडी तत्काल मां को सौंपने का निर्देश दिया और दादी को बच्चे से मिलने का अधिकार भी दिया।
इस निर्णय का मूल संदेश यही है कि अभिरक्षा की लड़ाई में माता-पिता या रिश्तेदारों के अधिकारों से ऊपर बच्चे का कल्याण है। किसी भी फैसले का उद्देश्य बच्चे को सुरक्षित, स्थिर और प्रेमपूर्ण वातावरण उपलब्ध कराना होना चाहिए।
कानूनी सिद्धांत: बच्चे की इच्छा महत्वपूर्ण है, लेकिन कम उम्र में उसे अभिरक्षा का अंतिम आधार नहीं बनाया जा सकता। बच्चे के सर्वोत्तम हितों का निष्पक्ष मूल्यांकन ही अभिरक्षा संबंधी निर्णय का केंद्र होना चाहिए।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।