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वकील के भरोसे मुकदमा छोड़ना पड़ सकता है भारी, पेशी पर गैरहाजिरी के लिए पक्षकार खुद भी जिम्मेदार: दिल्ली हाईकोर्ट

वकील के भरोसे मुकदमा छोड़ना पड़ सकता है भारी, पेशी पर गैरहाजिरी के लिए पक्षकार खुद भी जिम्मेदार: दिल्ली हाईकोर्ट

       अदालत में मुकदमा दायर करने के बाद कई पक्षकार यह मानकर निश्चिंत हो जाते हैं कि अब उनके मामले की पूरी जिम्मेदारी वकील की है। वे न तो नियमित रूप से मुकदमे की स्थिति की जानकारी लेते हैं और न ही अदालत में होने वाली सुनवाई की तारीखों पर ध्यान देते हैं। लेकिन अगर किसी कारण से वकील अदालत में उपस्थित नहीं होता और उसके परिणामस्वरूप मुकदमा एकपक्षीय रूप से तय हो जाता है, तो क्या पक्षकार अपनी पूरी जिम्मेदारी से बच सकता है? क्या केवल यह कह देना पर्याप्त है कि वकील फोन नहीं उठा रहा था या उसने मामले की जानकारी नहीं दी?

दिल्ली हाईकोर्ट ने इस सवाल पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि मुकदमे में पक्षकार अपनी अनुपस्थिति की पूरी जिम्मेदारी वकील पर नहीं डाल सकते। वकील की कथित लापरवाही का हवाला देने मात्र से पक्षकार को राहत नहीं मिल जाती। उसे भी अपने मुकदमे की स्थिति पर नजर रखनी चाहिए और वकील से संपर्क नहीं होने पर उचित कदम उठाने चाहिए।

जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस अदिति चौधरी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक अपील खारिज करते हुए की। अपीलकर्ता ने व्यावसायिक वसूली के एक मुकदमे में उसके खिलाफ पारित एकपक्षीय फैसले और डिक्री को रद्द करने की मांग की थी। हालांकि, हाईकोर्ट को उसकी अनुपस्थिति का ऐसा कोई ठोस और संतोषजनक कारण नहीं मिला, जिसके आधार पर निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप किया जा सके।

यह टिप्पणी उन सभी लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो दीवानी या व्यावसायिक मुकदमों में अपने अधिवक्ता पर पूरी तरह निर्भर रहते हैं और सुनवाई की तारीखों तथा न्यायालय के आदेशों की जानकारी लेने की जरूरत नहीं समझते।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला एक व्यावसायिक वसूली के मुकदमे से संबंधित था। इस मुकदमे में अपीलकर्ता के खिलाफ निचली अदालत ने एकपक्षीय फैसला सुनाते हुए डिक्री पारित कर दी थी। एकपक्षीय फैसले का सामान्य अर्थ यह है कि मामले में किसी पक्ष की अनुपस्थिति के बावजूद अदालत उपलब्ध रिकॉर्ड और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर कार्यवाही आगे बढ़ाती है तथा निर्णय देती है।

अपीलकर्ता ने इस फैसले और डिक्री को चुनौती देते हुए उन्हें निरस्त करने की मांग की। उसका तर्क था कि उसकी वकील ने उसके फोन का जवाब देना बंद कर दिया था। इस कारण वह मुकदमे की स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त नहीं कर सका और सुनवाई के दौरान उपस्थित नहीं हो पाया।

अपीलकर्ता की दलील का मूल आधार यह था कि उसकी अनुपस्थिति के लिए उसे पूरी तरह जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए, क्योंकि उसका अधिवक्ता से संपर्क नहीं हो पा रहा था।

लेकिन हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और घटनाक्रम पर विचार करने के बाद पाया कि अपीलकर्ता ने अपनी अनुपस्थिति के संबंध में पर्याप्त स्पष्टीकरण नहीं दिया। वह यह भी स्पष्ट नहीं कर सका कि उसने अपनी वकील से संपर्क करने का प्रयास कब किया, संपर्क नहीं होने पर आगे क्या कदम उठाए और अदालत में उपस्थित रहने के लिए उसने अपनी ओर से क्या प्रयास किए।

अदालत के अनुसार, केवल अधिवक्ता से संपर्क नहीं होने का दावा करना पर्याप्त नहीं था। अपीलकर्ता को यह भी बताना चाहिए था कि ऐसी स्थिति में उसने अपने मुकदमे की जानकारी प्राप्त करने के लिए दूसरे उपलब्ध रास्तों का सहारा क्यों नहीं लिया।

23 नवंबर और 26 नवंबर 2024 की तारीखें क्यों बनीं अहम?

मामले में घटनाक्रम की दो तारीखें विशेष रूप से महत्वपूर्ण थीं।

हाईकोर्ट ने गौर किया कि 23 नवंबर 2024 को मामले में अंतिम दलीलें सुनी गई थीं, जबकि 26 नवंबर 2024 को एकपक्षीय फैसला सुनाया गया। इन दोनों अवसरों पर न तो अपीलकर्ता अदालत में उपस्थित हुआ और न ही उसकी वकील मौजूद थी।

अपीलकर्ता अपनी अनुपस्थिति के लिए कोई संतोषजनक कारण नहीं बता सका। अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि यदि उसे अपनी वकील से संपर्क करने में कठिनाई हो रही थी, तो वह संबंधित निचली अदालत में जाकर अपने मुकदमे की वर्तमान स्थिति का पता लगा सकता था।

कानूनी कार्यवाही में किसी पक्ष की लगातार अनुपस्थिति और उसके पीछे दिए गए कारणों का मूल्यांकन करते समय अदालत केवल आरोपों के आधार पर निर्णय नहीं करती। यह भी देखा जाता है कि संबंधित व्यक्ति ने मामले की जानकारी रखने, सुनवाई में शामिल होने और अपने हितों की रक्षा करने के लिए उचित प्रयास किए थे या नहीं।

इस मामले में हाईकोर्ट को ऐसे पर्याप्त प्रयासों का प्रमाण नहीं मिला। इसलिए अपीलकर्ता की दलील को राहत देने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया।

एकपक्षीय डिक्री क्या होती है?

दीवानी मुकदमों में एकपक्षीय डिक्री (Ex Parte Decree) एक ऐसा निर्णय है, जो किसी पक्ष की अनुपस्थिति में पारित किया जाता है। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि अदालत अनुपस्थित पक्ष के खिलाफ बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के स्वतः फैसला सुना सकती है। न्यायालय को लागू प्रक्रिया और उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार कार्यवाही करनी होती है।

दीवानी प्रक्रिया संहिता, 1908 (Code of Civil Procedure, 1908) में ऐसे मामलों के लिए प्रावधान मौजूद हैं, जिनमें कोई पक्ष सुनवाई के समय उपस्थित नहीं होता।

उदाहरण के लिए, यदि किसी प्रतिवादी को विधिवत समन जारी किया गया है, लेकिन वह सुनवाई के लिए उपस्थित नहीं होता, तो लागू कानूनी शर्तों के अधीन अदालत उसके विरुद्ध एकपक्षीय कार्यवाही कर सकती है। इसके बाद उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी स्थिति के आधार पर फैसला सुनाया जा सकता है।

हालांकि, एकपक्षीय डिक्री पारित हो जाने का अर्थ यह नहीं है कि उसके खिलाफ कोई कानूनी उपाय उपलब्ध नहीं रहता। प्रभावित पक्ष कानून में निर्धारित शर्तों के अधीन उसे रद्द कराने के लिए आवेदन कर सकता है।

लेकिन ऐसे आवेदन में केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होता कि उसे मामले की जानकारी नहीं थी या उसका वकील उपस्थित नहीं हुआ। उसे संबंधित कानूनी प्रावधानों के अनुसार अपनी अनुपस्थिति का पर्याप्त कारण बताना पड़ता है।

CPC के Order 9 Rule 13 में क्या है प्रावधान?

इस मामले का महत्वपूर्ण कानूनी पहलू दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 9, नियम 13 (Order IX Rule 13 CPC) से जुड़ा है।

इस प्रावधान के तहत, यदि किसी प्रतिवादी के खिलाफ एकपक्षीय डिक्री पारित हुई है, तो वह निर्धारित कानूनी शर्तों के अधीन उसी अदालत में उसे रद्द कराने के लिए आवेदन कर सकता है।

सामान्य रूप से, इस नियम के अंतर्गत राहत मांगने वाले पक्ष को यह स्थापित करना होता है कि समन विधिवत तामील नहीं हुआ था या सुनवाई के समय उसकी अनुपस्थिति का पर्याप्त कारण था। हालांकि, इन आधारों का मूल्यांकन मामले के तथ्यों और लागू कानूनी शर्तों के अनुसार किया जाता है।

यदि अदालत को यह संतोष हो जाता है कि नियम में निर्धारित आधार मौजूद है, तो वह एकपक्षीय डिक्री को रद्द करने और मुकदमे को आगे सुनने का आदेश दे सकती है। इसके विपरीत, यदि आवेदन में दिया गया कारण पर्याप्त नहीं है, तो अदालत राहत देने से इनकार कर सकती है।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। Order IX Rule 13 के अंतर्गत आवेदन करना और उसमें सफलता प्राप्त करना दो अलग-अलग बातें हैं। आवेदन दाखिल कर देने मात्र से डिक्री रद्द नहीं हो जाती। आवेदक को अपने दावे के समर्थन में उचित तथ्य प्रस्तुत करने होते हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट के सामने अपीलकर्ता अपनी अनुपस्थिति का संतोषजनक कारण स्थापित नहीं कर सका। इसलिए उसकी दलील इस कानूनी कसौटी पर खरी नहीं उतरी।

क्या वकील की लापरवाही के लिए मुवक्किल जिम्मेदार होगा?

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण संदेश वकील और मुवक्किल के बीच जिम्मेदारी के संबंध से जुड़ा है।

किसी मुकदमे में अधिवक्ता की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। वह अपने मुवक्किल को कानूनी सलाह देता है, दस्तावेज तैयार करता है, अदालत में पक्ष रखता है और मुकदमे की कार्यवाही में उसका प्रतिनिधित्व करता है। इसके बावजूद मुकदमे से संबंधित सभी जिम्मेदारियों को बिना किसी निगरानी के अधिवक्ता पर छोड़ देना पक्षकार के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

हाईकोर्ट की टिप्पणी का आशय यह नहीं है कि वकील की वास्तविक लापरवाही को कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता या प्रत्येक परिस्थिति में मुवक्किल ही दोषी होगा। यदि किसी मामले में अधिवक्ता की गंभीर लापरवाही के ठोस प्रमाण हों, तो उन तथ्यों पर विचार किया जा सकता है।

लेकिन किसी पक्षकार को यह भी बताना होगा कि उसने अपनी ओर से उचित सावधानी बरती थी। यदि उसे सुनवाई की जानकारी नहीं मिल रही थी, तो उसने वैकल्पिक तरीके से जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया या नहीं, यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक अपने वकील से संपर्क नहीं कर पाता, तो वह अदालत की रजिस्ट्री से उपलब्ध जानकारी प्राप्त करने, मुकदमे की ऑनलाइन स्थिति देखने या आवश्यकता पड़ने पर दूसरे अधिवक्ता से सलाह लेने का प्रयास कर सकता है।

हालांकि, प्रत्येक मामले में उपलब्ध विकल्प और संबंधित व्यक्ति की परिस्थितियां अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए किसी भी पक्षकार की जिम्मेदारी का आकलन मामले के तथ्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

इंटरनेट के दौर में मुकदमे की जानकारी रखना हुआ आसान

हाईकोर्ट ने वर्तमान डिजिटल व्यवस्था की ओर भी ध्यान दिलाया। आज अनेक न्यायालयों में मुकदमों की स्थिति, सुनवाई की तारीखें और पारित आदेश ऑनलाइन उपलब्ध होते हैं। इसके अतिरिक्त, जहां सुविधा उपलब्ध हो और अदालत की अनुमति तथा लागू प्रक्रिया इसकी इजाजत दे, वहां वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से भी कार्यवाही में भाग लिया जा सकता है।

इस बदलाव ने मुकदमे की जानकारी प्राप्त करने के कई रास्ते खोले हैं।

पहले किसी पक्षकार को अपने मुकदमे की स्थिति जानने के लिए अक्सर अपने वकील पर निर्भर रहना पड़ता था। अब कई मामलों में वह स्वयं भी उपलब्ध ऑनलाइन सेवाओं के माध्यम से केस नंबर, पक्षकारों के नाम या अन्य आवश्यक विवरणों की सहायता से जानकारी प्राप्त कर सकता है।

हालांकि, ऑनलाइन उपलब्ध जानकारी की सीमा को समझना भी जरूरी है। हर अदालत में प्रत्येक प्रकार की कार्यवाही की पूरी जानकारी एक ही तरह से उपलब्ध हो, यह आवश्यक नहीं है। कभी तकनीकी समस्या, रिकॉर्ड अपडेट होने में देरी या अन्य कारणों से जानकारी तुरंत नहीं मिल पाती। इसलिए ऑनलाइन जानकारी के साथ-साथ आवश्यकता पड़ने पर अदालत की रजिस्ट्री या अपने अधिवक्ता से पुष्टि करना उचित है।

हाईकोर्ट की टिप्पणी का व्यावहारिक महत्व यही है कि पक्षकार को अपने मुकदमे के प्रति पूरी तरह उदासीन नहीं रहना चाहिए। मुकदमे की स्थिति जानने के उपलब्ध रास्तों का उचित उपयोग करना उसके हित में है।

व्यावसायिक विवादों में समय पर कार्यवाही का विशेष महत्व

इस मामले में विवाद व्यावसायिक वसूली से संबंधित था। हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि मामला व्यावसायिक अदालत में चल रहा था।

व्यावसायिक विवादों में समय का विशेष महत्व होता है। व्यापारिक लेन-देन, भुगतान, अनुबंध, माल की आपूर्ति और व्यावसायिक देनदारियों से जुड़े मामलों का अनावश्यक रूप से लंबित रहना कारोबार करने वाले पक्षों के लिए आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता है।

वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 (Commercial Courts Act, 2015) का उद्देश्य निर्धारित श्रेणी के व्यावसायिक विवादों का प्रभावी और समयबद्ध निपटारा सुनिश्चित करना है। इसके साथ दीवानी प्रक्रिया संहिता में व्यावसायिक विवादों के लिए विशेष प्रक्रियात्मक प्रावधान भी लागू होते हैं।

ऐसे मामलों में अदालतें अनावश्यक देरी को लेकर विशेष रूप से सतर्क रहती हैं। हालांकि, समयबद्ध न्याय का उद्देश्य किसी पक्ष को उचित सुनवाई के अवसर से वंचित करना नहीं है। अदालत को एक ओर प्रक्रिया की समय-सीमा का ध्यान रखना होता है और दूसरी ओर यह भी सुनिश्चित करना होता है कि न्याय के सिद्धांतों का पालन हो।

इस मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता अपनी अनुपस्थिति का पर्याप्त कारण नहीं बता सका। व्यावसायिक मुकदमे की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए भी अदालत को निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं मिला।

मुकदमा करने वाले लोगों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी से आम नागरिकों और व्यापारियों के लिए कुछ व्यावहारिक बातें सामने आती हैं।

1. सुनवाई की तारीखें लिखकर रखें: मुकदमे की प्रत्येक अगली तारीख और उस दिन होने वाली संभावित कार्यवाही की जानकारी अपने पास रखें। केवल मौखिक आश्वासन पर निर्भर न रहें।

2. वकील से नियमित संपर्क बनाए रखें: अपने अधिवक्ता से समय-समय पर मुकदमे की प्रगति के बारे में जानकारी लें। यदि किसी तारीख पर महत्वपूर्ण कार्यवाही होनी है, तो पहले से स्थिति स्पष्ट कर लें।

3. संपर्क नहीं होने पर वैकल्पिक उपाय अपनाएं: यदि वकील फोन नहीं उठा रहा है या लंबे समय से संपर्क नहीं हो पा रहा, तो संदेश या लिखित माध्यम से संपर्क करने का प्रयास करें। जरूरत पड़ने पर अदालत में उपलब्ध जानकारी प्राप्त करें अथवा दूसरे अधिवक्ता से सलाह लें।

4. अदालत के आदेशों की जानकारी रखें: मुकदमे में पारित आदेश, अगली तारीख और सुनवाई की स्थिति पर नजर रखें। ऑनलाइन जानकारी उपलब्ध हो तो उसका उपयोग करें, लेकिन आवश्यक होने पर आधिकारिक रिकॉर्ड से पुष्टि भी करें।

5. अनुपस्थिति की वजह से जुड़े प्रमाण सुरक्षित रखें: यदि वास्तव में बीमारी, दुर्घटना, संचार संबंधी समस्या या कोई अन्य गंभीर परिस्थिति सुनवाई में उपस्थित होने में बाधा बनी है, तो उससे संबंधित दस्तावेज सुरक्षित रखना उपयोगी हो सकता है। हालांकि, किसी प्रमाण की पर्याप्तता का निर्णय अदालत मामले की परिस्थितियों के आधार पर करेगी।

6. एकपक्षीय डिक्री होने पर तुरंत कानूनी सलाह लें: यदि आपके खिलाफ एकपक्षीय फैसला पारित हो गया है, तो उसके बाद उपलब्ध कानूनी उपायों और लागू समय-सीमा के बारे में शीघ्र जानकारी प्राप्त करें। देर करने से अनावश्यक कानूनी जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।

क्या हर मामले में वकील की अनुपस्थिति का नुकसान मुवक्किल को ही होगा?

इस प्रश्न का उत्तर सभी मामलों में एक जैसा नहीं दिया जा सकता। किसी मुकदमे में अधिवक्ता की अनुपस्थिति, पक्षकार को सूचना दिए जाने की स्थिति, समन की तामील, बीमारी या अन्य वास्तविक बाधाएं और मामले का पूरा घटनाक्रम महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

यदि कोई पक्षकार यह दिखाने में सक्षम है कि उसने उचित सावधानी बरती थी और उसके नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण वह उपस्थित नहीं हो सका, तो अदालत उन तथ्यों पर विचार कर सकती है। दूसरी ओर, यदि पक्षकार लंबे समय तक अपने मुकदमे से पूरी तरह अनजान रहने का दावा करता है, लेकिन यह नहीं बताता कि उसने जानकारी प्राप्त करने के लिए क्या कदम उठाए, तो उसकी दलील कमजोर पड़ सकती है।

इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी को इस रूप में नहीं समझना चाहिए कि वकील की हर गलती के लिए मुवक्किल ही जिम्मेदार होगा। अधिक उचित निष्कर्ष यह है कि केवल वकील की कथित लापरवाही का आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है। राहत मांगने वाले पक्ष को लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार अपने मामले का आधार स्थापित करना होगा।

निष्कर्ष: मुकदमे की निगरानी करना भी है जरूरी

दिल्ली हाईकोर्ट ने व्यावसायिक वसूली के मुकदमे में एकपक्षीय डिक्री को रद्द करने से इनकार करने वाले निचली अदालत के आदेश में कोई खामी नहीं पाई और अपील खारिज कर दी।

अदालत के सामने अपीलकर्ता यह साबित नहीं कर सका कि उसने सुनवाई में उपस्थित रहने के लिए ईमानदारी से प्रयास किए थे या अपनी वकील से संपर्क नहीं होने की स्थिति में मुकदमे की जानकारी प्राप्त करने के लिए उचित कदम उठाए थे।

इस फैसले से निकलने वाला व्यावहारिक संदेश स्पष्ट है—अदालत में अपना मुकदमा लड़ रहे व्यक्ति को केवल वकील के भरोसे निश्चिंत होकर नहीं बैठना चाहिए। अधिवक्ता की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन पक्षकार को भी अपने मुकदमे की प्रगति, सुनवाई की तारीखों और अदालत के आदेशों के प्रति जागरूक रहना चाहिए।

कानूनी रूप से सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एकपक्षीय डिक्री को रद्द कराने के लिए दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 9, नियम 13 की शर्तों को पूरा करना आवश्यक है। केवल वकील का फोन न उठाने या अदालत में उपस्थित न होने का आरोप अपने आप में पर्याप्त नहीं है। राहत के लिए संबंधित तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर अनुपस्थिति का पर्याप्त कारण स्थापित करना होगा।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।