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आगरा में सरकारी जमीन पर फर्जी NOC से बिल्डिंग बनाने का मामला गरमाया, शासन ने मांगी रिपोर्ट

आगरा में सरकारी जमीन पर फर्जी NOC से बिल्डिंग बनाने का मामला गरमाया, शासन ने मांगी रिपोर्ट; हाईकोर्ट में होगी सुनवाई

     सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर निर्माण कराने से जुड़े मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई अक्सर लंबे समय तक चर्चा में रहती है। ऐसा ही एक मामला आगरा के गुड़ की मंडी क्षेत्र से सामने आया है, जहां नजूल एवं सरकारी जमीन पर कथित रूप से फर्जी अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) और दस्तावेजों के आधार पर नक्शा स्वीकृत कराने तथा बहुमंजिला इमारत खड़ी करने का आरोप है।

इस मामले में अब शासन भी सक्रिय हो गया है। शहरी विकास विभाग ने जिलाधिकारी आगरा से पूरे प्रकरण की बिंदुवार रिपोर्ट मांगी है। वहीं, आरोपी बिल्डर पक्ष की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल किए जाने के बाद जिला प्रशासन को प्रभावी कानूनी पैरवी करने के निर्देश दिए गए हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, आगरा विकास प्राधिकरण (ADA) ने पहले स्वीकृत नक्शे और एनओसी को निरस्त कर दिया था। इसके अलावा बिल्डर मालती शर्मा और अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। प्राधिकरण की ओर से कथित अवैध निर्माण को स्वयं ध्वस्त करने और अवैध कब्जा खाली करने के लिए भी नोटिस जारी किया गया।

अब इस प्रकरण में शासन की ओर से रिपोर्ट मांगे जाने और हाईकोर्ट में मजबूत पैरवी के निर्देश दिए जाने के बाद मामले ने प्रशासनिक तथा कानूनी, दोनों स्तरों पर महत्व हासिल कर लिया है।

हालांकि, इस मामले में लगाए गए आरोपों और न्यायालय द्वारा अंतिम रूप से स्थापित तथ्यों के बीच अंतर करना जरूरी है। हाईकोर्ट में याचिका दाखिल होने का अर्थ यह नहीं है कि याचिकाकर्ता को राहत मिल गई है या सरकारी जमीन पर कब्जे से संबंधित आरोप न्यायालय द्वारा सही ठहरा दिए गए हैं।

1. क्या है आगरा के गुड़ की मंडी का पूरा मामला?

आगरा के गुड़ की मंडी क्षेत्र से जुड़ा यह विवाद सरकारी और नजूल भूमि पर निर्माण की अनुमति प्राप्त करने के लिए कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों तथा अनापत्ति प्रमाणपत्र का इस्तेमाल किए जाने के आरोपों से संबंधित है।

नजूल भूमि सामान्यतः ऐसी भूमि को कहा जाता है जो सरकार के स्वामित्व या प्रशासनिक नियंत्रण में होती है और जिसका प्रबंधन संबंधित सरकारी नियमों के अनुसार किया जाता है। ऐसी भूमि के उपयोग, आवंटन, पट्टे या निर्माण के संबंध में लागू कानूनों और निर्धारित शर्तों का पालन करना आवश्यक होता है।

इस मामले में आरोप है कि संबंधित जमीन पर नक्शा पास कराने के लिए फर्जी एनओसी और दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। इसके आधार पर बहुमंजिला इमारत का निर्माण कराया गया।

यदि किसी भवन का नक्शा गलत दस्तावेजों या ऐसी एनओसी के आधार पर स्वीकृत कराया गया हो, जिसकी वैधता संदिग्ध है, तो संबंधित प्राधिकरण के लिए उस स्वीकृति की जांच करना आवश्यक हो सकता है।

इसी तरह, यदि निर्माण सरकारी जमीन पर बिना वैध अधिकार के किया गया हो, तो भूमि के स्वामित्व, कब्जे और निर्माण की अनुमति से जुड़े प्रश्न उठ सकते हैं।

आगरा के इस मामले में भी अनियमितताओं का खुलासा होने के बाद विकास प्राधिकरण ने पहले जारी नक्शे और एनओसी को निरस्त करने तथा संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की दिशा में कदम उठाए।

अब मामला हाईकोर्ट पहुंच चुका है, जहां याचिकाकर्ता की मांगों और प्रशासन की कार्रवाई से संबंधित कानूनी प्रश्नों पर विचार होना है।

2. फर्जी एनओसी के आधार पर नक्शा पास कराने का आरोप कितना गंभीर है?

किसी भी भवन के निर्माण से पहले संबंधित नियमों के अनुसार आवश्यक अनुमति और स्वीकृत नक्शा प्राप्त करना महत्वपूर्ण होता है। निर्माण किस जमीन पर हो रहा है, जमीन का मालिकाना हक किसके पास है और वहां निर्माण की अनुमति है या नहीं, इन सवालों का भी महत्व होता है।

अनापत्ति प्रमाणपत्र यानी No Objection Certificate (NOC) ऐसा दस्तावेज होता है जिसके माध्यम से संबंधित प्राधिकरण या सक्षम संस्था किसी निर्धारित विषय पर अपनी अनापत्ति दर्ज कर सकती है। हालांकि, हर प्रकार के निर्माण में किन विभागों से एनओसी आवश्यक होगी, यह भूमि की प्रकृति, निर्माण के प्रकार और लागू नियमों पर निर्भर करता है।

यदि किसी व्यक्ति ने कथित तौर पर फर्जी एनओसी प्रस्तुत करके नक्शा स्वीकृत कराया है, तो जांच में यह पता लगाना जरूरी होगा कि दस्तावेज किसने तैयार किया, किसने प्रस्तुत किया और संबंधित अधिकारियों ने किस आधार पर उसे स्वीकार किया।

इसके अलावा यह भी देखना होगा कि दस्तावेज वास्तव में फर्जी था या उसकी वैधता को लेकर कोई विवाद है। इन दोनों परिस्थितियों में कानूनी स्थिति अलग हो सकती है।

किसी दस्तावेज के फर्जी होने का आरोप अपने आप में अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं है। संबंधित जांच और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से तथ्यों का निर्धारण किया जाता है।

इसलिए गुड़ की मंडी प्रकरण में भी फर्जी एनओसी से जुड़े आरोपों की गंभीरता को समझते हुए संबंधित दस्तावेजों, स्वीकृति आदेशों और जांच रिकॉर्ड का महत्व बढ़ जाता है।

3. आगरा विकास प्राधिकरण ने क्या कार्रवाई की?

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मामले में अनियमितता सामने आने के बाद आगरा विकास प्राधिकरण ने पहले स्वीकृत नक्शे और एनओसी को निरस्त कर दिया।

इसके साथ ही बिल्डर मालती शर्मा और अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई गई। प्राधिकरण ने संबंधित निर्माण को स्वयं ध्वस्त करने और कथित अवैध कब्जा खाली करने के लिए नोटिस भी जारी किया।

इन कार्रवाइयों के कानूनी महत्व को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि भवन निर्माण से जुड़े विवादों में कई अलग-अलग प्रक्रियाएं हो सकती हैं।

पहली प्रक्रिया स्वीकृत नक्शे या एनओसी की वैधता की जांच से संबंधित होती है। यदि किसी अनुमति को गलत जानकारी या अनियमितता के आधार पर प्राप्त किया गया हो, तो सक्षम प्राधिकरण लागू कानून के अनुसार उस पर कार्रवाई कर सकता है।

दूसरी प्रक्रिया अवैध निर्माण के संबंध में होती है। इसमें निर्माण की प्रकृति, स्वीकृत नक्शे से उसका मेल, भूमि की स्थिति और संबंधित वैधानिक प्रावधान महत्वपूर्ण होते हैं।

तीसरी प्रक्रिया आपराधिक जांच से संबंधित हो सकती है। यदि प्राथमिकी में जालसाजी, धोखाधड़ी या अन्य अपराधों के आरोप हों, तो पुलिस जांच के माध्यम से साक्ष्य जुटाती है और कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई होती है।

ये प्रक्रियाएं आपस में संबंधित हो सकती हैं, लेकिन इनका उद्देश्य और कानूनी आधार अलग-अलग होते हैं।

इसलिए किसी नक्शे को निरस्त करना, अवैध निर्माण हटाने का नोटिस जारी करना और आपराधिक मामले में दोषसिद्धि होना एक ही बात नहीं है। प्रत्येक कार्रवाई का परिणाम संबंधित कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करता है।

4. शासन ने जिलाधिकारी से बिंदुवार रिपोर्ट क्यों मांगी?

इस मामले में शहरी विकास विभाग ने जिलाधिकारी आगरा से पूरे प्रकरण की बिंदुवार रिपोर्ट मांगी है।

ऐसी रिपोर्ट के माध्यम से शासन को मामले की वर्तमान स्थिति, संबंधित विभागों द्वारा की गई कार्रवाई और न्यायालय में लंबित कार्यवाही के बारे में जानकारी मिल सकती है।

सरकारी जमीन और भवन निर्माण से संबंधित विवादों में कई विभागों की भूमिका हो सकती है। भूमि के अभिलेख, नक्शे की स्वीकृति, एनओसी जारी करने की प्रक्रिया और निर्माण संबंधी कार्रवाई अलग-अलग अधिकारियों या संस्थाओं से जुड़ी हो सकती है।

ऐसे मामलों में यह जानना जरूरी होता है कि किस स्तर पर कौन-सी अनुमति दी गई, किन दस्तावेजों के आधार पर निर्णय लिया गया और अनियमितता सामने आने के बाद क्या कदम उठाए गए।

बिंदुवार रिपोर्ट से इन पहलुओं को व्यवस्थित तरीके से सामने लाने में मदद मिल सकती है।

आगरा के इस मामले में शासन की ओर से रिपोर्ट मांगे जाने के बाद जिला प्रशासन को संबंधित रिकॉर्ड और कार्रवाई का विवरण उपलब्ध कराना होगा।

जिलाधिकारी मनीष बंसल के अनुसार, शासन का पत्र प्राप्त हुआ है और मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी। उन्होंने हाईकोर्ट में मामले की मजबूत पैरवी किए जाने की बात भी कही है।

हालांकि, रिपोर्ट मांगे जाने को अपने आप में किसी अधिकारी या बिल्डर के खिलाफ अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। इसका उद्देश्य संबंधित प्रकरण की स्थिति की जानकारी प्राप्त करना और आगे की कार्रवाई को व्यवस्थित करना हो सकता है।

5. हाईकोर्ट में याचिका दाखिल होने के बाद क्या बदलेगा?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बिल्डर पक्ष की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। इसके बाद शासन ने जिला प्रशासन को निर्देश दिया है कि मामले में प्रभावी पैरवी की जाए।

किसी प्रशासनिक कार्रवाई के खिलाफ प्रभावित व्यक्ति या संस्था कानून के अनुसार न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकती है। संबंधित याचिका में याचिकाकर्ता अपनी शिकायतों, अधिकारों या प्रशासनिक कार्रवाई की वैधता से जुड़े प्रश्न उठा सकता है।

हाईकोर्ट में दाखिल याचिका के माध्यम से संबंधित पक्ष यह मांग कर सकता है कि प्रशासन की कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा की जाए या कानून के अनुसार उचित राहत प्रदान की जाए। हालांकि, याचिका में वास्तव में कौन-सी राहत मांगी गई है, यह उसके मूल दस्तावेज से ही स्पष्ट होगा।

इस मामले में यह कहना अभी उचित नहीं होगा कि हाईकोर्ट ने बिल्डर के पक्ष में कोई आदेश दे दिया है या प्रशासन की कार्रवाई पर रोक लगा दी है। उपलब्ध समाचार विवरण में याचिका दाखिल होने और शासन द्वारा पैरवी के निर्देश दिए जाने की जानकारी है, लेकिन किसी विशिष्ट अंतरिम आदेश का उल्लेख नहीं है।

अब मामले की वास्तविक स्थिति जानने के लिए हाईकोर्ट में दाखिल याचिका, उसमें मांगी गई राहत और न्यायालय के आदेशों का अध्ययन करना आवश्यक होगा।

6. काउंटर एफिडेविट क्या होता है और इसकी भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?

शासन ने जिला प्रशासन को निर्देश दिया है कि हाईकोर्ट में दाखिल याचिका के संबंध में काउंटर एफिडेविट दाखिल कराया जाए और उसकी एक प्रति शासन को तत्काल उपलब्ध कराई जाए।

काउंटर एफिडेविट को सरल भाषा में समझें तो यह न्यायालय में याचिका के जवाब में प्रस्तुत किया जाने वाला शपथपत्र होता है। इसमें प्रतिवादी पक्ष याचिका में लगाए गए आरोपों, उठाए गए कानूनी प्रश्नों और मांगी गई राहत के संबंध में अपना पक्ष रख सकता है।

सरकारी विभागों के मामलों में काउंटर एफिडेविट विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इसके माध्यम से प्रशासन अपनी कार्रवाई का आधार और संबंधित रिकॉर्ड न्यायालय के सामने प्रस्तुत कर सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी निर्माण की अनुमति निरस्त की गई है, तो प्रशासन को यह स्पष्ट करना पड़ सकता है कि कार्रवाई किस नियम या कानूनी अधिकार के तहत की गई और उसके समर्थन में कौन-से दस्तावेज उपलब्ध हैं।

इसी प्रकार, यदि किसी जमीन को सरकारी या नजूल भूमि बताया गया है, तो उसके समर्थन में संबंधित राजस्व अभिलेख, स्वामित्व संबंधी दस्तावेज और अन्य प्रासंगिक रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

काउंटर एफिडेविट में तथ्यों को स्पष्ट, सटीक और अभिलेखों के अनुरूप रखना आवश्यक होता है। गलत या अधूरी जानकारी न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित कर सकती है।

हालांकि, काउंटर एफिडेविट दाखिल होने मात्र से किसी पक्ष का दावा सही सिद्ध नहीं हो जाता। अदालत संबंधित दस्तावेजों, दलीलों और लागू कानून के आधार पर मामले पर विचार करती है।

7. सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के मामलों में कानून क्या कहता है?

सरकारी जमीन पर कब्जे या उस पर निर्माण से जुड़े मामलों में सबसे पहले जमीन की वास्तविक कानूनी स्थिति निर्धारित करना जरूरी होता है।

यदि भूमि सरकारी स्वामित्व में है या नजूल भूमि के रूप में दर्ज है, तो यह देखना होगा कि किसी व्यक्ति या संस्था को उस पर कब्जा रखने, उसका उपयोग करने या निर्माण करने का वैध अधिकार प्राप्त था या नहीं।

सिर्फ किसी भवन का नक्शा स्वीकृत हो जाने से हर परिस्थिति में भूमि पर स्वामित्व का अधिकार स्थापित नहीं होता। इसी प्रकार, भूमि पर कब्जा होने से भी अपने आप कानूनी मालिकाना हक सिद्ध नहीं हो जाता।

भूमि के स्वामित्व, पट्टे, आवंटन और निर्माण की अनुमति से संबंधित दस्तावेजों की अलग-अलग जांच की आवश्यकता हो सकती है।

यदि सक्षम प्राधिकरण यह पाता है कि निर्माण लागू नियमों के विरुद्ध हुआ है, तो संबंधित कानूनों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन ऐसी कार्रवाई में निर्धारित प्रक्रिया और संबंधित व्यक्ति को उपलब्ध कानूनी उपायों का ध्यान रखना भी आवश्यक है।

अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई के मामले में नोटिस, आपत्ति प्रस्तुत करने का अवसर, सक्षम अधिकारी का आदेश और संबंधित वैधानिक प्रावधान महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

इसलिए गुड़ की मंडी प्रकरण में भी भूमि के अभिलेख, कथित एनओसी, स्वीकृत नक्शे और निरस्तीकरण आदेश की जांच से ही मामले के सभी कानूनी पहलुओं को स्पष्ट रूप से समझा जा सकेगा।

8. फर्जी दस्तावेज साबित होने पर क्या कानूनी कार्रवाई हो सकती है?

यदि जांच में यह साबित होता है कि किसी व्यक्ति ने जानबूझकर फर्जी दस्तावेज तैयार किए या उनका इस्तेमाल करके अनुचित लाभ प्राप्त किया, तो परिस्थितियों के अनुसार आपराधिक कानून के प्रावधान लागू हो सकते हैं।

ऐसे मामलों में दस्तावेज की प्रकृति, उसे तैयार करने वाले व्यक्ति की भूमिका, उसके इस्तेमाल का उद्देश्य और संबंधित पक्ष की जानकारी महत्वपूर्ण होती है।

भारत में 1 जुलाई 2024 से भारतीय न्याय संहिता, 2023 लागू है। इसमें जालसाजी और धोखाधड़ी से संबंधित अपराधों के लिए अलग-अलग प्रावधान हैं। किसी विशिष्ट मामले में कौन-सी धारा लागू होगी, यह आरोपों, घटना की तारीख और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्धारित किया जाता है।

यदि कथित फर्जी एनओसी किसी सरकारी कार्यालय, प्राधिकरण या अन्य संस्था से संबंधित है, तो यह भी जांच का विषय हो सकता है कि दस्तावेज वास्तव में किसने तैयार किया और संबंधित अधिकारियों की क्या भूमिका थी।

हालांकि, किसी व्यक्ति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने का अर्थ यह नहीं है कि वह अपराध का दोषी सिद्ध हो गया है। आपराधिक मामले में दोषसिद्धि न्यायालय द्वारा साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर की जाती है।

इसलिए आगरा के मामले में भी प्राथमिकी और प्रशासनिक कार्रवाई को महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा जाना चाहिए, जबकि अंतिम आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण संबंधित न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

9. शासन ने पैरवी में लापरवाही नहीं करने की हिदायत क्यों दी?

शासन ने जिला प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि हाईकोर्ट में मामले की पैरवी करते समय किसी प्रकार की लापरवाही या ढिलाई न बरती जाए।

साथ ही, न्यायालय द्वारा दिए जाने वाले किसी भी आदेश या निर्णय से शासन को तत्काल अवगत कराने के लिए कहा गया है।

सरकारी मुकदमों में समय पर जवाब दाखिल करना, आवश्यक अभिलेख उपलब्ध कराना और न्यायालय के सामने सही तथ्य प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण होता है।

यदि किसी मामले में जमीन के स्वामित्व, निर्माण की वैधता या प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठे हैं, तो संबंधित विभागों के पास उपलब्ध रिकॉर्ड का सही तरीके से प्रस्तुत किया जाना जरूरी हो सकता है।

काउंटर एफिडेविट दाखिल करने में देरी या आवश्यक दस्तावेजों की कमी से न्यायालय के सामने प्रशासन का पक्ष पूरी तरह स्पष्ट करने में कठिनाई हो सकती है।

हालांकि, मजबूत पैरवी का अर्थ केवल किसी पक्ष का विरोध करना नहीं है। इसका उद्देश्य कानून और रिकॉर्ड के आधार पर संबंधित पक्ष का पक्ष न्यायालय के सामने रखना होता है।

अदालत के आदेशों का समय पर पालन करना और शासन को प्रकरण की जानकारी उपलब्ध कराना भी प्रशासनिक जवाबदेही का हिस्सा है।

10. आगे क्या होगा और किन बातों पर रहेगी नजर?

आगरा के गुड़ की मंडी क्षेत्र से जुड़े इस मामले में आगे की कार्यवाही कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर निर्भर कर सकती है।

सबसे पहले, जिलाधिकारी को शासन की ओर से मांगी गई बिंदुवार रिपोर्ट उपलब्ध करानी होगी। इसके बाद हाईकोर्ट में दाखिल याचिका के जवाब में काउंटर एफिडेविट प्रस्तुत करने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

दूसरा, संबंधित जमीन की कानूनी स्थिति और कथित फर्जी एनओसी से जुड़े दस्तावेजों का महत्व होगा। यदि भूमि सरकारी या नजूल भूमि है, तो उसके अभिलेख और निर्माण की अनुमति से संबंधित रिकॉर्ड मामले की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं।

तीसरा, आगरा विकास प्राधिकरण की ओर से नक्शा और एनओसी निरस्त किए जाने के आधार की न्यायिक समीक्षा का प्रश्न उठ सकता है, यदि याचिका में इस कार्रवाई को चुनौती दी गई है।

चौथा, अवैध निर्माण हटाने और कब्जा खाली कराने के नोटिस की स्थिति भी महत्वपूर्ण होगी। इस संबंध में आगे क्या कार्रवाई होगी, यह संबंधित आदेशों और न्यायालय की कार्यवाही पर निर्भर करेगा।

फिलहाल, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि हाईकोर्ट ने निर्माण को ध्वस्त करने पर रोक लगा दी है या बिल्डर को कोई अंतिम राहत प्रदान की है।

मामले के अगले घटनाक्रम को समझने के लिए न्यायालय के वास्तविक आदेशों और प्रशासन द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी आवश्यक होगी।

निष्कर्ष

आगरा के गुड़ की मंडी क्षेत्र में सरकारी जमीन पर कथित फर्जी एनओसी और दस्तावेजों के आधार पर नक्शा पास कराने का मामला अब शासन और न्यायालय, दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण हो गया है।

आगरा विकास प्राधिकरण द्वारा स्वीकृत नक्शे और एनओसी निरस्त किए जाने, बिल्डर मालती शर्मा और अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने तथा निर्माण हटाने का नोटिस जारी किए जाने के बाद बिल्डर पक्ष ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया है।

इसके बाद शहरी विकास विभाग ने जिलाधिकारी से बिंदुवार रिपोर्ट मांगी है और काउंटर एफिडेविट के माध्यम से प्रशासन का पक्ष प्रभावी ढंग से रखने के निर्देश दिए हैं।

इस पूरे प्रकरण में सरकारी जमीन के अभिलेख, एनओसी की वैधता, नक्शा स्वीकृति की प्रक्रिया और प्रशासनिक कार्रवाई के कानूनी आधार महत्वपूर्ण होंगे।

अब आगे की स्थिति हाईकोर्ट में दाखिल याचिका, प्रशासन के जवाब और न्यायालय द्वारा पारित आदेशों से स्पष्ट होगी। इसलिए अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संबंधित दस्तावेजों और न्यायिक कार्यवाही का अध्ययन करना जरूरी है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।