IndianLawNotes.com

पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: महिला के घर में घुसना, मुंह दबाना और उसके ऊपर लेटना दुष्कर्म का प्रयास नहीं,

पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: महिला के घर में घुसना, मुंह दबाना और उसके ऊपर लेटना दुष्कर्म का प्रयास नहीं, जानिए अदालत ने क्या कहा

       महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों में किसी घटना को छेड़छाड़, महिला की गरिमा भंग करने या दुष्कर्म के प्रयास की श्रेणी में रखने का प्रश्न कई बार अदालतों के सामने आता है। ऐसे मामलों में केवल घटना की गंभीरता ही नहीं, बल्कि आरोपी की मंशा, उसके कृत्य और उपलब्ध साक्ष्यों का कानूनी मूल्यांकन भी महत्वपूर्ण होता है। इसी संदर्भ में पटना हाईकोर्ट ने वर्ष 2010 के एक आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या की है। अदालत ने कहा कि किसी महिला के घर में रात के समय जबरन घुसना, दीया बुझाना, उसके ऊपर लेटना और चीखने से रोकने के लिए उसका मुंह दबाना गंभीर आपत्तिजनक कृत्य हैं, लेकिन दुष्कर्म के प्रयास का अपराध साबित करने के लिए यह स्थापित करना आवश्यक है कि आरोपी ने शारीरिक संबंध बनाने की दिशा में आवश्यक ठोस कदम उठाया था।

जस्टिस संदीप कुमार की एकल पीठ ने बेगूसराय से जुड़े इस मामले में आरोपी मोहम्मद ऐनुल हक को दुष्कर्म के प्रयास के आरोप से बरी कर दिया। अदालत ने इस आरोप में सुनाई गई चार वर्ष की सजा को रद्द कर दिया। हालांकि, महिला की लज्जा भंग करने और उसके घर में जबरन प्रवेश करने से संबंधित अपराधों के लिए आरोपी की सजा को जेल में बिताई गई अवधि, यानी लगभग ढाई महीने तक सीमित कर दिया गया।

अदालत ने पीड़ित महिला को 25 हजार रुपये का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया। वहीं, आरोपी पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया।

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें दुष्कर्म के प्रयास और महिला की गरिमा भंग करने के अपराध के बीच कानूनी अंतर को समझाया गया है। हालांकि, इस निर्णय का अर्थ यह नहीं है कि किसी महिला के घर में घुसकर उसके साथ जबरदस्ती करना सामान्य या कम गंभीर व्यवहार है। अदालत ने घटना के कुछ पहलुओं को अपराध माना, लेकिन दुष्कर्म के प्रयास के लिए आवश्यक कानूनी तत्वों को उपलब्ध साक्ष्यों से साबित न होने के आधार पर उस आरोप में राहत दी।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला बिहार के बेगूसराय जिले में वर्ष 2010 में हुई एक घटना से संबंधित है। मामले में आरोप था कि मोहम्मद ऐनुल हक रात के समय एक महिला के घर में घुस गया। बताया गया कि उसने कमरे में जल रहे दीये को बुझाया और महिला के बिस्तर पर जाकर उसके ऊपर लेट गया। महिला के विरोध करने और चीखने की कोशिश करने पर आरोपी ने उसका मुंह दबा दिया।

इस घटना के संबंध में आरोपी के विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज हुआ और न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी। निचली अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए दुष्कर्म के प्रयास सहित संबंधित अपराधों के लिए चार वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी।

आरोपी ने इस फैसले को चुनौती देते हुए पटना हाईकोर्ट में अपील दायर की। अपील में दोषसिद्धि और सजा की कानूनी वैधता पर विचार करने की मांग की गई।

हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों का मूल्यांकन किया। अदालत के सामने प्रमुख प्रश्न यह था कि क्या आरोपी के कथित कृत्य दुष्कर्म के प्रयास का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त थे या वे महिला की गरिमा भंग करने तथा घर में जबरन प्रवेश करने जैसे अन्य अपराधों की श्रेणी में आते थे।

सुनवाई के दौरान अदालत ने दुष्कर्म के प्रयास के अपराध के कानूनी मानकों पर विचार किया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, अदालत को शारीरिक संबंध बनाने की दिशा में ऐसा प्रत्यक्ष प्रयास साबित नहीं हुआ, जिसे इस मामले में दुष्कर्म के प्रयास की दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त माना जा सके।

इसी आधार पर अदालत ने उस आरोप में आरोपी को बरी कर दिया।

दुष्कर्म का प्रयास साबित करने के लिए क्या जरूरी है?

भारतीय आपराधिक कानून में किसी अपराध की तैयारी और उस अपराध को अंजाम देने की दिशा में वास्तविक कदम उठाने के बीच अंतर किया जाता है। यह अंतर दुष्कर्म के प्रयास जैसे गंभीर आरोपों में भी महत्वपूर्ण होता है।

किसी व्यक्ति की गलत मंशा, अश्लील व्यवहार या महिला के साथ जबरदस्ती करना अपने आप में गंभीर मामला हो सकता है। लेकिन दुष्कर्म के प्रयास का अपराध साबित करने के लिए अदालत को यह देखना होता है कि आरोपी का आचरण किस सीमा तक पहुंचा और क्या उसने कथित अपराध को अंजाम देने की दिशा में आवश्यक कदम उठाए थे।

आपराधिक कानून में सामान्यतः तैयारी और प्रयास के बीच अंतर इस प्रकार समझा जा सकता है।

तैयारी की अवस्था: इस चरण में कोई व्यक्ति अपराध करने की योजना बनाता है या उसके लिए आवश्यक साधन जुटाता है। हालांकि, सामान्य नियम के रूप में केवल तैयारी कई अपराधों में प्रयास के बराबर नहीं होती। कुछ विशेष अपराधों के लिए कानून तैयारी को भी दंडनीय बना सकता है।

प्रयास की अवस्था: इस चरण में व्यक्ति केवल योजना बनाने या तैयारी करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अपराध को अंजाम देने की दिशा में ऐसा कदम उठाता है, जो संबंधित अपराध के कानूनी तत्वों के आधार पर प्रयास माना जा सके।

दुष्कर्म के प्रयास के मामलों में आरोपी की मंशा और उसके वास्तविक कृत्य दोनों महत्वपूर्ण होते हैं। अदालत को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह निर्धारित करना होता है कि आरोपी का व्यवहार केवल अश्लील हमले या छेड़छाड़ तक सीमित था अथवा वह दुष्कर्म करने के प्रयास की अवस्था तक पहुंच गया था।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि दुष्कर्म के प्रयास को साबित करने के लिए हर मामले में कपड़े फटना, चोट लगना या किसी एक विशेष प्रकार का शारीरिक संपर्क होना अनिवार्य है। ऐसे तथ्यों का महत्व मामले की परिस्थितियों और लागू कानूनी मानकों पर निर्भर करता है।

इसलिए किसी भी निर्णय को पढ़ते समय अदालत के पूरे तर्क और उपलब्ध साक्ष्यों को समझना आवश्यक है।

पीड़िता के कपड़े नहीं फटने और चोट के साक्ष्य पर क्या कहा गया?

उपलब्ध समाचार विवरण के अनुसार, हाईकोर्ट ने पीड़िता के बयान और अन्य साक्ष्यों पर विचार करते हुए उल्लेख किया कि न तो महिला के कपड़े फटे थे और न ही आरोपी के कपड़े फटने की बात सामने आई थी। कपड़े उतारने के प्रयास या शरीर पर चोट के संबंध में भी पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे।

अदालत ने इन परिस्थितियों को मामले के साक्ष्यगत मूल्यांकन के संदर्भ में देखा और निष्कर्ष निकाला कि दुष्कर्म के प्रयास का आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं था।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी बात समझना जरूरी है। कपड़े फटना, शरीर पर चोट लगना या कपड़े उतारने का प्रयास दिखाई देना दुष्कर्म के प्रयास के प्रत्येक मामले में अनिवार्य कानूनी शर्त नहीं है। किसी अपराध का निर्धारण केवल एक संकेत या एक परिस्थिति के आधार पर नहीं किया जाता।

उदाहरण के लिए, किसी महिला के साथ जबरदस्ती की कोशिश के दौरान चोट न लगने का अर्थ यह नहीं है कि घटना हुई ही नहीं। इसी तरह, कपड़े न फटने से अपने आप यह साबित नहीं होता कि आरोपी की मंशा गलत नहीं थी।

अदालत को यह देखना होता है कि पीड़िता के बयान, गवाहों की गवाही, चिकित्सकीय साक्ष्य और अन्य परिस्थितियां मिलकर किस निष्कर्ष का समर्थन करती हैं।

इस मामले में हाईकोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर दुष्कर्म के प्रयास की दोषसिद्धि को बनाए रखने के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाया। इस निष्कर्ष को प्रत्येक मामले पर लागू होने वाला सामान्य नियम नहीं समझना चाहिए।

महिला की लज्जा भंग करने का अपराध क्यों माना गया?

दुष्कर्म के प्रयास के आरोप में राहत देने के बावजूद अदालत ने आरोपी के अन्य कृत्यों को नजरअंदाज नहीं किया।

उपलब्ध विवरण के अनुसार, महिला की लज्जा भंग करने और घर में जबरन प्रवेश करने के अपराधों के लिए दोषसिद्धि कायम रखी गई। इन अपराधों में आरोपी की सजा को जेल में पहले से बिताई गई अवधि तक सीमित किया गया।

घटना में महिला के घर में रात के समय प्रवेश करने, उसके बिस्तर पर लेटने और विरोध करने पर उसका मुंह दबाने जैसे आरोप शामिल थे। अदालत ने इन कृत्यों को महिला की गरिमा और लज्जा के विरुद्ध माना।

भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के अंतर्गत महिला की लज्जा भंग करने के आशय से हमला या आपराधिक बल का प्रयोग दंडनीय अपराध था। इस प्रावधान का उद्देश्य महिलाओं के विरुद्ध ऐसे आचरण को दंडित करना है, जो उनकी गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन करता है।

धारा 354 के अंतर्गत अपराध के लिए संबंधित कानूनी तत्वों का साबित होना आवश्यक है। केवल किसी महिला के घर में मौजूद होना या उसके पास जाना अपने आप में इस अपराध को स्थापित नहीं करता। लेकिन यदि किसी महिला के विरुद्ध आपराधिक बल का प्रयोग उसके सम्मान और लज्जा को ठेस पहुंचाने के आशय से किया जाता है, तो परिस्थितियों के अनुसार यह प्रावधान लागू हो सकता है।

इस मामले में अदालत ने दुष्कर्म के प्रयास और महिला की लज्जा भंग करने के अपराध को अलग-अलग कानूनी कसौटियों पर परखा।

यही इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू है। किसी आरोपी को एक आरोप से बरी किए जाने का अर्थ यह नहीं होता कि उसके विरुद्ध लगाए गए सभी आरोप भी समाप्त हो गए।

घर में जबरन प्रवेश करना भी अलग अपराध हो सकता है

इस मामले में आरोपी के विरुद्ध घर में जबरन प्रवेश करने से संबंधित अपराध भी था। किसी व्यक्ति के घर में उसकी अनुमति के बिना आपराधिक आशय से प्रवेश करना कानून के तहत दंडनीय हो सकता है।

घर किसी व्यक्ति की निजता, सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण स्थान है। विशेष रूप से रात के समय किसी के घर में अनधिकृत प्रवेश करना व्यक्ति की सुरक्षा की भावना को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।

भारतीय दंड संहिता में आपराधिक अतिचार और गृह-अतिचार से संबंधित प्रावधान मौजूद थे। यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य के घर में अपराध करने, डराने या परेशान करने जैसे आपराधिक आशय से प्रवेश करता है, तो मामले की परिस्थितियों के अनुसार संबंधित प्रावधान लागू हो सकते हैं।

इस प्रकार के मामलों में अदालत को यह देखना होता है कि प्रवेश किस परिस्थिति में किया गया, आरोपी का आशय क्या था और क्या संबंधित अपराध के सभी कानूनी तत्व साबित हुए।

मोहम्मद ऐनुल हक के मामले में उपलब्ध विवरण के अनुसार, अदालत ने घर में जबरन प्रवेश करने के अपराध के संबंध में राहत नहीं दी, बल्कि सजा को पहले से काटी गई अवधि तक सीमित किया।

पीड़ित महिला को 25 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू पीड़ित महिला को मुआवजा देने का निर्देश भी है। अदालत ने महिला को 25 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। साथ ही आरोपी पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया।

आपराधिक न्याय व्यवस्था में मुआवजे का उद्देश्य पीड़ित को हुई क्षति के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना हो सकता है। अपराध का प्रभाव केवल शारीरिक चोट तक सीमित नहीं रहता। कई घटनाओं में पीड़ित को मानसिक पीड़ा, सामाजिक कठिनाइयों और अन्य प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

हालांकि, मुआवजे की राशि और उसका आधार मामले के तथ्यों, लागू कानूनी प्रावधानों तथा अदालत के आदेश पर निर्भर करता है।

यहां यह अंतर भी समझना चाहिए कि जुर्माना और पीड़ित को दिया जाने वाला मुआवजा कानूनी दृष्टि से अलग अवधारणाएं हैं। जुर्माना अपराध के लिए लगाया जाने वाला आर्थिक दंड है, जबकि मुआवजे का उद्देश्य पीड़ित को आर्थिक राहत देना होता है। किसी मामले में इनका भुगतान और वितरण संबंधित न्यायिक आदेश तथा कानून के अनुसार होता है।

इस निर्णय में मुआवजे का निर्देश यह दर्शाता है कि दुष्कर्म के प्रयास के आरोप में राहत मिलने के बावजूद पीड़ित के प्रति हुए अन्य अपराधों और उनके परिणामों पर विचार किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी ऐसे मामले में उठाए थे सवाल

इस प्रकरण के साथ पटना हाईकोर्ट के एक दूसरे फैसले की चर्चा भी सामने आई है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने पहले स्वतः संज्ञान लिया था।

उस दूसरे मामले में पटना हाईकोर्ट की एकल पीठ ने महिला के सलवार को उतारने की कोशिश और उसके सीने को दबाने से संबंधित तथ्यों पर विचार करते हुए टिप्पणी की थी कि ऐसे कृत्य दुष्कर्म के प्रयास के अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

इस मामले में न्यायमूर्ति पूर्णेन्दु सिंह ने 9 जुलाई को फैसला सुनाया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में की गई कुछ टिप्पणियों पर आपत्ति जताई और मामले पर विचार किया।

उपलब्ध विवरण के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति बी. मोहना श्री की पीठ ने सुनवाई के दौरान संबंधित टिप्पणियों को आपत्तिजनक बताया था। अदालत ने आरोपी का पक्ष सुनने के बाद फैसले को निरस्त किए जाने की संभावना भी व्यक्त की थी।

यहां दोनों मामलों के बीच अंतर समझना जरूरी है। किसी मामले में दुष्कर्म के प्रयास के कानूनी तत्वों की व्याख्या करना एक बात है, जबकि किसी महिला के साथ किए गए कथित कृत्य को कम गंभीर बताने वाली टिप्पणी करना दूसरी बात है।

न्यायालयों का दायित्व है कि वे अपराध की कानूनी श्रेणी निर्धारित करते समय सटीक और संवेदनशील भाषा का इस्तेमाल करें। पीड़िता की गरिमा और उसके साथ हुए कथित व्यवहार को कमतर आंकने वाली भाषा न्यायिक निर्णय की निष्पक्षता पर अनावश्यक प्रश्न खड़े कर सकती है।

साथ ही, किसी फैसले पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा सवाल उठाए जाने का अर्थ यह नहीं है कि हर समान तथ्य वाले मामले में निचली अदालत का निष्कर्ष स्वतः गलत हो जाता है। प्रत्येक मामले का निर्णय उसके अपने तथ्यों और लागू कानून के आधार पर किया जाता है।

दुष्कर्म के प्रयास और छेड़छाड़ में कानूनी अंतर

इस मामले को समझने के लिए दुष्कर्म के प्रयास और महिला की लज्जा भंग करने के अपराध के बीच अंतर जानना आवश्यक है।

दुष्कर्म के प्रयास का आरोप तब विचारणीय होता है, जब उपलब्ध साक्ष्य यह दिखाते हों कि आरोपी ने दुष्कर्म करने की दिशा में ऐसा कदम उठाया, जिसे कानून के अनुसार प्रयास माना जा सकता है। इसके लिए आरोपी की मंशा और उसके कृत्य दोनों का मूल्यांकन किया जाता है।

दूसरी ओर, महिला की लज्जा भंग करने के अपराध में आपराधिक बल या हमला और उससे संबंधित आवश्यक आशय अथवा जानकारी जैसे तत्व महत्वपूर्ण होते हैं।

दोनों अपराधों के कानूनी तत्व अलग हैं। इसलिए यह संभव है कि किसी घटना में महिला के साथ आपत्तिजनक व्यवहार और जबरदस्ती साबित हो जाए, लेकिन उपलब्ध साक्ष्य किसी अधिक गंभीर आरोप के लिए पर्याप्त न माने जाएं।

हालांकि, किसी घटना को छेड़छाड़ कह देने मात्र से उसके सभी कानूनी पहलुओं का निर्णय नहीं हो जाता। मामले की परिस्थितियों के अनुसार अन्य अपराध भी बन सकते हैं।

इसलिए अदालतों को प्रत्येक आरोप पर अलग-अलग विचार करना पड़ता है। अभियोजन पक्ष को आरोपों को लागू कानूनी मानकों के अनुसार साबित करना होता है, जबकि आरोपी को कानून के तहत अपना बचाव प्रस्तुत करने का अधिकार प्राप्त होता है।

निष्कर्ष: कानूनी कसौटी पर तय होगा अपराध, लेकिन महिला की गरिमा से समझौता नहीं

पटना हाईकोर्ट का यह फैसला दुष्कर्म के प्रयास और महिला की लज्जा भंग करने के अपराध के बीच अंतर को रेखांकित करता है। वर्ष 2010 के बेगूसराय मामले में अदालत ने मोहम्मद ऐनुल हक को दुष्कर्म के प्रयास के आरोप से बरी कर दिया और उस आरोप में सुनाई गई चार वर्ष की सजा रद्द कर दी। हालांकि, महिला की लज्जा भंग करने तथा घर में जबरन प्रवेश करने के अपराधों के लिए सजा को पहले से जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित रखा गया।

अदालत ने पीड़ित महिला को 25 हजार रुपये मुआवजा देने और आरोपी पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाने का भी निर्देश दिया।

इस निर्णय का मुख्य कानूनी संदेश यह है कि किसी अपराध की गंभीरता और उसकी कानूनी श्रेणी निर्धारित करने के लिए संबंधित अपराध के सभी आवश्यक तत्वों को साक्ष्यों के आधार पर साबित करना होता है। दुष्कर्म के प्रयास के लिए केवल गलत मंशा या अश्लील व्यवहार का आरोप पर्याप्त नहीं माना जा सकता; आरोपी के वास्तविक कृत्यों का भी मूल्यांकन आवश्यक है।

लेकिन इस सिद्धांत का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि महिला के घर में जबरन घुसना, उसे दबोचना या उसका मुंह बंद करना मामूली व्यवहार है। ऐसे कृत्य परिस्थितियों के अनुसार गंभीर आपराधिक अपराध बन सकते हैं।

न्याय का उद्देश्य न तो किसी आरोपी को बिना पर्याप्त साक्ष्य के दोषी ठहराना है और न ही किसी महिला के साथ हुए अपराध को कमतर आंकना। न्यायिक प्रक्रिया में दोनों सिद्धांतों का पालन आवश्यक है—आरोपों का निष्पक्ष मूल्यांकन और पीड़ित की गरिमा तथा अधिकारों की रक्षा।

✓
संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।