मृत्युदंड के मामलों में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: ट्रायल कोर्ट को हर मामले में सजा घटाने-बढ़ाने वाली परिस्थितियों की रिपोर्ट लेना जरूरी नहीं, जानिए पूरा आदेश
मृत्युदंड से जुड़े मामलों में सजा निर्धारित करने की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। अदालत ने 27 अप्रैल 2026 को जारी अपने उस निर्देश को हटा दिया है, जिसके तहत ट्रायल कोर्ट को मौत की सजा वाले अपराधों के प्रत्येक मामले में सजा को कम या ज्यादा करने वाली परिस्थितियों से संबंधित रिपोर्ट प्राप्त करनी होती। अदालत ने माना कि हर ऐसे मामले में रिपोर्ट तैयार कराने की अनिवार्यता से न्यायिक प्रक्रिया और कानूनी सहायता व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ पड़ सकता है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह की पीठ ने 7 अक्टूबर 2026 को यह आदेश पारित किया। अदालत ने नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA) की ओर से दायर स्पष्टीकरण संबंधी याचिका स्वीकार करते हुए 27 अप्रैल के आदेश के पैरा 13(A) में दिए गए निर्देश को हटा दिया।
यह मामला Aman Singh & Anr. v. State of Bihar से संबंधित है। इस फैसले का महत्व इसलिए है क्योंकि मृत्युदंड के मामलों में केवल अपराध की गंभीरता देखना पर्याप्त नहीं होता। अदालत को दोषी की परिस्थितियों, उसके जीवन की पृष्ठभूमि, मानसिक स्वास्थ्य और सुधार की संभावनाओं जैसे पहलुओं पर भी विचार करना होता है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के सभी निर्देश वापस नहीं लिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि मृत्युदंड की पुष्टि के लिए हाई कोर्ट के सामने आने वाले मामलों में सजा घटाने-बढ़ाने वाली परिस्थितियों से संबंधित रिपोर्ट प्राप्त करने के अन्य निर्देश प्रभावी रहेंगे।
इस प्रकार अदालत ने एक ओर अनावश्यक प्रक्रियात्मक बोझ को कम करने का प्रयास किया है, तो दूसरी ओर मृत्युदंड के मामलों में निष्पक्ष और संतुलित सजा निर्धारण की आवश्यकता को भी बरकरार रखा है।
क्या था सुप्रीम कोर्ट का 27 अप्रैल 2026 का आदेश?
मृत्युदंड भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में सबसे कठोर सजा है। इसलिए इसे निर्धारित करने से पहले अदालत को अपराध की परिस्थितियों के साथ-साथ दोषी से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर भी विचार करना होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 27 अप्रैल 2026 को एक आदेश जारी करते हुए मृत्युदंड से जुड़े मामलों में सजा निर्धारण की प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे।
अदालत ने चिंता व्यक्त की थी कि कई मामलों में ट्रायल के दौरान या हाई कोर्ट द्वारा मृत्युदंड की पुष्टि के लिए मामले पर विचार करते समय सजा को कम या ज्यादा करने वाली परिस्थितियों से संबंधित पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं होती।
ऐसी स्थिति में जब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचता है, तब पहली बार दोषी की सामाजिक पृष्ठभूमि, मानसिक स्थिति और सुधार की संभावनाओं जैसी जानकारियां जुटाने की आवश्यकता पड़ती है।
इससे मामले के निस्तारण में देरी हो सकती है। साथ ही, सजा निर्धारित करने के लिए आवश्यक जानकारी देर से उपलब्ध होने के कारण न्यायिक प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है।
इसी समस्या को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि सजा को प्रभावित करने वाली परिस्थितियों से संबंधित रिपोर्ट ट्रायल के दौरान, दोषसिद्धि के बाद और सजा निर्धारित करने से पहले प्राप्त की जानी चाहिए।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि अदालत के पास सजा तय करते समय सभी प्रासंगिक तथ्य उपलब्ध हों।
लेकिन बाद में NALSA ने इस निर्देश के एक हिस्से पर स्पष्टीकरण मांगा। संस्था का कहना था कि प्रत्येक ऐसे मामले में रिपोर्ट तैयार करने की अनिवार्यता व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा कर सकती है, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने मृत्युदंड देने की संभावना पर विचार भी नहीं किया हो।
इसी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 7 अक्टूबर को सुनवाई की और अपने पहले के आदेश में संशोधन किया।
NALSA ने सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या दलील दी?
नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी यानी NALSA का काम पात्र व्यक्तियों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने और देश में विधिक सेवा व्यवस्था को मजबूत बनाने से जुड़ा है।
मृत्युदंड के मामलों में भी कानूनी सहायता का विशेष महत्व है, क्योंकि इन मामलों में दोषी के जीवन, स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े अत्यंत गंभीर प्रश्न शामिल होते हैं।
NALSA की ओर से पेश अधिवक्ता रश्मि नंदकुमार ने अदालत के सामने दलील दी कि 27 अप्रैल के आदेश के पैरा 13(A) को जिस तरह लागू किया गया था, उससे व्यावहारिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
उन्होंने बताया कि ऐसे कई मामले हो सकते हैं, जिनमें ट्रायल कोर्ट ने मृत्युदंड देने पर विचार ही नहीं किया हो। यदि प्रत्येक ऐसे मामले में भी सजा को प्रभावित करने वाली परिस्थितियों पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार कराना अनिवार्य कर दिया जाए, तो न्यायालयों और कानूनी सहायता संस्थाओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
इसके अतिरिक्त, प्रत्येक मामले में इस प्रकार की रिपोर्ट तैयार करने के लिए पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षित कर्मचारी और समय उपलब्ध होना भी आवश्यक है।
यदि ट्रायल कोर्ट के सामने मृत्युदंड का प्रश्न ही नहीं उठता, तब भी रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया पूरी करना प्रशासनिक दृष्टि से कठिन हो सकता है।
NALSA ने इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट से अपने पहले के निर्देश में स्पष्टीकरण देने का अनुरोध किया।
अदालत ने इन दलीलों पर विचार किया और माना कि पैरा 13(A) में दिए गए निर्देश को हटाना उचित होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने पैरा 13(A) को क्यों हटाया?
7 अक्टूबर 2026 को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने NALSA की दलील से सहमति जताई।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि 27 अप्रैल 2026 के आदेश के पैरा 13(A) में ट्रायल कोर्ट को प्रत्येक मामले में सजा को बढ़ाने और कम करने वाली परिस्थितियों से संबंधित रिपोर्ट मंगाने के लिए दिए गए निर्देश को हटाया जाता है।
साथ ही, अदालत ने आदेश की सही प्रति जारी करने के लिए सुधार-पत्र यानी Corrigendum जारी करने का निर्देश दिया।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि पहले के आदेश की संशोधित स्थिति सभी संबंधित न्यायालयों और संस्थाओं तक स्पष्ट रूप से पहुंच जाए।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए। पैरा 13(A) को हटाने का अर्थ यह नहीं है कि अदालतों को दोषी की परिस्थितियों पर विचार करने की आवश्यकता ही नहीं रह गई है।
मृत्युदंड निर्धारित करते समय अपराध की गंभीरता और दोषी से संबंधित परिस्थितियों के बीच संतुलन स्थापित करना अब भी महत्वपूर्ण है। अदालत ने केवल उस निर्देश को हटाया है, जिसके तहत प्रत्येक ऐसे मामले में रिपोर्ट प्राप्त करना अनिवार्य किया गया था, भले ही ट्रायल कोर्ट के सामने मृत्युदंड देने का प्रश्न विचाराधीन न हो।
इसलिए फैसले को मृत्युदंड के मामलों में सजा निर्धारण से संबंधित सभी सुरक्षा उपायों की समाप्ति के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
Aggravating और Mitigating Circumstances का क्या अर्थ है?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश को समझने के लिए इन दोनों कानूनी अवधारणाओं को जानना आवश्यक है।
1. Aggravating Circumstances यानी सजा बढ़ाने वाली परिस्थितियां
ये वे परिस्थितियां होती हैं, जिन पर विचार करते समय अदालत अपराध की गंभीरता और उससे जुड़े अन्य प्रासंगिक पहलुओं का मूल्यांकन करती है।
उदाहरण के लिए, अपराध को अंजाम देने का तरीका, उसकी योजना, पीड़ित के साथ किया गया व्यवहार और घटना से संबंधित अन्य तथ्य सजा निर्धारित करने में प्रासंगिक हो सकते हैं।
हालांकि, किसी एक परिस्थिति के मौजूद होने से स्वतः मृत्युदंड देना आवश्यक नहीं हो जाता। अदालत को पूरे मामले का मूल्यांकन लागू कानूनी सिद्धांतों के अनुसार करना होता है।
2. Mitigating Circumstances यानी सजा कम करने के पक्ष में परिस्थितियां
ये वे परिस्थितियां हैं, जिन पर विचार करने से दोषी को अपेक्षाकृत कम कठोर सजा देने का आधार बन सकता है।
इनमें दोषी की उम्र, पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि, मानसिक स्वास्थ्य, आर्थिक परिस्थितियां, अपराध में उसकी भूमिका और सुधार की संभावनाएं जैसे पहलू शामिल हो सकते हैं।
इन परिस्थितियों का उद्देश्य अपराध को उचित ठहराना नहीं है। इनका महत्व यह निर्धारित करने में होता है कि संबंधित व्यक्ति के मामले में कौन-सी सजा न्यायसंगत और कानून के अनुरूप होगी।
मृत्युदंड के मामलों में इन दोनों प्रकार की परिस्थितियों पर विचार करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें दोषी के जीवन का प्रश्न शामिल होता है।
हाई कोर्ट के सामने डेथ रेफरेंस में क्या प्रक्रिया अपनानी होगी?
सुप्रीम कोर्ट ने 27 अप्रैल के आदेश में यह भी निर्देश दिया था कि यदि ट्रायल कोर्ट के सामने सजा को कम या ज्यादा करने वाली परिस्थितियों से संबंधित रिपोर्ट प्राप्त नहीं की गई है या उसे रिकॉर्ड पर नहीं रखा गया है, तो हाई कोर्ट को मृत्युदंड की पुष्टि के लिए आने वाले मामले के शुरुआती चरण में ही आवश्यक रिपोर्ट प्राप्त करनी चाहिए।
यह निर्देश संशोधित आदेश के बाद भी प्रभावी रहेगा।
भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में सत्र न्यायालय द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजा को लागू करने से पहले हाई कोर्ट की पुष्टि आवश्यक होती है। इस प्रक्रिया को सामान्यतः डेथ रेफरेंस कहा जाता है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मृत्युदंड जैसे गंभीर निर्णय की स्वतंत्र न्यायिक समीक्षा हो।
हाई कोर्ट मामले के तथ्यों, साक्ष्यों, दोषसिद्धि और सजा से जुड़े प्रश्नों पर विचार करता है। यदि आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं है, तो सजा निर्धारण से संबंधित रिपोर्ट प्राप्त करना महत्वपूर्ण हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का आशय यही है कि ऐसी रिपोर्ट की आवश्यकता होने पर उसे समय रहते हासिल किया जाए, ताकि मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंचने के बाद ही पहली बार आवश्यक जानकारी जुटाने की स्थिति पैदा न हो।
इससे न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक देरी कम करने और सजा के प्रश्न पर पर्याप्त सामग्री उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।
रिपोर्ट पूरी और सत्यापित होना क्यों जरूरी है?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के निर्देशों में रिपोर्ट की गुणवत्ता और समयबद्धता पर भी जोर दिया था।
यदि किसी रिपोर्ट में दोषी की पृष्ठभूमि, मानसिक स्वास्थ्य या सुधार की संभावनाओं से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी अधूरी हो, तो अदालत के लिए उसका उचित मूल्यांकन करना कठिन हो सकता है।
इसीलिए रिपोर्ट पूरी और सत्यापित होनी चाहिए तथा निर्धारित समय के भीतर प्रस्तुत की जानी चाहिए।
इसके साथ ही अभियोजन और बचाव पक्ष को रिपोर्ट की जांच करने और उस पर अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।
यह प्रक्रिया निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत से जुड़ी है। सजा निर्धारण के दौरान प्रस्तुत सामग्री को बिना परीक्षण के स्वीकार करना उचित नहीं होगा। दोनों पक्षों को संबंधित तथ्यों पर अपनी दलीलें रखने का अवसर मिलने से अदालत बेहतर निर्णय तक पहुंच सकती है।
मृत्युदंड के मामलों में यह प्रक्रिया और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि सजा का प्रभाव अपरिवर्तनीय हो सकता है।
हालांकि, रिपोर्ट प्राप्त करने की प्रक्रिया को प्रत्येक मामले में अनिवार्य बनाने और जहां उसकी आवश्यकता हो वहां समय पर रिपोर्ट उपलब्ध कराने के बीच अंतर है। सुप्रीम कोर्ट ने अब पहले वाले व्यापक निर्देश को हटा दिया है, जबकि हाई कोर्ट में डेथ रेफरेंस के दौरान आवश्यक रिपोर्ट प्राप्त करने का निर्देश बरकरार रखा है।
कानूनी सहायता के लिए विशेष टीम बनाने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट के 27 अप्रैल के आदेश में कानूनी सहायता व्यवस्था को मजबूत बनाने से संबंधित निर्देश भी शामिल थे।
अदालत ने कहा था कि लीगल सर्विस कमेटियों को मृत्युदंड की पुष्टि से संबंधित मामलों के लिए विशेष टीमें बनानी चाहिए।
इन टीमों में एक वरिष्ठ अधिवक्ता और कम-से-कम दो ऐसे वकील शामिल किए जाने का निर्देश दिया गया था, जिन्हें मृत्युदंड की पुष्टि संबंधी कार्यवाही में कम-से-कम सात वर्ष की प्रैक्टिस का अनुभव हो।
इस व्यवस्था का उद्देश्य ऐसे मामलों में प्रभावी कानूनी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, जिनमें दोषी के जीवन का प्रश्न शामिल होता है।
किसी व्यक्ति के पास निजी वकील होना या न होना, अपने आप में इस विशेष कानूनी सहायता व्यवस्था के महत्व को समाप्त नहीं करता। मृत्युदंड के मामलों में वकीलों को साक्ष्यों, अपील के आधारों, सजा से संबंधित परिस्थितियों और प्रासंगिक कानूनी सिद्धांतों का विस्तृत अध्ययन करना पड़ सकता है।
विशेष टीमों के माध्यम से मामलों की बेहतर तैयारी और कानूनी सहायता की गुणवत्ता में सुधार लाने का प्रयास किया जा सकता है।
यह निर्देश भी 27 अप्रैल के आदेश का हिस्सा था और 7 अक्टूबर के संशोधन से समाप्त नहीं हुआ।
हाई कोर्ट में वकीलों का विशेष पैनल और NALSA की गाइडलाइंस
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के निर्देशों में हाई कोर्ट को डेथ रेफरेंस मामलों के लिए वकीलों का विशेष पैनल तैयार करने को भी कहा था।
ऐसे पैनल का उद्देश्य मृत्युदंड की पुष्टि संबंधी मामलों में अनुभवी अधिवक्ताओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
इसके अतिरिक्त, NALSA को सजा कम करने के पक्ष में मौजूद परिस्थितियों की जांच के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने की जिम्मेदारी भी दी गई थी।
इन दिशा-निर्देशों में दोषी की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि, मानसिक स्वास्थ्य तथा सुधार और समाज में दोबारा शामिल होने की संभावनाओं जैसे पहलुओं को शामिल किया जाना था।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सजा निर्धारण केवल अपराध के परिणाम को देखकर नहीं किया जाता। दोषी की व्यक्तिगत परिस्थितियों का उचित मूल्यांकन भी न्यायिक निर्णय का हिस्सा हो सकता है।
यदि ऐसी जानकारी व्यवस्थित तरीके से जुटाई जाए, तो अदालत को यह समझने में मदद मिल सकती है कि संबंधित मामले में सजा के विभिन्न विकल्पों का मूल्यांकन किस प्रकार किया जाना चाहिए।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि 7 अक्टूबर के आदेश में पैरा 13(A) हटाया गया है, लेकिन आपके दिए गए विवरण के अनुसार कानूनी सहायता टीमों, विशेष पैनल और NALSA की गाइडलाइंस से संबंधित बाकी निर्देश प्रभावी बने हुए हैं।
क्या इस फैसले से मृत्युदंड देना आसान हो जाएगा?
इस प्रश्न का उत्तर सीधे तौर पर हां में देना उचित नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने रिपोर्ट प्राप्त करने से संबंधित एक व्यापक प्रक्रियात्मक अनिवार्यता को हटाया है। अदालत ने यह नहीं कहा कि मृत्युदंड के मामलों में दोषी की परिस्थितियों पर विचार करना अनावश्यक है या सजा निर्धारित करने के कानूनी मानकों को कम किया जा रहा है।
मृत्युदंड से संबंधित न्यायिक सिद्धांत अब भी महत्वपूर्ण हैं। अदालतों को अपराध की गंभीरता, दोषी की परिस्थितियों और लागू कानून के अनुसार निर्णय लेना होता है।
रिपोर्ट की अनिवार्यता में संशोधन का उद्देश्य उन मामलों में अनावश्यक प्रक्रियात्मक बोझ कम करना है, जिनमें ट्रायल कोर्ट ने मृत्युदंड देने पर विचार ही नहीं किया हो।
दूसरी ओर, जब किसी मामले में मृत्युदंड की पुष्टि का प्रश्न हाई कोर्ट के सामने आता है और आवश्यक रिपोर्ट उपलब्ध नहीं होती, तो उसे प्राप्त करने का निर्देश अब भी लागू है।
इसलिए फैसले को मृत्युदंड देने की प्रक्रिया को आसान बनाने के बजाय रिपोर्ट प्राप्त करने की व्यवस्था में सीमित प्रक्रियात्मक संशोधन के रूप में समझना अधिक उचित होगा।
निष्कर्ष: मृत्युदंड के मामलों में संतुलित न्याय की आवश्यकता बरकरार
सुप्रीम कोर्ट का 7 अक्टूबर 2026 का आदेश मृत्युदंड से जुड़े मामलों में सजा निर्धारण की प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण है। अदालत ने NALSA की दलीलों को स्वीकार करते हुए 27 अप्रैल के आदेश के पैरा 13(A) को हटा दिया, जिसके तहत ट्रायल कोर्ट को प्रत्येक संबंधित मामले में सजा बढ़ाने और कम करने वाली परिस्थितियों की रिपोर्ट प्राप्त करनी होती।
अदालत ने माना कि जहां ट्रायल कोर्ट ने मृत्युदंड देने पर विचार ही नहीं किया हो, वहां ऐसी रिपोर्ट तैयार कराने की अनिवार्यता से अनावश्यक प्रक्रियात्मक कठिनाइयां उत्पन्न हो सकती हैं।
हालांकि, रिपोर्ट की आवश्यकता वाले डेथ रेफरेंस मामलों में हाई कोर्ट द्वारा शुरुआती चरण में आवश्यक जानकारी प्राप्त करने का निर्देश प्रभावी रहेगा। इसी तरह, विशेष कानूनी सहायता टीमों, हाई कोर्ट में वकीलों के पैनल और NALSA की दिशा-निर्देश संबंधी जिम्मेदारियों से जुड़े अन्य निर्देश भी बरकरार हैं।
इस फैसले का मूल संदेश यह है कि न्यायिक प्रक्रिया में आवश्यक सुरक्षा उपाय बने रहने चाहिए, लेकिन उनकी व्यवस्था व्यावहारिक और प्रभावी भी होनी चाहिए।
मृत्युदंड जैसे गंभीर मामलों में अदालत को अपराध की परिस्थितियों के साथ-साथ दोषी के व्यक्तिगत पक्ष पर भी विचार करने का अवसर मिलना चाहिए। साथ ही, ऐसी प्रक्रिया को इस तरह लागू किया जाना चाहिए कि अनावश्यक देरी और संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ से बचा जा सके।
अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने रिपोर्ट प्राप्त करने की एक व्यापक अनिवार्यता हटाई है, लेकिन मृत्युदंड के मामलों में निष्पक्ष सुनवाई, प्रभावी कानूनी सहायता और सजा के संतुलित निर्धारण की आवश्यकता को समाप्त नहीं किया है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।