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पांचवीं पास युवती हिंदी अखबार तक नहीं पढ़ सकी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शिक्षा व्यवस्था पर उठाए गंभीर सवाल;

पांचवीं पास युवती हिंदी अखबार तक नहीं पढ़ सकी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शिक्षा व्यवस्था पर उठाए गंभीर सवाल; POCSO कानून में बदलाव के लिए विधि आयोग को सुझाव

       इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश की बुनियादी शिक्षा व्यवस्था पर चिंता जताई। अदालत के सामने एक ऐसी युवती का मामला आया, जिसने पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी, लेकिन वह हिंदी का अखबार पढ़ने और अपने नाम के अलावा कुछ लिखने में सक्षम नहीं थी। युवती एक बच्चे की मां भी बन चुकी है। मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने बच्चों की शिक्षा, गरीबी, सामाजिक जागरूकता और पॉक्सो कानून के व्यावहारिक प्रभावों पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। साथ ही, विधि आयोग से कानून के कुछ प्रावधानों की समीक्षा करने पर विचार करने का सुझाव दिया।

शिक्षा किसी भी समाज की प्रगति की बुनियाद होती है। इसका उद्देश्य केवल बच्चों को विद्यालय में प्रवेश दिलाना या उन्हें कक्षा दर कक्षा आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि उन्हें पढ़ने-लिखने, समझने, निर्णय लेने और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने योग्य बनाना भी है। यदि कोई विद्यार्थी कई वर्ष तक विद्यालय में पढ़ाई करने के बाद भी सामान्य रूप से पढ़ने और लिखने में सक्षम नहीं हो पाता, तो यह केवल उस विद्यार्थी की व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े करता है।

उत्तर प्रदेश से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने ऐसी ही स्थिति आई। पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई करने वाली एक युवती हिंदी का अखबार नहीं पढ़ सकी और अपने नाम के अलावा हिंदी में कुछ लिखने में भी असमर्थ पाई गई। वह एक बच्चे की मां भी बन चुकी थी। इस स्थिति ने अदालत को बुनियादी शिक्षा की गुणवत्ता और सामाजिक परिस्थितियों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया।

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान राज्य में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी पर सवाल उठाए। अदालत ने यह भी विचार किया कि गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक जागरूकता की कमी जैसी परिस्थितियों में पॉक्सो कानून के कुछ प्रावधानों का व्यावहारिक प्रभाव किस प्रकार पड़ सकता है।

अदालत की टिप्पणियों का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि इस मामले में एक तरफ नाबालिगों से संबंधित कानून का प्रश्न था, तो दूसरी तरफ शिक्षा, सामाजिक परिस्थितियों और न्याय के बीच संतुलन का मुद्दा भी सामने आया।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला राकेश यादव उर्फ पप्पू की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा है। याचिका में उस लड़की को अदालत के सामने पेश करने की मांग की गई थी, जिसके साथ वह वर्ष 2025 में घर से चला गया था। दोनों से एक बच्चे का जन्म हुआ था।

बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी हेबियस कॉर्पस एक महत्वपूर्ण न्यायिक उपाय है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को कथित गैरकानूनी हिरासत से मुक्त कराने या यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता कानून के विरुद्ध प्रतिबंधित न हो। हालांकि, किसी मामले में इस याचिका का दायरा संबंधित तथ्यों और कानूनी परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने युवती की शैक्षणिक स्थिति को समझने का प्रयास किया। जब उससे हिंदी का अखबार पढ़ने और लिखने के बारे में पूछा गया, तो उसकी असमर्थता सामने आई।

बताया गया कि युवती ने पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी, लेकिन वह सामान्य हिंदी पाठ पढ़ने और अपने नाम के अतिरिक्त कुछ लिखने में सक्षम नहीं थी।

इस स्थिति पर अदालत ने गंभीर चिंता व्यक्त की। सवाल केवल यह नहीं था कि युवती कितनी कक्षाओं तक विद्यालय गई थी, बल्कि यह भी था कि विद्यालय में पढ़ाई करने के बावजूद वह बुनियादी साक्षरता क्यों हासिल नहीं कर सकी।

अदालत ने इस प्रसंग को उत्तर प्रदेश की बुनियादी शिक्षा व्यवस्था से जोड़ते हुए राज्य सरकार की जिम्मेदारी पर सवाल उठाए।

पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई, फिर भी हिंदी पढ़ने-लिखने में परेशानी

विद्यालय में नामांकन और वास्तविक शिक्षा के बीच अंतर होना भारतीय शिक्षा व्यवस्था की प्रमुख चुनौतियों में गिना जाता है। किसी बच्चे का विद्यालय में प्रवेश हो जाना अपने आप यह सुनिश्चित नहीं करता कि वह पढ़ने, लिखने और गणित की बुनियादी क्षमताएं भी हासिल कर लेगा।

इस मामले में युवती की स्थिति ने इसी प्रश्न को सामने रखा।

पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद सामान्य हिंदी पाठ पढ़ने में असमर्थ होना यह सवाल पैदा करता है कि विद्यालय में उसकी शिक्षा किस स्तर की रही और पढ़ाई बीच में रुकने या सीखने की प्रक्रिया प्रभावित होने के पीछे क्या परिस्थितियां थीं।

हालांकि, केवल एक मामले के आधार पर पूरे राज्य की शिक्षा व्यवस्था के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन इस तरह की स्थिति शिक्षा की गुणवत्ता, बच्चों की नियमित उपस्थिति, शिक्षण के स्तर और कमजोर विद्यार्थियों को अतिरिक्त सहायता देने की व्यवस्था की जांच की जरूरत जरूर सामने लाती है।

शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होता है, जब बच्चे विद्यालय से आवश्यक ज्ञान और व्यावहारिक कौशल प्राप्त करें।

यदि कोई बच्चा कई कक्षाएं पार कर जाता है, लेकिन पढ़ने-लिखने की बुनियादी क्षमता विकसित नहीं कर पाता, तो केवल परीक्षा परिणाम या कक्षा में पदोन्नति को शिक्षा की सफलता का पर्याप्त प्रमाण नहीं माना जा सकता।

इसीलिए बुनियादी शिक्षा में सीखने के परिणामों का मूल्यांकन महत्वपूर्ण है।

अदालत ने राज्य सरकार से क्या सवाल किए?

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए यह जानना चाहा कि युवती की शिक्षा पांचवीं कक्षा तक ही क्यों सीमित रह गई।

अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि सरकार बच्चों को कम से कम बारहवीं कक्षा तक शिक्षा से जोड़े रखने के लिए प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करने में क्यों सफल नहीं हो सकी।

यह सवाल शिक्षा के अधिकार और बच्चों के भविष्य से जुड़ा हुआ है।

विद्यालय में प्रवेश दिलाना महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके साथ यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि बच्चे नियमित रूप से पढ़ाई कर सकें, उनकी सीखने की क्षमता विकसित हो और आर्थिक या सामाजिक कारणों से उन्हें शिक्षा छोड़ने के लिए मजबूर न होना पड़े।

विशेष रूप से गरीब परिवारों के बच्चों के सामने कई तरह की चुनौतियां होती हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने पर बच्चों को घरेलू जिम्मेदारियां निभानी पड़ सकती हैं। कुछ मामलों में वे कम उम्र में काम करने लगते हैं या पारिवारिक परिस्थितियों के कारण विद्यालय से दूर हो जाते हैं।

लड़कियों की शिक्षा पर इन परिस्थितियों का प्रभाव और अधिक गंभीर हो सकता है। आर्थिक कठिनाइयां, सामाजिक दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियां और कम उम्र में विवाह जैसी स्थितियां उनकी शिक्षा को प्रभावित कर सकती हैं।

इसलिए शिक्षा व्यवस्था का मूल्यांकन करते समय यह देखना आवश्यक है कि विद्यालयों में नामांकन के साथ बच्चों की पढ़ाई जारी रखने और उन्हें आवश्यक ज्ञान उपलब्ध कराने के लिए क्या व्यवस्थाएं मौजूद हैं।

बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना राज्य की जिम्मेदारी

अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों को सार्थक शिक्षा उपलब्ध कराना राज्य की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है। युवाओं को वयस्क होने तक शिक्षा से जोड़े रखने के साथ उन्हें व्यावसायिक कौशल हासिल करने के अवसर भी मिलने चाहिए, ताकि वे भविष्य में आत्मनिर्भर बन सकें।

भारतीय संविधान में शिक्षा को विशेष महत्व दिया गया है।

संविधान का अनुच्छेद 21A छह से चौदह वर्ष तक के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करता है। इसी संवैधानिक व्यवस्था को लागू करने के लिए बच्चों का निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 बनाया गया।

इस कानून का उद्देश्य बच्चों को प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर शिक्षा प्राप्त करने का अवसर उपलब्ध कराना है।

हालांकि, शिक्षा से संबंधित संवैधानिक और वैधानिक दायित्वों को केवल विद्यालय में प्रवेश तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। बच्चों को ऐसी शिक्षा मिलनी चाहिए, जो उनकी उम्र और कक्षा के अनुरूप आवश्यक क्षमताएं विकसित करने में मदद करे।

सार्थक शिक्षा का संबंध केवल किताबों से नहीं है। इसमें भाषा की समझ, गणितीय क्षमता, तार्किक सोच, सामाजिक जागरूकता और जीवन में निर्णय लेने की योग्यता भी शामिल हैं।

अदालत की चिंता इसी व्यापक अर्थ में महत्वपूर्ण है। यदि कोई बच्चा विद्यालय में कई वर्ष बिताने के बावजूद सामान्य रूप से पढ़ने-लिखने में सक्षम नहीं हो पाता, तो शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो जाता है।

युवती के पिता की आर्थिक स्थिति ने भी खींचा अदालत का ध्यान

सुनवाई के दौरान युवती के पिता ने अपनी आर्थिक परिस्थितियों के बारे में बताया। उनके अनुसार, वह पूरी तरह निरक्षर हैं और मजदूरी करके मुश्किल से 10 से 12 हजार रुपये प्रतिमाह कमा पाते हैं।

उन्हें अपने चार बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता के भरण-पोषण की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती है।

यह स्थिति ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के सामने मौजूद चुनौतियों को समझने में मदद करती है।

जब परिवार की आमदनी सीमित हो और आश्रितों की संख्या अधिक हो, तो बच्चों की शिक्षा पर पर्याप्त ध्यान देना कठिन हो सकता है। कई बार माता-पिता स्वयं पढ़े-लिखे नहीं होते, इसलिए उन्हें शिक्षा के महत्व, सरकारी योजनाओं या बच्चों को आगे पढ़ाने के उपलब्ध अवसरों की पूरी जानकारी नहीं मिल पाती।

ऐसे परिवारों में बच्चों को विद्यालय में बनाए रखना केवल माता-पिता की इच्छा पर निर्भर नहीं रह सकता। इसके लिए विद्यालय, स्थानीय प्रशासन और संबंधित सरकारी विभागों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

बच्चों की नियमित उपस्थिति, सीखने में आने वाली कठिनाइयों की पहचान और पढ़ाई छोड़ने की आशंका वाले विद्यार्थियों की सहायता के लिए प्रभावी व्यवस्था आवश्यक है।

इस मामले में पिता की आर्थिक स्थिति ने यह भी दिखाया कि अशिक्षा और गरीबी कई बार एक-दूसरे को मजबूत करती हैं। अशिक्षित माता-पिता के लिए रोजगार के अवसर सीमित हो सकते हैं और कम आमदनी के कारण अगली पीढ़ी की शिक्षा भी प्रभावित हो सकती है।

इस चक्र को तोड़ने के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आर्थिक अवसरों का विस्तार आवश्यक है।

गरीबी और अशिक्षा के कारण अधिकारों की जानकारी नहीं मिल पाती

हाईकोर्ट ने भारतीय समाज की सामाजिक वास्तविकताओं पर विचार करते हुए कहा कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा गरीबी और अज्ञानता के कारण कानून तथा संविधान से प्राप्त अधिकारों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं रखता।

यह टिप्पणी न्याय तक पहुंच के प्रश्न को भी सामने लाती है।

कानून का उद्देश्य केवल अपराधों के लिए दंड निर्धारित करना नहीं है, बल्कि लोगों के अधिकारों की रक्षा करना और समाज में न्याय सुनिश्चित करना भी है।

लेकिन यदि किसी व्यक्ति को अपने अधिकारों, कानूनी प्रक्रियाओं और उपलब्ध सहायता के बारे में जानकारी ही नहीं है, तो उसके लिए न्याय व्यवस्था का लाभ उठाना कठिन हो सकता है।

आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के सामने कानूनी सहायता प्राप्त करने, न्यायालय तक पहुंचने और लंबी कार्यवाही का सामना करने जैसी चुनौतियां भी हो सकती हैं।

इसीलिए कानूनी जागरूकता, निःशुल्क विधिक सहायता और सरल न्यायिक प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण हैं।

हालांकि, गरीबी या अशिक्षा अपने आप में किसी अपराध से छूट का आधार नहीं बनती। प्रत्येक मामले में लागू कानून, संबंधित व्यक्तियों की उम्र, उपलब्ध साक्ष्य और अन्य परिस्थितियों का मूल्यांकन आवश्यक होता है।

अदालत की टिप्पणी का व्यापक आशय यह था कि न्यायिक प्रक्रिया में सामाजिक परिस्थितियों को समझना भी महत्वपूर्ण है, ताकि कानून का उद्देश्य पूरा हो और उसके अनुप्रयोग से अनावश्यक अन्याय की स्थिति पैदा न हो।

पॉक्सो कानून की समीक्षा पर विचार करने का सुझाव

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम यानी पॉक्सो एक्ट से जुड़ा है।

POCSO Act, 2012 का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करना और ऐसे अपराधों के मामलों में कानूनी प्रक्रिया निर्धारित करना है।

यह कानून बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों में विशेष सुरक्षा प्रदान करता है। इसके तहत विभिन्न प्रकार के यौन अपराधों और उनके लिए दंड का प्रावधान किया गया है।

इस मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने विधि आयोग को पॉक्सो कानून के उन प्रावधानों की समीक्षा करने पर विचार करने का सुझाव दिया, जो किशोरों और नाबालिगों के आपसी संबंधों से जुड़े मामलों में लागू होते हैं।

यह मुद्दा इसलिए संवेदनशील है, क्योंकि इसमें बच्चों की सुरक्षा, उनकी उम्र, सहमति की कानूनी स्थिति और वास्तविक सामाजिक परिस्थितियों के बीच संतुलन का प्रश्न सामने आता है।

पॉक्सो कानून के तहत अठारह वर्ष से कम आयु के व्यक्ति को बच्चा माना जाता है। कानून की व्यवस्था के अनुसार, नाबालिग की कथित सहमति सामान्यतः उसे कानून के संरक्षण से बाहर नहीं करती।

इसलिए किसी नाबालिग से संबंधित यौन संबंध के मामले में परिस्थितियों के आधार पर कानून के प्रावधान लागू हो सकते हैं।

दूसरी ओर, कुछ मामलों में यह प्रश्न भी उठता है कि क्या किशोरों के आपसी संबंधों और किसी वयस्क द्वारा बच्चे के शोषण के मामलों के बीच अंतर को सजा तय करते समय पर्याप्त रूप से समझा जा सकता है।

इसी संदर्भ में हाईकोर्ट ने कानून की समीक्षा पर विचार करने का सुझाव दिया।

यह स्पष्ट रहना चाहिए कि अदालत का विधि आयोग को सुझाव देना और कानून में संशोधन हो जाना दो अलग-अलग बातें हैं। कानून में बदलाव के लिए निर्धारित विधायी प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक होता है।

क्या विशेष न्यायाधीशों को सजा तय करने में अधिक विवेकाधिकार मिलना चाहिए?

अदालत ने यह सुझाव भी दिया कि असाधारण परिस्थितियों में विशेष न्यायाधीशों को सजा निर्धारित करते समय व्यापक विवेकाधिकार दिए जाने के प्रश्न पर विचार किया जाना चाहिए।

इसके साथ ही सामुदायिक सेवा जैसे वैकल्पिक दंडों और सामाजिक परिस्थितियों के आकलन की संभावना पर भी ध्यान देने की बात कही गई।

इस सुझाव का संबंध इस प्रश्न से है कि क्या सभी मामलों में एक समान कानूनी दृष्टिकोण पर्याप्त है या कुछ विशेष परिस्थितियों में अलग-अलग तथ्यों को ध्यान में रखकर दंड निर्धारित करने की गुंजाइश होनी चाहिए।

आपराधिक न्याय व्यवस्था में अपराध की प्रकृति, आरोपी की उम्र, उपलब्ध साक्ष्य और लागू कानून जैसे तत्व महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन कुछ मामलों में सामाजिक पृष्ठभूमि और संबंधित व्यक्तियों की परिस्थितियां भी न्यायिक विचार का विषय बन सकती हैं, जहां कानून इसकी अनुमति देता है।

हालांकि, पॉक्सो कानून बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए बनाया गया एक महत्वपूर्ण संरक्षणात्मक कानून है। किसी भी संभावित बदलाव पर विचार करते समय बच्चों की सुरक्षा और उनके अधिकारों को कमजोर न होने देना आवश्यक होगा।

साथ ही, यदि किशोरों के आपसी संबंधों से जुड़े मामलों के लिए अलग व्यवस्था पर विचार किया जाता है, तो उसकी सीमाएं स्पष्ट होनी चाहिए, ताकि उसका दुरुपयोग बच्चों के शोषण को उचित ठहराने के लिए न किया जा सके।

इसलिए विधि आयोग के स्तर पर ऐसी समीक्षा का उद्देश्य कानून की सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर करना नहीं, बल्कि न्यायसंगत और प्रभावी अनुप्रयोग के प्रश्नों का परीक्षण करना होना चाहिए।

क्या गरीबी और अशिक्षा के कारण कानून से छूट मिल सकती है?

इस मामले में उठे सवालों के बीच यह समझना भी जरूरी है कि गरीबी और अशिक्षा का उल्लेख अपने आप किसी व्यक्ति को आपराधिक दायित्व से मुक्त नहीं करता।

भारत में कानून का पालन सभी के लिए आवश्यक है। किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति या शिक्षा का स्तर उसे स्वतः कानूनी दायित्वों से छूट नहीं देता।

लेकिन न्यायिक प्रक्रिया में प्रत्येक मामले के तथ्यों और लागू कानून के अनुसार विचार किया जाता है। कुछ परिस्थितियों में आरोपी की उम्र, मानसिक स्थिति, भूमिका और अन्य प्रासंगिक तथ्यों का महत्व हो सकता है, बशर्ते कानून इसकी अनुमति देता हो।

इसी प्रकार, बच्चों से संबंधित मामलों में उनकी सुरक्षा, कल्याण और अधिकारों को विशेष महत्व दिया जाता है।

पॉक्सो कानून का मूल उद्देश्य नाबालिगों को यौन शोषण से बचाना है। इसलिए इस कानून में किसी भी बदलाव पर विचार करते समय यह सुनिश्चित करना आवश्यक होगा कि बच्चों को मिलने वाला संरक्षण कमजोर न हो।

हाईकोर्ट की टिप्पणियों को इसी व्यापक संदर्भ में समझना चाहिए। अदालत ने सामाजिक परिस्थितियों और कानून के व्यावहारिक प्रभावों पर विचार करने की आवश्यकता सामने रखी है।

शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए क्या जरूरी है?

इस मामले ने शिक्षा की गुणवत्ता और बच्चों के भविष्य को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े किए हैं।

पहला, विद्यालयों में बच्चों की उपस्थिति के साथ उनके वास्तविक सीखने के स्तर का नियमित मूल्यांकन होना चाहिए।

दूसरा, जो बच्चे पढ़ने-लिखने में पीछे रह जाते हैं, उन्हें समय पर अतिरिक्त सहायता मिलनी चाहिए।

तीसरा, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को शिक्षा जारी रखने में सहायता देने के लिए उपलब्ध सरकारी योजनाओं और सुविधाओं का प्रभावी उपयोग किया जाना चाहिए।

चौथा, लड़कियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, ताकि वे सामाजिक या आर्थिक कारणों से बीच में पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर न हों।

पांचवां, माता-पिता को बच्चों की शिक्षा, बाल अधिकारों और सरकारी सहायता से संबंधित योजनाओं की जानकारी उपलब्ध कराना जरूरी है।

छठा, बच्चों को सामान्य साक्षरता के साथ जीवनोपयोगी और व्यावसायिक कौशल हासिल करने के अवसर भी दिए जाने चाहिए।

यदि शिक्षा व्यवस्था बच्चों को केवल अगली कक्षा में पहुंचाने के बजाय उन्हें वास्तविक ज्ञान और आत्मनिर्भरता के लिए तैयार करने पर ध्यान देती है, तो उसका प्रभाव लंबे समय तक दिखाई दे सकता है।

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सामने आया यह मामला शिक्षा व्यवस्था, गरीबी, सामाजिक जागरूकता और आपराधिक कानून के व्यावहारिक प्रभावों से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल उठाता है।

पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई करने के बावजूद हिंदी का अखबार पढ़ने और अपने नाम के अलावा कुछ लिखने में असमर्थ युवती की स्थिति ने अदालत को बुनियादी शिक्षा की गुणवत्ता पर चिंता व्यक्त करने के लिए प्रेरित किया।

युवती के पिता की आर्थिक कठिनाइयों और परिवार की जिम्मेदारियों ने भी यह दिखाया कि गरीबी तथा अशिक्षा किस प्रकार बच्चों के अवसरों को प्रभावित कर सकती हैं।

इसी पृष्ठभूमि में अदालत ने राज्य सरकार की शिक्षा संबंधी जिम्मेदारियों पर सवाल उठाए और विधि आयोग को पॉक्सो कानून के कुछ प्रावधानों की समीक्षा करने पर विचार करने का सुझाव दिया। विशेष न्यायाधीशों के विवेकाधिकार और सामुदायिक सेवा जैसे वैकल्पिक दंडों पर विचार का प्रश्न भी सामने आया।

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि बच्चों को केवल विद्यालय में प्रवेश दिलाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें ऐसी शिक्षा मिलनी चाहिए, जो उन्हें पढ़ने-लिखने, अपने अधिकार समझने और आत्मनिर्भर जीवन जीने योग्य बनाए। साथ ही, बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का प्रभावी संरक्षण बनाए रखते हुए यह भी देखना आवश्यक है कि न्यायिक प्रक्रिया में संबंधित मामले की वास्तविक परिस्थितियों पर कानून के दायरे में उचित विचार हो।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।