IndianLawNotes.com

वोटर लिस्ट के फॉर्म-6 पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ की स्थिति, कहा- न मंजूरी दी, न खारिज किया; 27 अक्टूबर को होगी सुनवाई

वोटर लिस्ट के फॉर्म-6 पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ की स्थिति, कहा- न मंजूरी दी, न खारिज किया; 27 अक्टूबर को होगी सुनवाई

चुनाव आयोग के नए फॉर्म-6 के साथ जुड़े अतिरिक्त घोषणापत्र पर विवाद, CJI सूर्यकांत की पीठ ने कहा- पिछली टिप्पणियों का गलत अर्थ न निकाला जाए; बिहार SIR मामले से भी जुड़ा है मुद्दा

नई दिल्ली। मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट की है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा है कि अदालत ने चुनाव आयोग के नए फॉर्म-6 को न तो मंजूरी दी है और न ही उसे खारिज किया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी पिछली टिप्पणियों को इस तरह प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए, जिससे यह लगे कि न्यायालय ने नए फॉर्म या उससे जुड़े अतिरिक्त घोषणापत्र को वैध ठहरा दिया है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि चुनाव आयोग की तरफ से यह कहा जा रहा है कि नए फॉर्म-6 को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिल चुकी है। इस पर पीठ ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (Special Intensive Revision) से जुड़े मामले की सुनवाई के समय नया फॉर्म-6 अस्तित्व में ही नहीं आया था।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत की पिछली टिप्पणियों का गलत अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए। पीठ ने यह भी कहा कि इस मुद्दे को उसके संज्ञान में लाया गया है और 27 अक्टूबर को मुख्य याचिकाओं के साथ इस पर विचार किया जाएगा।

इस घटनाक्रम के बाद फॉर्म-6 के साथ जोड़े गए अतिरिक्त घोषणापत्र और उसकी वैधानिकता को लेकर चल रही बहस एक बार फिर महत्वपूर्ण हो गई है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने घोषणापत्र को अवैध घोषित कर दिया है। फिलहाल अदालत ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है और संबंधित सवालों पर आगे सुनवाई होना बाकी है।

### आखिर क्या है फॉर्म-6 और इसका इस्तेमाल क्यों होता है?

फॉर्म-6 भारत में मतदाता सूची में पहली बार नाम दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण आवेदन है। इसका संबंध उन भारतीय नागरिकों से है, जो निर्धारित कानूनी शर्तें पूरी करते हैं और मतदाता के रूप में अपना पंजीकरण कराना चाहते हैं।

चुनाव में मतदान करने के लिए केवल भारतीय नागरिक होना पर्याप्त नहीं है। संबंधित व्यक्ति को कानून के अनुसार निर्धारित पात्रता की शर्तें पूरी करनी होती हैं और उसका नाम उस निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज होना चाहिए, जहां वह सामान्य रूप से निवास करता है।

फॉर्म-6 इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। इसके माध्यम से पात्र नागरिक मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं। यह आवेदन चुनाव आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ऑनलाइन या अन्य उपलब्ध माध्यमों से किया जा सकता है।

फॉर्म-6 का इस्तेमाल विशेष रूप से उन युवाओं के लिए महत्वपूर्ण है, जो पहली बार मतदाता बनने जा रहे हैं। इसके अलावा, ऐसे पात्र नागरिक भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं, जिनका नाम अभी तक मतदाता सूची में दर्ज नहीं है।

इस फॉर्म की प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि योग्य नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल होने का अवसर मिले। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी यह भी है कि मतदाता सूची सही, अद्यतन और विश्वसनीय बनी रहे।

इसी वजह से मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया में पहचान, निवास और पात्रता से संबंधित विवरण महत्वपूर्ण होते हैं। विवाद तब पैदा होता है, जब आवेदन प्रक्रिया में ऐसे अतिरिक्त दस्तावेज या घोषणाएं मांगी जाती हैं, जिनकी आवश्यकता और वैधानिक आधार पर सवाल उठने लगते हैं।

वर्तमान विवाद पूरे फॉर्म-6 के अस्तित्व को लेकर नहीं, बल्कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया में इसके साथ जोड़े गए अतिरिक्त घोषणापत्र को लेकर है।

### चुनाव आयोग के नए फॉर्म-6 पर विवाद कैसे शुरू हुआ?

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान चुनाव आयोग ने ऑनलाइन पोर्टल पर फॉर्म-6 के साथ एक अतिरिक्त घोषणापत्र जोड़ा। इस घोषणापत्र में नए आवेदकों से उनकी और उनके परिवार के पुराने मतदाता रिकॉर्ड से संबंधित अतिरिक्त जानकारी मांगी जा रही थी।

विवाद का मुख्य कारण यह है कि इन अतिरिक्त सवालों को लेकर कुछ राजनीतिक नेताओं और याचिकाकर्ताओं ने आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अतिरिक्त इस प्रकार की घोषणाएं मांगने से पात्र नागरिकों के सामने अनावश्यक कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं।

इस मामले में एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। फॉर्म-6 स्वयं मतदाता पंजीकरण की वैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है। लेकिन उसके साथ जोड़े गए अतिरिक्त घोषणापत्र की वैधता और आवश्यकता का प्रश्न अलग है।

यदि किसी आवेदन के साथ अतिरिक्त जानकारी मांगी जाती है, तो यह देखना जरूरी होता है कि उसके लिए कानूनी आधार क्या है, क्या वह संबंधित नियमों के अनुरूप है और क्या उसकी मांग सभी पात्र आवेदकों के लिए उचित है।

याचिकाकर्ताओं की आपत्ति इसी प्रकार के सवालों से जुड़ी है। वे यह जानना चाहते हैं कि क्या चुनाव आयोग SIR के दौरान फॉर्म-6 के साथ अतिरिक्त घोषणापत्र जोड़कर आवेदन प्रक्रिया में ऐसी शर्तें लागू कर सकता है, जिनका प्रभाव नागरिकों के मतदाता पंजीकरण पर पड़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन सवालों पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। अदालत ने इतना स्पष्ट किया है कि उसके पिछले आदेश या टिप्पणियों को नए फॉर्म-6 की मंजूरी के रूप में पेश करना सही नहीं है।

### अतिरिक्त घोषणापत्र में पूछे जा रहे थे कौन-से सवाल?

विवाद के केंद्र में वह अतिरिक्त घोषणापत्र है, जिसे SIR प्रक्रिया के दौरान फॉर्म-6 के साथ जोड़ा गया था। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इसमें नए आवेदकों से पुराने मतदाता रिकॉर्ड और उनके परिवार के सदस्यों से संबंधित तीन तरह की जानकारियां मांगी जा रही थीं।

इन सवालों का संबंध मुख्य रूप से निम्नलिखित विषयों से था।

पहला सवाल: क्या आवेदक का नाम 2000 के दशक की किसी पुरानी मतदाता सूची में दर्ज था?

इस सवाल के माध्यम से यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा था कि क्या आवेदक का अपना नाम पहले की मतदाता सूची में मौजूद रहा है। इससे पुराने मतदाता रिकॉर्ड और वर्तमान आवेदन के बीच संबंध स्थापित करने का प्रयास दिखाई देता है।

दूसरा सवाल: यदि आवेदक का नाम पुरानी मतदाता सूची में नहीं था, तो क्या उसके माता-पिता या दादा-दादी अथवा नाना-नानी का नाम वर्ष 2003 की मतदाता सूची में दर्ज था?

इस सवाल के तहत आवेदक से उसके परिवार की पुरानी मतदाता सूची में मौजूदगी के बारे में जानकारी मांगी जा रही थी। इसका संबंध पारिवारिक रिकॉर्ड के आधार पर पुराने मतदाता विवरण का पता लगाने से था।

तीसरा सवाल: यदि माता-पिता या दादा-दादी अथवा नाना-नानी का नाम पिछली मतदाता सूची में दर्ज नहीं था, तो उसका कारण क्या था?

इस सवाल के माध्यम से आवेदक से परिवार के पुराने मतदाता रिकॉर्ड में नाम नहीं होने की वजह बताने की अपेक्षा की जा रही थी।

इन सवालों को लेकर विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि पुराने रिकॉर्ड का उपलब्ध होना और वर्तमान समय में किसी नागरिक का मतदाता बनने के लिए पात्र होना दो अलग-अलग विषय हैं। किसी व्यक्ति या उसके परिवार का नाम पुरानी मतदाता सूची में न मिलना अपने आप में वर्तमान पात्रता का अंतिम निर्धारण नहीं करता। पात्रता का फैसला लागू कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही होना चाहिए।

हालांकि, इन सवालों के आधार पर घोषणापत्र को अवैध मान लेना भी उचित नहीं होगा। इसकी वैधानिकता, उद्देश्य और प्रभाव का आकलन संबंधित नियमों तथा अदालत के समक्ष प्रस्तुत दलीलों के आधार पर किया जाना बाकी है।

### याचिकाकर्ताओं का आरोप- मनमाने बदलाव से बढ़ सकती है परेशानी

कुछ राजनीतिक नेताओं और याचिकाकर्ताओं ने फॉर्म-6 के साथ जोड़े गए अतिरिक्त घोषणापत्र पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि चुनाव आयोग ने आवेदन प्रक्रिया में मनमाने बदलाव किए हैं और इन बदलावों की वैधानिकता की जांच की जानी चाहिए।

आपत्तियों का एक प्रमुख पहलू यह है कि पुराने मतदाता रिकॉर्ड के आधार पर अतिरिक्त जानकारी मांगने से ऐसे आवेदकों को परेशानी हो सकती है, जिनके पास अपने परिवार के पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।

उदाहरण के लिए, किसी युवा नागरिक का जन्म ऐसे परिवार में हुआ हो, जिसने कई दशक पहले निवास स्थान बदल लिया हो, तो उसके माता-पिता या दादा-दादी के पुराने मतदाता रिकॉर्ड ढूंढना आसान नहीं हो सकता। ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों में पलायन, पुराने दस्तावेजों का नष्ट हो जाना, नामों की वर्तनी में अंतर और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव जैसी परिस्थितियां भी रिकॉर्ड खोजने में कठिनाई पैदा कर सकती हैं।

इसी तरह, यदि किसी परिवार के सदस्यों के नाम पुराने रिकॉर्ड में किसी अलग वर्तनी या अलग पते से दर्ज रहे हों, तो उनकी पहचान और रिकॉर्ड का मिलान करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

याचिकाकर्ताओं की चिंता यह है कि अतिरिक्त घोषणापत्र के कारण पात्र नागरिकों को आवेदन करने में अनावश्यक बाधाओं का सामना न करना पड़े। उनका कहना है कि मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया कानून के अनुरूप और सभी योग्य नागरिकों के लिए सुलभ होनी चाहिए।

दूसरी ओर, मतदाता सूची को शुद्ध और विश्वसनीय बनाए रखना भी चुनाव आयोग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इसलिए विवाद का समाधान करते समय दोनों पहलुओं पर विचार करना होगा।

यह निर्धारित करना अदालत का काम होगा कि अतिरिक्त घोषणापत्र किस कानूनी आधार पर जोड़ा गया, उससे आवेदकों पर क्या प्रभाव पड़ता है और क्या उसकी शर्तें लागू कानून के अनुरूप हैं।

### बिहार SIR मामले का इस विवाद से क्या संबंध है?

इस विवाद को समझने के लिए बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े मामले का संदर्भ भी महत्वपूर्ण है।

SIR का उद्देश्य मतदाता सूची की व्यापक समीक्षा करना और उसमें आवश्यक सुधार करना है। ऐसी प्रक्रिया के तहत मतदाता रिकॉर्ड की जांच, नए पात्र मतदाताओं को शामिल करने और सूची में मौजूद त्रुटियों को दूर करने जैसे विषय सामने आते हैं।

बिहार में SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मतदाता सूची, नागरिकों की पात्रता और चुनाव आयोग की प्रक्रिया से जुड़े कई मुद्दे उठे थे। वर्तमान विवाद में याचिकाकर्ता की ओर से यह सवाल उठाया गया कि चुनाव आयोग नए फॉर्म-6 को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी प्राप्त बताने की बात कर रहा है।

इस पर न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने स्पष्ट किया कि जब बिहार SIR मामले की सुनवाई हुई थी, तब नया फॉर्म-6 आया ही नहीं था।

इस टिप्पणी का सीधा महत्व यह है कि बिहार SIR मामले में अदालत की पिछली कार्यवाही को नए फॉर्म-6 या उसके साथ जुड़े अतिरिक्त घोषणापत्र की न्यायिक मंजूरी के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।

किसी मामले में अदालत द्वारा किसी प्रक्रिया के एक पहलू पर विचार करना अपने आप में किसी दूसरे, बाद में सामने आए प्रावधान को मंजूरी देने के बराबर नहीं होता। दोनों के बीच अंतर करना आवश्यक है।

इसी कारण CJI सूर्यकांत ने भी पिछली टिप्पणियों का गलत अर्थ न निकालने पर जोर दिया। अदालत ने इस विवाद को अपने संज्ञान में लेते हुए कहा कि संबंधित प्रश्नों पर मुख्य याचिकाओं के साथ विचार किया जाएगा।

### सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा और क्या नहीं कहा?

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात अदालत की स्थिति है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उसने चुनाव आयोग के नए फॉर्म-6 को न मंजूरी दी है और न खारिज किया है।

इसका मतलब है कि अदालत ने फिलहाल नए फॉर्म और उसके अतिरिक्त घोषणापत्र की वैधानिकता पर अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह जरूर स्पष्ट किया कि उसकी पिछली टिप्पणियों को गलत तरीके से पेश नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन यह कहना कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 को अवैध घोषित कर दिया है, उपलब्ध जानकारी के आधार पर सही नहीं होगा।

इसी प्रकार, यह दावा करना भी उचित नहीं होगा कि अदालत ने नए फॉर्म-6 को पूरी तरह मंजूरी दे दी है।

कानूनी मामलों में किसी टिप्पणी, अंतरिम निर्देश और अंतिम निर्णय के बीच अंतर होता है। किसी न्यायाधीश द्वारा सुनवाई के दौरान कही गई बात मामले के संदर्भ को स्पष्ट कर सकती है, लेकिन उससे हमेशा अंतिम कानूनी निष्कर्ष नहीं निकलता।

इस मामले में अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 27 अक्टूबर की तारीख निर्धारित की है। उस दिन मुख्य याचिकाओं के साथ इस मुद्दे पर विचार किया जाएगा। इसके बाद अदालत जो निर्देश देगी, उससे विवाद की कानूनी स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है।

### मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से संबंधित याचिका भी जुड़ी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से संबंधित एक अन्य याचिका को भी इस विषय पर दाखिल प्रमुख याचिकाओं के साथ जोड़ दिया।

इससे संबंधित मामलों पर एक साथ विचार किए जाने का रास्ता बना है। जब एक ही व्यापक विवाद से जुड़े कई सवाल अलग-अलग याचिकाओं में उठाए जाते हैं, तो अदालत उन्हें एक साथ सुनने का निर्णय कर सकती है, ताकि कानूनी मुद्दों पर समग्र रूप से विचार किया जा सके।

हालांकि, किसी याचिका को दूसरी याचिकाओं के साथ जोड़ने का अर्थ यह नहीं है कि उसमें लगाए गए आरोपों को अदालत ने स्वीकार कर लिया है। इसका उद्देश्य संबंधित मामलों की सुनवाई को व्यवस्थित करना और समान या जुड़े हुए कानूनी प्रश्नों पर विचार करना हो सकता है।

इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त से संबंधित याचिका को जोड़ने के निर्णय को भी उसके सीमित प्रक्रियात्मक संदर्भ में समझना चाहिए।

### मतदाताओं के लिए इस विवाद का क्या महत्व है?

फॉर्म-6 और अतिरिक्त घोषणापत्र को लेकर चल रहा विवाद सीधे तौर पर मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया से जुड़ा है। इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि मतदाता सूची में नाम दर्ज होना चुनाव में मतदान करने के लिए आवश्यक है।

योग्य नागरिकों का नाम मतदाता सूची में शामिल होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके साथ ही यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि मतदाता सूची में दर्ज विवरण सही हों और कानून के अनुसार पात्रता की शर्तें पूरी की जाती हों।

यदि आवेदन प्रक्रिया में अतिरिक्त जानकारी मांगी जाती है, तो उसके उद्देश्य और कानूनी आधार स्पष्ट होने चाहिए। नागरिकों को यह पता होना चाहिए कि उन्हें कौन-से दस्तावेज देने हैं, कौन-सी जानकारी अनिवार्य है और आवेदन में किसी कमी की स्थिति में उसे कैसे पूरा किया जा सकता है।

इस मामले में अदालत का अंतिम निर्णय इन सवालों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि, जब तक कोई नया आदेश जारी नहीं होता, तब तक केवल सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि फॉर्म-6 की पूरी प्रक्रिया बदल गई है या मौजूदा आवेदन व्यवस्था समाप्त हो गई है।

मतदाता बनने के इच्छुक नागरिकों को चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट और संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी से उपलब्ध नवीनतम निर्देशों के आधार पर ही आवेदन करना चाहिए।

### 27 अक्टूबर को होगी अगली सुनवाई, फैसले पर रहेगी नजर

सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 के साथ जुड़े अतिरिक्त घोषणापत्र के विवाद को 27 अक्टूबर को मुख्य याचिकाओं के साथ सुनने की बात कही है। ऐसे में अगली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी।

अदालत के सामने यह प्रश्न रहेगा कि चुनाव आयोग द्वारा अतिरिक्त घोषणापत्र जोड़े जाने का कानूनी आधार क्या है और क्या इस प्रक्रिया में निर्धारित नियमों का पालन किया गया है। इसके साथ यह भी विचारणीय होगा कि अतिरिक्त सवालों का मतदाता पंजीकरण पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।

अदालत के समक्ष चुनाव आयोग और याचिकाकर्ताओं की दलीलों के आधार पर ही आगे की कानूनी स्थिति स्पष्ट होगी।

निष्कर्षतः, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल केवल यह स्पष्ट किया है कि उसने नए फॉर्म-6 को न मंजूरी दी है और न खारिज किया है। विवाद मुख्य रूप से SIR के दौरान फॉर्म-6 के साथ जोड़े गए अतिरिक्त घोषणापत्र को लेकर है। अब 27 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई पर नजर रहेगी, जिसमें अदालत इस मुद्दे पर मुख्य याचिकाओं के साथ विचार करेगी।

मतदाता सूची को शुद्ध बनाए रखना और हर पात्र नागरिक को पंजीकरण का उचित अवसर देना, दोनों लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। इस मामले में अंतिम न्यायिक निर्णय यह स्पष्ट करने में अहम भूमिका निभा सकता है कि इन दोनों उद्देश्यों के बीच कानूनी संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाना चाहिए।

✓
संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।