दिल्ली-NCR में पटाखों पर प्रतिबंध को लेकर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, CJI सूर्यकांत बोले- धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाएंगे, निकालेंगे संतुलित रास्ता
दिवाली पर पटाखे जलाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, अदालत ने कहा- पूर्ण प्रतिबंध के बजाय व्यावहारिक समाधान पर विचार जरूरी; 15 अक्टूबर को फिर होगी सुनवाई
नई दिल्ली। दिवाली नजदीक आते ही दिल्ली-NCR में पटाखों के इस्तेमाल और बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहती, लेकिन इस विषय पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। अदालत के सामने सवाल केवल पटाखों पर प्रतिबंध लगाने या हटाने का नहीं है, बल्कि ऐसा व्यावहारिक रास्ता तलाशने का है, जिससे त्योहार की खुशियां भी बनी रहें और लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को भी कम किया जा सके।
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि यदि अदालत पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी कर देती है, तो लोग दिन में ही पटाखे जलाना शुरू कर सकते हैं। उनकी इस टिप्पणी से यह संकेत मिला कि किसी भी आदेश को लागू करने से पहले उसके व्यावहारिक परिणामों पर विचार करना आवश्यक है। केवल प्रतिबंध लगा देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह भी देखना होगा कि उसका पालन किस तरह सुनिश्चित किया जा सकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि लोगों से अपील करने और पटाखे चलाने के समय को कुछ निर्धारित घंटों तक सीमित रखने के लिए अभी पर्याप्त समय है। इस टिप्पणी के साथ न्यायालय ने जागरूकता, नागरिक जिम्मेदारी और संतुलित व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई 15 अक्टूबर को होगी। ऐसे में दिवाली से पहले दिल्ली-NCR में पटाखों के इस्तेमाल को लेकर क्या व्यवस्था लागू होती है, इस पर लोगों की नजरें टिकी हुई हैं।
### पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से क्या समस्या होगी?
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि यदि पटाखों पर प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी कर दिया जाता है, तो संभव है कि लोग दिन में ही पटाखे जलाने लगें। इस टिप्पणी का मुख्य आशय यह था कि किसी नियम को बनाते समय उसके वास्तविक प्रभाव और लोगों के व्यवहार को भी ध्यान में रखना होगा।
दिल्ली-NCR में वायु प्रदूषण पहले से ही गंभीर चिंता का विषय रहा है। दिवाली के आसपास पटाखों के इस्तेमाल से प्रदूषण बढ़ने की आशंका रहती है। ऐसे में प्रशासन और अदालत के सामने पर्यावरण की सुरक्षा तथा लोगों की धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती है।
हालांकि, दिन में पटाखे जलाने संबंधी टिप्पणी को अदालत के अंतिम निर्णय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह सुनवाई के दौरान व्यक्त किया गया एक विचार था। प्रतिबंध, समय-सीमा या अन्य शर्तों के संबंध में अंतिम व्यवस्था अदालत के आदेश से ही स्पष्ट होगी।
व्यावहारिक समस्या यह भी है कि किसी प्रतिबंध को प्रभावी बनाने के लिए केवल कानूनी आदेश पर्याप्त नहीं होता। उसके पालन की निगरानी, उल्लंघन पर कार्रवाई और लोगों को नियमों की जानकारी देना भी जरूरी है। यदि नागरिक नियमों का पालन नहीं करते, तो प्रदूषण कम करने के उद्देश्य से बनाई गई व्यवस्था अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाती।
इसी कारण अदालत ने लोगों को जागरूक करने और निर्धारित समय के भीतर पटाखे चलाने जैसे विकल्पों पर विचार करने की बात कही। इससे यह स्पष्ट होता है कि मामले में केवल प्रतिबंध के प्रश्न पर नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
### CJI सूर्यकांत बोले- धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते
सुनवाई के दौरान धार्मिक आस्था और पटाखों के इस्तेमाल के बीच संबंध को लेकर भी चर्चा हुई। एक वकील ने दलील दी कि पटाखे चलाना धर्म के मौलिक अधिकार का हिस्सा नहीं है। उनका तर्क था कि पूजा-अर्चना धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन पटाखे जलाने को उसी श्रेणी में रखना आवश्यक नहीं है।
इस दलील के दौरान यह टिप्पणी भी की गई कि भगवान भी यह देखकर हैरान होंगे। इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि अदालत धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहती, लेकिन यह जरूर देखेगी कि आगे बढ़ने का संतुलित तरीका क्या हो सकता है।
इस टिप्पणी का महत्व इसलिए है, क्योंकि दिवाली पर पटाखे चलाने का विषय केवल पर्यावरण या प्रदूषण तक सीमित नहीं रहता। इससे धार्मिक परंपराओं, व्यक्तिगत पसंद, सार्वजनिक स्वास्थ्य और नागरिक जिम्मेदारियों से जुड़े कई सवाल भी सामने आते हैं।
एक पक्ष का मानना है कि त्योहार मनाने की स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए। वहीं, दूसरा पक्ष यह सवाल उठाता है कि किसी परंपरा के पालन से यदि दूसरे लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो उस पर उचित नियंत्रण क्यों नहीं होना चाहिए।
अदालत के सामने चुनौती इन दोनों दृष्टिकोणों को समझते हुए ऐसा समाधान तलाशने की है, जो कानून के दायरे में हो और जिसका पालन भी कराया जा सके।
धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़े सभी नियम अप्रासंगिक हो जाते हैं। इसी तरह प्रदूषण रोकने के उद्देश्य से उठाए जाने वाले कदमों में भी उचित प्रक्रिया और संवैधानिक अधिकारों का ध्यान रखना आवश्यक है।
### जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने पूछा- पटाखों का धर्म से क्या लेना-देना?
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने पटाखों के इस्तेमाल और धर्म के संबंध पर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि पटाखों का धर्म से क्या लेना-देना है?
अदालत की सहायता कर रहीं एमिकस क्यूरी अपराजिता सिंह ने कहा कि इस मामले में हर बार इसी तरह की दलीलें सामने आती हैं। उन्होंने बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि यदि भगवान को यह पता चले कि उनके नाम पर बच्चे तकलीफ झेल रहे हैं और बीमार पड़ रहे हैं, तो वे भी हैरान होंगे।
यह बहस इस बात को सामने लाती है कि त्योहारों की परंपराओं और उनसे जुड़े व्यवहारों को अलग-अलग नजरिए से देखने की जरूरत है। पूजा, धार्मिक अनुष्ठान और पारिवारिक उत्सव जहां आस्था का हिस्सा हो सकते हैं, वहीं पटाखों का इस्तेमाल किस सीमा तक धार्मिक परंपरा से जुड़ा है, यह अपने आप में विचार का विषय है।
दिवाली पर दीप जलाना, घरों को सजाना, पूजा करना और परिवार के साथ उत्सव मनाना व्यापक रूप से प्रचलित परंपराएं हैं। पटाखे चलाने की परंपरा भी कई लोगों के लिए त्योहार की खुशी से जुड़ी हुई है। लेकिन किसी प्रथा का प्रचलित होना और उसका धर्म के लिए अनिवार्य होना दो अलग-अलग बातें हैं।
इसी अंतर को लेकर अदालत में चर्चा हुई। हालांकि, सुनवाई के दौरान किसी पक्ष की टिप्पणी को अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। मामले में अंतिम निर्णय सभी संबंधित पहलुओं पर विचार करने के बाद ही सामने आएगा।
### एमिकस क्यूरी ने कहा- हर साल वही बहस दोहराई जाती है
अदालत की सहायता कर रहीं एमिकस क्यूरी अपराजिता सिंह ने कहा कि आदर्श स्थिति यही होगी कि लोग स्वयं विचार करें और पटाखों के इस्तेमाल से होने वाले नुकसान को समझें। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि दुर्भाग्य से हर साल वही दलीलें और वही घटनाक्रम दोहराए जाते हैं।
यह टिप्पणी प्रदूषण नियंत्रण के प्रयासों के सामने आने वाली एक बड़ी चुनौती की ओर इशारा करती है। हर साल त्योहारों से पहले पटाखों के इस्तेमाल को लेकर चर्चा होती है। प्रतिबंध, सीमित समय, पर्यावरण के अनुकूल विकल्प और जागरूकता जैसे उपायों पर विचार किया जाता है। इसके बावजूद नियमों के पालन और उनके प्रभाव को लेकर सवाल उठते रहते हैं।
यदि लोगों को पटाखों के धुएं से होने वाले नुकसान के बारे में जानकारी हो, फिर भी नियमों का पालन नहीं किया जाता, तो केवल जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं रह जाता। दूसरी ओर, यदि नियम बनाए जाएं लेकिन उनके पालन की प्रभावी व्यवस्था न हो, तो उनका उद्देश्य भी पूरा नहीं हो पाता।
इसलिए प्रदूषण नियंत्रण के लिए सरकार, प्रशासन, नागरिकों और सामाजिक संगठनों सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है। पटाखों के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट नियम, उनकी जानकारी और उल्लंघन की स्थिति में उचित कार्रवाई आवश्यक है।
अदालत ने भी नागरिकों और सिविल सोसायटी से मौजूदा परिस्थितियों के प्रति जागरूक रहने तथा अपनी जिम्मेदारी समझने की अपेक्षा जताई।
### क्या पटाखे जलाना धार्मिक मौलिक अधिकार है?
सुप्रीम कोर्ट में हुई बहस के दौरान यह प्रश्न महत्वपूर्ण रहा कि क्या पटाखे चलाना धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के अंतर्गत आता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। हालांकि, यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन है।
इसका अर्थ है कि धार्मिक स्वतंत्रता महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इसके प्रयोग को लेकर कानून में निर्धारित सीमाएं भी लागू हो सकती हैं। किसी गतिविधि का धार्मिक परंपरा से जुड़ा होना अपने आप में उसे हर प्रकार के नियमन से मुक्त नहीं कर देता।
पटाखों के मामले में भी अदालत को यह देखना होगा कि धार्मिक आस्था, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े हितों के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित किया जाए।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। अदालत में किसी वकील द्वारा दिया गया तर्क, न्यायाधीश द्वारा पूछा गया सवाल और अदालत का अंतिम आदेश तीन अलग-अलग बातें हैं। पटाखे चलाना धार्मिक मौलिक अधिकार है या नहीं, इस संबंध में सुनवाई के दौरान सामने आए विचारों को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।
मामले में अंतिम आदेश आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि दिल्ली-NCR में पटाखों के इस्तेमाल पर कौन-सी शर्तें लागू होंगी और उनका कानूनी आधार क्या होगा।
### पिछले साल भी सुप्रीम कोर्ट में उठा था पटाखों का मुद्दा
दिल्ली-NCR में पटाखों पर प्रतिबंध और उनके सीमित इस्तेमाल का विषय नया नहीं है। पिछले वर्षों में भी सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर सुनवाई होती रही है। हर बार पर्यावरण संरक्षण, लोगों के स्वास्थ्य, धार्मिक भावनाओं और प्रतिबंध लागू करने की व्यावहारिक कठिनाइयों पर चर्चा हुई है।
पिछले साल की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी थी कि लोगों को दो दिन जश्न मनाने की अनुमति दी जानी चाहिए। उन्होंने दिवाली, गुरुपर्व और क्रिसमस जैसे त्योहारों का उल्लेख करते हुए अपनी बात रखी थी।
इस दौरान अदालत ने पूर्ण प्रतिबंध को लेकर व्यावहारिक कठिनाइयों पर भी विचार किया था। चर्चा का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि प्रतिबंध लागू किए जाने के बाद प्रदूषण के स्तर में कितना बदलाव आया है और क्या इससे वायु गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार हुआ है।
सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठा था कि वर्ष 2018 में प्रतिबंधों से संबंधित व्यवस्था लागू होने के बाद वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई में सुधार हुआ है या स्थिति खराब हुई है।
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, कोविड लॉकडाउन की अवधि को छोड़कर प्रदूषण का स्तर लगभग समान रहा था। इस तरह की जानकारी प्रदूषण नियंत्रण के उपायों की प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए महत्वपूर्ण है।
हालांकि, प्रदूषण के स्तर को केवल पटाखों के इस्तेमाल से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। दिल्ली-NCR में वाहन उत्सर्जन, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल, औद्योगिक गतिविधियां, मौसम की परिस्थितियां और आसपास के क्षेत्रों में पराली जलाने जैसे कई कारक वायु गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए किसी एक उपाय की सफलता या विफलता का निष्कर्ष निकालने के लिए व्यापक आंकड़ों और वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता होती है।
### दिल्ली-NCR में वायु प्रदूषण की समस्या कितनी गंभीर है?
दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। सर्दियों के दौरान मौसम संबंधी परिस्थितियां प्रदूषकों के फैलाव को प्रभावित करती हैं, जिसके कारण कई बार हवा की गुणवत्ता खराब हो जाती है।
पटाखों से निकलने वाले धुएं में सूक्ष्म कण और अन्य प्रदूषक शामिल हो सकते हैं। इनके संपर्क में आने से विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस संबंधी परेशानी से जूझ रहे लोगों को दिक्कत हो सकती है। आंखों में जलन, खांसी और सांस लेने में परेशानी जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं।
वायु प्रदूषण का प्रभाव केवल दिवाली की रात तक सीमित नहीं रहता। पटाखों से उत्पन्न प्रदूषक स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार हवा में कुछ समय तक बने रह सकते हैं। मौसम की स्थिति और अन्य प्रदूषण स्रोतों के कारण उनका प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकता है।
इसी वजह से पटाखों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के साथ-साथ प्रदूषण के अन्य स्रोतों पर भी ध्यान देना जरूरी है। वाहनों से निकलने वाले धुएं को कम करना, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण, औद्योगिक उत्सर्जन पर निगरानी और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना भी महत्वपूर्ण कदम हैं।
यदि प्रदूषण नियंत्रण को केवल त्योहारों के दौरान लागू किए जाने वाले प्रतिबंधों तक सीमित रखा जाएगा, तो लंबे समय में अपेक्षित सुधार हासिल करना कठिन हो सकता है।
### क्या पूर्ण प्रतिबंध के बजाय समय निर्धारित किया जा सकता है?
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि लोगों से अपील करने और पटाखे चलाने के समय को कुछ निर्धारित घंटों तक सीमित करने के लिए अभी पर्याप्त समय है। इस टिप्पणी से यह संकेत मिलता है कि अदालत व्यावहारिक विकल्पों पर भी विचार कर रही है।
समय निर्धारित करने का उद्देश्य पटाखों के इस्तेमाल को एक सीमित अवधि तक रखने और प्रदूषण तथा शोर के प्रभाव को नियंत्रित करने में मदद करना हो सकता है। लेकिन केवल समय-सीमा तय करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ नियमों का पालन, निगरानी और लोगों को सही जानकारी देना भी आवश्यक है।
इसके अलावा, पटाखों की प्रकृति, उनसे होने वाले उत्सर्जन और स्थानीय वायु गुणवत्ता की स्थिति को भी ध्यान में रखना होगा। किसी भी व्यवस्था का मूल्यांकन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि वह पर्यावरण और स्वास्थ्य की रक्षा में कितनी प्रभावी है।
अदालत के सामने एक विकल्प ऐसा रास्ता तलाशना है, जिसमें लोगों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए प्रदूषण कम करने के उपाय किए जा सकें। लेकिन इस विषय में अंतिम निर्णय क्या होगा, यह 15 अक्टूबर की सुनवाई और उसके बाद जारी होने वाले आदेश पर निर्भर करेगा।
### 15 अक्टूबर की सुनवाई पर टिकी निगाहें
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई के लिए 15 अक्टूबर की तारीख निर्धारित की है। ऐसे में दिल्ली-NCR के निवासियों, पर्यावरण से जुड़े संगठनों और दिवाली पर पटाखे चलाने वाले लोगों की निगाहें अदालत की अगली कार्यवाही पर रहेंगी।
आने वाली सुनवाई में यह महत्वपूर्ण होगा कि अदालत प्रतिबंध, समय-सीमा, जागरूकता अभियान और नियमों के पालन से जुड़े मुद्दों पर क्या रुख अपनाती है। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए प्रशासन को किस प्रकार के निर्देश दिए जाते हैं।
फिलहाल सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि पटाखों पर प्रतिबंध पूरी तरह हटा दिया गया है या कोई नई समय-सीमा अंतिम रूप से लागू कर दी गई है। ऐसी किसी व्यवस्था की पुष्टि अदालत के आधिकारिक आदेश से ही होगी।
निष्कर्षतः, सुप्रीम कोर्ट के सामने चुनौती दिवाली के उत्सव और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की है। धार्मिक आस्था का सम्मान करना और नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करना, दोनों महत्वपूर्ण हैं। अब देखना होगा कि अदालत ऐसा कौन-सा रास्ता अपनाती है, जिससे त्योहार की खुशियों के साथ-साथ स्वच्छ हवा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के हितों की भी रक्षा की जा सके।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।