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अमेरिका में यौन अपराध के दोषी नागरिक को भारत में प्रवेश देने से इनकार, दिल्ली हाई कोर्ट

अमेरिका में यौन अपराध के दोषी नागरिक को भारत में प्रवेश देने से इनकार, दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा—विदेशी नागरिक वीजा को अधिकार नहीं मान सकते

       भारत में प्रवेश करने के लिए वीजा प्राप्त करना किसी विदेशी नागरिक का ऐसा अधिकार नहीं है, जिसे हर परिस्थिति में लागू कराया जा सके। किसी विदेशी व्यक्ति को देश में आने की अनुमति दी जाए या नहीं, यह भारत की संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और संबंधित परिस्थितियों के आधार पर तय किया जा सकता है। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अमेरिकी नागरिक और उसकी भारतीय पत्नी की याचिका खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत दोहराया है।

मामला ऐसे अमेरिकी नागरिक से जुड़ा था, जिसे अमेरिका में यौन अपराध के लिए दोषी ठहराया जा चुका था। वह मूल रूप से भारतीय नागरिक था, लेकिन बाद में अमेरिकी नागरिकता हासिल करने के बाद भारतीय नागरिकता छोड़ चुका था। भारत आने के लिए पहले उसे ई-वीजा जारी किया गया था, लेकिन दिल्ली हवाई अड्डे पर पहुंचने के बाद आव्रजन अधिकारियों ने उसे प्रवेश देने से रोक दिया। उसका ई-वीजा रद्द कर दिया गया और उसे दुबई वापस भेज दिया गया।

इसके बाद उसने भारत आने के लिए कई बार आवेदन किया। जब उसे अनुमति नहीं मिली, तो उसने अपनी भारतीय पत्नी के साथ दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दंपति ने एंट्री वीजा देने की मांग करते हुए अपने पारिवारिक जीवन और साथ रहने के अधिकार का हवाला दिया। हालांकि, अदालत ने याचिका स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

न्यायमूर्ति अमित महाजन ने 5 अक्टूबर को दिए गए फैसले में कहा कि विदेशी नागरिक भारत में प्रवेश के लिए वीजा को अपना स्वतः प्राप्त अधिकार नहीं मान सकते। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि याचिकाकर्ता को पहले गुजरात हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली थी और उसने दिल्ली हाई कोर्ट के सामने उस महत्वपूर्ण तथ्य का खुलासा भी नहीं किया था।

यह मामला केवल वीजा जारी करने या रद्द करने तक सीमित नहीं है। इसमें विदेशी नागरिकों के भारत में प्रवेश, राष्ट्रीय सुरक्षा, सरकारी विवेकाधिकार, वैवाहिक जीवन और अदालत के सामने सभी महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा करने जैसे कानूनी प्रश्न शामिल हैं।

क्या था पूरा मामला?

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता मूल रूप से भारतीय नागरिक था। बाद में उसने अमेरिकी नागरिकता प्राप्त कर ली और भारतीय नागरिकता औपचारिक रूप से छोड़ दी। इस बदलाव के बाद उसकी कानूनी स्थिति एक विदेशी नागरिक की हो गई।

उपलब्ध विवरण के मुताबिक, उसे 7 दिसंबर 2022 को भारत आने के लिए ई-वीजा मिला था। वह भारत पहुंचा, लेकिन दिल्ली हवाई अड्डे पर आव्रजन अधिकारियों ने उसे प्रवेश देने से रोक दिया। अधिकारियों ने उसका ई-वीजा रद्द कर दिया और उसे दुबई वापस भेज दिया।

याचिकाकर्ता के अमेरिकी पासपोर्ट पर उसके यौन अपराध में दोषसिद्ध होने का उल्लेख भी था। भारतीय अधिकारियों ने उसकी पृष्ठभूमि और उपलब्ध जानकारी को ध्यान में रखते हुए उसे भारत में प्रवेश देने की अनुमति नहीं दी।

इसके बाद याचिकाकर्ता ने भारत आने के लिए गृह मंत्रालय के समक्ष कई आवेदन किए। लेकिन इन आवेदनों को मंजूरी नहीं मिली। लगातार अनुमति न मिलने पर उसने अपनी भारतीय पत्नी के साथ दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की।

दंपति की ओर से मांग की गई कि उन्हें एंट्री वीजा जारी करने का निर्देश दिया जाए, ताकि पति भारत आ सके और दोनों साथ रह सकें।

याचिका में पारिवारिक जीवन और पति-पत्नी के साथ रहने के अधिकार का प्रश्न भी उठाया गया। लेकिन अदालत के सामने यह भी विचारणीय था कि क्या भारतीय नागरिक से विवाह कर लेने के कारण किसी विदेशी व्यक्ति को भारत में प्रवेश पाने का कानूनी अधिकार मिल जाता है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने वीजा देने से इनकार क्यों किया?

दिल्ली हाई कोर्ट ने याचिका पर विचार करते हुए कहा कि विदेशी नागरिक भारत में प्रवेश करने के लिए वीजा को अपना अधिकार नहीं मान सकते। किसी विदेशी को देश में प्रवेश देने की अनुमति देना भारत का संप्रभु अधिकार है।

अदालत ने याचिकाकर्ता की आपराधिक पृष्ठभूमि को भी महत्वपूर्ण माना। वह अमेरिका में यौन अपराध के लिए दोषी ठहराया जा चुका था और उसके अमेरिकी पासपोर्ट पर इस दोषसिद्धि का उल्लेख था।

ऐसी परिस्थितियों में भारतीय अधिकारियों द्वारा उसे प्रवेश देने से रोकने के निर्णय को केवल इस आधार पर गैरकानूनी नहीं माना जा सकता कि उसे पहले ई-वीजा जारी किया गया था।

वीजा जारी होना और देश की सीमा पर अंतिम रूप से प्रवेश की अनुमति मिलना हमेशा एक ही बात नहीं होती। आव्रजन अधिकारी संबंधित कानूनों और लागू नियमों के अनुसार प्रवेश से जुड़े प्रश्नों पर निर्णय ले सकते हैं।

इस मामले में अदालत ने सरकारी अधिकारियों के निर्णय का मूल्यांकन करते समय याचिकाकर्ता की पृष्ठभूमि, भारत में प्रवेश से संबंधित सरकारी विवेकाधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं को ध्यान में रखा।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकार का प्रत्येक निर्णय किसी भी परिस्थिति में न्यायिक समीक्षा से बाहर हो जाता है। सरकारी कार्रवाई को लागू कानून और संवैधानिक सीमाओं के भीतर होना चाहिए। लेकिन विदेशी नागरिक को भारत में प्रवेश देने के प्रश्न पर सरकार के पास व्यापक अधिकार हो सकते हैं।

विदेशी नागरिक के लिए वीजा मौलिक अधिकार क्यों नहीं?

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू विदेशी नागरिकों के भारत में प्रवेश के अधिकार से संबंधित है।

भारत का संविधान नागरिकों और विदेशियों के अधिकारों में कुछ महत्वपूर्ण अंतर करता है। उदाहरण के लिए, अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाली स्वतंत्रताएं केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त हैं। इसलिए कोई विदेशी नागरिक अनुच्छेद 19 के तहत भारत में प्रवेश करने या यहां रहने का स्वतः अधिकार नहीं जता सकता।

दूसरी ओर, संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 में प्रयुक्त संरक्षण केवल नागरिकों तक सीमित नहीं हैं। कानून के समक्ष समानता और जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित संवैधानिक सुरक्षा विदेशियों को भी लागू परिस्थितियों में प्राप्त हो सकती है।

लेकिन इन प्रावधानों का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक विदेशी व्यक्ति को भारत में प्रवेश देने के लिए सरकार बाध्य है। देश में प्रवेश, वीजा, आव्रजन और निर्वासन से जुड़े प्रश्नों पर लागू कानूनों तथा सरकारी नीतियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

इसलिए किसी विदेशी नागरिक के वीजा आवेदन पर निर्णय लेते समय सरकार उसकी पृष्ठभूमि, यात्रा का उद्देश्य, संबंधित नियमों और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों पर विचार कर सकती है।

इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विदेशी नागरिक वीजा को ऐसा अधिकार नहीं मान सकते, जिसके आधार पर वे हर परिस्थिति में भारत में प्रवेश की मांग कर सकें।

राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता की भूमिका

हर देश को यह तय करने का अधिकार होता है कि किन विदेशी नागरिकों को उसकी सीमा में प्रवेश की अनुमति दी जाए। यह अधिकार देश की संप्रभुता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

भारत में विदेशी नागरिकों का प्रवेश आव्रजन संबंधी कानूनों, वीजा नियमों और संबंधित सरकारी नीतियों के अधीन होता है। सरकार विभिन्न परिस्थितियों में किसी विदेशी व्यक्ति को प्रवेश देने, वीजा जारी करने या पहले जारी किए गए वीजा को रद्द करने का निर्णय ले सकती है।

ऐसे निर्णयों में राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक हित, विदेश नीति और संबंधित व्यक्ति की पृष्ठभूमि जैसे पहलू महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

यदि किसी विदेशी नागरिक को किसी गंभीर अपराध में दोषी ठहराया गया है, तो उसकी पृष्ठभूमि पर विचार किया जाना सरकारी निर्णय का प्रासंगिक हिस्सा हो सकता है। हालांकि, प्रत्येक मामले में लागू कानून और वास्तविक परिस्थितियों को देखना आवश्यक रहता है।

वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता की अमेरिका में हुई दोषसिद्धि और उसके पासपोर्ट पर दर्ज जानकारी महत्वपूर्ण थी। अदालत ने इन परिस्थितियों के बीच भारतीय अधिकारियों द्वारा प्रवेश रोकने के निर्णय को कानून के दायरे से बाहर नहीं माना।

इससे यह सिद्धांत सामने आता है कि पहले वीजा मिल जाना विदेशी नागरिक के लिए भारत में प्रवेश का अटल अधिकार पैदा नहीं करता।

भारतीय पत्नी के साथ रहने की दलील पर क्या हुआ?

याचिकाकर्ता ने अपनी भारतीय पत्नी के साथ मिलकर अदालत का रुख किया था। दंपति की मुख्य दलील यह थी कि एंट्री वीजा न मिलने से उनके पारिवारिक जीवन और साथ रहने के अधिकार पर असर पड़ रहा है।

यह एक महत्वपूर्ण मानवीय पहलू है। विवाह के बाद पति-पत्नी का साथ रहना उनके व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन से जुड़ा प्रश्न है। जब पति या पत्नी में से एक विदेशी नागरिक हो, तो वीजा संबंधी निर्णयों का असर उनके पारिवारिक जीवन पर पड़ सकता है।

लेकिन किसी भारतीय नागरिक से विवाह कर लेने मात्र से उसके विदेशी जीवनसाथी को भारत में प्रवेश का स्वतः और असीमित अधिकार नहीं मिल जाता। विवाह का अस्तित्व और आव्रजन संबंधी अनुमति दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं।

सरकार को विदेशी जीवनसाथी के वीजा आवेदन पर विचार करते समय लागू कानूनों और परिस्थितियों को ध्यान में रखना होता है। दूसरी ओर, पारिवारिक जीवन से जुड़े दावों को भी संबंधित मामले में कानून के अनुरूप परखा जा सकता है।

इस मामले में दंपति की दलील के बावजूद अदालत ने याचिका खारिज कर दी। अदालत के सामने राष्ट्रीय संप्रभुता, सरकारी विवेकाधिकार और याचिकाकर्ता की पृष्ठभूमि से जुड़े प्रश्न भी थे।

इस फैसले का यह अर्थ नहीं है कि विदेशी नागरिकों से विवाह करने वाले भारतीय नागरिकों के पारिवारिक अधिकारों का कोई महत्व नहीं है। बल्कि यह बताता है कि पारिवारिक जीवन की दलील और भारत में प्रवेश की अनुमति के बीच कानूनी संतुलन लागू नियमों के अनुसार तय किया जाता है।

गुजरात हाई कोर्ट में पहले भी पहुंचा था मामला

इस प्रकरण में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। केंद्र सरकार की ओर से पेश सेंट्रल गवर्नमेंट स्टैंडिंग काउंसिल रुक्मिणी बोबडे ने याचिका का विरोध करते हुए बताया कि याचिकाकर्ता पहले भी गुजरात हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा चुका था।

उसने वहां अपने निर्वासन और ई-वीजा रद्द किए जाने के निर्णय को चुनौती दी थी। उपलब्ध विवरण के अनुसार, गुजरात हाई कोर्ट ने 6 जनवरी 2023 को उसकी याचिका खारिज कर दी थी।

इसके बावजूद याचिकाकर्ता ने दिल्ली हाई कोर्ट के सामने इस महत्वपूर्ण तथ्य का खुलासा नहीं किया।

किसी अदालत में याचिका दाखिल करते समय संबंधित पक्षों का दायित्व होता है कि वे मामले से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को सही तरीके से सामने रखें। पहले की न्यायिक कार्यवाही और उसमें दिए गए आदेश की जानकारी विशेष महत्व रख सकती है, क्योंकि उससे मामले की पृष्ठभूमि और उठाए गए प्रश्नों की स्थिति स्पष्ट होती है।

यदि कोई पक्ष किसी महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाकर अदालत से राहत मांगता है, तो इससे उसकी दलीलों की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।

इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने गुजरात हाई कोर्ट के पहले के आदेश का खुलासा न किए जाने को गंभीरता से लिया। यह पहलू याचिका के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण रहा।

हालांकि, किसी मामले में पहले याचिका खारिज हो जाने का हर परिस्थिति में यह अर्थ नहीं होता कि बाद में कोई कानूनी उपाय संभव ही नहीं है। इसका निर्धारण पहले आदेश की प्रकृति, उठाए गए प्रश्नों और लागू कानूनी सिद्धांतों के आधार पर किया जाता है।

अदालत के सामने तथ्य छिपाने का क्या कानूनी प्रभाव हो सकता है?

न्यायिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा करना निष्पक्ष सुनवाई के लिए आवश्यक है। अदालत किसी विवाद का निर्णय पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत तथ्यों, दस्तावेजों और लागू कानून के आधार पर करती है।

यदि कोई याचिकाकर्ता पहले की कार्यवाही, किसी महत्वपूर्ण आदेश या मामले से संबंधित आवश्यक तथ्य को छिपाता है, तो अदालत उसकी याचिका पर विचार करते समय इस आचरण को ध्यान में रख सकती है।

इसका कारण यह है कि न्यायिक राहत मांगने वाले व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह अदालत के सामने ईमानदारी से सभी प्रासंगिक तथ्य प्रस्तुत करे। किसी महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाने से अदालत के सामने मामले की वास्तविक स्थिति अधूरी रह सकती है।

इस मामले में गुजरात हाई कोर्ट में पहले दाखिल की गई याचिका और उसके खारिज होने की जानकारी महत्वपूर्ण थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने इस तथ्य का खुलासा न किए जाने को गंभीरता से लिया।

इससे एक व्यापक कानूनी संदेश निकलता है कि अदालत से राहत मांगने के लिए केवल अपने पक्ष के अनुकूल तथ्यों को प्रस्तुत करना पर्याप्त नहीं है। मामले से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी भी सामने रखनी चाहिए, ताकि अदालत उचित निर्णय ले सके।

क्या यह फैसला सभी विदेशी नागरिकों पर लागू होगा?

इस फैसले को इस रूप में नहीं समझना चाहिए कि किसी भी अपराध में दोषी ठहराए गए प्रत्येक विदेशी नागरिक को हर परिस्थिति में भारत में प्रवेश से रोक दिया जाएगा। किसी मामले का निर्णय संबंधित कानूनों, वीजा नियमों, अपराध की प्रकृति और उपलब्ध परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है।

इसी प्रकार, किसी विदेशी नागरिक का भारतीय नागरिक से विवाह हो जाने पर उसे स्वतः प्रवेश का अधिकार नहीं मिलता, लेकिन उसके पारिवारिक जीवन से संबंधित दलीलें भी अपने आप अप्रासंगिक नहीं हो जातीं।

सरकार को अपने निर्णय लागू कानूनों और प्रासंगिक परिस्थितियों के अनुसार लेने होते हैं। न्यायालय यह भी देख सकते हैं कि सरकारी निर्णय कानूनी सीमाओं के भीतर है या नहीं।

इस मामले में याचिकाकर्ता की दोषसिद्धि, प्रवेश से इनकार किए जाने की परिस्थितियां और गुजरात हाई कोर्ट में पहले की कार्यवाही का खुलासा न किया जाना महत्वपूर्ण तथ्य थे। इसलिए फैसले को इन्हीं परिस्थितियों के संदर्भ में समझना अधिक उचित होगा।

निष्कर्ष: भारत में प्रवेश का अधिकार और सरकारी विवेकाधिकार

दिल्ली हाई कोर्ट ने अमेरिकी नागरिक और उसकी भारतीय पत्नी की एंट्री वीजा संबंधी याचिका खारिज करते हुए विदेशी नागरिकों के भारत में प्रवेश से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों को सामने रखा।

अदालत ने कहा कि विदेशी नागरिक वीजा को अपना अधिकार नहीं मान सकते और किसी विदेशी को भारत में प्रवेश देने का निर्णय देश की संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति तथा सरकारी विवेकाधिकार से जुड़ा है।

मामले में याचिकाकर्ता को अमेरिका में यौन अपराध के लिए दोषी ठहराया गया था। उसे पहले ई-वीजा जारी होने के बावजूद दिल्ली हवाई अड्डे पर प्रवेश नहीं दिया गया और वापस दुबई भेज दिया गया। बाद में गृह मंत्रालय से राहत नहीं मिलने पर उसने अपनी भारतीय पत्नी के साथ दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की।

अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि याचिकाकर्ता ने गुजरात हाई कोर्ट में पहले की कार्यवाही और याचिका खारिज होने के तथ्य का खुलासा नहीं किया था।

इस फैसले का व्यापक संदेश यह है कि भारत में प्रवेश की अनुमति केवल वीजा जारी हो जाने या भारतीय नागरिक से विवाह कर लेने के आधार पर सुनिश्चित नहीं होती। ऐसे मामलों में लागू कानून, संबंधित व्यक्ति की पृष्ठभूमि और सरकार के वैध निर्णय महत्वपूर्ण होते हैं।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।