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इलाहाबाद हाईकोर्ट से 22 पुलिसकर्मियों को राहत: SC/ST कोर्ट का FIR दर्ज करने का आदेश निरस्त

इलाहाबाद हाईकोर्ट से 22 पुलिसकर्मियों को राहत: SC/ST कोर्ट का FIR दर्ज करने का आदेश निरस्त, जानिए BNSS की धाराओं का महत्व

प्रस्तावना

उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक उपनिरीक्षक समेत 22 पुलिसकर्मियों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने विशेष एससी/एसटी अदालत के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी यानी एफआईआर (FIR) दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। यह मामला घुघली थाना क्षेत्र के बसंतपुर गांव से संबंधित है, जहां दो महिलाओं ने पुलिसकर्मियों पर घर में घुसने, अभद्र व्यवहार करने और जातिसूचक टिप्पणियां करने सहित कई गंभीर आरोप लगाए थे।

इस मामले में हाईकोर्ट का फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह केवल पुलिसकर्मियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने के आदेश तक सीमित नहीं है। इसमें पुलिस अधिकारियों के आधिकारिक कर्तव्यों से संबंधित शिकायतों पर न्यायिक प्रक्रिया अपनाने और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के प्रावधानों का पालन करने का प्रश्न भी शामिल है।

न्यायमूर्ति संतोष राय ने उपनिरीक्षक राकेश कुमार यादव की ओर से दाखिल अपील पर सुनवाई करते हुए विशेष अदालत के आदेश को निरस्त किया। हालांकि, इस फैसले को शिकायतकर्ता महिलाओं के आरोपों की सत्यता पर अंतिम निर्णय के रूप में देखना उचित नहीं होगा। किसी आदेश को प्रक्रिया संबंधी आधार पर निरस्त किए जाने और आरोपों को साक्ष्यों के आधार पर गलत साबित किए जाने के बीच कानूनी अंतर होता है।

क्या है महाराजगंज के बसंतपुर गांव का पूरा मामला?

यह मामला उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के घुघली थाना क्षेत्र के बसंतपुर गांव से जुड़ा है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, दो महिलाओं ने संबंधित पुलिसकर्मियों के विरुद्ध शिकायत की थी। महिलाओं ने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों ने उनके घर में प्रवेश किया, उनके साथ अभद्रता की और जातिसूचक टिप्पणियां कीं।

शिकायत में यह आरोप भी लगाया गया कि महिलाओं को शौचालय जाने से रोका गया। यदि ऐसे आरोप तथ्यों और साक्ष्यों से प्रमाणित होते हैं, तो मामले की प्रकृति के अनुसार संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई का प्रश्न उठ सकता है।

शिकायतकर्ताओं ने मामले में कानूनी कार्रवाई की मांग की। इसके बाद विशेष एससी/एसटी अदालत ने संबंधित पुलिसकर्मियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया था।

इस आदेश से असहमत उपनिरीक्षक राकेश कुमार यादव ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया। उनकी ओर से दाखिल अपील में विशेष अदालत के आदेश को चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने मामले पर विचार करने के बाद उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत पुलिसकर्मियों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि एफआईआर दर्ज करने का आदेश अपने आप में किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने वाला निर्णय नहीं होता। प्राथमिकी का उद्देश्य किसी संज्ञेय अपराध की सूचना को दर्ज कर कानून के अनुसार आगे की जांच का रास्ता खोलना होता है। दोष सिद्ध करने के लिए आवश्यक साक्ष्यों का मूल्यांकन अलग न्यायिक प्रक्रिया का विषय है।

दो महिलाओं ने लगाए थे गंभीर आरोप

मामले की गंभीरता को समझने के लिए शिकायत में लगाए गए आरोपों पर ध्यान देना जरूरी है। दोनों महिलाओं ने पुलिसकर्मियों के व्यवहार को लेकर आपत्ति जताई थी। शिकायत में घर में प्रवेश, अभद्रता, जातिसूचक टिप्पणियों और शौचालय जाने से रोकने जैसे आरोप शामिल थे।

जाति के आधार पर अपमानित करने या किसी व्यक्ति के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करने के आरोप भारतीय कानून के अंतर्गत गंभीर महत्व रखते हैं। विशेष रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के विरुद्ध किए गए कुछ कृत्यों के लिए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 में विशेष प्रावधान किए गए हैं।

हालांकि, केवल शिकायत में किसी आरोप का उल्लेख होने से यह स्वतः सिद्ध नहीं हो जाता कि संबंधित अपराध हुआ है। मामले के तथ्यों, शिकायत की परिस्थितियों, लागू कानून की आवश्यक शर्तों और उपलब्ध साक्ष्यों को ध्यान में रखकर ही कानूनी स्थिति निर्धारित की जाती है।

दूसरी ओर, केवल इसलिए भी किसी शिकायत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि आरोप किसी पुलिस अधिकारी या सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध लगाए गए हैं। कानून की दृष्टि में शिकायत की जांच निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए और संबंधित व्यक्तियों के अधिकारों का संरक्षण भी आवश्यक है।

इसी संतुलन को बनाए रखना आपराधिक न्याय व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में क्यों दाखिल हुई अपील?

विशेष एससी/एसटी अदालत द्वारा एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिए जाने के बाद उपनिरीक्षक राकेश कुमार यादव की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दाखिल की गई।

अपील पर सुनवाई के दौरान पुलिसकर्मियों के आधिकारिक कर्तव्यों से संबंधित मामलों में शिकायत पर आदेश पारित करने की प्रक्रिया का प्रश्न महत्वपूर्ण रहा। अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita—BNSS) की धारा 173(4) और धारा 175(3) के संदर्भ में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के महत्व को रेखांकित किया।

हाईकोर्ट ने विशेष अदालत के एफआईआर दर्ज करने संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया। परिणामस्वरूप, इस आदेश के आधार पर कार्रवाई का सामना कर रहे उपनिरीक्षक समेत 22 पुलिसकर्मियों को राहत मिली।

यह समझना जरूरी है कि किसी न्यायालय द्वारा निचली अदालत का आदेश निरस्त करने के पीछे विशिष्ट कानूनी कारण हो सकते हैं। इसलिए इस फैसले का सटीक दायरा निर्धारित करने के लिए हाईकोर्ट के विस्तृत आदेश का अध्ययन आवश्यक है। उपलब्ध विवरण के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि हाईकोर्ट ने शिकायत में लगाए गए प्रत्येक आरोप को गलत करार दे दिया है।

क्या कहती है BNSS की धारा 173(4)?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 ने आपराधिक प्रक्रिया से संबंधित पुराने कानून, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), का स्थान लिया है। BNSS में प्राथमिकी दर्ज कराने, पुलिस जांच और मजिस्ट्रेट की शक्तियों से संबंधित प्रक्रियाओं को निर्धारित किया गया है।

BNSS की धारा 173(4) उस स्थिति से संबंधित है, जब कोई व्यक्ति पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी द्वारा सूचना दर्ज नहीं किए जाने से असंतुष्ट हो।

इस प्रावधान के अनुसार, संबंधित व्यक्ति अपनी सूचना का सार लिखित रूप में और डाक के माध्यम से संबंधित पुलिस अधीक्षक को भेज सकता है। यदि पुलिस अधीक्षक को सूचना से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता दिखाई देता है, तो वह स्वयं मामले की जांच कर सकता है या कानून के अनुसार अपने अधीनस्थ पुलिस अधिकारी से जांच कराने का निर्देश दे सकता है।

यदि इस प्रक्रिया के बाद भी शिकायतकर्ता को राहत नहीं मिलती, तो वह लागू कानूनी प्रक्रिया के अनुसार सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष जा सकता है।

इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पुलिस थाने में शिकायत दर्ज न होने की स्थिति में भी शिकायतकर्ता के पास कानून के तहत आगे बढ़ने का रास्ता उपलब्ध रहे।

हालांकि, धारा 173(4) का इस्तेमाल किस प्रकार किया जाना चाहिए और शिकायत पर आगे कौन-सा आदेश दिया जा सकता है, यह मामले की परिस्थितियों और संबंधित वैधानिक प्रावधानों पर निर्भर करता है।

BNSS की धारा 175(3) में मजिस्ट्रेट की क्या शक्ति है?

BNSS की धारा 175(3) मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस जांच का आदेश दिए जाने से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान है।

इस धारा के अंतर्गत सक्षम मजिस्ट्रेट, धारा 173(4) में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने के बाद प्राप्त आवेदन पर विचार कर सकता है। कानून में निर्धारित शर्तों के अधीन मजिस्ट्रेट पुलिस जांच का आदेश दे सकता है।

इस प्रावधान के तहत आदेश पारित करते समय लागू वैधानिक आवश्यकताओं का पालन करना जरूरी है। इनमें आवेदन की प्रकृति, शिकायतकर्ता द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया और संबंधित मामले में लागू कानूनी शर्तें महत्वपूर्ण हो सकती हैं।

धारा 175(3) को केवल इस अर्थ में नहीं समझना चाहिए कि मजिस्ट्रेट के पास हर शिकायत पर बिना किसी प्रक्रिया के एफआईआर दर्ज कराने का असीमित अधिकार है। न्यायिक शक्तियों का प्रयोग कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर ही किया जाता है।

विशेष रूप से जब शिकायत किसी ऐसे पुलिस अधिकारी या सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़ी हो, जिस पर कानून के अंतर्गत कोई विशेष प्रक्रिया लागू होती है, तो संबंधित वैधानिक प्रावधानों का परीक्षण महत्वपूर्ण हो जाता है।

इसी कारण इस मामले में BNSS की धाराओं का उल्लेख कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर हाईकोर्ट के प्रत्येक तर्क या आदेश के विस्तृत आधार के बारे में कोई अतिरिक्त निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध शिकायत होने पर क्या प्रक्रिया अपनाई जाती है?

सरकारी कर्मचारी या पुलिस अधिकारी के विरुद्ध शिकायत आने पर यह देखना आवश्यक होता है कि आरोप किस प्रकार के हैं और संबंधित कर्मचारी किस परिस्थिति में कार्य कर रहा था।

हर शिकायत को एक ही कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता। कुछ मामलों में सामान्य आपराधिक कानून के प्रावधान लागू होते हैं, जबकि कुछ परिस्थितियों में सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक कर्तव्यों और लागू वैधानिक सुरक्षा से जुड़े प्रश्न भी उठ सकते हैं।

यहां तीन बातों को समझना उपयोगी है।

पहली बात: आरोपों की प्रकृति।

सबसे पहले यह देखा जाता है कि शिकायत में किन कृत्यों का उल्लेख है। क्या आरोप किसी सामान्य आपराधिक घटना से संबंधित हैं, या वे सरकारी कर्मचारी द्वारा आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़े हैं? इसका निर्धारण मामले के वास्तविक तथ्यों के आधार पर किया जाता है।

दूसरी बात: संबंधित कानून की आवश्यकताएं।

यदि किसी विशेष कानूनी प्रावधान के तहत कोई प्रक्रिया निर्धारित है, तो उसका पालन करना आवश्यक हो सकता है। शिकायतकर्ता और संबंधित अधिकारी, दोनों के अधिकारों का निर्धारण लागू कानून के अनुसार होता है।

तीसरी बात: न्यायालय की भूमिका।

न्यायालय का दायित्व केवल शिकायत में लगाए गए आरोपों को पढ़कर आदेश देना नहीं है। उसे संबंधित कानूनी प्रावधानों, अपने अधिकार-क्षेत्र और लागू प्रक्रिया को भी ध्यान में रखना होता है।

हालांकि, यह मान लेना गलत होगा कि प्रत्येक सरकारी कर्मचारी को आपराधिक कार्रवाई से सामान्य छूट प्राप्त है। किसी अधिकारी के पद या सरकारी सेवा में होने से उसे कानून से ऊपर का दर्जा नहीं मिल जाता।

यदि किसी पुलिस अधिकारी के विरुद्ध अपराध किए जाने की शिकायत है, तो उस पर कार्रवाई का प्रश्न लागू कानून और मामले के तथ्यों के अनुसार तय होगा।

एससी/एसटी एक्ट के मामलों में प्रक्रिया का महत्व

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 का उद्देश्य अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के विरुद्ध होने वाले निर्दिष्ट अत्याचारों को रोकना तथा पीड़ितों को कानूनी संरक्षण प्रदान करना है।

इस अधिनियम के अंतर्गत अपराधों की प्रकृति और लागू प्रावधानों के अनुसार विशेष न्यायालयों या विशेष रूप से निर्धारित न्यायालयों में मामलों की सुनवाई की व्यवस्था की गई है।

ऐसे मामलों में शिकायतकर्ता की सुरक्षा, निष्पक्ष जांच और कानून के अनुसार कार्रवाई महत्वपूर्ण हैं। साथ ही, न्यायिक आदेश पारित करते समय संबंधित न्यायालय को अपने अधिकार-क्षेत्र और लागू वैधानिक प्रक्रिया का पालन करना होता है।

यहां दो अलग-अलग पहलुओं के बीच अंतर समझना जरूरी है।

पहला पहलू है शिकायतकर्ता के आरोपों की गंभीरता और उन पर कानून के अनुसार कार्रवाई की आवश्यकता। दूसरा पहलू है उस कार्रवाई के लिए अपनाई गई प्रक्रिया की वैधानिकता।

यदि किसी मामले में एफआईआर दर्ज करने का आदेश निरस्त होता है, तो इसका अर्थ आवश्यक रूप से यह नहीं होता कि शिकायत में बताए गए कृत्य हुए ही नहीं थे। इसी प्रकार, किसी शिकायत पर एफआईआर दर्ज होने से आरोपी की दोषसिद्धि भी नहीं हो जाती।

आरोपों की जांच, साक्ष्यों का मूल्यांकन और दोष या निर्दोष होने का निर्धारण कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होता है।

इसलिए महाराजगंज के बसंतपुर गांव से जुड़े मामले को समझते समय शिकायत में लगाए गए आरोपों और हाईकोर्ट के आदेश के प्रभाव को अलग-अलग देखना आवश्यक है।

क्या हाईकोर्ट के फैसले से पुलिसकर्मियों को क्लीन चिट मिल गई?

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या विशेष अदालत का आदेश निरस्त होने के बाद पुलिसकर्मियों को आरोपों से पूरी तरह मुक्त माना जा सकता है।

उपलब्ध विवरण के आधार पर ऐसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

हाईकोर्ट ने विशेष एससी/एसटी अदालत के उस आदेश को निरस्त किया, जिसके तहत संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। इससे उस आदेश के आधार पर आगे बढ़ने वाली कार्रवाई प्रभावित हुई और पुलिसकर्मियों को राहत मिली।

लेकिन किसी आदेश को निरस्त करने का कानूनी प्रभाव उस आदेश में दिए गए कारणों और हाईकोर्ट द्वारा जारी निर्देशों पर निर्भर करता है।

यदि आदेश प्रक्रिया संबंधी त्रुटि, अधिकार-क्षेत्र या वैधानिक आवश्यकताओं के पालन से जुड़ी वजहों से निरस्त किया गया है, तो उससे शिकायत में लगाए गए सभी आरोपों की सत्यता पर स्वतः अंतिम निर्णय नहीं हो जाता।

इसी तरह, यह भी बिना विस्तृत आदेश देखे नहीं कहा जा सकता कि शिकायतकर्ताओं के लिए आगे कोई कानूनी रास्ता शेष है या नहीं। यह संबंधित आदेश, लागू कानून और मामले की वर्तमान स्थिति पर निर्भर करेगा।

इसलिए इस फैसले को समझने का सही तरीका यह है कि हाईकोर्ट ने विशेष अदालत के एफआईआर दर्ज करने संबंधी आदेश को निरस्त किया है, जबकि आरोपों के अंतिम परिणाम के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए विस्तृत न्यायिक आदेश और आगे की कार्यवाही की स्थिति देखना आवश्यक है।

आम नागरिकों के लिए इस फैसले का क्या महत्व है?

यह मामला आम नागरिकों और कानून के विद्यार्थियों के लिए कई महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं को सामने लाता है।

सबसे पहले, यदि पुलिस किसी संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज नहीं करती, तो कानून शिकायतकर्ता को आगे की प्रक्रिया अपनाने का अवसर देता है। संबंधित पुलिस अधीक्षक के समक्ष शिकायत प्रस्तुत करना और उसके बाद लागू प्रक्रिया के अनुसार सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष जाना इसमें महत्वपूर्ण हो सकता है।

दूसरे, अदालत में आवेदन दाखिल करते समय केवल आरोपों का उल्लेख करना पर्याप्त नहीं होता। यह देखना भी जरूरी है कि कानून द्वारा निर्धारित प्रारंभिक प्रक्रियाओं का पालन किया गया है या नहीं।

तीसरे, सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध शिकायतों में संबंधित अधिकारी के पद से अधिक महत्वपूर्ण मामले के वास्तविक तथ्य और लागू कानून होते हैं। किसी विशेष प्रक्रिया या सुरक्षा का अस्तित्व अपने आप में किसी अधिकारी को सभी प्रकार की आपराधिक जवाबदेही से मुक्त नहीं करता।

चौथे, न्यायालय का आदेश किस विषय पर है, इसे सही तरीके से समझना आवश्यक है। प्राथमिकी दर्ज करने के आदेश को निरस्त करना, जांच के बाद आरोपों को गलत पाना और मुकदमे में दोषमुक्त करना अलग-अलग कानूनी स्थितियां हैं।

कानून के विद्यार्थियों के लिए यह मामला BNSS की धारा 173(4) और धारा 175(3) के व्यावहारिक महत्व को समझने का अवसर भी प्रदान करता है। इन प्रावधानों का अध्ययन करते समय उनके शब्दों, प्रक्रिया और न्यायालयों द्वारा की गई व्याख्या पर ध्यान देना चाहिए।

निष्कर्ष

महाराजगंज जिले के घुघली थाना क्षेत्र के बसंतपुर गांव से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उपनिरीक्षक राकेश कुमार यादव समेत 22 पुलिसकर्मियों को राहत देते हुए विशेष एससी/एसटी अदालत के एफआईआर दर्ज करने संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया।

यह मामला इस बात को रेखांकित करता है कि आपराधिक शिकायतों पर न्यायिक आदेश पारित करते समय निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया और न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र का पालन करना आवश्यक है। BNSS की धारा 173(4) और धारा 175(3) शिकायतकर्ता द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया तथा मजिस्ट्रेट की जांच का आदेश देने की शक्ति के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं।

हालांकि, इस फैसले का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि शिकायतकर्ता महिलाओं के सभी आरोप अंतिम रूप से गलत साबित हो गए हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार, हाईकोर्ट ने विशेष अदालत का एफआईआर दर्ज करने वाला आदेश निरस्त किया है। इस आदेश का सटीक कानूनी प्रभाव समझने के लिए हाईकोर्ट के विस्तृत निर्णय का अध्ययन जरूरी है।

आपराधिक न्याय व्यवस्था में शिकायतकर्ता को न्याय पाने का अवसर देना और आरोपी के कानूनी अधिकारों की रक्षा करना, दोनों महत्वपूर्ण हैं। कानून की निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए ही इन दोनों उद्देश्यों के बीच उचित संतुलन बनाया जा सकता है।

कानूनी अस्वीकरण: यह लेख उपलब्ध मामले के विवरण पर आधारित सामान्य कानूनी जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। मामले के सभी तथ्यों, हाईकोर्ट के विस्तृत आदेश और आगे की न्यायिक कार्यवाही की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध न होने के कारण इसे न्यायिक निर्णय का पूर्ण या प्रमाणित विवरण नहीं माना जाना चाहिए।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।