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बच्चों की अश्लील सामग्री सर्च करना, देखना या शेयर करना पड़ सकता है भारी: POCSO और IT Act के तहत कार्रवाई,

बच्चों की अश्लील सामग्री सर्च करना, देखना या शेयर करना पड़ सकता है भारी: POCSO और IT Act के तहत कार्रवाई, राजस्थान पुलिस की एडवाइजरी

राजस्थान पुलिस ने जारी की साइबर सुरक्षा एडवाइजरी, CSAM सामग्री को आगे भेजने से बचने और तत्काल शिकायत करने की अपील

इंटरनेट ने आज लोगों के लिए जानकारी हासिल करना, संवाद करना और दुनिया भर की घटनाओं से जुड़ना आसान बना दिया है। लेकिन डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल कुछ लोग गंभीर अपराधों के लिए भी कर रहे हैं। विशेष रूप से बच्चों के यौन शोषण से संबंधित तस्वीरों, वीडियो और अन्य डिजिटल सामग्री का ऑनलाइन प्रसार एक गंभीर समस्या बन चुका है। ऐसी सामग्री न केवल बच्चों की गरिमा और निजता का उल्लंघन करती है, बल्कि उनके शोषण को बढ़ावा देने वाले आपराधिक नेटवर्क को भी मजबूत कर सकती है।

इसी गंभीर विषय को लेकर राजस्थान पुलिस की साइबर क्राइम ब्रांच ने आम नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण एडवाइजरी जारी की है। राजस्थान पुलिस के महानिदेशक राजीव कुमार शर्मा के निर्देशानुसार जारी इस जनहित एडवाइजरी के माध्यम से लोगों को बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री के संबंध में कानून की जानकारी दी गई है। अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस साइबर क्राइम वीके सिंह ने स्पष्ट किया कि ऐसी सामग्री को ऑनलाइन खोजना, देखना, बनाना, डाउनलोड करना या साझा करना परिस्थितियों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर गंभीर दंडनीय अपराध हो सकता है।

पुलिस ने लोगों से अपील की है कि यदि इंटरनेट या सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री दिखाई देती है, तो उसे आगे भेजने, डाउनलोड करने या अपने डिवाइस में सुरक्षित रखने के बजाय संबंधित अधिकारियों को सूचित करें। साथ ही, बच्चों को इंटरनेट के सुरक्षित इस्तेमाल के बारे में जागरूक करने पर भी जोर दिया गया है।

क्या है CSAM और इसे गंभीर अपराध क्यों माना जाता है?

CSAM का पूरा नाम Child Sexual Abuse Material है। हिंदी में इसे बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री कहा जा सकता है। इसमें ऐसी तस्वीरें, वीडियो या अन्य डिजिटल सामग्री शामिल हो सकती है, जो बच्चों के यौन शोषण या दुर्व्यवहार को दर्शाती हो।

यह समझना जरूरी है कि CSAM को सामान्य वयस्क सामग्री के समान नहीं माना जा सकता। ऐसी सामग्री किसी बच्चे के शोषण से जुड़ी हो सकती है और उसके प्रसार से पीड़ित की निजता, गरिमा तथा सुरक्षा को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।

यदि कोई व्यक्ति इस तरह की सामग्री को जानबूझकर खोजता है, डाउनलोड करता है, संग्रहित करता है या दूसरों तक पहुंचाता है, तो उसके विरुद्ध संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई हो सकती है। हालांकि, किसी विशेष गतिविधि की कानूनी स्थिति उस गतिविधि की प्रकृति, व्यक्ति के इरादे, उपलब्ध साक्ष्यों और लागू वैधानिक प्रावधानों पर निर्भर करती है।

बच्चों के यौन शोषण से संबंधित डिजिटल सामग्री का प्रसार पीड़ित को दोबारा नुकसान पहुंचा सकता है। घटना के बाद भी ऐसी सामग्री इंटरनेट पर उपलब्ध रहने से बच्चे को भविष्य में पहचान उजागर होने, सामाजिक दबाव और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

इसी वजह से पुलिस और बाल संरक्षण से जुड़ी संस्थाएं लोगों को ऐसी सामग्री को देखने या साझा करने से बचने तथा उसकी सूचना संबंधित अधिकारियों को देने के लिए जागरूक करती हैं।

राजस्थान पुलिस की एडवाइजरी में क्या कहा गया?

राजस्थान पुलिस की साइबर क्राइम ब्रांच द्वारा जारी एडवाइजरी का मुख्य उद्देश्य साइबर अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना और नागरिकों को बच्चों के ऑनलाइन शोषण से संबंधित कानूनी प्रावधानों के बारे में जागरूक करना है।

अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस साइबर क्राइम वीके सिंह के अनुसार, बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री को खोजना, देखना, बनाना, डाउनलोड करना या साझा करना गंभीर कानूनी परिणाम पैदा कर सकता है।

पुलिस ने यह भी समझाया कि ऐसी सामग्री की मांग और उसका प्रसार अपराधियों को प्रोत्साहित कर सकता है। जब लोग इस प्रकार की सामग्री खोजते हैं या उसे दूसरों तक पहुंचाते हैं, तो इससे उसका डिजिटल प्रसार बढ़ सकता है।

इसलिए नागरिकों से अपील की गई है कि ऐसी सामग्री मिलने पर उसे किसी व्यक्ति, सोशल मीडिया समूह या मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर फॉरवर्ड न करें।

एडवाइजरी में शिकायत दर्ज कराने के लिए राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल, पुलिस थानों और संबंधित हेल्पलाइन के माध्यमों की जानकारी भी दी गई है।

क्या POCSO Act के तहत ऐसी गतिविधियां दंडनीय हैं?

भारत में बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण प्रदान करने के लिए Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012 यानी POCSO Act लागू है।

इस कानून का उद्देश्य 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को यौन उत्पीड़न, यौन हमले और अन्य संबंधित अपराधों से सुरक्षा प्रदान करना है। कानून बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों की रिपोर्टिंग, जांच और न्यायिक प्रक्रिया के लिए भी विशेष प्रावधान करता है।

POCSO Act की धारा 13 बच्चों का अश्लील उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने से संबंधित है। धारा 14 में ऐसे अपराध के लिए सजा का प्रावधान है, जबकि धारा 15 बच्चों से संबंधित अश्लील सामग्री को रखने के कुछ विशेष मामलों में दंड निर्धारित करती है।

धारा 15 के अंतर्गत अलग-अलग परिस्थितियों में सामग्री को मिटाने, नष्ट करने या रिपोर्ट करने में विफल रहने तथा उसे साझा करने या प्रसारित करने जैसे आचरण के संबंध में अलग-अलग दंडात्मक प्रावधान लागू हो सकते हैं।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। केवल इंटरनेट पर कोई शब्द टाइप कर देना और जानबूझकर बच्चों के यौन शोषण को दर्शाने वाली सामग्री खोजना, डाउनलोड करना या संग्रहित करना हर परिस्थिति में एक समान कानूनी स्थिति नहीं रखता। अपराध का निर्धारण लागू कानून की भाषा और मामले के तथ्यों के आधार पर किया जाता है।

इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि बच्चों से संबंधित अश्लील सामग्री के निर्माण, संग्रहण, प्रसारण या अन्य संबंधित गतिविधियों पर POCSO Act के विशिष्ट प्रावधान लागू हो सकते हैं। किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी का निर्धारण संबंधित साक्ष्यों और कानूनी शर्तों के आधार पर होगा।

IT Act, 2000 के तहत भी हो सकती है कार्रवाई

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 यानी Information Technology Act, 2000 में इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से अश्लील और यौन सामग्री के प्रकाशन तथा प्रसारण से संबंधित प्रावधान हैं।

इस कानून की धारा 67 इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील सामग्री के प्रकाशन या प्रसारण से संबंधित है। धारा 67A इलेक्ट्रॉनिक रूप में स्पष्ट यौन कृत्य वाली सामग्री के प्रकाशन या प्रसारण से जुड़ी है।

वहीं, धारा 67B में इलेक्ट्रॉनिक रूप में बच्चों को यौन रूप से स्पष्ट कृत्यों में दर्शाने वाली सामग्री से संबंधित विशिष्ट अपराधों का प्रावधान है। इसकी भाषा में ऐसी सामग्री को प्रकाशित करना, प्रसारित करना, बनाना, एकत्र करना, खोज करना, ब्राउज करना, डाउनलोड करना या अन्य संबंधित गतिविधियां शामिल हो सकती हैं, बशर्ते मामले में लागू कानूनी तत्व पूरे हों।

इसलिए बच्चों के यौन शोषण से संबंधित डिजिटल सामग्री के मामले में IT Act की धारा 67B विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

हालांकि, हर मामले में सभी धाराएं स्वतः लागू नहीं होतीं। पुलिस और अदालत को यह देखना होता है कि संबंधित गतिविधि कानून में परिभाषित अपराध के दायरे में आती है या नहीं।

यदि किसी व्यक्ति के सामने अनजाने में ऐसी सामग्री आ जाती है, तो उसे जानबूझकर खोलने, डाउनलोड करने, संग्रहित करने या दूसरों को भेजने से बचना चाहिए। इसके बजाय संबंधित सामग्री की सूचना उचित माध्यम से देनी चाहिए।

क्या सामग्री डिलीट करने के बाद भी डिजिटल साक्ष्य मिल सकते हैं?

राजस्थान पुलिस ने नागरिकों को आगाह किया है कि डिजिटल गतिविधियों से संबंधित जानकारी जांच में सामने आ सकती है। इसलिए यह मानना गलत है कि किसी फाइल को मोबाइल या कंप्यूटर से डिलीट कर देने के बाद उससे संबंधित हर प्रकार का डिजिटल साक्ष्य अनिवार्य रूप से समाप्त हो जाता है।

डिजिटल जांच में परिस्थितियों के अनुसार डिवाइस का डेटा, उपलब्ध लॉग, अकाउंट गतिविधियां, संबंधित सर्वर रिकॉर्ड और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

हालांकि, यह दावा करना भी सही नहीं होगा कि हर ऑनलाइन गतिविधि का पूरा रिकॉर्ड हमेशा सुरक्षित रहता है या प्रत्येक डिलीट की गई फाइल निश्चित रूप से बरामद की जा सकती है। डिजिटल रिकॉर्ड की उपलब्धता कई बातों पर निर्भर करती है, जिनमें प्लेटफॉर्म की नीतियां, डेटा सुरक्षित रखने की अवधि, तकनीकी व्यवस्था और जांच की परिस्थितियां शामिल हैं।

यदि किसी मामले में डिजिटल साक्ष्य उपलब्ध हों, तो उनकी प्रामाणिकता और कानूनी स्वीकार्यता का परीक्षण लागू कानून के अनुसार किया जाता है।

इसलिए इंटरनेट का इस्तेमाल करते समय यह समझना आवश्यक है कि ऑनलाइन गतिविधियां कानूनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हैं। किसी अवैध सामग्री को हटाने से पहले या बाद में साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ करना भी जांच को प्रभावित कर सकता है।

अनजाने में ऐसी सामग्री मिल जाए तो क्या करें?

कई बार इंटरनेट ब्राउज करते समय या सोशल मीडिया पर संदेश प्राप्त होने के कारण किसी व्यक्ति के सामने अनचाही या संदिग्ध सामग्री आ सकती है। ऐसी स्थिति में घबराने या उसे दूसरों को भेजने के बजाय सावधानी से कदम उठाना चाहिए।

सबसे पहले, सामग्री को आगे न बढ़ाएं। यदि किसी लिंक या संदेश में बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री होने का संदेह है, तो उसे डाउनलोड या साझा न करें।

दूसरा, सामग्री की प्रतियां न बनाएं। उसे सुरक्षित रखने के उद्देश्य से स्क्रीनशॉट लेना, वीडियो डाउनलोड करना या फाइल को क्लाउड में अपलोड करना उचित नहीं है। इससे अनावश्यक रूप से ऐसी सामग्री की प्रतियां बन सकती हैं।

तीसरा, उपलब्ध संदर्भ की जानकारी रखें। यदि सुरक्षित रूप से संभव हो, तो संबंधित वेबसाइट का पता, उपयोगकर्ता का नाम, संदेश प्राप्त होने का समय और प्लेटफॉर्म का विवरण नोट किया जा सकता है। इसके लिए आपत्तिजनक सामग्री को खोलना या उसकी प्रति बनाना आवश्यक नहीं है।

चौथा, संबंधित अधिकारियों को सूचना दें। नागरिक राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल या निकटतम पुलिस थाने के माध्यम से शिकायत कर सकते हैं।

पांचवां, संदिग्ध व्यक्ति से सीधे टकराव से बचें। ऑनलाइन आरोपी से बहस करने, उसे धमकाने या स्वयं जांच करने की कोशिश करने के बजाय मामले को पुलिस के सामने रखना बेहतर है।

यदि किसी बच्चे की तत्काल सुरक्षा को खतरा हो, तो संबंधित पुलिस या बाल संरक्षण एजेंसी से तुरंत सहायता लेनी चाहिए।

राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत कैसे करें?

भारत सरकार का राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल नागरिकों को साइबर अपराधों की सूचना देने के लिए बनाया गया है।

पोर्टल का उपयोग करने के लिए नागरिक इसकी आधिकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं:

आधिकारिक पोर्टल: राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल

शिकायत करते समय उपलब्ध विकल्पों में उपयुक्त श्रेणी का चयन करना चाहिए और घटना से संबंधित जानकारी सही तरीके से दर्ज करनी चाहिए।

राजस्थान पुलिस की एडवाइजरी के अनुसार, नागरिकों के लिए गुमनाम रिपोर्टिंग का विकल्प भी उपलब्ध है। हालांकि, यह सुविधा किस श्रेणी में और किन शर्तों पर उपलब्ध है, इसकी पुष्टि पोर्टल पर दिए गए वर्तमान निर्देशों से करनी चाहिए।

यदि किसी शिकायत के लिए संपर्क संबंधी जानकारी या अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जाते हैं, तो उन्हें संबंधित निर्देशों के अनुसार उपलब्ध कराया जा सकता है।

शिकायत दर्ज करने के बाद प्राप्त संदर्भ संख्या को सुरक्षित रखना उपयोगी हो सकता है। इससे भविष्य में शिकायत की स्थिति जानने या संबंधित अधिकारियों से संपर्क करने में सहायता मिल सकती है।

ध्यान रहे कि पोर्टल पर रिपोर्ट दर्ज करना और पुलिस द्वारा औपचारिक प्राथमिकी (FIR) दर्ज करना अलग-अलग प्रक्रियाएं हो सकती हैं। शिकायत की प्रकृति और उपलब्ध जानकारी के आधार पर आगे की कार्रवाई संबंधित एजेंसी करती है।

साइबर हेल्पलाइन और बाल हेल्पलाइन की मदद लें

राजस्थान पुलिस ने नागरिकों को सहायता के लिए विभिन्न माध्यमों की जानकारी दी है।

  • राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल: cybercrime.gov.in
  • साइबर हेल्पलाइन: 1930। यह मुख्य रूप से साइबर वित्तीय धोखाधड़ी की रिपोर्टिंग और उससे संबंधित त्वरित सहायता के लिए है। बच्चों के ऑनलाइन शोषण से जुड़े मामलों में पोर्टल या पुलिस से भी संपर्क करना चाहिए।
  • चाइल्ड हेल्पलाइन: 1098। संकट में बच्चों की सहायता के लिए उपलब्ध हेल्पलाइन।
  • राजस्थान पुलिस की साइबर हेल्पडेस्क: 9256001930 और 9257510100। इन नंबरों की वर्तमान उपलब्धता की आधिकारिक माध्यम से पुष्टि कर लेना उचित है।
  • निकटतम पुलिस थाना या साइबर पुलिस स्टेशन: संदिग्ध सामग्री, ऑनलाइन शोषण या बच्चे की सुरक्षा से जुड़े मामले की सूचना देने के लिए संपर्क किया जा सकता है।

यदि किसी बच्चे के साथ वास्तविक समय में शोषण हो रहा है या उसकी सुरक्षा को तत्काल खतरा है, तो केवल ऑनलाइन शिकायत दर्ज करके प्रतीक्षा न करें। निकटतम पुलिस थाने या आपातकालीन सहायता से संपर्क करें।

माता-पिता बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित कैसे रखें?

बच्चों की डिजिटल सुरक्षा केवल पुलिस या कानून की जिम्मेदारी नहीं है। माता-पिता, शिक्षक और समाज भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

बच्चों को कम उम्र से ही सुरक्षित और असुरक्षित व्यवहार के बारे में उनकी आयु के अनुसार जानकारी देनी चाहिए। उन्हें समझाया जाना चाहिए कि कोई व्यक्ति यदि उन्हें असहज महसूस कराने वाली तस्वीरें मांगता है, अनुचित संदेश भेजता है या किसी बात को गुप्त रखने के लिए दबाव डालता है, तो वे किसी विश्वसनीय वयस्क को इसकी जानकारी दे सकते हैं।

बच्चों को यह भी बताना चाहिए कि इंटरनेट पर किसी व्यक्ति की पहचान हमेशा वास्तविक नहीं होती। कोई व्यक्ति अपने बारे में गलत जानकारी देकर बच्चों का विश्वास जीतने की कोशिश कर सकता है।

माता-पिता बच्चों के साथ डिजिटल सुरक्षा पर नियमित बातचीत करें और जरूरत के अनुसार गोपनीयता सेटिंग्स, अकाउंट सुरक्षा तथा अभिभावकीय नियंत्रण का उपयोग करें।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि बच्चा किसी अनुचित ऑनलाइन संपर्क के बारे में जानकारी देता है, तो उसे दोष देने या डांटने के बजाय उसकी बात ध्यान से सुनी जाए। डर और शर्म के कारण बच्चे कई बार गंभीर घटनाओं की जानकारी देने से बचते हैं।

निष्कर्ष: एक जिम्मेदार शिकायत किसी बच्चे को बचाने में मदद कर सकती है

राजस्थान पुलिस की यह एडवाइजरी इंटरनेट पर बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री के प्रसार को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण जनजागरूकता संदेश देती है।

CSAM जैसी सामग्री केवल एक डिजिटल फाइल नहीं है। इसके पीछे किसी बच्चे का शोषण और उसकी गरिमा तथा सुरक्षा का उल्लंघन जुड़ा हो सकता है। ऐसी सामग्री को खोजना, डाउनलोड करना, संग्रहित करना या प्रसारित करना लागू कानूनों के तहत गंभीर कानूनी परिणाम पैदा कर सकता है।

POCSO Act, 2012 और IT Act, 2000 में बच्चों के यौन शोषण से संबंधित अपराधों तथा इलेक्ट्रॉनिक सामग्री के संबंध में महत्वपूर्ण प्रावधान मौजूद हैं। हालांकि, किसी विशेष गतिविधि में अपराध बनता है या नहीं, इसका निर्धारण संबंधित कानूनी प्रावधानों और मामले के तथ्यों के आधार पर किया जाता है।

यदि किसी नागरिक के सामने ऐसी सामग्री आती है, तो उसे आगे भेजने या उसकी प्रतियां बनाने के बजाय संबंधित पोर्टल अथवा पुलिस को सूचना देनी चाहिए। बच्चों को डिजिटल सुरक्षा के बारे में जागरूक करना और उनके लिए भरोसेमंद वातावरण तैयार करना भी उतना ही जरूरी है।

इंटरनेट पर जिम्मेदार व्यवहार, समय पर शिकायत और बच्चों की सुरक्षा के प्रति संवेदनशीलता ऐसे अपराधों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।