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बच्चों के ऑनलाइन शोषण के अंतरराष्ट्रीय गिरोह से जुड़ा मामला: भारतीय युवक को फ्रांस में 20 साल की जेल

बच्चों के ऑनलाइन शोषण के अंतरराष्ट्रीय गिरोह से जुड़ा मामला: भारतीय युवक को फ्रांस में 20 साल की जेल

पेरिस में अदालत का सख्त फैसला, अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा के बच्चों को निशाना बनाने वाले नेटवर्क से जुड़ा मामला

        इंटरनेट और सोशल मीडिया ने दुनिया को एक-दूसरे के करीब लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज बच्चे पढ़ाई, मनोरंजन और दोस्तों से बातचीत के लिए विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इंटरनेट की इसी पहुंच का फायदा उठाकर कुछ आपराधिक गिरोह बच्चों को अपने जाल में फंसाते हैं और उनका शोषण करते हैं। ऐसा ही एक गंभीर मामला फ्रांस की राजधानी पेरिस में सामने आया है, जहां एक अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन आपराधिक नेटवर्क से जुड़े भारतीय युवक को 20 साल की जेल की सजा सुनाई गई है।

एसोसिएटेड प्रेस (AP) की रिपोर्ट के अनुसार, 29 वर्षीय रोहन राणे को नाबालिगों के यौन उत्पीड़न और उन्हें यातना देने से संबंधित अपराधों में दोषी ठहराया गया। अदालत ने उसे 20 साल की कैद की सजा सुनाई, जो उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों के तहत अधिकतम सजा बताई गई है।

इस मामले में आरोप था कि एक अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन गिरोह बच्चों को अपने प्रभाव में लेकर उनसे हिंसक और यौन गतिविधियों से संबंधित वीडियो बनवाता था। बच्चों को ऑनलाइन मंच Discord के माध्यम से नेटवर्क तक पहुंचाया जाता था। इसके बाद उन्हें कथित रूप से ‘CVLT’ नामक समूह के अधीन कर उनका शोषण किया जाता था।

मामले की गंभीरता को देखते हुए फ्रांसीसी अदालत ने सुनवाई बंद कमरे में करने का निर्णय लिया। यह मामला न केवल बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से संबंधित है, बल्कि इस बात की भी याद दिलाता है कि इंटरनेट पर होने वाले अपराधों की जांच और अभियोजन के लिए विभिन्न देशों की एजेंसियों के बीच सहयोग कितना आवश्यक है।

कौन है रोहन राणे और क्या है पूरा मामला?

उपलब्ध समाचार विवरण के अनुसार, रोहन राणे मूल रूप से महाराष्ट्र के पुणे का रहने वाला है। घटना और जांच से संबंधित अवधि में वह फ्रांस में पढ़ाई कर रहा था।

उस पर आरोप था कि वह ऐसे अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन आपराधिक नेटवर्क से जुड़ा हुआ था, जिसके सदस्य बच्चों को निशाना बनाते थे। इस नेटवर्क के बारे में जांच के दौरान सामने आया कि बच्चों को ऑनलाइन संपर्क के माध्यम से अपने प्रभाव में लिया जाता था और फिर उन्हें हिंसक तथा यौन गतिविधियों से संबंधित सामग्री तैयार करने के लिए मजबूर किया जाता था।

ऐसे अपराधों में बच्चों को अक्सर मानसिक दबाव, धमकी, भावनात्मक नियंत्रण या अन्य तरीकों से अपने प्रभाव में रखने की कोशिश की जाती है। हालांकि, किसी विशेष मामले में किस तरीके का इस्तेमाल किया गया, इसका निर्धारण जांच और अदालत के अभिलेखों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

इस मामले में अदालत ने राणे को नाबालिगों के यौन उत्पीड़न और यातना से संबंधित अपराधों का दोषी पाया। इसके बाद उसे 20 साल की कैद की सजा सुनाई गई।

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि मामले के सभी विस्तृत तथ्य सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए अपराध के प्रत्येक घटनाक्रम या पीड़ितों के साथ हुई घटनाओं के बारे में अतिरिक्त विवरण का अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।

अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा के बच्चों को बनाया गया निशाना

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कथित आपराधिक नेटवर्क की गतिविधियां किसी एक देश तक सीमित नहीं थीं। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, इस नेटवर्क से जुड़े अपराधों में अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा के बच्चों के शोषण का आरोप सामने आया।

डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से संचालित होने वाले अपराधों में अपराधी और पीड़ित अलग-अलग देशों में हो सकते हैं। किसी दूसरे देश में बैठा व्यक्ति इंटरनेट के जरिए बच्चों से संपर्क कर सकता है, जबकि अपराध से संबंधित डिजिटल सामग्री किसी अन्य देश में तैयार या प्रसारित की जा सकती है।

यही कारण है कि ऑनलाइन बाल शोषण के मामलों की जांच पारंपरिक अपराधों की तुलना में अधिक जटिल हो सकती है। पुलिस को डिजिटल साक्ष्य जुटाने, संबंधित खातों की पहचान करने, संचार के रिकॉर्ड का विश्लेषण करने और अलग-अलग देशों में मौजूद व्यक्तियों के बीच संबंध स्थापित करने की आवश्यकता पड़ सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के कम से कम पांच पीड़ितों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील हिप्पोलिट मारकेटी ने इस मामले में पीड़ितों को हुए गंभीर नुकसान की बात कही।

उन्होंने कहा कि पीड़ितों की जिंदगी बुरी तरह प्रभावित हुई है और उन्हें गंभीर मानसिक तथा व्यक्तिगत क्षति पहुंची है।

बच्चों के विरुद्ध होने वाले ऐसे अपराधों का प्रभाव केवल घटना के समय तक सीमित नहीं रहता। कई बार पीड़ितों को लंबे समय तक मानसिक तनाव, भय, सामाजिक कठिनाइयों और भरोसे से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

Discord के माध्यम से बच्चों तक पहुंचने का आरोप

इस मामले में ऑनलाइन मंच Discord का नाम सामने आया है। यह एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जहां उपयोगकर्ता टेक्स्ट, वॉइस और वीडियो के माध्यम से बातचीत कर सकते हैं तथा विभिन्न ऑनलाइन समुदायों में शामिल हो सकते हैं।

ऐसे मंचों का इस्तेमाल शिक्षा, गेमिंग, तकनीकी चर्चाओं और अन्य वैध गतिविधियों के लिए भी किया जाता है। इसलिए किसी प्लेटफॉर्म का नाम किसी आपराधिक मामले में सामने आने का अर्थ यह नहीं है कि उस मंच के सभी उपयोगकर्ता या गतिविधियां आपराधिक हैं।

हालांकि, ऑनलाइन समुदायों की संरचना का दुरुपयोग करके अपराधी बच्चों से संपर्क स्थापित कर सकते हैं। वे पहले सामान्य बातचीत के जरिए विश्वास जीतने की कोशिश कर सकते हैं और बाद में अनुचित मांगों, धमकियों या दबाव के माध्यम से उनका शोषण कर सकते हैं।

बच्चों को इस तरह के जाल में फंसाने की प्रक्रिया को कई संदर्भों में ऑनलाइन ग्रूमिंग कहा जाता है। इसमें अपराधी धीरे-धीरे बच्चे के साथ ऐसा संबंध बनाता है, जिसका उद्देश्य आगे चलकर उसका शोषण करना हो सकता है।

वर्तमान मामले में उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों को Discord के जरिए कथित नेटवर्क तक पहुंचाया गया था। इसके बाद उन्हें CVLT नामक समूह का गुलाम बनाने और हिंसक तथा यौन गतिविधियों से संबंधित वीडियो तैयार करवाने के आरोप सामने आए।

ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों के लिए यह पता लगाना आवश्यक होता है कि किसने किससे संपर्क किया, बच्चों को किस प्रकार प्रभावित किया गया और अपराध में शामिल व्यक्तियों की भूमिका क्या थी।

CVLT समूह पर क्या आरोप हैं?

समाचार रिपोर्ट में CVLT नामक समूह का उल्लेख उस नेटवर्क के संदर्भ में किया गया है, जिससे कथित रूप से बच्चों का शोषण जुड़ा था।

रिपोर्ट के अनुसार, इस समूह से जुड़े लोगों पर बच्चों को अपने नियंत्रण में लेकर हिंसक और यौन गतिविधियों से संबंधित वीडियो बनाने के लिए मजबूर करने के आरोप थे।

इस प्रकार के मामलों में अपराधियों का उद्देश्य केवल ऑनलाइन बातचीत तक सीमित नहीं रहता। वे बच्चों को ऐसी गतिविधियों में शामिल करने की कोशिश कर सकते हैं, जिनसे उन्हें शारीरिक, मानसिक या यौन नुकसान पहुंचे।

हालांकि, समूह की पूरी संरचना, उसके सभी सदस्यों की पहचान और प्रत्येक आरोपी की भूमिका के संबंध में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए इस मामले में अदालत द्वारा स्थापित तथ्यों और समाचार रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है।

किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण उसके विरुद्ध उपलब्ध साक्ष्यों और अदालत के निर्णय के आधार पर किया जाता है। केवल किसी समूह का नाम सामने आने से उससे संबंधित प्रत्येक व्यक्ति को किसी विशेष अपराध का दोषी नहीं माना जा सकता।

अमेरिका में भी गिरफ्तार किए गए नेटवर्क के सदस्य

इस मामले का दायरा केवल फ्रांस तक सीमित नहीं बताया गया है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, इस अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के कम से कम तीन अन्य सदस्यों को अमेरिका में गिरफ्तार किया जा चुका है।

यह तथ्य इस बात को दर्शाता है कि ऑनलाइन अपराधों की जांच में विभिन्न देशों की कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच सहयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

जब अपराध से जुड़े लोग अलग-अलग देशों में रहते हैं, तो किसी एक देश की पुलिस के लिए पूरे नेटवर्क की जांच अकेले करना कठिन हो सकता है। ऐसी परिस्थितियों में संबंधित देशों की एजेंसियां उपलब्ध साक्ष्यों, कानूनी प्रक्रियाओं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से जांच को आगे बढ़ाती हैं।

डिजिटल साक्ष्यों के मामले में यह सहयोग और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। ऑनलाइन संदेश, खातों से संबंधित जानकारी, डिजिटल फाइलें और अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड अपराध की जांच में उपयोगी हो सकते हैं। हालांकि, ऐसे साक्ष्यों को कानून के अनुसार प्राप्त करना, सुरक्षित रखना और अदालत में उनकी विश्वसनीयता स्थापित करना आवश्यक होता है।

अमेरिका में अन्य संदिग्धों की गिरफ्तारी और फ्रांस में राणे के खिलाफ मुकदमा इस मामले के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को उजागर करते हैं।

2021 में फ्रांस के एंटीब शहर से हुई गिरफ्तारी

उपलब्ध समाचार विवरण के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों से मिली सूचना के बाद फ्रांस के दक्षिणी शहर एंटीब में पुलिस ने वर्ष 2021 में रोहन राणे को गिरफ्तार किया था।

इस गिरफ्तारी के बाद फ्रांसीसी अधिकारियों ने उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की। रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों ने प्रत्यर्पण के प्रश्न पर विचार करने से पहले फ्रांस में उसके विरुद्ध आपराधिक मुकदमे की कार्यवाही पूरी करने का निर्णय लिया।

प्रत्यर्पण यानी Extradition वह कानूनी प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से एक देश किसी आरोपी या दोषसिद्ध व्यक्ति को दूसरे देश के अनुरोध पर वहां की न्यायिक प्रक्रिया का सामना करने के लिए सौंप सकता है। यह प्रक्रिया संबंधित देशों के कानूनों, संधियों और लागू कानूनी शर्तों के अधीन होती है।

यदि कोई आरोपी एक देश में गिरफ्तार होता है, जबकि अपराध की जांच या अभियोजन दूसरे देश में चल रहा हो, तो यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि मुकदमा कहां चलाया जाएगा और संबंधित व्यक्ति को किस देश की अदालत के सामने पेश किया जाएगा।

इस मामले में फ्रांसीसी अधिकारियों ने पहले फ्रांस में आपराधिक कार्यवाही पूरी करने का निर्णय लिया। हालांकि, उपलब्ध जानकारी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मुकदमे के बाद प्रत्यर्पण के संबंध में अंतिम निर्णय क्या होगा।

अदालत ने सुनवाई बंद कमरे में क्यों की?

बच्चों के यौन शोषण और यातना से जुड़े मामलों में पीड़ितों की पहचान तथा उनकी गरिमा की रक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए फ्रांसीसी न्यायाधीशों ने मुकदमे की सुनवाई बंद कमरे में करने का आदेश दिया। बंद कमरे में सुनवाई का अर्थ है कि मुकदमे की पूरी कार्यवाही आम जनता और सामान्य दर्शकों के लिए खुली अदालत में नहीं की जाती।

ऐसी व्यवस्था का उद्देश्य परिस्थितियों के अनुसार पीड़ितों की निजता की रक्षा करना, संवेदनशील जानकारी के अनावश्यक प्रसार को रोकना और न्यायिक प्रक्रिया को उचित वातावरण में संचालित करना हो सकता है।

बाल पीड़ितों से संबंधित मामलों में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि सार्वजनिक रूप से पहचान उजागर होने से उन्हें दोबारा मानसिक परेशानी, सामाजिक दबाव या अन्य नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

हालांकि, बंद कमरे में सुनवाई के बावजूद अदालत कानून के अनुसार साक्ष्यों का परीक्षण करती है और निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही दिया जाता है।

इस मामले में अदालत ने राणे को दोषी ठहराते हुए 20 साल की कैद की सजा सुनाई।

पीड़ितों पर अपराध का गंभीर प्रभाव

अमेरिका के पांच पीड़ितों का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील हिप्पोलिट मारकेटी ने कहा कि पीड़ितों को गंभीर नुकसान पहुंचा है और उनकी जिंदगी पूरी तरह बिखर गई है।

यह टिप्पणी ऐसे अपराधों के मानवीय प्रभाव को सामने लाती है। बच्चों के साथ होने वाला शोषण उनके शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक विकास, शिक्षा, सामाजिक संबंधों और भविष्य के जीवन को प्रभावित कर सकता है।

ऑनलाइन अपराधों में नुकसान का एक अतिरिक्त पहलू यह भी है कि डिजिटल सामग्री के प्रसार का भय पीड़ितों को लंबे समय तक परेशान कर सकता है। यदि किसी बच्चे को उसकी इच्छा के विरुद्ध सामग्री बनाने के लिए मजबूर किया गया हो, तो उसे भविष्य में उस सामग्री के दोबारा सामने आने की आशंका हो सकती है।

इसलिए ऐसे मामलों में केवल आरोपी को सजा देना ही महत्वपूर्ण नहीं है। पीड़ितों को उचित सहायता, गोपनीयता, परामर्श और आवश्यक कानूनी संरक्षण उपलब्ध कराना भी आवश्यक है।

बच्चों के शोषण से जुड़े मामलों में परिवार, स्कूल, सामाजिक संस्थाओं और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। बच्चों को यह विश्वास दिलाना आवश्यक है कि यदि उनके साथ कोई अनुचित घटना होती है, तो वे बिना डर के किसी विश्वसनीय वयस्क या संबंधित अधिकारी को इसकी जानकारी दे सकते हैं।

भारत में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा क्यों महत्वपूर्ण है?

यह मामला फ्रांस में सामने आया है, लेकिन इससे जुड़ा विषय भारत सहित पूरी दुनिया के लिए प्रासंगिक है।

भारत में बच्चे मोबाइल फोन, ऑनलाइन गेम, सोशल मीडिया, मैसेजिंग सेवाओं और डिजिटल शिक्षा प्लेटफॉर्म का तेजी से इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे उन्हें नई जानकारियां प्राप्त करने और सीखने के अवसर मिलते हैं। लेकिन इंटरनेट का असुरक्षित इस्तेमाल उन्हें ऑनलाइन धोखाधड़ी, धमकी, अनुचित संपर्क और शोषण के जोखिम में भी डाल सकता है।

अभिभावकों को बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों के प्रति जागरूक रहना चाहिए। इसका अर्थ बच्चों की हर बातचीत पर अनावश्यक निगरानी रखना नहीं, बल्कि उन्हें डिजिटल सुरक्षा के नियम समझाना और ऐसा वातावरण तैयार करना है, जिसमें वे किसी समस्या की जानकारी बिना डर के दे सकें।

बच्चों को समझाया जाना चाहिए कि इंटरनेट पर किसी अजनबी को निजी जानकारी, घर का पता, स्कूल का विवरण, पासवर्ड या निजी तस्वीरें साझा नहीं करनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति उनसे अनुचित तस्वीरें या वीडियो मांगता है, धमकी देता है अथवा उन्हें किसी गतिविधि के लिए मजबूर करता है, तो उन्हें बातचीत रोककर विश्वसनीय वयस्क को बताना चाहिए।

यदि किसी बच्चे को ऑनलाइन धमकी या शोषण का सामना करना पड़े, तो संबंधित संदेशों और खातों की जानकारी सुरक्षित रखना उपयोगी हो सकता है। हालांकि, आपत्तिजनक सामग्री को डाउनलोड करना, उसकी प्रतियां बनाना या दूसरों को भेजना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में पुलिस या संबंधित साइबर अपराध इकाई से सहायता लेनी चाहिए।

डिजिटल अपराधों के खिलाफ कानून की भूमिका

ऑनलाइन माध्यम से बच्चों के शोषण से जुड़े अपराधों की जांच में संबंधित देश के आपराधिक कानून, बाल संरक्षण संबंधी प्रावधान और डिजिटल साक्ष्य से जुड़े नियम महत्वपूर्ण होते हैं।

भारत में बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण के लिए Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012 यानी POCSO Act लागू है। इस कानून में बच्चों के विरुद्ध विभिन्न प्रकार के यौन अपराधों के लिए दंडात्मक प्रावधान हैं।

इसके अतिरिक्त, परिस्थितियों के अनुसार सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के प्रावधान भी प्रासंगिक हो सकते हैं, विशेष रूप से जब मामला इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से संबंधित यौन सामग्री या बच्चों के शोषण से जुड़ा हो।

हालांकि, फ्रांस में सुनाए गए इस फैसले पर भारतीय कानून सीधे लागू होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। रोहन राणे के विरुद्ध मुकदमा फ्रांस में चला और सजा फ्रांसीसी अदालत ने वहां लागू कानून के तहत सुनाई।

इसलिए इस मामले को भारतीय कानूनी प्रावधानों के साथ समझते समय दोनों देशों के अधिकार क्षेत्र और लागू कानूनों के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है।

निष्कर्ष: ऑनलाइन दुनिया में बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता

रोहन राणे को फ्रांस में 20 साल की जेल की सजा सुनाए जाने का मामला ऑनलाइन बाल शोषण की गंभीरता और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक नेटवर्क के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के महत्व को सामने लाता है।

उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, इस नेटवर्क पर अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा के बच्चों को ऑनलाइन माध्यमों से अपने प्रभाव में लेकर उनका शोषण करने के आरोप थे। अमेरिकी अधिकारियों से मिली सूचना के बाद फ्रांस में वर्ष 2021 में राणे की गिरफ्तारी हुई और मुकदमे की सुनवाई पूरी होने के बाद उसे अधिकतम 20 साल की कैद की सजा सुनाई गई।

इस मामले में अदालत की कार्रवाई, अन्य देशों में नेटवर्क के सदस्यों की गिरफ्तारी और पीड़ितों के प्रतिनिधि वकील की टिप्पणियां इस बात पर ध्यान दिलाती हैं कि डिजिटल अपराधों का असर वास्तविक जीवन पर कितना गंभीर हो सकता है।

इंटरनेट की दुनिया में बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए तकनीकी उपायों के साथ जागरूकता, प्रभावी कानून, समय पर शिकायत और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भी आवश्यकता है।

अभिभावकों, शिक्षकों और समाज को बच्चों के साथ विश्वासपूर्ण संवाद बनाए रखना चाहिए, ताकि वे किसी भी अनुचित ऑनलाइन संपर्क या धमकी के बारे में खुलकर बता सकें।

अंततः, तकनीक का विकास तभी सार्थक है, जब उसका इस्तेमाल बच्चों के अधिकारों, सुरक्षा और गरिमा की रक्षा के साथ किया जाए।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।