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20 लाख रुपये से कम के होम लोन पर सरफेसी एक्ट की कार्रवाई पर सवाल, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मकान का कब्जा लौटाने का दिया आदेश

20 लाख रुपये से कम के होम लोन पर सरफेसी एक्ट की कार्रवाई पर सवाल, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मकान का कब्जा लौटाने का दिया आदेश

बैंक या वित्तीय संस्थान से लिया गया होम लोन समय पर नहीं चुकाने की स्थिति में कर्जदाता कई कानूनी उपायों का सहारा ले सकते हैं। इनमें एक महत्वपूर्ण कानून है सरफेसी एक्ट, जिसके तहत निर्धारित शर्तें पूरी होने पर बैंक और पात्र वित्तीय संस्थान गिरवी रखी गई संपत्ति पर कब्जा लेकर कर्ज की वसूली की कार्रवाई कर सकते हैं। हालांकि, इस कानून का इस्तेमाल हर प्रकार के ऋण और हर परिस्थिति में नहीं किया जा सकता। इसके लिए कानून में निर्धारित शर्तों और संबंधित अधिसूचनाओं का पालन करना आवश्यक है।

इसी कानूनी सवाल पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित किया है। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि 20 लाख रुपये से कम के होम लोन की वसूली के लिए सरफेसी एक्ट के तहत की गई कार्रवाई अधिकार क्षेत्र से बाहर हो सकती है। मामला आगरा की एक आवासीय संपत्ति से जुड़ा है, जहां 17.67 लाख रुपये के होम लोन की वसूली के लिए मकान पर कब्जा लेने की कार्रवाई की गई थी।

न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने नुसरत खान व अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए संबंधित प्रशासनिक आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी। अदालत ने संपत्ति का कब्जा तत्काल याचियों को लौटाने का निर्देश भी दिया। हालांकि, यह आदेश मामले के अंतिम निस्तारण से पहले पारित अंतरिम आदेश है। इसे इस निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए कि अदालत ने सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर अंतिम फैसला सुना दिया है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला उत्तर प्रदेश के आगरा जिले की एक आवासीय संपत्ति से संबंधित है। याचियों ने सम्मान कैपिटल लिमिटेड, जो पहले इंडिया बुल्स हाउसिंग फाइनेंस के नाम से जानी जाती थी, से अपना मकान खरीदने या उससे संबंधित आवासीय आवश्यकता पूरी करने के लिए 17.67 लाख रुपये का होम लोन लिया था।

ऋण लेने के बाद जब उसकी वसूली का मामला सामने आया, तो वित्तीय कंपनी ने सरफेसी एक्ट के प्रावधानों के तहत कार्रवाई शुरू कर दी। इस प्रक्रिया के अंतर्गत आगरा के अपर जिलाधिकारी वित्त एवं राजस्व ने 18 नवंबर 2023 को संपत्ति पर कब्जा लेने का आदेश पारित किया था।

इस आदेश के बाद याचियों के मकान पर कब्जा लेने की कार्रवाई की गई। इसके विरुद्ध याचियों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका मुख्य तर्क यह था कि जिस ऋण की वसूली के लिए सरफेसी एक्ट का इस्तेमाल किया गया, वह निर्धारित 20 लाख रुपये की सीमा से कम है। ऐसे में संबंधित वित्तीय कंपनी को इस कानून के तहत कार्रवाई करने का अधिकार नहीं था।

याचियों की ओर से उठाया गया यह सवाल केवल मकान के कब्जे तक सीमित नहीं था। इसका संबंध इस बात से भी था कि किसी वित्तीय संस्था को ऋण वसूली के लिए विशेष कानून के तहत कार्रवाई करने का अधिकार किन परिस्थितियों में प्राप्त होता है।

सरफेसी एक्ट क्या है?

सरफेसी एक्ट का पूरा नाम Securitisation and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest Act, 2002 है। हिंदी में इसे प्रतिभूतिकरण और वित्तीय परिसंपत्तियों का पुनर्निर्माण तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम कहा जाता है।

यह कानून वर्ष 2002 में बनाया गया था। इसका प्रमुख उद्देश्य बैंकों और पात्र वित्तीय संस्थानों को गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों यानी Non-Performing Assets (NPA) से संबंधित समस्याओं से निपटने और पात्र मामलों में गिरवी रखी संपत्तियों के माध्यम से ऋण की वसूली करने के लिए एक वैधानिक व्यवस्था उपलब्ध कराना है।

सामान्य तौर पर जब कोई व्यक्ति बैंक या वित्तीय संस्था से होम लोन लेता है, तो ऋण की सुरक्षा के लिए उसकी संपत्ति पर बंधक या अन्य वैधानिक प्रतिभूति हित बनाया जा सकता है। यदि उधारकर्ता ऋण चुकाने में चूक करता है और कानून में निर्धारित आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं, तो कर्जदाता सरफेसी एक्ट के तहत कार्रवाई कर सकता है।

इस कानून की धारा 13 में प्रतिभूति हित लागू करने से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान हैं। धारा 13(2) के अंतर्गत निर्धारित परिस्थितियों में कर्जदार को मांग नोटिस दिया जाता है। सामान्यतः इस नोटिस के माध्यम से 60 दिन के भीतर देयता का भुगतान करने के लिए कहा जाता है।

यदि निर्धारित समय में भुगतान नहीं होता और कानून की अन्य आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं, तो कर्जदाता धारा 13(4) के अंतर्गत उपलब्ध उपाय अपना सकता है। इनमें निर्धारित परिस्थितियों में गिरवी रखी संपत्ति का कब्जा लेना भी शामिल है।

हालांकि, इस कानून के अंतर्गत कार्रवाई करने के लिए केवल ऋण का बकाया होना पर्याप्त नहीं है। संबंधित संस्था की पात्रता, ऋण का प्रकार, लागू वैधानिक सीमाएं और प्रक्रिया का पालन भी महत्वपूर्ण है।

20 लाख रुपये की सीमा क्यों बनी विवाद का विषय?

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न होम लोन की राशि से संबंधित है। याचियों ने अदालत के समक्ष दलील दी कि उनका ऋण 17.67 लाख रुपये का था, जो 20 लाख रुपये से कम है।

याचियों के वकील ने तर्क दिया कि संबंधित हाउसिंग फाइनेंस कंपनी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी यानी Non-Banking Financial Company (NBFC) के दायरे में आती है। भारतीय रिजर्व बैंक की 12 फरवरी 2021 की अधिसूचना के अनुसार, ऐसी पात्र वित्तीय संस्थाओं को सरफेसी एक्ट के तहत ऋण वसूली की कार्रवाई करने के लिए निर्धारित शर्तों का पालन करना पड़ता है।

याचियों का कहना था कि अधिसूचना में निर्धारित 20 लाख रुपये की न्यूनतम ऋण सीमा के कारण 17.67 लाख रुपये के उनके होम लोन पर सरफेसी एक्ट के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती थी।

उनके अनुसार, जब संबंधित कानून या अधिसूचना किसी वित्तीय संस्था को विशेष अधिकार केवल निर्धारित परिस्थितियों में देती है, तो उन परिस्थितियों के बाहर उस अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

इसी आधार पर उन्होंने एडीएम वित्त एवं राजस्व द्वारा 18 नवंबर 2023 को पारित कब्जा आदेश को चुनौती दी।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि 20 लाख रुपये की सीमा को प्रत्येक बैंक, प्रत्येक वित्तीय संस्था और प्रत्येक प्रकार के ऋण पर बिना किसी अंतर के लागू मानना उचित नहीं होगा। इसके लिए संबंधित संस्था की कानूनी स्थिति, ऋण की प्रकृति, लागू अधिसूचना और मामले के तथ्यों की जांच आवश्यक है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने नुसरत खान व अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए याचियों की दलीलों पर विचार किया।

अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि प्रस्तुत मामले में सरफेसी एक्ट के तहत की गई कार्रवाई अधिकार क्षेत्र से बाहर हो सकती है। इसी आधार पर अदालत ने एडीएम वित्त एवं राजस्व के 18 नवंबर 2023 के आदेश के प्रभाव पर अगले आदेश तक रोक लगा दी।

न्यायालय का अंतरिम हस्तक्षेप इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी प्रशासनिक अधिकारी या वित्तीय संस्था द्वारा संपत्ति पर कब्जा लेने की कार्रवाई के पीछे वैधानिक अधिकार होना आवश्यक है। यदि संबंधित कार्रवाई ऐसे मामले में की गई हो, जिसमें कानून के तहत उस प्रक्रिया का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है, तो न्यायिक समीक्षा के माध्यम से उसे चुनौती दी जा सकती है।

हालांकि, अदालत की प्रथम दृष्टया टिप्पणी को अंतिम कानूनी निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए। मामले में राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया गया है और अगली सुनवाई के दौरान संबंधित पक्षों की दलीलों तथा अभिलेखों पर आगे विचार किया जा सकता है।

आगरा स्थित मकान का कब्जा लौटाने का आदेश

हाई कोर्ट ने केवल प्रशासनिक आदेश पर रोक लगाकर मामला समाप्त नहीं किया। अदालत ने संपत्ति के कब्जे के संबंध में भी स्पष्ट अंतरिम निर्देश दिया।

मामले में संबंधित संपत्ति आगरा के बलदेवपुरी कॉलोनी, मौजा कौलाखा में स्थित 132 वर्ग गज का मकान है। अदालत ने इस मकान का कब्जा तत्काल याचियों को लौटाने का आदेश दिया।

यह निर्देश मामले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि संपत्ति पर कब्जा खोने की स्थिति में संबंधित परिवार को वास्तविक और गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। यदि कब्जा लेने की कार्रवाई प्रथम दृष्टया अधिकार क्षेत्र से बाहर दिखाई देती है, तो अदालत परिस्थितियों के अनुसार अंतरिम राहत प्रदान कर सकती है।

हालांकि, कब्जा लौटाने का आदेश मिलने का अर्थ यह नहीं है कि ऋण अपने आप समाप्त हो गया या उधारकर्ता को बकाया चुकाने की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया। ऋण की देयता और उसे वसूलने के लिए अपनाई जाने वाली कानूनी प्रक्रिया दो अलग-अलग प्रश्न हैं।

इसलिए कर्जदारों को यह समझना चाहिए कि किसी वसूली प्रक्रिया में कानूनी कमी होने पर उसे चुनौती दी जा सकती है, लेकिन केवल उस आधार पर ऋण की मूल देनदारी समाप्त नहीं हो जाती।

संपत्ति बेचने या तीसरे पक्ष का अधिकार बनाने पर रोक

अदालत ने याचियों को भी कुछ शर्तों के अधीन रखा है। उन्हें संबंधित मकान को बेचने, उस पर किसी तीसरे पक्ष का अधिकार बनाने या संपत्ति को दोबारा बंधक रखने से रोक दिया गया है।

इस प्रकार के अंतरिम प्रतिबंध का उद्देश्य विवादित संपत्ति की वर्तमान स्थिति को सुरक्षित रखना होता है, ताकि मुकदमे के अंतिम निर्णय से पहले संपत्ति के अधिकारों में ऐसा परिवर्तन न हो जाए जिससे न्यायालय के लिए प्रभावी आदेश पारित करना कठिन हो जाए।

यदि किसी संपत्ति पर न्यायालय का अंतरिम आदेश लागू है, तो संबंधित पक्षों को उसकी शर्तों का पालन करना चाहिए। आदेश में लगाए गए प्रतिबंधों की अनदेखी भविष्य में अलग कानूनी विवाद उत्पन्न कर सकती है।

इस मामले में भी याचियों को कब्जा लौटाने की राहत दी गई, लेकिन साथ ही संपत्ति के हस्तांतरण और उस पर तीसरे पक्ष के अधिकार बनाने पर रोक लगाई गई। इससे स्पष्ट होता है कि अंतरिम राहत के साथ न्यायालय संपत्ति की सुरक्षा और विवाद के संतुलित समाधान को भी महत्व देता है।

रजिस्ट्रार को 72 घंटे के भीतर सूचना भेजने का निर्देश

हाई कोर्ट ने अपने आदेश के प्रभावी अनुपालन के लिए भी निर्देश दिए हैं।

अदालत ने रजिस्ट्रार को आदेश दिया कि 72 घंटे के भीतर आदेश की सूचना मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), आगरा के माध्यम से अपर जिलाधिकारी वित्त एवं राजस्व तक पहुंचाई जाए।

इस निर्देश का उद्देश्य संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को न्यायालय के आदेश की समय पर जानकारी उपलब्ध कराना है, ताकि आदेश के अनुपालन में अनावश्यक देरी न हो।

न्यायालय के आदेशों का पालन न्यायिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब किसी संपत्ति के कब्जे या प्रशासनिक कार्रवाई पर अंतरिम आदेश पारित होता है, तो संबंधित अधिकारियों तक आदेश की सूचना पहुंचना उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन के लिए आवश्यक हो सकता है।

राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय

मामले में हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। अगली सुनवाई 22 अक्टूबर को निर्धारित बताई गई है।

राज्य सरकार के जवाब और संबंधित अभिलेखों के आधार पर मामले के कानूनी पहलुओं पर आगे विचार किया जा सकता है। विशेष रूप से यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित वित्तीय संस्था पर कौन-से वैधानिक प्रावधान लागू होते हैं और याचियों के ऋण के संबंध में 20 लाख रुपये की सीमा का कानूनी प्रभाव क्या है।

चूंकि अदालत ने फिलहाल अंतरिम आदेश दिया है, इसलिए मामले के अंतिम परिणाम के संबंध में अभी कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

क्या बैंक या वित्तीय कंपनी छोटे होम लोन पर वसूली नहीं कर सकती?

इस मामले से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या 20 लाख रुपये से कम का होम लोन होने पर बैंक या वित्तीय कंपनी ऋण की वसूली नहीं कर सकती।

इसका उत्तर समझने के लिए दो बातों के बीच अंतर करना आवश्यक है।

पहली बात है ऋण की वसूली का अधिकार। यदि किसी व्यक्ति ने बैंक या वित्तीय संस्था से ऋण लिया है, तो वह अनुबंध और लागू कानून के अनुसार उसका भुगतान करने के लिए जिम्मेदार होता है। ऋण की राशि कम होने से यह जिम्मेदारी अपने आप समाप्त नहीं हो जाती।

दूसरी बात है वसूली के लिए किसी विशेष कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल करने का अधिकार। सरफेसी एक्ट के तहत संपत्ति पर कब्जा लेने जैसी कार्रवाई करने के लिए संबंधित संस्था और ऋण का कानून में निर्धारित शर्तों को पूरा करना जरूरी है।

इसलिए संभव है कि किसी संस्था को ऋण की वसूली का अधिकार तो हो, लेकिन वह किसी विशेष मामले में सरफेसी एक्ट की प्रक्रिया का इस्तेमाल करने की पात्र न हो। ऐसी स्थिति में उसे कानून के तहत उपलब्ध किसी अन्य उपयुक्त उपाय का सहारा लेना पड़ सकता है।

इसी अंतर को वर्तमान मामले में उठाई गई दलीलों के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि 20 लाख रुपये से कम के सभी ऋणों पर किसी भी प्रकार की कानूनी वसूली प्रतिबंधित है।

आरबीआई की अधिसूचना का कानूनी महत्व

भारतीय रिजर्व बैंक देश की बैंकिंग व्यवस्था और अपने नियामकीय अधिकार क्षेत्र में आने वाली वित्तीय संस्थाओं के लिए विभिन्न निर्देश और अधिसूचनाएं जारी करता है।

गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के संबंध में जारी निर्देशों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि इन संस्थाओं की गतिविधियां और अधिकार संबंधित कानूनों तथा नियामकीय शर्तों से प्रभावित होते हैं।

वर्तमान मामले में याचियों ने 12 फरवरी 2021 की आरबीआई अधिसूचना का हवाला देते हुए तर्क दिया कि 20 लाख रुपये से कम के ऋण पर संबंधित कंपनी सरफेसी एक्ट के तहत कार्रवाई नहीं कर सकती थी।

इस तर्क की कानूनी जांच करते समय अधिसूचना का वास्तविक पाठ, उसके लागू होने की शर्तें, संबंधित कंपनी की श्रेणी और ऋण की प्रकृति देखना आवश्यक होगा। साथ ही, यह भी निर्धारित करना होगा कि मामले के तथ्यों पर अधिसूचना का कौन-सा प्रावधान लागू होता है।

इसलिए किसी अन्य मामले में इस आदेश का हवाला देने से पहले अधिसूचना और न्यायालय के वास्तविक आदेश की प्रमाणित प्रति का अध्ययन करना उपयोगी होगा।

कर्जदारों के लिए इस मामले से क्या सीख मिलती है?

यह मामला उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जिन्होंने बैंक या हाउसिंग फाइनेंस कंपनी से होम लोन लिया है और जिनकी संपत्ति के विरुद्ध वसूली की कार्रवाई की जा रही है।

सबसे पहले, कर्जदार को ऋण संबंधी सभी दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए। इनमें ऋण समझौता, भुगतान की रसीदें, बैंक स्टेटमेंट, बकाया राशि का विवरण, नोटिस और संपत्ति से संबंधित दस्तावेज शामिल हैं।

दूसरे, यदि वित्तीय संस्था सरफेसी एक्ट के तहत कार्रवाई करती है, तो यह देखना चाहिए कि उसे कानून के तहत ऐसा करने का अधिकार है या नहीं। संबंधित नोटिस और कार्रवाई में अपनाई गई प्रक्रिया की जांच भी जरूरी है।

तीसरे, यदि किसी प्रशासनिक अधिकारी द्वारा संपत्ति पर कब्जा लेने का आदेश दिया जाता है, तो कर्जदार को उसके कानूनी आधार की जांच करानी चाहिए। आवश्यकता होने पर योग्य अधिवक्ता से सलाह लेकर उपयुक्त न्यायिक मंच पर चुनौती दी जा सकती है।

चौथे, अदालत से अंतरिम राहत मिलने पर उसके सभी निर्देशों का पालन करना आवश्यक है। यदि न्यायालय संपत्ति बेचने या तीसरे पक्ष के अधिकार बनाने पर रोक लगाता है, तो उस प्रतिबंध का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।

अंत में, केवल ऋण की राशि के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि सरफेसी एक्ट लागू होगा या नहीं। संबंधित कानून, अधिसूचना और मामले के तथ्यों का समग्र परीक्षण आवश्यक है।

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह अंतरिम आदेश इस बात को रेखांकित करता है कि ऋण की वसूली के लिए अपनाई जाने वाली कानूनी प्रक्रिया का वैधानिक आधार होना आवश्यक है। किसी बैंक या वित्तीय संस्था को बकाया ऋण वसूलने का अधिकार होने के बावजूद वह कानून में निर्धारित सीमाओं और शर्तों से बाहर जाकर कार्रवाई नहीं कर सकती।

नुसरत खान व अन्य के मामले में 17.67 लाख रुपये के होम लोन की वसूली के लिए सरफेसी एक्ट के तहत की गई कार्रवाई पर अदालत ने प्रथम दृष्टया सवाल उठाया। एडीएम वित्त एवं राजस्व के 18 नवंबर 2023 के आदेश पर अगले आदेश तक रोक लगाते हुए आगरा स्थित 132 वर्ग गज के मकान का कब्जा याचियों को तत्काल लौटाने का निर्देश दिया गया। साथ ही, याचियों को संपत्ति बेचने, तीसरे पक्ष का अधिकार बनाने या उसे दोबारा बंधक रखने से रोका गया।

राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है और अगली सुनवाई 22 अक्टूबर को निर्धारित बताई गई है।

अब मामले की आगे की सुनवाई में यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित वित्तीय संस्था पर लागू वैधानिक प्रावधानों और आरबीआई की अधिसूचना के आधार पर सरफेसी एक्ट के तहत की गई कार्रवाई वैध थी या नहीं।

यह मामला कर्जदारों को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक करने के साथ-साथ वित्तीय संस्थाओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि ऋण वसूली की प्रक्रिया में कानून का पालन करना अनिवार्य है। हालांकि, अंतिम कानूनी स्थिति के लिए न्यायालय के विस्तृत आदेश और आगे की कार्यवाही का अध्ययन आवश्यक रहेगा।

महत्वपूर्ण कानूनी सूचना: यह लेख उपलब्ध समाचार विवरण के आधार पर तैयार किया गया है। किसी विशिष्ट ऋण या संपत्ति विवाद में कानूनी कदम उठाने से पहले संबंधित अधिसूचना, न्यायालय के मूल आदेश और मामले के दस्तावेजों की जांच कर योग्य अधिवक्ता से सलाह लें।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।