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मध्य प्रदेश में शिक्षक भर्ती का बड़ा फर्जीवाड़ा: 51 शिक्षकों की नौकरी पर संकट, 100 करोड़ रुपये तक वेतन वसूली की तैयारी

मध्य प्रदेश में शिक्षक भर्ती का बड़ा फर्जीवाड़ा: 51 शिक्षकों की नौकरी पर संकट, 100 करोड़ रुपये तक वेतन वसूली की तैयारी

इंदौर, मध्य प्रदेश। सरकारी नौकरी पाने के लिए लाखों युवा दिन-रात मेहनत करते हैं। कोई प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में वर्षों लगा देता है, तो कोई शिक्षक बनने के लिए आवश्यक शैक्षणिक योग्यता हासिल करने में अपनी पूरी ताकत लगा देता है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति कथित रूप से फर्जी डिग्री और अंकसूचियों के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल कर ले और वर्षों तक सरकारी खजाने से वेतन प्राप्त करता रहे, तो यह भर्ती व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के सांवेर विकासखंड से सामने आया शिक्षक भर्ती से जुड़ा मामला इसी कारण चर्चा में है। यहां वर्ष 2006-07 में हुई संविदा शाला शिक्षक भर्ती के दौरान नियुक्त 51 शिक्षकों के डीएड और बीएड से संबंधित शैक्षणिक दस्तावेज जांच में कथित रूप से फर्जी पाए गए हैं। अब शिक्षा विभाग इन शिक्षकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने और नौकरी के दौरान दिए गए वेतन की वसूली की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की तैयारी कर रहा है।

प्रारंभिक अनुमान के अनुसार, वेतन वसूली की राशि करीब 100 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। हालांकि, यह अंतिम राशि नहीं है। प्रत्येक शिक्षक की नियुक्ति की तारीख, सेवा अवधि, वेतन वृद्धि, पदोन्नति और वास्तव में प्राप्त वेतन की गणना के बाद ही वसूली की वास्तविक रकम निर्धारित हो सकेगी।

इस मामले में सबसे गंभीर सवाल यह है कि यदि नियुक्ति के समय शैक्षणिक दस्तावेजों का उचित सत्यापन किया गया होता, तो क्या कथित फर्जीवाड़े को रोका जा सकता था? आखिर ऐसी नियुक्तियां लगभग दो दशक तक जांच के दायरे से बाहर कैसे रहीं? और अब यदि दस्तावेज फर्जी होने की पुष्टि होती है, तो संबंधित शिक्षकों तथा नियुक्ति प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध क्या कार्रवाई होगी?

1. क्या है मध्य प्रदेश का पूरा शिक्षक भर्ती घोटाला?

मामला इंदौर जिले के सांवेर विकासखंड में वर्ष 2006-07 के दौरान हुई संविदा शाला शिक्षक भर्ती से संबंधित है। उस समय सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्तियां की गई थीं। नियुक्ति पाने वाले अभ्यर्थियों को निर्धारित शैक्षणिक योग्यताओं से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने होते थे।

शिक्षक पद के लिए डीएड और बीएड जैसी व्यावसायिक शैक्षणिक योग्यताएं महत्वपूर्ण होती हैं। इन पाठ्यक्रमों की डिग्री या प्रमाणपत्र की वैधता नियुक्ति के नियमों और संबंधित पद के लिए निर्धारित योग्यता पर निर्भर करती है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बाद में शिकायत मिलने पर नियुक्ति के समय जमा किए गए शैक्षणिक दस्तावेजों का सत्यापन कराया गया। इस जांच में 51 शिक्षकों की डीएड और बीएड से संबंधित डिग्रियों तथा अंकसूचियों में गंभीर अनियमितताएं सामने आईं।

आरोप है कि संबंधित शिक्षकों ने इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर सरकारी नौकरी प्राप्त की थी। यदि जांच में यह साबित होता है कि नियुक्ति के लिए जानबूझकर फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया, तो मामला केवल सेवा नियमों के उल्लंघन तक सीमित नहीं रहेगा। परिस्थितियों के अनुसार आपराधिक कार्रवाई का प्रश्न भी उठ सकता है।

फिलहाल मामले में अंतिम कानूनी निष्कर्ष संबंधित जांच, दस्तावेजों के सत्यापन और सक्षम अधिकारियों की कार्रवाई पर निर्भर करेगा। किसी व्यक्ति के विरुद्ध आरोप सामने आना और न्यायिक प्रक्रिया में उसका दोष सिद्ध होना अलग-अलग बातें हैं।

2. वर्ष 2021 में हुई शिकायत के बाद शुरू हुई जांच

इस मामले की शिकायत वर्ष 2021 में की गई थी। शिकायत के बाद शिक्षा विभाग ने नियुक्ति के समय प्रस्तुत किए गए शैक्षणिक प्रमाणपत्रों और अंकसूचियों की जांच शुरू कराई।

सरकारी भर्ती में प्रस्तुत दस्तावेजों का सत्यापन इसलिए जरूरी होता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अभ्यर्थी ने निर्धारित योग्यता किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से प्राप्त की है और उसके प्रमाणपत्र वास्तविक हैं।

शिक्षक भर्ती में यह प्रक्रिया विशेष महत्व रखती है, क्योंकि नियुक्त व्यक्ति को बच्चों की शिक्षा से जुड़ी जिम्मेदारी सौंपी जाती है।

सांवेर के मामले में दस्तावेजों की जांच के दौरान कई विसंगतियां सामने आने की जानकारी दी गई है। बताया गया कि कुछ अंकसूचियां मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा जारी ही नहीं की गई थीं। कुछ अन्य दस्तावेजों में एक ही रोल नंबर पर दूसरे परीक्षार्थी की जानकारी मिली।

यदि किसी अंकसूची पर दर्ज रोल नंबर, परीक्षार्थी का नाम या परीक्षा संबंधी विवरण आधिकारिक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता, तो उसकी प्रामाणिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

हालांकि, किसी दस्तावेज में त्रुटि मिलने और उसे जानबूझकर फर्जी बनाकर इस्तेमाल करने के बीच अंतर होता है। इसलिए प्रत्येक संबंधित शिक्षक के दस्तावेजों का अलग-अलग परीक्षण करना और यह पता लगाना आवश्यक है कि कथित अनियमितता किस प्रकार हुई।

3. चार प्राचार्यों की समिति ने मई 2024 में सौंपी रिपोर्ट

दस्तावेजों की जांच के लिए चार प्राचार्यों की एक समिति गठित की गई थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, समिति ने मई 2024 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

समिति का काम संबंधित शैक्षणिक दस्तावेजों की जांच करना और सामने आई अनियमितताओं के बारे में रिपोर्ट तैयार करना था।

इस तरह की जांच में मूल अंकसूचियों, प्रमाणपत्रों, परीक्षा रिकॉर्ड और संबंधित शैक्षणिक संस्थानों से प्राप्त जानकारी का मिलान महत्वपूर्ण होता है। यदि किसी दस्तावेज के जारी होने का रिकॉर्ड ही उपलब्ध न हो, तो संबंधित बोर्ड या संस्थान से आधिकारिक पुष्टि लेना आवश्यक होता है।

समिति की रिपोर्ट के बाद मामले की गंभीरता बढ़ गई। इसके अतिरिक्त, विशेष कार्य बल यानी एसटीएफ की जांच में भी संबंधित दस्तावेजों के फर्जी होने की जानकारी सामने आने का उल्लेख किया गया है।

इस मामले में जांच एजेंसियों की रिपोर्ट और आधिकारिक रिकॉर्ड यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण होंगे कि किन दस्तावेजों में किस प्रकार की गड़बड़ी थी और उनका इस्तेमाल नियुक्ति प्राप्त करने के लिए किया गया था या नहीं।

4. 51 शिक्षकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश

जिला शिक्षा अधिकारी शौर्य मल्होत्रा ने संबंधित संकुल प्राचार्यों और विकासखंड शिक्षा अधिकारी को 51 शिक्षकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं।

जानकारी के अनुसार, इससे पहले सितंबर 2024 में भी प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन उस समय एफआईआर दर्ज नहीं हो सकी थी।

अब दोबारा कार्रवाई की तैयारी ने इस मामले को चर्चा में ला दिया है।

एफआईआर दर्ज होने का उद्देश्य कथित अपराध की औपचारिक जांच को आगे बढ़ाना और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कानूनी कार्रवाई करना होता है। प्राथमिकी दर्ज होने मात्र से किसी आरोपी का दोष सिद्ध नहीं हो जाता। जांच के बाद पुलिस या संबंधित जांच एजेंसी को साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई करनी होती है।

यदि यह साबित होता है कि किसी व्यक्ति ने जानबूझकर जाली दस्तावेज तैयार किए या उन्हें असली बताकर सरकारी नौकरी हासिल करने के लिए इस्तेमाल किया, तो उसके विरुद्ध लागू कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है।

साथ ही, यह भी जांच का विषय हो सकता है कि दस्तावेजों के सत्यापन में किसी अधिकारी की लापरवाही हुई थी या किसी स्तर पर जानबूझकर अनियमितता को नजरअंदाज किया गया।

यदि नियुक्ति प्रक्रिया में अन्य लोगों की भूमिका के प्रमाण मिलते हैं, तो उनकी जिम्मेदारी भी उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर निर्धारित की जा सकती है।

5. करीब 100 करोड़ रुपये की वेतन वसूली का अनुमान

इस मामले का सबसे चर्चित पहलू वेतन वसूली का अनुमान है। शिक्षा विभाग संबंधित शिक्षकों को उनकी सेवा अवधि के दौरान भुगतान किए गए वेतन की गणना करने की तैयारी कर रहा है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, संबंधित शिक्षक लगभग दो दशकों से सरकारी विद्यालयों में कार्यरत रहे हैं। वर्तमान में उनके मासिक वेतन की राशि लगभग 50 हजार रुपये से एक लाख रुपये के बीच बताई गई है।

इन शिक्षकों में कुछ ऐसे भी बताए जा रहे हैं, जिन्हें सेवा के दौरान पदोन्नति मिली है।

लंबी सेवा अवधि, नियमित वेतन वृद्धि, पदोन्नति और अन्य अनुमन्य भुगतान को ध्यान में रखते हुए कुल वसूली का प्रारंभिक अनुमान करीब 100 करोड़ रुपये तक बताया गया है।

लेकिन इस राशि को अंतिम या प्रमाणित वसूली राशि नहीं माना जाना चाहिए। वास्तविक रकम निकालने के लिए प्रत्येक शिक्षक की सेवा पुस्तिका, नियुक्ति की तारीख, वेतन निर्धारण, पदोन्नति और प्राप्त भुगतान का अलग-अलग हिसाब तैयार करना होगा।

यह भी महत्वपूर्ण है कि वेतन की वसूली का कानूनी आधार क्या होगा और प्रत्येक कर्मचारी के मामले में कौन-सा आदेश पारित किया जाता है।

यदि नियुक्ति फर्जी दस्तावेजों के आधार पर अवैध पाई जाती है, तो सेवा समाप्ति और वेतन वसूली से जुड़े प्रश्न उठ सकते हैं। लेकिन वसूली की सीमा, प्रक्रिया और संबंधित कर्मचारी को उपलब्ध कानूनी अवसर लागू नियमों तथा मामले की परिस्थितियों के अनुसार तय होंगे।

इसलिए 100 करोड़ रुपये का आंकड़ा फिलहाल अनुमान के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

6. क्या सरकारी नौकरी मिलने के बाद पूरा वेतन वापस करना पड़ सकता है?

यह इस मामले से जुड़ा महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न है।

सामान्य रूप से, यदि किसी व्यक्ति ने जानबूझकर गलत जानकारी या फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी नियुक्ति प्राप्त की हो, तो उसकी नियुक्ति रद्द करने और उसके विरुद्ध अन्य कानूनी कार्रवाई करने का आधार बन सकता है।

लेकिन नौकरी समाप्त करना और पहले से दिए गए पूरे वेतन की वसूली करना दो अलग-अलग प्रश्न हैं।

वेतन वसूली के मामले में यह देखना आवश्यक होता है कि नियुक्ति किन परिस्थितियों में हुई, संबंधित कर्मचारी की भूमिका क्या थी, दस्तावेजों की प्रामाणिकता के बारे में उसे जानकारी थी या नहीं और लागू सेवा नियम क्या कहते हैं।

यदि जानबूझकर धोखाधड़ी करके नियुक्ति प्राप्त करने का आरोप प्रमाणित होता है, तो संबंधित व्यक्ति की जिम्मेदारी निर्धारित करने के लिए तथ्य महत्वपूर्ण होंगे।

दूसरी ओर, सरकारी कर्मचारियों से वेतन वसूली के मामले में न्यायालयों ने विभिन्न परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग सिद्धांत लागू किए हैं। विशेष रूप से गलत वेतन निर्धारण के कारण हुई अधिक अदायगी और धोखाधड़ी से प्राप्त नियुक्ति के मामलों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।

इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि प्रत्येक शिक्षक से बिना किसी अलग प्रक्रिया के पूरे कार्यकाल का वेतन अनिवार्य रूप से वसूल कर लिया जाएगा।

सांवेर मामले में संबंधित शिक्षकों के विरुद्ध दस्तावेजों की जांच, नियुक्ति की वैधता और लागू नियमों के आधार पर निर्णय लिया जाना बाकी है। अंतिम परिणाम संबंधित आदेशों और कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

7. लोकायुक्त की जांच में 74 शिक्षकों का रिकॉर्ड मांगा गया

इस मामले में लोकायुक्त की जांच भी जारी होने की जानकारी सामने आई है।

बताया गया है कि लोकायुक्त ने शिक्षा विभाग से कुल 74 शिक्षकों का रिकॉर्ड मांगा है। इनमें 51 शिक्षकों के दस्तावेज फर्जी पाए जाने की जानकारी दी गई है, जबकि शेष 23 शिक्षकों के दस्तावेजों की जांच अभी जारी है।

इससे स्पष्ट होता है कि जांच का दायरा केवल उन 51 शिक्षकों तक सीमित नहीं है, जिनके दस्तावेजों पर गंभीर सवाल उठे हैं।

अन्य 23 शिक्षकों के रिकॉर्ड की जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि उनके मामलों में भी कोई अनियमितता सामने आती है या नहीं।

लोकायुक्त जैसी जांच संस्था का उद्देश्य संबंधित शिकायतों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मामले की जांच करना होता है। यदि जांच के दौरान भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग या अन्य किसी अपराध से जुड़े साक्ष्य मिलते हैं, तो लागू कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई हो सकती है।

हालांकि, जांच जारी होने का अर्थ यह नहीं है कि रिकॉर्ड मांगे गए सभी व्यक्ति दोषी हैं। प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका और उसके विरुद्ध उपलब्ध साक्ष्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन आवश्यक है।

8. इतने वर्षों तक फर्जी दस्तावेजों की पहचान क्यों नहीं हो सकी?

इस पूरे मामले का एक अहम सवाल यही है कि यदि शैक्षणिक दस्तावेज वास्तव में फर्जी थे, तो नियुक्ति के समय उनका सत्यापन कैसे हुआ?

सरकारी भर्ती प्रक्रिया में दस्तावेजों की जांच केवल औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। संबंधित बोर्ड, विश्वविद्यालय या शैक्षणिक संस्थान से प्रमाणपत्रों की पुष्टि कराना भर्ती प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यदि किसी अंकसूची पर दर्ज रोल नंबर आधिकारिक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता या संबंधित बोर्ड उस दस्तावेज को जारी करने से इनकार करता है, तो ऐसी विसंगतियों का समय रहते पता लगाया जा सकता है।

इस मामले में लगभग दो दशक बाद अनियमितताओं का सामने आना सत्यापन प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है।

जांच में यह पता लगाना आवश्यक होगा कि नियुक्ति के समय दस्तावेजों की जांच किस स्तर पर की गई थी, किन अधिकारियों ने सत्यापन किया था और उपलब्ध रिकॉर्ड के बावजूद कथित गड़बड़ी सामने क्यों नहीं आई।

यदि किसी अधिकारी ने जानबूझकर गलत दस्तावेजों को सही मानकर नियुक्ति की अनुमति दी थी, तो उसकी भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। वहीं, यदि कोई अनियमितता प्रशासनिक लापरवाही के कारण हुई, तो उसके लिए जिम्मेदारी तय करने का प्रश्न अलग होगा।

ऐसी जांच से न केवल वर्तमान मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है, बल्कि भविष्य की शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में सुधार के रास्ते भी खुल सकते हैं।

9. शिक्षक भर्ती में फर्जी डिग्री का मामला शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर क्यों?

शिक्षक केवल एक सरकारी कर्मचारी नहीं होता। उसके ऊपर बच्चों के शैक्षणिक विकास और भविष्य को दिशा देने की जिम्मेदारी होती है।

इसलिए शिक्षक पद पर नियुक्ति के लिए निर्धारित शैक्षणिक योग्यताओं का पालन आवश्यक है। यदि कोई अभ्यर्थी फर्जी प्रमाणपत्रों के माध्यम से नियुक्ति प्राप्त करता है, तो इससे उन उम्मीदवारों के साथ अन्याय हो सकता है, जिन्होंने वास्तविक योग्यता हासिल करने के लिए मेहनत की और भर्ती प्रक्रिया में हिस्सा लिया।

ऐसी घटनाएं सरकारी भर्ती की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करती हैं।

इसके अतिरिक्त, यदि दस्तावेज सत्यापन में लंबे समय तक कमियां बनी रहती हैं, तो प्रशासनिक व्यवस्था पर जनता का भरोसा कमजोर हो सकता है।

इस समस्या का समाधान केवल आरोपियों के विरुद्ध कार्रवाई तक सीमित नहीं होना चाहिए। भर्ती प्रक्रिया में डिजिटल सत्यापन, संबंधित संस्थानों के साथ रिकॉर्ड का नियमित मिलान और नियुक्ति के बाद भी दस्तावेजों की प्रामाणिकता की जांच जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करना आवश्यक है।

जहां किसी गड़बड़ी के प्रमाण मिलें, वहां समयबद्ध जांच और नियमों के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

साथ ही, किसी कर्मचारी के विरुद्ध कार्रवाई करने से पहले तथ्यों की पुष्टि और उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना भी उतना ही जरूरी है।

10. आगे क्या हो सकता है?

इस मामले में आगे की कार्रवाई मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण पहलुओं पर निर्भर करेगी।

पहला, संबंधित 51 शिक्षकों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज होने और जांच आगे बढ़ने से कथित फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल की परिस्थितियां स्पष्ट हो सकती हैं।

दूसरा, शिक्षा विभाग प्रत्येक शिक्षक की नियुक्ति और सेवा संबंधी रिकॉर्ड की समीक्षा करके सेवा समाप्ति तथा वेतन वसूली से जुड़े प्रश्नों पर निर्णय ले सकता है। यह कार्रवाई लागू नियमों और संबंधित मामले के तथ्यों के अनुसार होनी चाहिए।

तीसरा, लोकायुक्त की जांच में मांगे गए 74 शिक्षकों के रिकॉर्ड का परीक्षण पूरा होने के बाद अन्य संभावित अनियमितताओं के बारे में भी स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

जांच के दौरान यह पता लगाना भी आवश्यक होगा कि कथित फर्जी दस्तावेज कहां तैयार किए गए, उनका इस्तेमाल किस प्रकार हुआ और नियुक्ति प्रक्रिया में किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका थी या नहीं।

यदि आपराधिक आरोप प्रमाणित होते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध लागू कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जा सकती है।

फिलहाल वेतन वसूली की अंतिम राशि और प्रत्येक शिक्षक के मामले में होने वाली कार्रवाई स्पष्ट होना बाकी है।

निष्कर्ष

इंदौर जिले के सांवेर विकासखंड का यह मामला सरकारी भर्ती व्यवस्था और दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया के लिए एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। वर्ष 2006-07 में नियुक्त हुए 51 शिक्षकों के शैक्षणिक दस्तावेजों में कथित फर्जीवाड़े की जानकारी सामने आने के बाद अब एफआईआर और वेतन वसूली की तैयारी की जा रही है।

करीब 100 करोड़ रुपये की संभावित वसूली का अनुमान इस मामले को और महत्वपूर्ण बनाता है। हालांकि, अंतिम राशि का निर्धारण संबंधित शिक्षकों की सेवा अवधि और प्राप्त वेतन की गणना के बाद ही हो सकेगा।

मामले में लोकायुक्त की जांच भी जारी है और कुल 74 शिक्षकों के रिकॉर्ड मांगे जाने की जानकारी सामने आई है। इससे स्पष्ट है कि जांच का दायरा आगे बढ़ सकता है।

अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि जांच निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से पूरी हो, दस्तावेजों की वास्तविकता प्रमाणित की जाए और जिन लोगों की जिम्मेदारी सामने आए, उनके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई हो।

यदि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नियुक्ति प्राप्त करने के आरोप प्रमाणित होते हैं, तो यह केवल सेवा संबंधी अनियमितता नहीं, बल्कि सरकारी भर्ती की निष्पक्षता और सार्वजनिक धन के उपयोग से जुड़ा गंभीर मामला होगा।

साथ ही, किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले उसे कानून के अनुसार अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। यही निष्पक्ष जांच और न्यायपूर्ण प्रशासन की मूल कसौटी है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।