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दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 26 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की नाबालिग को मिली अनुमति

दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 26 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की नाबालिग को मिली अनुमति, अनुच्छेद 21 के तहत अधिकारों पर जोर

      किसी नाबालिग के साथ यौन उत्पीड़न हो और उसके बाद उसे गर्भावस्था जैसी गंभीर परिस्थिति का सामना करना पड़े, तो यह केवल एक चिकित्सकीय मामला नहीं रह जाता। ऐसी स्थिति में उसके स्वास्थ्य, मानसिक स्थिति, गरिमा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और भविष्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल सामने आते हैं। यदि पीड़िता को उसके माता-पिता का सहयोग भी प्राप्त न हो, तो उसकी कठिनाइयां और बढ़ जाती हैं।

इसी तरह के एक संवेदनशील मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने 16 वर्षीय नाबालिग को लगभग 26 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति प्रदान की। नाबालिग के माता-पिता ने उसे छोड़ दिया था और वह अपने मामा तथा नानी की देखरेख में रह रही थी। उसके मामा ने अदालत में याचिका दायर कर गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति मांगी थी।

न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की पीठ ने मामले की परिस्थितियों और मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी। अदालत ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। इसमें सम्मानपूर्वक जीवन जीने, अपने जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लेने और प्रजनन संबंधी विकल्पों का अधिकार भी शामिल है।

इस मामले का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि गर्भावस्था 24 सप्ताह की सामान्य वैधानिक सीमा से आगे बढ़ चुकी थी। इसके बावजूद नाबालिग की उम्र, स्वास्थ्य संबंधी जोखिम और विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने अपने संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल किया।

1. क्या है पूरा मामला?

समाचार में उपलब्ध जानकारी के अनुसार, संबंधित नाबालिग की उम्र 16 वर्ष थी। उसके माता-पिता ने वर्ष 2022 में उसे छोड़ दिया था। इसके बाद से वह अपने मामा और नानी की देखरेख में रह रही थी।

नाबालिग यौन उत्पीड़न की शिकार हुई और गर्भवती हो गई। मामले की संवेदनशीलता इस तथ्य से और बढ़ गई कि मेडिकल बोर्ड ने उसे मानसिक रूप से अक्षम बताया। बोर्ड के अनुसार, वह यौन उत्पीड़न की घटना और अपनी गर्भावस्था की स्थिति को समझने में असमर्थ थी।

ऐसी परिस्थितियों में गर्भावस्था जारी रखने या उसे समाप्त करने का प्रश्न केवल सामान्य चिकित्सकीय निर्णय तक सीमित नहीं था। इसमें नाबालिग की शारीरिक सुरक्षा, मानसिक स्थिति और उसके सर्वोत्तम हितों का आकलन करना आवश्यक था।

नाबालिग के मामा ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की। अदालत के समक्ष मांग रखी गई कि गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी जाए, क्योंकि इसे जारी रखने से नाबालिग के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता था।

अदालत ने मामले की परिस्थितियों का मूल्यांकन करने के लिए मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर विचार किया। चिकित्सा विशेषज्ञों की राय ने इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

2. मेडिकल जांच में क्या सामने आया?

मामले में गठित मेडिकल बोर्ड ने अदालत को बताया कि नाबालिग की गर्भावस्था लगभग 25 सप्ताह और एक दिन की थी। समाचार विवरण के अनुसार, 28 सितंबर को दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल में उसकी जांच की गई थी।

मेडिकल बोर्ड ने गर्भावस्था को समाप्त करने की संभावना पर विचार करते हुए कहा कि चिकित्सकीय प्रक्रिया संभव थी, लेकिन इसमें जोखिम भी था।

बोर्ड की रिपोर्ट में नाबालिग की कम उम्र को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना गया। इसके अतिरिक्त, उसकी रीढ़ की हड्डी में लॉर्डोटिक असामान्यता होने की जानकारी सामने आई। उसकी फेफड़ों की कार्यक्षमता की जांच भी नहीं हो पा रही थी।

इन परिस्थितियों ने चिकित्सकों के सामने गर्भावस्था जारी रखने और उसे समाप्त करने, दोनों विकल्पों के जोखिमों का मूल्यांकन करने की चुनौती पैदा की।

मेडिकल बोर्ड की राय थी कि गर्भावस्था जारी रखने से नाबालिग के स्वास्थ्य को अधिक खतरा हो सकता है। दूसरी ओर, गर्भावस्था समाप्त करने की प्रक्रिया भी जोखिम से पूरी तरह मुक्त नहीं थी।

ऐसे मामलों में डॉक्टरों के लिए केवल गर्भावस्था की अवधि देखना पर्याप्त नहीं होता। गर्भवती व्यक्ति की उम्र, मौजूदा स्वास्थ्य समस्याएं, गर्भावस्था से जुड़े जोखिम और आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण होती हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट के सामने यही सवाल था कि कानून में निर्धारित सामान्य समय-सीमा से आगे बढ़ चुकी गर्भावस्था के मामले में नाबालिग के स्वास्थ्य और अधिकारों की रक्षा किस प्रकार की जाए।

3. 24 सप्ताह की सीमा के बाद गर्भपात की अनुमति कैसे मिली?

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू गर्भावस्था की अवधि है।

भारत में गर्भावस्था की चिकित्सकीय समाप्ति को मुख्य रूप से मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 यानी MTP Act के तहत नियंत्रित किया जाता है। इस कानून में यह निर्धारित किया गया है कि किन परिस्थितियों में और किस प्रक्रिया के तहत गर्भावस्था समाप्त की जा सकती है।

कानून के अंतर्गत सामान्यतः निर्धारित परिस्थितियों में 20 सप्ताह तक गर्भावस्था समाप्त करने के लिए एक पंजीकृत चिकित्सक की राय आवश्यक होती है। 20 सप्ताह से अधिक और 24 सप्ताह तक कुछ निर्धारित श्रेणियों के मामलों में दो पंजीकृत चिकित्सकों की राय की आवश्यकता होती है।

इन विशेष श्रेणियों में यौन उत्पीड़न, बलात्कार या नाबालिग होने जैसी परिस्थितियां शामिल हो सकती हैं। हालांकि, गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति संबंधित वैधानिक शर्तों के अधीन होती है।

लेकिन जब गर्भावस्था 24 सप्ताह से आगे बढ़ जाती है, तो मामला अधिक जटिल हो सकता है।

MTP Act की धारा 3(2B) में कुछ विशेष परिस्थितियों में गर्भावस्था की अवधि की सीमा से संबंधित अपवाद दिया गया है। उदाहरण के लिए, गर्भस्थ शिशु में गंभीर असामान्यता का निदान होने पर कानून के अंतर्गत निर्धारित मेडिकल बोर्ड की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

इसके अतिरिक्त, जहां गर्भवती महिला के जीवन को बचाने के लिए तत्काल गर्भावस्था समाप्त करना आवश्यक हो, वहां धारा 5 के प्रावधान प्रासंगिक हो सकते हैं।

हालांकि, इन वैधानिक अपवादों की अपनी निर्धारित शर्तें हैं। प्रत्येक 24 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था को केवल अदालत में याचिका दायर करने के आधार पर समाप्त करने की अनुमति नहीं मिल जाती।

वर्तमान मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने नाबालिग की विशेष परिस्थितियों और उसके स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को ध्यान में रखते हुए अपने संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल किया।

इसलिए इस फैसले को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि अदालत ने संबंधित मामले के तथ्यों पर विचार करके राहत दी। इसे सभी मामलों में 24 सप्ताह की सीमा स्वतः समाप्त हो जाने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

4. अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है कि किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है।

समय के साथ सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुच्छेद की व्यापक व्याख्या की है। अब जीवन के अधिकार को केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसमें मानवीय गरिमा, स्वास्थ्य और सम्मानपूर्वक जीवन जीने जैसे पहलुओं को भी महत्व दिया गया है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में अनुच्छेद 21 के महत्व को रेखांकित किया। अदालत के अनुसार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता में अपने जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लेने और प्रजनन संबंधी विकल्पों का अधिकार भी शामिल है।

प्रजनन संबंधी स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति के शरीर, गर्भावस्था और प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े निर्णयों में उसकी गरिमा तथा स्वायत्तता को महत्व दिया जाना चाहिए।

हालांकि, इस अधिकार का प्रयोग कानून के अधीन होता है। गर्भावस्था समाप्त करने के मामले में लागू वैधानिक शर्तों, चिकित्सकीय राय और आवश्यक सुरक्षा उपायों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

नाबालिग के मामले में यह प्रश्न और संवेदनशील हो जाता है, क्योंकि उसकी उम्र और निर्णय लेने की क्षमता से संबंधित परिस्थितियों पर भी विचार करना आवश्यक है।

इसलिए अनुच्छेद 21 यहां केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सामान्य सिद्धांत नहीं है, बल्कि नाबालिग के स्वास्थ्य, गरिमा और जीवन की गुणवत्ता से जुड़े प्रश्नों पर विचार करने का संवैधानिक आधार भी प्रदान करता है।

5. क्या नाबालिग की मानसिक स्थिति भी महत्वपूर्ण थी?

हां, मामले में मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट का यह पहलू विशेष महत्व रखता था।

बोर्ड ने बताया कि नाबालिग मानसिक रूप से अक्षम थी और यौन उत्पीड़न तथा गर्भावस्था की स्थिति को समझने में असमर्थ थी।

इस प्रकार की चिकित्सकीय जानकारी किसी मामले के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण हो सकती है। इससे यह समझने में सहायता मिलती है कि संबंधित व्यक्ति अपनी स्थिति को किस हद तक समझ पा रहा है और उसे किस प्रकार की देखभाल की आवश्यकता है।

हालांकि, मानसिक अक्षमता से संबंधित निष्कर्ष किसी व्यक्ति के सभी अधिकारों को समाप्त नहीं कर देते। इसके विपरीत, ऐसी स्थिति में उसके हितों की रक्षा करने और निर्णय लेने की प्रक्रिया को कानून के अनुरूप संचालित करने की आवश्यकता और बढ़ जाती है।

नाबालिग के सर्वोत्तम हितों का आकलन करते समय उसकी शारीरिक सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, चिकित्सकीय आवश्यकताओं और उपलब्ध देखभाल को ध्यान में रखना जरूरी है।

इस मामले में माता-पिता के सहयोग की अनुपस्थिति भी एक महत्वपूर्ण सामाजिक परिस्थिति थी। जब किसी बच्चे को उसके अपने माता-पिता का संरक्षण प्राप्त नहीं होता, तो परिवार के अन्य सदस्यों और संबंधित संस्थाओं की भूमिका बढ़ जाती है।

अदालत के सामने यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी थी कि नाबालिग को ऐसी स्थिति में अनावश्यक रूप से असुरक्षित न छोड़ा जाए।

6. क्या पिता की तलाश का इंतजार करना उचित होता?

समाचार में उपलब्ध विवरण के अनुसार, अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि नाबालिग की परिस्थितियों में केवल पिता की तलाश या उसके सामने आने का इंतजार करना उचित समाधान नहीं होगा।

इस टिप्पणी का महत्व इसलिए है, क्योंकि गर्भावस्था से संबंधित चिकित्सकीय निर्णय समय के साथ और अधिक जटिल हो सकते हैं। गर्भावस्था की अवधि बढ़ने पर स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों, उपलब्ध चिकित्सा विकल्पों और लागू कानूनी प्रावधानों का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ सकता है।

यदि किसी नाबालिग को यौन उत्पीड़न के कारण गर्भावस्था का सामना करना पड़ रहा हो और उसके माता-पिता उसकी देखभाल नहीं कर रहे हों, तो उसकी चिकित्सा संबंधी जरूरतों को अनिश्चितकाल तक टालना उसके हित में नहीं होगा।

हालांकि, ऐसे मामलों में माता-पिता या अभिभावक की भूमिका, नाबालिग की निर्णय क्षमता और न्यायिक अनुमति से संबंधित प्रश्न लागू कानून तथा मामले के तथ्यों के आधार पर तय किए जाते हैं।

महत्वपूर्ण यह है कि नाबालिग की सुरक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए आवश्यक निर्णय समय पर लिए जाएं।

इस मामले में अदालत ने संबंधित परिस्थितियों और मेडिकल बोर्ड की राय पर विचार करके गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी।

7. लोक नायक अस्पताल को क्या निर्देश दिए गए?

दिल्ली हाईकोर्ट ने लोक नायक अस्पताल को निर्देश दिया कि गर्भावस्था समाप्त करने की प्रक्रिया जल्द से जल्द पूरी की जाए।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रक्रिया के दौरान आवश्यक चिकित्सकीय सावधानियों, मेडिकल प्रोटोकॉल और कानून द्वारा निर्धारित सुरक्षा उपायों का पालन किया जाना चाहिए।

यह निर्देश महत्वपूर्ण है, क्योंकि गर्भावस्था की अधिक अवधि में चिकित्सकीय प्रक्रिया को सावधानीपूर्वक संचालित करना आवश्यक होता है।

गर्भावस्था समाप्त करने का निर्णय केवल कानूनी अनुमति प्राप्त करने तक सीमित नहीं रहता। इसके बाद चिकित्सकों को संबंधित व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति के अनुरूप उपचार की योजना बनानी होती है।

इसमें प्रक्रिया से पहले स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों का आकलन, उपयुक्त चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता, प्रक्रिया के दौरान निगरानी और बाद में आवश्यक देखभाल शामिल हो सकती है।

विशेष रूप से कम उम्र की गर्भवती नाबालिग के मामले में विशेषज्ञ चिकित्सकीय देखरेख और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहयोग भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

अदालत द्वारा अस्पताल को दिए गए निर्देशों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कानूनी राहत को सुरक्षित और चिकित्सकीय रूप से उचित तरीके से लागू किया जाए।

8. यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़ितों के अधिकार

यौन उत्पीड़न की शिकार नाबालिगों के मामलों में न्याय व्यवस्था के सामने कई तरह की चुनौतियां होती हैं। उन्हें चिकित्सा सहायता, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहयोग, सुरक्षा और कानूनी संरक्षण की आवश्यकता हो सकती है।

ऐसे मामलों में पीड़िता को दोषी ठहराने या उसकी परिस्थितियों के लिए उसे जिम्मेदार मानने के बजाय उसके अधिकारों और जरूरतों पर ध्यान देना आवश्यक है।

यदि पीड़िता गर्भवती हो जाती है, तो गर्भावस्था से संबंधित निर्णय उसके स्वास्थ्य, उम्र, परिस्थितियों और लागू कानून के अनुसार लिए जाने चाहिए।

भारत में MTP Act गर्भावस्था समाप्त करने के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करता है। इसके साथ ही, नाबालिगों के यौन उत्पीड़न से संबंधित मामलों में पॉक्सो अधिनियम, 2012 यानी Protection of Children from Sexual Offences Act भी महत्वपूर्ण है।

पॉक्सो अधिनियम बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण देने के उद्देश्य से बनाया गया है। इसमें बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों से संबंधित कानूनी प्रावधान निर्धारित किए गए हैं।

ऐसे मामलों में पीड़िता की पहचान की गोपनीयता और उसकी गरिमा की रक्षा करना भी आवश्यक है। मीडिया रिपोर्टिंग और सार्वजनिक चर्चा में उसकी पहचान उजागर करने वाली जानकारी प्रकाशित करने से बचना चाहिए।

न्याय का उद्देश्य केवल अपराध के लिए जिम्मेदार व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई करना नहीं है, बल्कि पीड़िता को आवश्यक सहायता और संरक्षण उपलब्ध कराना भी है।

9. इस फैसले का कानूनी महत्व क्या है?

दिल्ली हाईकोर्ट का यह निर्णय कई महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्नों को सामने लाता है।

पहला, यह मामला बताता है कि गर्भावस्था की अवधि 24 सप्ताह से आगे बढ़ने पर भी कुछ विशेष परिस्थितियों में न्यायालय के समक्ष संवैधानिक राहत का प्रश्न उठ सकता है।

दूसरा, यह निर्णय स्वास्थ्य और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों के संदर्भ में अनुच्छेद 21 की भूमिका को रेखांकित करता है।

तीसरा, यह मामला दिखाता है कि मेडिकल बोर्ड की विशेषज्ञ राय गर्भावस्था से जुड़े न्यायिक निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। अदालत को चिकित्सकीय जोखिमों और संबंधित व्यक्ति की परिस्थितियों को समझने में ऐसी रिपोर्ट से सहायता मिलती है।

चौथा, नाबालिग की उम्र, मानसिक स्थिति और पारिवारिक परिस्थितियों का मूल्यांकन भी न्यायिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हो सकता है।

हालांकि, इस फैसले का दायरा समझने के लिए अदालत के मूल आदेश की भाषा और उसमें दिए गए कानूनी कारणों को देखना आवश्यक है। केवल समाचार के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि गर्भावस्था समाप्त करने के संबंध में वैधानिक समय-सीमा अब लागू नहीं रहती।

न्यायिक निर्णयों का सही अर्थ उनके तथ्यों, लागू कानून और अदालत द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के आधार पर ही समझा जा सकता है।

10. निष्कर्ष: नाबालिग का स्वास्थ्य, गरिमा और कानूनी अधिकार सर्वोपरि

दिल्ली हाईकोर्ट का यह मामला दिखाता है कि यौन उत्पीड़न की शिकार नाबालिग के लिए न्याय की प्रक्रिया कितनी जटिल हो सकती है। एक ओर गर्भावस्था की अवधि 24 सप्ताह से अधिक हो चुकी थी, वहीं दूसरी ओर मेडिकल बोर्ड ने उसकी कम उम्र और स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों को देखते हुए गर्भावस्था जारी रखने के जोखिमों की ओर ध्यान दिलाया।

ऐसी स्थिति में अदालत को कानून, चिकित्सकीय राय और नाबालिग के सर्वोत्तम हितों के बीच संतुलन बनाना था।

न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की पीठ ने अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लेख करते हुए गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी और लोक नायक अस्पताल को आवश्यक सावधानियों के साथ प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया।

इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि संवेदनशील मामलों में न्यायिक निर्णय लेते समय केवल सामान्य नियमों को देखना पर्याप्त नहीं होता। संबंधित व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य, मानसिक स्थिति और वास्तविक परिस्थितियों पर भी ध्यान देना आवश्यक है।

हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि इस निर्णय को कानून में निर्धारित 24 सप्ताह की सीमा समाप्त होने के रूप में न समझा जाए। प्रत्येक मामले में लागू वैधानिक प्रावधानों और विशिष्ट परिस्थितियों का मूल्यांकन आवश्यक रहेगा।

अंततः, किसी भी न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता इस बात से भी पहचानी जाती है कि वह कठिन परिस्थितियों में फंसे बच्चों और कमजोर व्यक्तियों के स्वास्थ्य, सम्मान तथा अधिकारों की रक्षा किस प्रकार करती है। दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला इसी व्यापक संवैधानिक और मानवीय प्रश्न को सामने लाता है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।